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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 286 में से

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पृष्ठ 144

३४६ रसिकप्रिया
अथ स्वाधीनपतिका-लक्षण—(दोहा)
(२४१) केसव जाके गुन बँध्यो, सदा रहै पति संग।
स्वाधिनपतिका तासु कों, बरनत प्रेम-प्रसंग। ४।
प्रच्छन्न स्वाधीनपतिका, यथा—(सवैया)
(२४२) केसव जीवन जो ब्रज को पुनि जोवहु तें अति बापहि भावै।
जापर देव-अदेव-कुमारिनि वारत माइ न बार लगावै।
ता हरि पै तूँ गँवार की बेटी महावर पाइ झवाँइ दिवावै।
हौं तौ बची अब हाँसिनहीं ऐसें और जौ देखै तौ ऊतरु आवै।५।
शब्दार्थ—जीवन = प्राण। भावै = अच्छे लगते हैं। माइ = माता।
अदेव = मनुष्य। वारत = न्यौछावर करने में। बार = विलंब। झवाँइ =
झावें से पैर रगड़वाकर। दिवावै = दिलवाती है। हाँसी = उपहास, अप्रतिष्ठा।
ऊतरु आवै = उसे क्या उत्तर दोगी अर्थात् कोई नहीं।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायिका प्रति) हे सखी, जो ब्रजवासियों के
प्राण हैं और जिन्हें पिता भी प्राणों से अधिक प्यारा समझते हैं, जिन पर
उनकी माता देव तथा नर-कुमारियों को न्योछावर कर देने में देर नहीं लगातीं,
ऐसे कृष्ण से भी तू ग्रामवासी की छोकरी (राधिका) होकर पैरों में झावें
से रगड़वाकर महावर लगवाती है। मैं तो केवल हँसकर ही टाल गई। यदि
कोई दूसरा देखेगा तो क्या तुझसे उत्तर बन आएगा? (अर्थात् नहीं)।
प्रकाश स्वाधीनपतिका, यथा—(कबित्त)
(२४३) चोली को सो पान तोहिं करत सँवारिबोई,
मुकुर ज्यों तोहीं बीच मूरति समानी है।
तोहीं तियदेवता पै पायो पति केसौदास,
पतनी बहुत पतिदेवता बखानी है।
तेरे मनोरथ भागीरथ-रथ पाछै पाछै,
डोलत गुपाल मेरे गंग को सो पानी है।
ऐसी बात कौन जो न मानी सुनि मेरी रानी,
उनकें तौ तेरी बानी वेद की सी बानी है।६।
४—तास कों-तास कहें, तास कहि। ५—पुनि-अरु। बापहि-तातहि।
कुमारिनि-कुमारिन। बार०-बारनि लावै। गँवार-अहीर। महावर०-झमाइकेँ
पांइ महावर द्यावै। हौं तौ०-हौंतौ रही बचि, मैं तौ चलो अब। ऐसे-अस, सखि।
तौ-सो।६—को सो-के सो। बीच-मांह। तियदेवता-पतिदेवता। केसौदास-
केसौराइ। तेरे०-मनोरथ रथ भगीरथ रथ पीछे। डोलत०-डोलै नंदलाल।
वेद-देव।