रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ प्रभाव १३५
शब्दार्थ—समयैं बिषै = समय पर भी । तासों = ताकों, उसको ।
अथ श्रीराधिकाजू को विहृत हाव, यथा—( सबैया )
(२१४) मेरे कहे दहिये जु तऊ फिरि ग्रीषम ज्यों हठ-काठ दहौगी ।
पैरिबो प्रेम-समुद्र पराए कराए करें कृत क्यों निबहौगी ।
हौंस मरै सजनी सिगरी कबहुँ हरि सों हँसि बात कहौगी ।
पी-चित की चित्तसारी चढ़ी चित की पुतरी भई कौ लौं रहौगी।३४
शब्दार्थ—दहिये = जलती हो, दुख पाती हो । ग्रीषम = ग्रीष्म, अग्नि ।
हठ-काठ = हठ रूपी लकड़ी । पराए कराए = दूसरे द्वारा ( तैरने को प्रेरित
किए जाने पर ) । करें कृत = कार्य करने पर अर्थात् तैरने पर । दूसरे द्वारा
तैरने को प्रेरित किए जाने पर और दूसरे के तैरने से तुम्हारी तैरने की क्रिया
कैसे होगी । तुम्हें स्वयम् तैरना होगा । हौंस = उत्कंठा, लालसा । पी = प्रिय,
नायक । चित्रसारी = चित्रशाला, शयनगृह । चित = चित्र । पुतरी = पुतली
कौ लौं = कब तक ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका से ) हे सखी, मेरे कहने से यदि
( इस समय ) जल रही हो ( हठ नहीं छोड़ रही हो ) तो भी मुझे विश्वास
है कि ऐसा समय आएगा जब ( भीतरी ) आग से तुम अपने हठ रूपी काठ
को स्वयम् जला डालोगी, अर्थात् जब प्रेम की तीव्र प्रेरणा होगी तो हठ न
रह जाएगा । तुम्हें प्रेमसमुद्र में तैरना है, क्या किसी के पार कराने से या
उसके ही पार करने से वहाँ तुम्हारा निबाह हो जायगा ? ( यह समुद्र तुम्हें
स्वयम् पार करना होगा, दूसरों के भरोसे मत रहो ) । ( उधर ) सारी
सखियाँ इस लालसा में मरी जा रही हैं कि कभी न कभी श्रीकृष्ण से तुम
हँसकर बोलोगी ( इधर तुम्हारा राग कुछ समझ में नहीं आ रहा है ) ।
आखिर, मैं यह पूछती हूँ कि प्रिय के हृदय की चित्रशाला में चित्र में खचित
पुतली के समान कब तक ( जड़ ) बनी रहोगी ।
अलंकार—रूपक ।
श्रीकृष्णजू को विहृत हाव यथा—( सवया )
(२१५) केसवदास सों आजु सखी बृषभानुकुमारी उराहनो दीनो ।
गारि दई अरु मारि दई अरबिंदन सों मनु कै हितहीनो ।
सीख दई, सुख पाइ लई उर लाइ सुगंध चढ़ाइ नवीनो ।
उत्तरु देइ कौं नंदकुमार कछू सिर नीचे तें ऊँचो न कीनो ।३५।
शब्दार्थ—उराहनो = उलाहना, उपालंभ । मारि० = कमलों से मार
दी ( मारा ) । मनु कै० = मन में लगाव कम करके, मन में प्रेम की कमी
करके ( अर्थात् रोष से ) ।
३४—फिरि - तन । पैरिबौ-पौरिबो । करें कृत - किये उत, किये कित ।
चढ़ी चित-चढ़ी चित्र । ३५—केसवदास-केसवराइ । मनु-करि ।