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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 286 में से

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पृष्ठ 140

१४२ रसिकप्रिया
श्रीराधिकाजू को मोट्टाइत हाव, यथा—(सवैया)
(२२६) खेलत हे हरि बागे बने जहाँ बैठी प्रिया रति तें अति लोनी ।
केसव कैसहूँ पीठि में डीठि परी कुच कुंकुम की रुचि रोनी ।
मात-समीप दुराई भले तिनि सातुक-भावनि की गति होनी ।
धूरि कपूर की पूरि बिलोचन सूँघि सरोरुह ओढ़ि उड़ोनी ।४६।
शब्दार्थ—हे = थे । बागे बने = पोशाक पहने । लोनी = सुंदर । रुचि =
शोभा । रोनी = रमणीय, अच्छी । दुराई = छिपाई । तिनि = उन्होंने
(नायिका ने) ।
भावार्थ--(सखी की उक्ति सखी से) श्रीकृष्ण पोशाक पहने वहाँ
खेल रहे थे जहाँ रति से भी बढ़कर सुंदर नायिका बैठी हुई थी । किसी प्रकार
नायिका की दृष्टि श्रीकृष्ण की पीठ (के वस्त्र) पर पड़ी जहाँ स्तनों की केसर
की सुंदर शोभा दिखाई पड़ रही थी (नायिका ने कभी पीछे से नायक को
आलिंगन किया था जिससे स्तनों की केसर का चिह्न उसकी पीठ में लग गया
था) । देखते ही उसे सात्विक भाव हो आया । उन सात्विकों की होनेवाली
गति (उनके प्रकाशित होने को) उसने माता के समीप (होने के कारण)
भली भाँति (इस प्रकार) छिपाया कि कपूर की धूल तो नेत्रों में भर ली,
कमल सूँघ लिया और ओढ़नी ओढ़ लीं (कपूर की धूल से आँसू आते हैं,
कमल सूँघकर उसकी प्रशंसा में सिर हिलाया जाता है और ओढ़नी ओढ़
लेने से चेहरा और शरीर छिप जाता है इस प्रकार चार सात्विक छिपाए
गए-अश्रु, कंप, रोमांच और वैवर्ण्य) ।
अलंकार—युक्ति (केशव के मत से 'लेश') ।
सूचना—'कविप्रिया' में यह छंद लेशालंकार के उदाहरण में दिया
गया है ।
श्रीकृष्णजू को मोट्टाइत हाव, यथा—(सवैया)
(२३०) भोजन कै वृषभानु-सभा महँ बैठे हे नंद सदा सुखकारी ।
गोप घने, बल बीर बिराजत, खात बनाइ बिरी गिरिधारी ।
राधिका झाँकी झरोखे ह्वै झाँप सी लागी, गिरे मुरझाइ बिहारी ।
सोर भयो समुझे सकुचे हरुवाइ कह्यो हरि लागि सुपारी ।५०।
शब्दार्थ—घने = अधिक । झरोखे ह्वै = खिड़की से । झाँप सी लागी =
झाँई सी आ गई, चक्कर सा आ गया । बलबीर = भाई बलराम । गिरि-
धारी = श्रीकृष्ण । बिहारी = श्रीकृष्ण । हरुवाइ = हड़बड़ाकर ।
४६—प्रिया-तिया । तिनि-जिन्हि । सातुक-सात्विक । ५०—हे-हैं ।
सुखकारी-सुभकारी । राधिका० । राधिका झाँकि झरोखनि ह्वै कवि केसव
रीझि गिरे सु बिहारी । भयो-परचौं । कह्यो-कही ।