रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ रसिकप्रिया
करि अंजन रंजित चारु कपोल करी जुत जावक नैननिकाई ।
सुनि आवत श्रीव्रजभूषन भूषन भूषतहीं उठि देखन धाई ।३१।
शब्दार्थ—कटि के तट = कमर में । उरमाई = लटका ली, डाल ली,
पहन ली । कल किकिनी० = सुंदर करधनी लेकर गले में पहन ली । कर =
हाथ में । नूपुर = पायजेब । पग = पैर में । पौंची = पहुँची, कलाई पर का
गहना । रची = पहन ली । अँगिया = चोली । अँगिया० = अँगिया पर आँचल
डालने की सुध भूल गई । रंजित = युक्त । करी० = नेत्रों का सौंदर्य यावक से
युक्त किया, नेत्रों का श्रृंगार महावर से कर लिया । जावक = महावर ।
निकाई = सुंदरता, श्रृंगार । ब्रजभूषन = श्रीकृष्णजी । भूषन०, = भूषण सजाते
समय ही ( भूषण पहनते पहनते ही ) उठ देखने दौड़ पड़ी और हड़बड़ी में
यहाँ का वहाँ पहन लिया ।
अलंकार—असंगति ।
श्रीकृष्णजू को विभ्रम हाव, यथा—( सवैया )
(२१२) नँहूनंदन खेलत हे बने गात बनी छबि चंदन के जल की ।
वृषभानुसुताहि बिलाकत ही रुचि चित्त में बिभ्रम की झलकी ।
गिरि जात न जानत पाननि खात बिरी करि पंकज के दल की ।
बिहँसी सब गोपसुता हरि लोचन मूँदी सुरोचि दृगंचल की ।३२।
शब्दार्थ—हे = थे । बने गात = शरीर सजाए । रुचि = छटा । रुचि
चित्त में० = चित्त में विभ्रम का रंग आ गया । सुरोचि = सुंदर छटा ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) हे सखी, श्रीकृष्ण शरीर सजाए
खेल खेल रहे थे । उनके शरीर में चंदन-लेप की शोभा अच्छी बनी थी ।
( एकाएक उन्हें श्री राधिकाजी देख पड़ीं ) उन्हें देखते ही उनके चित्त में
विभ्रम का ऐसा रंग चढ़ा कि उन्हें पता ही न चला कि उनके हाथ से पान
( तांबूल ) छूटकर कब गिर गए । तब वे हाथ में लिए हुए कमल के पत्तों
का ही बीड़ा बनाकर खाने लगे । ( यह देखकर ) समस्त गोपियाँ हँस पड़ीं ।
( उनका हँसना देखकर ) श्रीकृष्ण ने अपने दृगंचलों की छटा को नेत्रों में
बंद कर लिया। अर्थात् श्रीकृष्ण को लज्जा लगी जिससे उन्होंने अपने नेत्र
बंद कर लिए, नेत्रों के मूँद लेने से उनके दृगंचलों की वह छटा नहीं रह गई ।
अथ विहृत हाव-लक्षण—( दोहा )
(२१३) बोलनि के समये बिषै, बोलन देइ न लाज ।
बिहृत हाव तासों कहैं, केसव कबि कबिराज । ३३।
३१—रची-बनी, बिना । उर सों-उर में । बिसराई-बिरमाई । रंजित-
भंजित । भूषन०-राधिका भूषित भूषन हो उठि धाई, भूषित ह्वै अति आतुर देख
न भाई । ३२—बने०-हैं बन तात, हैं बनगात । सुताहि-कुमारि । सुरोचि-सरोज ।