रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरि = अत्यंत कठिनाई से । कहा = क्यों । इनके = इस नायिका के । ढिग =
पास । कहैं = कहिहैं, कह देंगे । जाउ ० = जाते क्यों नहीं, कोई जाकर यदि ये
समाचार (उस नायिका को जिससे भोजन करके आने की कह आए हैं) सुना
आए तो । उमहे = उमड़ने पर । बहुरयो = तदनंतर । रैहैं = रहिहैं, रहेंगे,
रुकेंगे । पुनि रैहैं = क्या फिर रोके रुक सकेंगे ?
अथ विप्रलब्धा-लक्षण--( दोहा )
(२५६) दूती सों संकेत कहि लैन पठाई आप ।
लब्धविप्र सो जानियै, अनआए संताप ।२२।
शब्दार्थ-लैन पठाई = बुलाने के लिए भेज दी ।
प्रच्छन्न विप्रलब्धा, यथा--( सवैया )
(२६०) सूल से फूल सुबास कुबास सी भाकसी से भए भौन सभागे ।
केसव बाग महावन सो जुर सी चढ़ी जोन्ह सबै अँग दागे ।
नेह लग्यो उर नाहर सो निसि नाह घरीक कहूँ अनुरागे ।
गारी सो गीत बिरी बिष सी सिगरेई सिंगार अँगार से लागे ।२३।
शब्दार्थ--सूल = ( सं० शूल ) काँटा । कुबास = दुर्गंध । भाकसी =
(भस्त्रा) भाड़, भरसांई । भौन = महल । सभागे = अच्छे, मनभावने । बाग =
बगीचा, उपवन । महावन = घोर जंगल सा भयावना । जुर सी = ज्वर की
भाँति । जोन्ह = (ज्योत्स्ना) चाँदनी । दागे = जलाए । नाहर = सिंह ( की
भाँति त्रासद ) । निसि = रात्रि में । नाह = नाथ ( पति ) । घरीक = घड़ी
भर । निसि नाह = रात्रि में घड़ी भर के लिए अपने पति के कहीं अन्यत्र रम
जाने के कारण । गारी से = गाली की भाँति अप्रिय । बिरी = पान का बीड़ा ।
प्रकाश विप्रलब्धा, यथा--( कबित्त )
(२६१) देखत उद्घिजात देखि देखि निज गात,
चंपक के पात कछू लिख्यो है बनाइकै ।
सकल सुगंध टारि फूल-माल तोरि डारि,
दूतिका कों मारि पुनि बीरी बगराइकै ।
लै लै दीह साँस तजि बिबिध बिलास हास,
केसौदास ह्वै उदास चली अकुलाइकै ।
सेइकै संकेत सूनो कान्हजू सों बोलि ऊनो,
मोसों कर जोरि दूनो दूनो दुख पाइकै ।२४।
२२--कहि--बदि, करि । लब्ध--लब्धा । सो--सु । जानियै--जानिजै ।
२३--सभाग--सुभागे । गारी सो--गारी से । २४--टारि--ढारि । बीरी--बोरा ।
हास--ग्रास । बोलि--मान । कर०--जोरे कर, करचो जोर, करि जोसो । दूनो--
बोली दूनों ।