रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० रसिकप्रिया
केसौदास सब छाड़ि कियो हठ ही सों हेत,
वाहू छोड़ि जिय जिये बिन कहा जात है।
ऐसे प्यारे पीय ही सों मान्यो न मनायो तब,
ऐसी तोहि बूझियै जु पाछैं पछिताव है। १४।
शब्दार्थ—बालिस = (सं० बालिश) मूर्ख। ज्यों = भाँति। कह = क्यों।
बिललातु है = व्याकुल होता है। पाहन = (पाषाण) पत्थर। तें = से (भी
अधिक)। पीन = मोटा, कठोर। माखन सो = मक्खन की भाँति मृदु। हेत =
प्रेम, संबंध। जिय = हे मन। जिए बिन = जीते रहे बिना, अब जाओगे कहाँ,
तुम्हें जीते रहना ही पड़ेगा, मरने चले हो तो मर भी न सकोगे। ऐसी० =
क्या तुम्हें ऐसा करना चाहिए था कि तू पीछे पछताए ?
प्रकाश अभिसंधिता, यथा—( सवैया )
(२५२) पाइ परेहू तें प्रीतम त्यों कहि केसव क्योंहूँ न मैं दृग दीनी
तेरी सखी सिख सीखी न एकहूँ रोष ही