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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 286 में से

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पृष्ठ 141

षष्ठ प्रभाव १४३
अलंकार-युक्ति ।
अथ कुट्टमित हाव-लक्षण- (दोहा)
(२३१) केलि-कलह में सोभिजै केलि कपट पट रूप ।
उपजत है तहँ कुट्टमित हाव कहत कबिभूप ।५१।
भावार्थ-केलि के कलह में जहाँ कपटकेलि का छिपा रूप दिखलाई पड़े
अर्थात् नायक या नायिका जहां कलह के बहाने प्रच्छन्न केलि का ही आनंद
लें, वहाँ कुट्टमित हाव होता है ।
श्री राधिकाजू का कुट्टमित हाव, यथा- ( सवैया )
(२३२) पहिले हठि रूठि चली उठि पीठि दै मैं,चितई सखि तैं न लखी री
पुनि धाइ धरी हरिजू की भुजानि तें छूटिबे कों बहु भाँति भखी री ।
गहिकै कुच-पीड़न दंत नखच्छत बैरिन की मरजाद नखी री ।
पुनि ताहि कों पान खवावति हैं उलटी कछू प्रीति की रीति सखीरी ।५२।
शब्दार्थ - हठि = हठपूर्वक । रूठि = अप्रसन्न होकर । पीठि दै=मुँह मोड़
कर । धाइ = दौड़कर । भखी री = व्याकुल हुई । कुच-पीड़न=स्तनों का
मर्दन । बैरिन की = शत्रु की । मरजाद नखी री = सीमा लाँघ गए । बैरिन ०-
शत्रु अपने शत्रु को जितना कष्ट दे सकता है उसकी सीमा भी पार कर गए,
शत्रु से अधिक कष्ट दिया ।
श्रीकृष्णजू को कुट्टमित हाव, यथा- ( सवैया )
(२३३) देखत ही जिहिं मौन गही अरु मौन तजें कटु बोल उचारे ।
सौंहैं कियेहूँ न सौंहो कियो मनुहारि कियेहूँ न सूधे निहारे ।
हाहा कै हारि रहे मनमोहन पाइँ परैं तिहिं लातन मारे ।
मंडत हैं मुँहँ ताही को अंग लै हैं कछू प्रेम के पाठ निन्यारे।५३।
शब्दार्थ- सौंहैं किये = शपथ करने पर भी । न सौंहो कियो = सामने
मुँह नहीं किया । मनुहार = मिन्नत । हाहा कै = दीनतापूर्वक विनय करके ।
मंडत हैं = सिंगार रहे हैं । अंक = गोद में । निन्यारे = विचित्र ।
भावार्थ- (सखी की उक्ति सखी से ) आज राधिका श्रीकृष्ण को देखते
ही मौन हो रहीं। फिर मौन छोड़ने पर कटु वचन कहने लगीं, यहाँ तक कि
श्रीकृष्ण के शपथें खाने पर भी उन्होंने मुँह सामने नहीं किया । मिन्नतें करने
पर भी सीधी नजर नहीं देखा । वे दीनतापूर्वक विनय करके भी हार गए,
तब पैरों पड़े और उन्होंने इन्हें लातों से झटक दिया । देखो, इस समय उसी
का मुँह अपनी गोद में लेकर सँवार-सिंगार रहे हैं । प्रेम के पाठ कुछ
विचित्र ही हैं ।
५१-सोभिजै-सोभियै, सोभिए । कपट-कलह । ५२ - पुनि ० - फिरि । चितई-
ही लखी । गहिकै ० - कुचपीड़न दंतनखक्षत दै गिरि, ...... दै निज । ५३-
जिहि-जिनि । तजें-तजी । कियेहूँ-करेहूँ । मनमोहन-नंदनंदन । तिहिं-तिन्ह ।