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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 286 में से

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पृष्ठ 145

सप्तम प्रभाव १४७
शब्दार्थ—चोली = पान रखने की डलिया। पान = तांबूल। करत
सँवारिबोई = सँवारते रहते हैं। तियदेवता = स्त्री ही है देवता जिसके लिए
( वह पति ) ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका से ) हे सखी, वे तुझे डलिया में
रखे पान की तरह उलट पलट कर सँवारते रहते हैं, दर्पण की भाँति तुझमें
ही उनकी मूर्ति बसी हुई है। पतिदेवता (पतिव्रता, पति को देवता माननेवाली)
स्त्रियाँ तो बहुत सी प्रसिद्ध हैं पर स्त्रीदेवता ( स्त्री को देवता माननेवाला )
पति तो तुम्हीं को मिला है। तेरे मनोरथ रूपी भगीरथ के रथ के पीछे पीछे
मेरे कृष्ण गंगाजल की भाँति चलते हुए दिखाई देते हैं (तेरे मनोरथ के
अनुकूल कार्य करते देखे जाते हैं ) हे रानी, उन्होंने तेरी ऐसी कौन सी बात
थी जो टाल दी ? वे तो तेरी बात वेद-वाणी-तुल्य समझते हैं।
अलंकार—दृष्टांत और रूपक ।
सूचना—वेदवाणी अमान्य नहीं की जाती जैसे स्वामी की वाणी ।
श्रीकृष्ण नायिका की वाणी भी अमान्य नहीं करते ।
अथ उत्का-लक्षण—( दोहा )
(२४४) कौनहुँ हेत न आइयो, प्रीतम जाके धाम ।
ताकों सोचति सोचि हिय, केसव उत्का बाम ।७।
प्रच्छन्न उत्का, यथा—( कबित्त )
(२४५) किधौं गृह-काज कै न छूटत सखा-समाज,
किधौं कछू आज व्रत-बासर बिभात तैं ।
दीनो तैं न सोध, किधौं काहू सों भयो बिरोध,
उपज्यो प्रबोध किधौं उर अवदात तैं ।
सुख में न देह किधौं मोहीं सों कपटनेह,
किधौं देखि मेह अति डरे अधरात तैं ।
किधौं मेरी प्रीति की प्रतीति लेत केसोदास,
अजहूँ न आए मन सुधौं कौनी बात तैं ।८।
शब्दार्थ—किधौं गृहकाज = घर का कोई काम आ पड़ा है। कै =
अथवा । छूटत न = छोड़ न सके । व्रत-वासर = व्रत का दिन । विभात =
प्रभात । आज० = आज व्रत के दिन का प्रभात ( आरंभ ) । सोध = पता,
समाचार । बिरोध = झगड़ा । प्रबोध = ज्ञान, वैराग्य । अवदात = विमल ।
७—उत्का-उत्कंठिता । सोचि-सोच । केसव०-सो उत्कंठा । ८—कै न-
किं न, किधौं । छूटत-छूटघो न । किधौं उर-उर सोधु । केसवदास-केसवराइ ।
सु धौं-सूधो ।