रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
पंचम प्रभाव ११६
आप क्या बटोर लेंगे ? (आपके न जाने) मेरी समझ में यदि कहीं वह काम-
देव की कली कुँम्हला गई तो फिर क्या फूलेगी ? ( कदापि नहीं ) ।
अथ प्रथम-मिलनस्थान-वर्णन—( दोहा )
(१६३) जनी सहेली धाइ घर, सूने घर निसि चार ।
अति भय उत्सव व्याधि मिस न्यौते सु बन-बिहार ।२४।
शब्दार्थ—जनी = दासी । चार = चलना, घूमना । निसि०=रात में
भ्रमण । ब्याधि = रोग ।
( दोहा )
(१६४) इन ठौरनि ही होत है, प्रथम मिलन संसार ।
केसव राजा रंक को, रचि राखे करतार ।२५।
जनी के घर को मिलन, यथा—( कबित्त )
(१६५) बेषु कै कुमारिका को ब्रज की कुमारिकानि,
माँझ साँझ केसौदास त्रास पग पेलिकै ।
काम की लता सी चपला सी प्रेम पासी सी है,
राधिका के बुद्धिबल कंठ भुज मेलिकै ।
दौरि दौरि दुरि दुरि पूरि पूरि अभिलाष,
भाँति भाँति के अनूप-रूप बहु केलि कै ।
जनी के अजिर आज रजनो में सजनी री,
साँची करी स्याम चोरमिहचनी खेलिकै ।२६।
शब्दार्थ—त्रास पग पेलिकै = भय को पैरों से दबाकर, निर्भय होकर ।
चपला = बिजली । प्रेमपासी सी=प्रेम के फंदे की भाँति । मेलिकै = डाल
कर । दुरि दुरि=छिप छिपकर । बहु केलि कै = अनेक क्रीड़ा करके । जनी =
दासी । अजिर = आंगन । चोरमिहचनी खेलिकै = आँखमिचौली खेलकर ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी प्रति ) हे सखी, आज कृष्ण ने स्वयम्
कुमारी का वेश बनाया और संध्या-समय निर्भय होकर ब्रज कुमारियों में जा
मिले । उन्होंने बुद्धि के कौशल द्वारा काम की लता, बिजली एवम् प्रेमपाश
स्वरूप सुंदरी राधिका के गलबाँही डाल दी । आँखमिचौली खेल के बहाने
दौड़ दौड़कर छिप छिपकर और इस प्रकार अभिलाषों की पूति करते हुए
उन्होंने लाखों प्रकार की अद्वितीय कामक्रीड़ा की। (चोर बने हुए) श्रीकृष्णजी
ने, दासी के आंगन में आज रात्रि को ( इस रीति से ) आँखमिचौली के
२४—सूने घर-घरनि संचार । सु बन-बिपिन । २५-इन०-इनहीं
ठौरनि । राखे-राखो । २६—चपला सो०-चल प्रेमपास सी अमल । भाँति
भाँति०-लाख भाँति । करी-कीन्ही ।
१२० रसिकप्रिया
खेल को खेल ( आरोपित या असत् व्यापार ) नहीं रहने दिया, वास्तविक
कर दिया ।
अलंकार—द्वितीय पर्यायोक्ति, उपमा ।
सहेली के घर को मिलन, यथा—( कवित्त )
(१६६) नैनिन के तारनि में राखौ प्यारे पूतरी कै,
मुरली ज्यों लाइ राखौ दसन-बसन में ।
राखौ भुजबीच बनमाली बनमाला करि
चंदन ज्यों चतुर चढ़ाइ राखौ तन में ।
केसौराइ कलकंठ राखौ बलि कठुला कै,
करम करम क्योंहूँ आनी है भवन में ।
चंपक-कली ज्यों कान्ह सूँघि सूँघि देवता ज्यों,
लेहु मेरे लाल, इन्हें मेलि राखौ मन में ।२७।
शब्दार्थ—तारनि = तारों में । पूतरी = आँख की पुतली । ज्यों=तरह ।
लाइ = लाकर । लाइ राखौ = ला रखो, लगा रखो । दसन-बसन = दाँत का
वस्त्र, अधर, ओठ । बनमाली = श्रीकृष्ण । बनमाला = घुटनों तक या
पैरों तक लंबी माला । चतुर = हे चतुर । कलकंठ = सुंदर कंठवाली, मधुर
वाणी बोलनेवाली । कठुला = गले का हार । करम करम = क्रम क्रम से
धीरे धीरे सिखा-पढ़ाकर । आनी है भवन में = इन्हें घर तक ले आई हूँ ।
क्योंहूँ = किसी प्रकार । देवता = देवी । लाल = श्रीकृष्णलाल । मेलि राखौ =
धारण कर लो ।
अलंकार—उपमा ।
धाइ के घर का मिलन, यथा—( कवित्त )
(१६७) हँसत खेलत खेल मंद भई चंददुति,
कहत कहानी और बूझत पहेली-जाल ।
केसौदास नींदबस अपने अपने घर,
हरैं हरैं उठि गए बालिका सकल बाल ।
घोरि उठे गगन सघन घन चहूँ दिसि,
उठि चले कान्ह धाइ बोलि उठी तिहि काल ।
आधी रात्रि अधिक अँध्यारे माँझ जैहौ कहाँ,
राधिका की आधी सेज सोइ रहौ प्यारे लाल ।२८।
२७—केसौराइ-केसोदास । कलकंठ०--गल मेलि राखो कलकंठी कंठा कल
कठुला कै । बलि-करि, कुल । क्योंहूँ--केहूँ । सूँघि०-सोंधी सूंधी, सोंधी सूची ।
ज्यों-सी । २८-खेलत०-खेलत माँझ । घोर-अरु । बस-सिसु । घर--घरै,। गए--
गई । बालिका-ग्वालिका । अँध्यारे-अँधेरी । सोइ-पौढ़ि । प्यारे लाल-नंदलाल ।
पंचम प्रभाव १२१
शब्दार्थ—बूझत पहेली-जाल = पहेलियाँ बूझते हुए । घोरि उठे = गर्जन
करने लगे ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से) हँसते और खेल खेलते तथा कहानी
कहते एवम् पहेलियों को बूझते चंद्रमा की ज्योति मंद पड़ गई (चंद्रमा
डूबने लगा)। नींद लग जाने के कारण सब गोपियाँ और गोप भी धीरे धीरे
अपने अपने घर चले गए । उधर आकाश में चारों ओर घने बादल गरजने
लगे । अतः श्रीकृष्ण भी उठकर चलने लगे । उस अवसर पर धाय बोली
'कि आप आधी रात को ऐसे अंधकार में कहाँ जाएँगे ? प्यारे लाल, आप
राधिका की आधी शैय्या में लेट जाइए न ।
सूने घर को मिलन, यथा—( कबित्त )
(१६८) देखत ही चित्र सूनी चित्रसाला बाला आज,
रूप की सी माला राधा रूपकु सुहाए री ।
नूपुर के सुरनि के अनुरूप तानें लेति
पगतल ताल देति अति मन भाए री ।
ऐसे में दिखाई दीनी औचक कुँवर कान्ह,
जैसे भए गात तैसे जात न बताए री ।
केसौदास कहे परै अलज सलज से न
जलज से लोचन जलद से द्वै आए री २६।
शब्दार्थ—ही=थी । बाला = नायिका ( राधिका ) । रूप = छवि ।
रूपकु = सात मात्राओं का एक ताल विशेष । नूपुर=पायजेब । अनुरूप=
अनुकूल । औचक=अचानक । अलज=लज्जारहित ( एकांत की निर्भयता के
के कारण) । सलज=लज्जा से युक्त ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से ) आज वह बाला (राधा ) सूनी
चित्रशाला में चित्र देख रही थी । (चित्र देखते देखते) उस छवि की माला
राधिका को रूपक ताल ( देने का मन हुआ और वह ताल) देने लगी ।
नूपुर की ध्वनि के ही अनुकूल वह आलाप भी लेती थी और पदतल से
अत्यंत मनभाए ताल भी दे रही थी। इसी समय अचानक श्रीकृष्ण के द्वारा
वह देख ली गई । (और उसने उनके द्वारा अपना देखा जाना जान लिया)
उस समय उसके शरीर की जैसी दशा हुई वह बतलाई नहीं जा सकती । उस
समय के उसके नेत्र न तो अलज्ज ही कहे जा सकते हैं न सलज्ज ही (अपने
आप नाचते समय नेत्रों में लज्जा का भाव नहीं था, पर श्रीकृष्ण के द्वारा इस
स्थिति के देख लिए जाने से उनमें लज्जा का संचार हुआ। अभी न तो
पहले की स्थिति समाप्त ही हुई है और न श्रीकृष्ण के मिलन के कारण उत्पन्न
२६—राधा...-लजु । भए--हैं ए । से न--ऐसे ।
१२२ रसिकप्रिया
प्रभाव ही पूरा पड़ सका, दोनो स्थितियों की संधि दिख रही है । अतः कहना
पड़ता है कि उनके जो नेत्र जलज की भाँति खिले थे उनमें बादलों का सा
घिराव हो गया (नेत्रों में आनंदश्रु आ गए) ।
निशि चार को मिलन, यथा—(सवैया)
(१६६) एक समै सब देखन गोकुल गोपी-गोपाल-समूह सिधायो ।
राति है आइ चले घर कों दसहूँ दिसि मेह महा मढ़ि आयो ।
दूसरो बोल ही तें समुझै कहि केसव यों छिति में तम छायो ।
ऐसे में स्याम सुजान बियोग बिदा कै दियो सु कियो मनभायो ।३०।
शब्दार्थ—मेह = मेघ, बादल । मढ़ि आयो = छा गया । दूसरो०-ऐसा
घना अंधकार था कि कोई दिखाई नहीं पड़ता था, बोलने से ही किसी का
ज्ञान होता था । छिति = क्षिति, पृथ्वी । वियोग = वियोग की वेदना ।
कियो० = यथेच्छ और यथेष्ट गोपियों के साथ कामक्रीड़ा कीं ।
अति भय को मिलन, यथा—(कबित्त)
(१७०) जानि आगि लागी बृषभान के निकट भौन,
दौरि ब्रजबासी चढ़े चहूँ दिसि धाइकै ।
जहाँ तहाँ सोर भारी भीर नर-नारिन की
सब ही की छूट गईं लाज हाइ भाइ कै ।
ऐसे में कुँवर कान्ह सारौ सुक बाहिर कै,
राधिका जगाई और जुवती जगाइकै ।
लोचन बिसाल चारु चिबुक कपोल चूमि,
चंपे की सी माला लाल लीनी उर लाइकै ।३१।
शब्दार्थ—जानि = पता पाकर । बृषभान = वृषभानु, राधिका के पिता ।
भौन = भवन । चढ़े = जा पहुँचे । चहुँ दिसि = चारों ओर से । हाइ भाइ =
हावभाव (सुख की स्थिति) । कै = के साथ । सारो = सारिका, मैना ।
चिबुक = ठोड़ी ।
उत्सव को मिलन, यथा—(कबित्त)
(१७१) बल की बरस गाँठि ताकी राति जागिवे कौं,
आई ब्रजसुंदरी सँवारि तन सोनो सो ।
केसौदास भीर भई नंदजू के मंदिरनि,
अध मध ऊरध बच्यो न कांऊ कोनो सो ।
३०—सिधायो-'सिधाए' आदि । बोल०-बोलतहीं । ३१—जानि-जानी,
देखी । बृषभान०-वृषभानु जू के मंदिरनि । भारी-मई । हाइ भाइ-हाइ हाइ ।
सारौ-सारी । की सी-कैसी ।
पंचम प्रभाव १२३
गावति बजावति नचति नाना रूप करि,
जहाँ तहाँ उमँगत आनँद को ओनो सो।
साँवरे की सूनी सेज सोवत ही राधिकाजू,
सोए आनि साँवरेऊ मानि मन गोनो सो। ३२।
शब्दार्थ—बल = बलराम । राति जागिबे को = रतजगा करने के लिए ।
सोनो सो = सोने सा, पीत वर्ण । मंदिरनि = घरों में । अध = नीचे का खंड ।
मध = मध्य का खंड । ऊरध = ( ऊर्ध्व ) ऊपर का खंड । कोनो सो = कोना
तक, थोड़ी जगह भी । गावति बजावति० = स्त्रियाँ गाती बजाती अनेक प्रकार
से नृत्य करती थीं । ओनो = तालाब में से पानी निकलने का मार्ग, निकास ।
उमँगत० = आनंद का प्रवाह सा बह रहा था । साँवरे = श्रीकृष्ण । मानि
मन० = गौना सा मानकर, जैसे गौने में पति पत्नी के पास सो रहता है।
अलंकार—उपमा, उत्प्रेक्षा ।
व्याधि मिस को मिलन, यथा—( सवैया )
(१७२) सोधि निदाननि दान दिये उपचार बिचार किये न धिरानी ।
बेद के सासन ब्याधि-बिनासन होमहुतासनहू न सिरानी।
केसव बेगि चलो बलि बोलति दीन भई बृषभानु की रानी।
आए हौ मेटि मरू करिकै बहुरथौ उनके वह पीर पिरानी। ३३।
शब्दार्थ—निदान = आदिकरण । सोधि निदाननि = व्याधि के निदानों
का शोध कर, व्याधि के मूल कारण का पता लगाकर । दान दए = दान दिए
(धर्मेण हन्यते व्याधिः ) । उपचार = चिकित्सा । बिचार = व्यवस्था ।
उपचार-विचार = औषधोपचार की व्यवस्था । न धिरानी = कम नहीं पड़ी,
धीमी नहीं हुई । सासन = (सं० शासन ) आज्ञा । ब्याधि = रोग । हुतासन
= अग्नि । सिरानी = ठंडी पड़ी, दूर हुई । दीन भई = दुःखित हुई । मरू
करिकै = कठिनाई से ।
भावार्थ—( सखी-वचन नायक से ) व्याधि के कारणों की शोध कर
(ग्रहों की शांति के लिए ) दान दिए गए । चिकित्सा की व्यवस्था की गई ।
पर पीड़ा धीमी नहीं पड़ी । व्याधि को नष्ट करने के लिए वेद (शास्त्र ) की
आज्ञा के अनुकूल अग्नि में होम भी किया गया, पर वह न हटी। बृषभानु की
पत्नी अत्यंत कातर हो रही हैं, उन्होंने आपको बुलवाया है, कृपा करके शीघ्र
ही चलिए । बड़ी मुश्किल से आप जिस पीड़ा को (एक बार पहले ) दूर कर
आए थे, वही पीड़ा उनको फिर होने लगी है।
अलंकार—पर्यायोक्ति ।
३२—अध-आधो। अध०-मांध अध। कोऊ-काहू, कहूँ । ३३—न
धिरानी-नँदरानी । सिरानी-हिरानी । बेगि- क्यों हूँ । हौ-हे ।
१२४ रसिकप्रिया
न्योते के मिस को मिलन, यथा—( कबित्त )
(१७३) न्यौति कै बुलाई हुती बेटी वृषभानुजू की,
जेंबे कौं जसोदा रानी आनी हैं सिँगारिकै।
भोजन कै, भवन बिलोकिबे कौं पान खात,
ऊपर अकेली गई आनँद बिचारिकै।
देखत देखत हरि भावते कौं भागी देखि,
दौरि गही ब्यालु ऐसी बेनी डर डारिकै।
भेंटी भरि अंक मनभायो करि छाड्यो मुहुँ,
केसरि सों माँडि लई बेसरि उतारिकै।३४।
शब्दार्थ—जेंबे कौं = भोजन करने के लिए। पान खात = पान खाती
हुई। आनँद बिचारिकै = हर्षपूर्वक, —खुशी मन से। माँडि = मंडन करके,
मलकर, लगाकर। बेसरि = नाक में पहनने की छोटी नथ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी प्रति) हे सखी, यशोदा रानी ने वृषभानु
की बेटी को भोजन करने के लिए न्यौता देकर बुलाया था, उसका श्रृंगार
करके यशोदा जी (खाने के लिए उसे भोजनालय में) ले गईं—भोजन करके
वह पान खाती हुई घर देखने के लिए प्रसन्न मन से ऊपर अकेली ही चली
गई। प्रिय श्रीकृष्ण को देखते देखते ही (देखकर तुरंत ही) भागी। उन्होंने
(उसे भागते) देख दौड़ते हुए भय त्याग कर उसकी नागिन सी चोटी पकड़
ही तो ली। फिर गोद में भरकर आलिंगन करके उसके साथ मनमानी करके
(दंत-क्षत को छिपाने के लिए) बेसर उतारकर (हटाकर) मुंह में केसर
मलकर तब छोड़ा।
सूचना—बेसर इसलिए उतारी कि केसर मलने में गहना हाथ में न लगे।
(१७४) वन-विहार के मिस को मिलन, यथा—( कबित्त )
देहि री कान्हि गई कहि दैन पसारहु ओलि भरौ पुनि फेटौ।
छाड़ौ नहीं मग, छाड़ौं जौ या पै छुड़ावौ बिलोकनि लाजलपेटी।
बात सँभारि कहौ सुनिहै कोऊ जानत हौ यह कौन की बेटी ?।
जानत हैं वृषभानु की है पर तोहि न जानत कौन की चेटी।३५।
शब्दार्थ—ओलि = झोली, अंचल या दुपट्टे को फैलाकर उसे वस्तु
रखने की झोली के रूप में बना लेने को झोली कहते हैं। फेटौ = फेंट
(कमर की)। या पैं = इससे। लाजलपेटी = लाज से युक्त। चेटी = दासी।
भावार्थ—(नायक के साथ नायिका की दासी का संवाद, दासी अपनी
स्वामिनी की ओर से बोल रही है)।
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३४—जेंबे-जेंइवे। हैं-ही। लई-लीनो, लोन्हो। ३५—बन-सु बन।
देहि री-दै दधि। जौ०-जु पाए। छुड़ावौ-छुड़ावै। कौन०-को महरेटी।
नायक—कल (दधिदान) देने को कह गई थी, अरी दे।
दासी—झोली फैलाओ (वह भर जाय तो), फिर फेंट भी भर लेना।
क्या आप मार्ग न छोड़ेंगे।
नायक—मैं मार्ग छोड़ने को इस शर्त पर प्रस्तुत हूँ कि तू इस (नायिका
राधिका) की लाजभरी चितवन छुड़ा दे।
दासी—बात सँभाल के कहिए अगर कोई सुन ले तो ! क्या जानते नहीं
कि यह किसकी बेटी है ?
नायक—जानता हूँ, यह वृषभानु की बेटी है, पर तुझे नहीं जानता कि
तू किसकी दासी है। (तू क्यों दाल-भात में मूसरचंद हो रही है)।
जलविहार को मिलन, यथा—(सवैया)
(१७५) हरि राधिका मानसरोवर के तट ठाढ़े री हाथ सों हाथ छियें ।
पिय के सिर पाग प्रिया मुकताहल छाजत माल दुहूँनि हियें।
कटि केसव काछनी सेत कछै सबही तन, चंदन चित्र कियै
निकसे छिति छीरसमुद्र ही तें सँग श्रीपति मानहु श्रीय लियें। ३६।
शब्दार्थ—मानसरोवर = तालाब। छियें = (बुंदेली) छुए, पकड़े हुए।
पाग = पगड़ी। मुकताहल = मुक्ताफल, मोती। पिय के० = प्रिय के सिर पर
पगड़ी है और प्रिया के सिर पर मोती। छाजत = शोभित है। माल० =
दोनों के गले में (पुष्प) मालाएँ पड़ी हैं। छीरसमुद्र = क्षीरसागर। कटि =
कमर। काछनी = कछनी, एक प्रकार की जाँघिया। सेत = श्वेत, उज्ज्वल।
कछै = पहने हुए। छिति = क्षिति, पृथ्वी। श्रीपति = विष्णु। श्रीय =
लक्ष्मी (को)।
अलंकार—उत्प्रेक्षा।
अन्यच्च, यथा—(सवैया)
(१७६) रितु ग्रीषम के प्रतिवासर केसव खेलत हैं जमुना जल में ।
इत गोपसुता वहि पार गोपाल बिराजत गोपनि के दल में ।
अति बूड़त हैं गति मीनन की मिलि जाइ उठैं अपने थल में ।
इहि भाँति मनोरथ पूरि दुवौ जन दूरि रहें छबि सों छल में।३७।
शब्दार्थ—प्रतिवासर = प्रतिदिन। इत = इस ओर। गति मीनन की =
मछलियों की भाँति। मिलि० = पानी के भीतर मिलने के बाद फिर अपने
ही स्थान में जाकर निकलते हैं (जल के भीतर से ऊपर उभरते हैं)। दुवौ
जन = दोनो व्यक्ति, नायक नायिका। छबि सों = सुंदरता से, सफाई से।
छल में = छलपूर्वक लोगों की आंख बचाकर ।
३६—छियें-दिये। मुकताहल-मुक्ताघर, मुक्ताछर। छाजत-राजति।
कछै-कसी, कसे, लसी। चित्र-खोरि। श्रीय-ओहि।
१२६ रसिकप्रिया
(दोहा)
(१७७) इहिं बिधि राधारमन के, बरने मिलन बिसेसि ।
केसवदास निवास बहु, बुधिबल लीजहु लेखि ।३८।
शब्दार्थ - निवास = स्थान, मिलने के स्थान ।
(१७८) और जु तरुनी तीसरी क्यों बरनौ यहि ठौर ।
रस में बिरस न बरनियै कहत रसिक सिरमौर ।३६।
शब्दार्थ - तीसरी तरुनी = तीसरी नायिका (गणिका, सामान्या) ।
(१७६) ये सब जितनी नायिका बरनी मतिअनुसार ।
केसवदास बखानियहु बुधिबल अष्ट प्रकार ।४०।
सूचना - 'सरदार' की टीका में यह दोहा नहीं है।
(१८०) प्रथम मिलन थल मैं कहे, अपनी मतिअनुसार ।
हावभाव-वर्णन करौं, सुनि अब बहुत प्रकार ।४१।
शब्दार्थ - अपनी ० = अपनी उद्भावना से।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां श्रीराधाकृष्ण-
चेष्टादर्शनमिलनस्थान वर्णनं नाम पंचमः प्रभावः ।५।
षष्ठ प्रभाव
अथ भाव-लक्षण-(दोहा)
(१८१) आनन लोचन बचन मग प्रगटत मन की बात ।
ताही सों सब कहत हैं, भाव कबिन के तात ।१।
शब्दार्थ- मग = (मार्ग) द्वारा । तात = प्रिय ।
भावार्थ-मुख (चेहरा), नेत्र और वचन के द्वारा मन की बात का
प्रकट होना 'भाव' कहलाता है।
(१८२) भाव सु पंच प्रकार के, सुनि विभाव अनुभाव ।
थाई, सात्विक कहत हैं व्यभिचारी कबिराव ।२।
शब्दार्थ - थाई = स्थायी ।
अथ विभाव-वर्णन-(दोहा)
(१८३) जिनतें जगत अनेक रस, प्रगट होत अनयास ।
तिनसों बिमति बिभाव कहि, बरनत केसवदास ।३।
३७-गोपनि ०-गुवालनि के गन में । ३८- निवास-बिलास । इति श्री-
राधाकृष्ण-नायक नायिका ।
१-प्रगटत-प्रगटति । २- पंच ०-पांच प्रकार को । सुनि-सुनु । थाई०-
अस्थाई सात्विक क= हैं। ३-जगत-जगुति । बिमति-कहत । कहि-कबि ।
षष्ठ प्रभाव १२७
शब्दार्थ—अनयास = अनायास, स्वतः । तिनसों=तिनको उन्हें । बिमति
= विशेष मतिमान् , अधिक बुद्धिमान् ।
अथ विभाव नामभेद-वर्णन—( दोहा )
(१८४) सब बिभाव द्वै भाँति के केसवदास बखानि ।
आलंबन इक दूसरो उद्दीपन मन आनि ।४।
(१८५) जिन्हें अतन अवलंबई ते आलंबन जानि ।
जिनतें दीपति होति है, ते उद्दीप बखानि ।५।
शब्दार्थ—अतन = अशरीरी, रस-भाव । दीपति = दीप्ति । उद्दीप =
उद्दीपन ।
अथ आलंबन-स्थान-वर्णन—( छप्पय )
(१८६) दंपति जोबन रूप जाति लच्छनजुत सखिजन ।
कोकिल कलित बसंत फूल फल दल अलि उपबन ।
जलचर जलजुत अमल कमल कमला कमलाकर ।
चातक मोर सु सन्द तड़ित धनु अंबुद अंबर ।
सुभ सेज दीप सौगंध गृह पान गान परिधान मनि ।
नव नृत्य भेद बीनादि रव आलंबन केसव बरनि ।६।
शब्दार्थ—दल = पत्तो । कमला = लक्ष्मी, शोभा । कमलाकर = सरो-
वर । तड़ित = बिजली । धनु = इंद्रधनुष। अंबुद = बादल । अंबर = आकाश।
परिधान = पहनावा । रव = शब्द ।
अथ उद्दीपन-वर्णन—( दोहा )
(१८७) अवलोकन आलाप परिरंभन नख-रद-दान ।
चुंबनादि उद्दीप हैं, मर्दन परस प्रबान ।७।
शब्दार्थ—आलाप = बोलना । परिरंभन = आलिंगन । नख-रद-दान =
नख-दान ( नखक्षत ) और रद-दान ( दंतक्षत ) । परस = स्पर्श । प्रवान =
प्रमाण ( माने जाते हैं ) ।
अथ अनुभाव-वर्णन—( दोहा )
(१८८) आलंबन उद्दीप के जो अनुकरन बखान ।
ते कहिये अनुभाव सब दंपति प्रीति-विधान ।८।
४—सब-सो । के-को ।केसवदास-केसवराइ । बखानि-बखान, बखानु ।
आनि-आन, आनु, मान, मानु । ५—जिन्हें०-जिनही रसु । अवलंबई-अवलंब
है। जानि-जान, जानु । दीपति०-दीपतु होत । बखानि-बखान, बखानु ।
६—कमला-मधुकर, मारुत । धनु-धन । पान०-पानखान । रव-सब ।
७—है-ए । प्रवान-प्रमान । ८—जो-जे । कहिये-कहिजै ।
१२८ रसिकप्रिया
शब्दार्थ - अनुकरण = पीछे आनेवाले । प्रीति-विधान = प्रेम के विधान में
अथ स्थायी भाव-वर्णन - (दोहा)
(१८६) रति हांसी अरु सोक पुनि क्रोध उछाह सुजान ।
भय निंदा बिसमय सदा थाई भाव प्रमान ।६।
शब्दार्थ- रति = प्रेम । हांसी = हास । उछाह = उत्साह । निंदा =
अर्थात् जुगुप्सा (घृणा) । विस्मय = आश्चर्य ।
अथ सात्त्विक-भाव-वर्णन - ( दोहा )
(१६०) स्तंभ स्वेद रोमांच सुरभंग कंप बैबन्य ।
आँसू प्रलय बखानिये आठौ नाम अनन्य ।१०।
शब्दार्थ-सुरभंग = स्वरभंग । बैबन्य = वैवर्ण्य । अनन्य = जो किसी
दूसरे का (नाम) न हो ।
अथ व्यभिचारी भाव-वर्णन - ( दोहा )
(१६१) भाव जु सबही रसन में उपजत केसवराय ।
बिना नियम तिन सों कहैं व्यभिचारी कबिराय ।११।
शब्दार्थ - बिना नियम० = जो किसी नियम के बिना सभी रसों में प्रकट
हों । तिनसों = तिनको, उन्हें ।
अथ व्यभिचारी-नाम-वर्णन - ( दोहा )
(१६२) निर्वेद ग्लानि संका तथा, आलस दैन्य रु मोह ।
स्मृति धृति ब्रीड़ा चपलता श्रम मद चिंता कोह ।१२।
शब्दार्थ-कोह = ( क्रोध ) रोष, अमर्ष ।
(१६३) गर्ब हर्ष आवेग पुनि, निंद्रा नींद-बिबाद ।
जड़ता उत्कंठा सहित, स्वप्न प्रबोध बिषाद ।१३।
शब्दार्थ-नींद-बिबाद - नींद का विवाद, नींद की कथा अर्थात् निद्रा ।
प्रबोध=विबोध, जागरण ।
(१६४) अपस्मार मति उग्रता, त्रास तर्क औ ब्याधि ।
उन्माद मरन अवहित्थ है, व्यभिचारी जुत आधि ।१४।
शब्दार्थ-अपस्मार = मिरगी । तर्क = वितर्क । ब्याधि = शारीरिक कष्ट ।
आधि = मानसिक कष्ट ।
सूचना- 'विवाद' का अर्थ स्वतंत्र करने से तर्क में पुनरुक्ति हो जाती है ।
६-हाँसी-सुहास । सु-हि । सदा-सहित । प्रमान-बखानु । १०-बैबन्य
-बैदनं । आँसू०-अश्रु प्रलाप । बखानिये-बखानिजै । अनन्य-सुबनं, न अन्य ।
११- कहैं-कहत । १४-त्रास-आस । औ-अति । उन्माद०-अवहित्य भय
आदि दै । अवहित्य-भय आदि दै । है०-तातें होइ ।
६ षष्ठ प्रभाव १२६
'आधि' मानसिक कष्ट अलग कोई व्यभिचारी नहीं, उसे व्याधि के साथ ही
समझना चाहिए या संगति बैठाने के लिए उसे ( 'जुत आधि' को ) 'अवहित्य'
का विशेषण मान लेना चाहिए ।
अथ हाव-लक्षण—( दोहा )
(१६५) प्रेम राधिका कृस्न को, है तातें सिंगार ।
ताके भावप्रभाव तें, उपजत हावबिचार ।१५।
शब्दार्थ—भाव = स्थिति । ताके० = उस शृंगार की स्थिति के कारण ।
विचार = अर्थात् बात, रूप ।
(१६६) हेला लीला ललित मद, बिभ्रम बिहृत बिलास ।
किलकिंचित बिच्छित्ति अरु, कहि बिब्बोक प्रकास ।१६।
(१६७) मोट्टाइत सुनि कुट्टमित, बोधकादि बहु हाव ।
अपने अपने बुद्धिबल, बरनत कबि कबिराव ।१७।
अथ हेला हाव-लक्षण—( दोहा )
(१६८) पूरन प्रेम-प्रताप तें, भूलत लाज-समाज ।
सो हेला तिहिं हरत हिय, राधा श्रीब्रजराज ।१८।
भावार्थ—अत्यंत प्रेम होने के कारण जहां लज्जा न रह जाय । जिसके
कारण देखनेवाले का हृदय वशीभूत हो जाए वही हेला है ।
अथ श्रीराधिकाजू को हेला हाव-यथा—( सवैया )
(१६६) अवलोकनि अंकुस ऐंचि अनूपम भ्रू-जुगपास भलें गल मेली ।
मृदुहास सुबास उठाइ मिली बहै जोन्ह की जामिनी माँझ अकेली।
अधरासव प्याइ किये बस केसवरांय करी रसरीति नवेली ।
बन में बृषभानुसुता सुखहीं हरि कों हरि लै गई हेलहीं हेली ।१६।
शब्दार्थ—ऐंचि = खींचकर । पास = (पाश) फंदा । सुबास = सुगंध ।
जोन्ह की जामिनी = चाँदनी रात । अधरासव = अधरों का आसव (शराब) ।
सुखहीं = सरलता के साथ । हरि कों हरि = कृष्ण को हरण करके । हेलहीं =
खेल ही खेल में । हेली = हे अली, हे सखी ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) चाँदनी रात में अकेली उस
वृषभानु की पुत्री राधिका ने श्रीकृष्ण को चितवन रूपी अंकुश से खींच लिया ।
अद्वितीय दो भौंह रूपी पाश भली भाँति उनके गले में डाल दिए और मृदु
हास तथा सुगंध ( रूपी सहचरों ) द्वारा उन्हें उठवा मँगाया और फिर अधरों
का आसव पिलाकर ( बेहोश हो जाने पर ) अपने वश में कर लिया । इस
१६-बिहृत-बिहित । बिच्छित्ति-बिक्षिस ।' १७-बोधकादि-बोधादिक ।
अपने०-अपनो अपनी । १८-तिहिं-जिहिं । १६-वह-बहु । अधरा०-
अधरारस । रस-रति ।
१३० रसिकप्रिया
प्रकार की नई रसपद्धति द्वारा वह वन में सरलतापूर्वक उन्हें हरण करके खेल
ही खेल में ले गई ।
सूचना—इस छंद में डाकुओं की क्रियाओं का साम्य राधिका की
चेष्टाओं से स्थापित किया गया है। 'हेलहीं हेली" में 'हेला' नाम भी रख
दिया गया है ।
अलंकार—रूपक ।
श्रीकृष्णजू को हेला हाव, यथा—( सवैया )
(२००) बेनु सुनाइ बुलाइ लई बन भौन बुलाइ कै भाँति भली को ।
फूलि गयो मन फूल्यो बिलोकत केसव कानन रासथली को ।
अधरारस प्याइ कियो परिरंभन चुंबन कै सुख कामकली को ।
हेलहिं श्रीहरि नागर आजु हर्यो मन श्रीवृषभानुलली को ।२०।
शब्दार्थ—बेनु = ( वेणु ) वंशी । भाँति भली को = भली भाँति से ।
फूल्यो = फूला हुआ (देखकर) । परिरंभन = आलिंगन । कामकली = काम
की कलिका ( नायिका ) । हेलहिं = खेल में ही । नागर = चतुर ।
अथ लीला हाव-लक्षण—( दोहा )
(२०१) करत जहाँ लीलानि को प्रीतम प्रिया बनाय ।
उपजत लीला हाव तहँ, बरनत केसवराय ।२१।
शब्दार्थ—लीला = रूप-परिवर्तन, प्रिय प्रेमिका बने प्रेमिका प्रिय ।
श्रीराधिकाजू को लीला हाव, यथा—( सवैया )
(२०२) पायन को परिबो अपमान अनेक सों केसव मान मनैबो ।
मीठो तमोर खवाइबो खैबो बिसेषि चहूँ दिसि चौकि चितैबो ।
चीर कुचीलनि ऊपर पौढ़िबो पातन के खरके भजि ऐबो ।
आँखिन मूदिकै सीखति राधिका कुंजन तें प्रतिकुंजन जैबो ।२२।
शब्दार्थ—अपमान० = अनेक अपमान सहकर । मीठो = मधुर । तमोर =
तांबूल, पान । चीर कुचीलनि = मैले वस्त्रों ( पर ) पात = पत्ता । खरके =
खड़कने पर । ऐबो = आना । प्रतिकुंजन = अन्य कुंजों में ।
भावार्थ—( सखी उक्ति सखी प्रति ) हे सखी, ( राधिका श्रीकृष्ण
का रूप धारण करके ) श्रीकृष्ण के पैरों पड़ना, अनेक अपमान सहकर मान
२०—बेनु-बैन । बन-भव, वह । फूलि-भूलि । फूल्यो-भूल्यो । रस-
मधु । अधरा०-रूप महामधु पान कराय कियो परिरंभन कामकली को,
चुंबन रंभन कामकली को । मन-तब । २१—लीलानि-ललितानि । २२—
अनेक०-अनेक सों मान छोड़ाइ मनैबो । मीठो-सीठो, सीखो । चीर-चील ।
पातन०-पानन के खरके भजि जैबो । भजि-भगि ।
षष्ठ प्रभाव १३१
मनाना, विशेष रूप से मधुर पान खिलाना एवम् खाना, चौंककर चारो ओर
देखना, मैले कुचैले वस्त्रों पर लेटना, पत्ता भी खड़कने से भाग जाना तथा
आँखें मूँदकर एक कुंज से अन्य कुंज में जाना सीख रही हैं।
अलंकार—प्रथम समुच्चय ।
श्रीकृष्णजू को लीला हाव, यथा—( सवैया )
(२०३) झाँकि झरोखनि में चढ़ि ऊँचे अवासनि ऊपर देखन धावै !
निंदत गोपचरित्रनि कों कहि केसव ध्यान ककै गुन गावै ।
चित्रित चित्र में आपुन यों अवलोकत आनंद सों उर लावै ।
आँगन तें घर में घर तें फिरि आँगन बासर कों बिरमावै ।२३।
शब्दार्थ—(श्रीकृष्ण राधा का रूप धारण करते हैं) अवासनि = महलों
( पर ) । ककै = करके। आपुन = अपने को ही । अवलोकत = देखते हुए ।
उर लावै = छाती से लगाते हैं। बासर को बिरमावै = दिन बिताते हैं ।
अथ ललित हाव-लक्षण—( दोहा )
(२०४) बोलनि हँसनि बिलोकिबो चलनि मनोहर रूप ।
जैसे तैसे बरनिये ललित हाव अनुरूप ।२४।
श्रीराधिकाजू को ललित हाव, यथा—( कवित्त )
(२०५) कोमल बिमल मन, बिमला सी सखी साथ,
कमला ज्यों लीने हाथ कमल सनाल के ।
नूपुर की धुनि सुनि भोरे कलहंसनि के,
चौंकि चौंकि परैं चारु चेटुवा मराल के ।
कचनि के भार कुचभारनि सकुचभार,
लचकि लचकि जात कटितट बाल के ।
हरें हरें बोलति बिलोकति हँसत हरें,
हरें हरें चलति हरति मन लाल के ।२५।
शब्दार्थ—बिमला = सरस्वती । कमला ज्यों० = सनाल कमल हाथ में
ले लेने से वह लक्ष्मी की तरह जान पड़ती है। भोरे० = कलहंसों (की ध्वनि)
के धोखे में आकर । चारु = सुंदर । चेटुवा मराल के = हंस के बच्चे । कचनि
के भार = केशों के बोझ से । सकुच = संकोच, लज्जा । कटितट = कमर ।
बाल = नायिका । हरें हरें = धीरे धीरे । लाल = नायक ।
अलंकार—भ्रांतिमान् (द्वितीय चरण में ) ।
सूचना—'कविप्रिया' में यह छंद 'मंदमति' के उदाहरण में दिया गया है ।
२३—में-पै । अवलोकत-अवलोकन । उर०-उरझावै । घर में०-आँगन
तें घर तें फिरि आँगन यों निसिबासर । २४—हाव०-सुभाव अनूप । २५—
हँसत-हरैंई ।
१३२ रसिकप्रिया
श्रीकृष्णजू को ललित हाव, यथा—( सवैया )
(२०६) चपला पट मोर किरीट लसै मघवा-धनु-सोभ बढ़ावत हैं ।
मृदु गावत आवत बेनु बजावत मित्र-मयूर नचावत हैं ।
उठि देखि भटू भरि लोचन चातक-चित्त की ताप बुझावत हैं ।
घनस्याम घनाघन बेष घरे जु बने बन तें ब्रज आवत हैं।२६।
शब्दार्थ—पट = वस्त्र, पीतांबर । किरीट = मुकुठ । मघवा-धनु = इंद्र-
धनुष । मित्र-मयूर नचावत हैं = मित्र रूपी मयूरों को नचाते हैं । भटू = हे
सखी । चातक = पपीहा । घनस्याम = श्रीकृष्ण । घनाघन = बरसनेवाला बादल ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका से ) पीतांबर ही बिजली है । सिर
पर के मोरमुकुट से इंद्रधनुष की सी शोभा बढ़ा रहे हैं। धीरे धीरे गाते और
वेणु बजाते आ रहे हैं ( यही मेघ की मंद ध्वनि है ) जिससे अपने मित्र मयूरों
को नचा देते हैं । हे सखी, उठकर नेत्रभर देख, वे चातक के चित्त का ताप
दूर कर रहे हैं । घनश्याम श्रीकृष्ण आज बरसनेवाले बादल का वेश धारण
किए वन से बने ठने ब्रज की ओर आ रहे हैं ।
अलंकार—सांग रूपक ।
अथ मद हाव-लक्षण—( दोहा )
(२०७) पूरन प्रेम-प्रभाव तें, गर्व बढ़ै बहु भाव ।
तिनके तरुन बिकार तें, उपजत है मद हाव ।२७।
भावार्थ—पूर्ण प्रेम के प्रभाव से अनेक प्रकार के गर्व का बढ़ना और
उनके ( नायक नायिका के ) यौवन-विकार के मद का उदय ही मद हाव है ।
श्रीराधिकाजू को मद हाव, यथा—( कवित्त )
(२०८) छबि सों छबीली बृषभानु की कुँवरि आजु,
रही हुती रूपमद मानमद छकिकै ।
मारहू तें सुकुमार नंद के कुमार ताहि,
आए री मनावन सयान सब तकिकै ।
हँसि हँसि सौंहैं करि करि पाँयँ परि परि,
केंसौराय की सौं जब हारे जिय जकिकै ।
ताही समै उठे घन घोरि घोरि दामिनी सी,
लागी लौटि स्याम घन उर सों लपकिकै ।२८।
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२६—घनाघन - घने घन । घरे-घने । २७-प्रभाव-प्रताप । २८-छबि-
छल । हुती-द्युति । आए-आपु । मनावन-मनावत । तकि-बकि । पायँ०-पांय
परि कर जोरि । कैसोराय-केसोदास । हारे-रहे । घन-घन घोर दामिनी सी
धाइ, आइ उर लागी स्याम घनहूँसों लपकि कें०, स्याम घन तकि कै०, स्याम
घन घन सों लपकिकैं ।
षष्ठ प्रभाव १३३
शब्दार्थ—मारहू = कामदेव से भी । सयान = चतुराई । तकिकै =
ध्यान में लाकर, प्रयोग करके । हारे० - हृदय में परेशान होकर हार मान
गए । लौटि = पलटकर, उलटे ही । स्याम घन = घनश्याम श्रीकृष्ण ।
भावार्थ-( सखी की उक्ति सखी से ) हे सखी, आज शोभा से युक्त
वृषभानुनंदिनी ( राधा ) सौंदर्य और मान के मद ( नशे ) में छकी बैठी
थीं। काम से भी सुकुमार श्रीकृष्णजी ने उन्हें मनाने के लिए सब प्रकार के
चातुर्य का प्रयोग किया । वे हँस हँसकर शपथ करते एवम् बारबार पैरों
पड़ते थे । वे जब ( अनेक उपाय करके ) मन में परेशान होकर हार मान
गए और फिर भी मानभंग न हुआ, तभी एकाएक काले बादल जोर जोर से
गरजने लगे । तब तो राधिका ( स्वयम् ) उलटे ही लपककर बिजली की
भाँति घनश्याम की छाती से जा लगीं ।
श्रीकृष्णजू को मद हाव, यथा—( सवैया )
(२०६) मनमोहिनी मोहि सकै न सखी चपला चलचित्त बखानत हैं।
रति की रति क्योंहूँ न कान करैं द्युतिचंदकला घटि जानत हैं।
कहि केसव और की बात कहा रमनीय रमाहूँ न मानत हैं।
वृषभानुसुता हित मत्त मनोहर औरहिं डीठि न आनत हैं। २६॥
शब्दार्थ—मनमोहिनी = मन को लुभानेवाली कोई अन्य स्त्री । चपला =
बिजली को। चलचित्त = चंचल चित्त वाली। रति = कामदेव की पत्नी ।
बखानत हैं = कहते हैं । रति = प्रीति । कान न करना = ध्यान देने योग्य न
समझना । रमनीय = सुंदरी । रमाहूँ = लक्ष्मी को भी । हित = लिए, वास्ते ।
मनोहर = श्रीकृष्ण । डीठि न आनत = आंख में नहीं लाते, उनकी आँख में
और कोई महिला नहीं चढ़ती ।
अलंकार-प्रतीप ।
अथ विभ्रम हाव-लक्षण-( दोहा )
(२१०) बास बिभूषन प्रेम तें, जहाँ होहिं बिपरीत ।
दरसन-रस तन मन रसित, गनि बिभ्रम की रीत ।३०।'
श्रीराधिकाजू को विभ्रम हाव, यथा—( सवैया )
शब्दार्थ—वास = वस्त्र । बिभूषन = गहना । प्रेम तें = प्रेम के कारण ।
होहिं = हो जाएँ । विपरीत = अंडबंड, उलटे पलटे । दरसन-रस = देखने का
आनंद । रसित = आनंदित ( होता है )। रीत = रीति ( ढंग )।
श्री राधिकाजू को विभ्रम हाव, यथा—( सवैया )
(२११) कटि के तट हार लपेटि लियो कल किंकिनी लै उर सों उरमाई ।
कर नूपुर सों पग पोंची रची अँ गिया सुधि अंचल की बिसराई ।
२६—मन-महि । ३०—वास-बांकु, वाक । होहि-होइ । दरसन-रस-
बरस दरसि । की रीति-के गीत ।
१२४ रसिकप्रिया
करि अंजन रंजित चारु कपोल करी जुत जावक नैननिकाई ।
सुनि आवत श्रीव्रजभूषन भूषन भूषतहीं उठि देखन धाई ।३१।
शब्दार्थ—कटि के तट = कमर में । उरमाई = लटका ली, डाल ली,
पहन ली । कल किकिनी० = सुंदर करधनी लेकर गले में पहन ली । कर =
हाथ में । नूपुर = पायजेब । पग = पैर में । पौंची = पहुँची, कलाई पर का
गहना । रची = पहन ली । अँगिया = चोली । अँगिया० = अँगिया पर आँचल
डालने की सुध भूल गई । रंजित = युक्त । करी० = नेत्रों का सौंदर्य यावक से
युक्त किया, नेत्रों का श्रृंगार महावर से कर लिया । जावक = महावर ।
निकाई = सुंदरता, श्रृंगार । ब्रजभूषन = श्रीकृष्णजी । भूषन०, = भूषण सजाते
समय ही ( भूषण पहनते पहनते ही ) उठ देखने दौड़ पड़ी और हड़बड़ी में
यहाँ का वहाँ पहन लिया ।
अलंकार—असंगति ।
श्रीकृष्णजू को विभ्रम हाव, यथा—( सवैया )
(२१२) नँहूनंदन खेलत हे बने गात बनी छबि चंदन के जल की ।
वृषभानुसुताहि बिलाकत ही रुचि चित्त में बिभ्रम की झलकी ।
गिरि जात न जानत पाननि खात बिरी करि पंकज के दल की ।
बिहँसी सब गोपसुता हरि लोचन मूँदी सुरोचि दृगंचल की ।३२।
शब्दार्थ—हे = थे । बने गात = शरीर सजाए । रुचि = छटा । रुचि
चित्त में० = चित्त में विभ्रम का रंग आ गया । सुरोचि = सुंदर छटा ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) हे सखी, श्रीकृष्ण शरीर सजाए
खेल खेल रहे थे । उनके शरीर में चंदन-लेप की शोभा अच्छी बनी थी ।
( एकाएक उन्हें श्री राधिकाजी देख पड़ीं ) उन्हें देखते ही उनके चित्त में
विभ्रम का ऐसा रंग चढ़ा कि उन्हें पता ही न चला कि उनके हाथ से पान
( तांबूल ) छूटकर कब गिर गए । तब वे हाथ में लिए हुए कमल के पत्तों
का ही बीड़ा बनाकर खाने लगे । ( यह देखकर ) समस्त गोपियाँ हँस पड़ीं ।
( उनका हँसना देखकर ) श्रीकृष्ण ने अपने दृगंचलों की छटा को नेत्रों में
बंद कर लिया। अर्थात् श्रीकृष्ण को लज्जा लगी जिससे उन्होंने अपने नेत्र
बंद कर लिए, नेत्रों के मूँद लेने से उनके दृगंचलों की वह छटा नहीं रह गई ।
अथ विहृत हाव-लक्षण—( दोहा )
(२१३) बोलनि के समये बिषै, बोलन देइ न लाज ।
बिहृत हाव तासों कहैं, केसव कबि कबिराज । ३३।
३१—रची-बनी, बिना । उर सों-उर में । बिसराई-बिरमाई । रंजित-
भंजित । भूषन०-राधिका भूषित भूषन हो उठि धाई, भूषित ह्वै अति आतुर देख
न भाई । ३२—बने०-हैं बन तात, हैं बनगात । सुताहि-कुमारि । सुरोचि-सरोज ।
षष्ठ प्रभाव १३५
शब्दार्थ—समयैं बिषै = समय पर भी । तासों = ताकों, उसको ।
अथ श्रीराधिकाजू को विहृत हाव, यथा—( सबैया )
(२१४) मेरे कहे दहिये जु तऊ फिरि ग्रीषम ज्यों हठ-काठ दहौगी ।
पैरिबो प्रेम-समुद्र पराए कराए करें कृत क्यों निबहौगी ।
हौंस मरै सजनी सिगरी कबहुँ हरि सों हँसि बात कहौगी ।
पी-चित की चित्तसारी चढ़ी चित की पुतरी भई कौ लौं रहौगी।३४
शब्दार्थ—दहिये = जलती हो, दुख पाती हो । ग्रीषम = ग्रीष्म, अग्नि ।
हठ-काठ = हठ रूपी लकड़ी । पराए कराए = दूसरे द्वारा ( तैरने को प्रेरित
किए जाने पर ) । करें कृत = कार्य करने पर अर्थात् तैरने पर । दूसरे द्वारा
तैरने को प्रेरित किए जाने पर और दूसरे के तैरने से तुम्हारी तैरने की क्रिया
कैसे होगी । तुम्हें स्वयम् तैरना होगा । हौंस = उत्कंठा, लालसा । पी = प्रिय,
नायक । चित्रसारी = चित्रशाला, शयनगृह । चित = चित्र । पुतरी = पुतली
कौ लौं = कब तक ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका से ) हे सखी, मेरे कहने से यदि
( इस समय ) जल रही हो ( हठ नहीं छोड़ रही हो ) तो भी मुझे विश्वास
है कि ऐसा समय आएगा जब ( भीतरी ) आग से तुम अपने हठ रूपी काठ
को स्वयम् जला डालोगी, अर्थात् जब प्रेम की तीव्र प्रेरणा होगी तो हठ न
रह जाएगा । तुम्हें प्रेमसमुद्र में तैरना है, क्या किसी के पार कराने से या
उसके ही पार करने से वहाँ तुम्हारा निबाह हो जायगा ? ( यह समुद्र तुम्हें
स्वयम् पार करना होगा, दूसरों के भरोसे मत रहो ) । ( उधर ) सारी
सखियाँ इस लालसा में मरी जा रही हैं कि कभी न कभी श्रीकृष्ण से तुम
हँसकर बोलोगी ( इधर तुम्हारा राग कुछ समझ में नहीं आ रहा है ) ।
आखिर, मैं यह पूछती हूँ कि प्रिय के हृदय की चित्रशाला में चित्र में खचित
पुतली के समान कब तक ( जड़ ) बनी रहोगी ।
अलंकार—रूपक ।
श्रीकृष्णजू को विहृत हाव यथा—( सवया )
(२१५) केसवदास सों आजु सखी बृषभानुकुमारी उराहनो दीनो ।
गारि दई अरु मारि दई अरबिंदन सों मनु कै हितहीनो ।
सीख दई, सुख पाइ लई उर लाइ सुगंध चढ़ाइ नवीनो ।
उत्तरु देइ कौं नंदकुमार कछू सिर नीचे तें ऊँचो न कीनो ।३५।
शब्दार्थ—उराहनो = उलाहना, उपालंभ । मारि० = कमलों से मार
दी ( मारा ) । मनु कै० = मन में लगाव कम करके, मन में प्रेम की कमी
करके ( अर्थात् रोष से ) ।
३४—फिरि - तन । पैरिबौ-पौरिबो । करें कृत - किये उत, किये कित ।
चढ़ी चित-चढ़ी चित्र । ३५—केसवदास-केसवराइ । मनु-करि ।
़१३६ रसिकप्रिया
भावार्थ— (सखी की उक्ति सखी से) हे सखी, वृषभानु की पुत्री राधिका
ने आज श्रीकृष्ण को उलाहना दिया, फिर गाली तक दी, मन में प्रेम की
कमी करके अर्थात् ईषत् रोष से कमलों की मार भी दी। फिर (ठंडी पड़कर)
नवीन सुगंधित द्रव्य उनके शरीर में लगाकर और उन्हें छाती से चिपकाकर
सीख दी और श्रीकृष्ण ने (बिना कुछ कहे सुने चुपचाप) सुख पाकर उसे
ग्रहण किया, इन सबका उत्तर देने के लिए नंदकुमार ने अपना सिर नीचे से
थोड़ा भी ऊपर नहीं किया (सिर जो नीचा किया तो वह नीचे का नीचे
ही रह गया, फिर उठाया ही नहीं, एक चुप तो सौ चुप) ।
अथ विलास हाव-लक्षण— (दोहा)
(२१६) खेलत बोलत हँसत अरु, चितवत चलत प्रकास।
जल थल केसवदास कहि, उपजत हाव बिलास।३६।
श्रीराधिकाजू को विलास हाव, यथा—(कवित्त)
(२१७) किलकत्त अलिक जु तिलक-चिलक मिस,
भौंहनि में बिभ्रमनि भावभेद दीने हैं।
लोचननि सोचन-सकोचनि नचावति है,
दसनचमक ही चकित चित्त कीने हैं।
केसौदास मंदहास अनायास दास करि,
लीने केसौराय जिय जद्यपि प्रबीने हैं।
मोहन के तन मन मोहिबे कौं मेरी आली,
तेरो मुख सुख ही अनंत ब्रत लीने हैं।३७।
शब्दार्थ—अलिक = भाल, माथा। चिलक = चमक। भावभेद = अनेक
भाव। बास = सुगंध। अनायास = बिना श्रम के। सुख ही = सरलता से।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायिका प्रति) हे सखी, श्रीकृष्ण के शरीर
एवम् मन को वशीभूत करने के लिए तेरे मुख ने अनेक ब्रत (ढंग) किए
हैं। माथे पर तिलक की चमक का बहाना उन्हें किलकाता है (आनंदित
करता है)। भौहों के अनेक विलासों (भंगिमाओं) से उनमें भावों के अनेक
स्वरूप लक्षित होते हैं। नेत्रों के सोच और संकोच की मुद्रा से तू उन्हें नचाती
है, दाँत की चमक ने तो उनके चित्त को ही चकित कर दिया है। अपने मंद
हास से तो उन्हें अनायास ही अपना दास बना लिया है, यद्यपि वे बड़े
प्रवीण गिने जाते हैं (अर्थात् तेरे मुख की चेष्टाओं का अत्यधिक प्रभाव उन
पर पड़ता है)।
३६—हाव-विविध । ३७-भाव-भौन । केसौदास०-मंदहास मुखबास ।
केसौराय-केसौदास । प्रबीने-नवीने । आली-सखी, भटू ।
· षष्ठ प्रभाव १३७
सूचना-( १ ) ब्रत करने वाला ब्रत का प्रभाव जिन पर डालना
चाहता है उन पर उसका प्रभाव किस प्रकार क्रमशः पड़ता है और वे उसके
वश हो जाते हैं इसका इसमें क्रम से वर्णन है। पहले तो वे अनाश्रित
किलकते हैं, फिर उनमें अनेक भाव जगते हैं, तदनंतर वे नाचने लगते हैं,
पुनः थकित होते हैं और अंत में वश में हो जाते हैं ।
( २ ) 'अलिक' का अर्थ 'अलीक, मिथ्या' भी कर सकते हैं ।
श्रीकृष्णजू को विलास हाव, यथा-( कबित्त )
(२२८) जिन न निहारे ते निहोरत निहारिबे कौं
काहू न निहारे जिन कैसेहूँ निहारे हैं।
सुर नर नाग नवकन्यनि के प्रानपति,
पतिदेवतानिहूँ कि हियनि बिहारे हैं।
इहि बिधि केसौदास रावरे असेष अंग।
उपमा न उपजी बिरंचि पचि हारे हैं।
रूप-मद-मोचन मदन-मद-मोचन हैं
तीय-ब्रत-मोचन बिलोचन तिहारे हैं।३८।
शब्दार्थ—निहारे = देखे । निहोरत = प्रार्थना करते हैं, लालसा करते हैं ।
कैसे ० = किसी प्रकार ( संयोग से या अनेक कष्ट झेलकर ) । नवकन्या =
नवीन कन्या, पंच कन्या ( अहल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी ) । पति-
देवता = पतिव्रता । असेष अंग = संपूर्ण रूप से । उपजी = बन सकी ।
बिरंचि = ब्रह्मा । पचि हारे = परेशान हो गए ।
भावार्थ- ( सखी की उक्ति नायक प्रति ) हे कृष्ण, जिन्होंने आपके नेत्र
नहीं देखे वे देखने की लालसा करते हैं। जिन्होंने किसी प्रकार ( कष्ट सहकर
भी ) आपके नेत्र देख लिए वे फिर किसी के नेत्रों को नहीं देखते (आपके नेत्रों
के सौंदर्य के सामने किसी के नेत्रों का सौंदर्य नहीं ठहरता) । ये नेत्र सुर, नर,
नाग की कन्याओं और नवकन्याओं (पंच कन्याओं) को प्राणों की भाँति प्यारे
हैं और पतिव्रता स्त्रियों के भी हृदय में विहार करनेवाले हैं। इसी भाँति
आपके संपूर्ण अंग ( सुंदर ) हैं, जिनकी समता के लिए उपमान बनाते बनाते
ब्रह्मा परेशान होकर हार मान गए, परंतु उपमान न बन सके । आपके दोनो
नेत्र सौंदर्य का मद दूर करनेवाले एवम् कामदेव का गर्व छुड़ा देनेवाले और
स्त्रियों के व्रत ( पातिव्रत ) को विचलित करनेवाले हैं ।
अथ किलकिंचित हाव-लक्षण- (दोहा)
(२१६) श्रम अभिलाष सगर्ब स्मित, क्रोध हर्ष भय भाव ।
उपजत एकहि बार जहँ तहँ, किलकिंचित हाव ।३६।
३८-कैसेहूँ-कैसे कै । केसौदास-कैसोराय । उपजी-उपजै । रूप-मान ।
हैं-कौं, किधौं । बिलोचन-कौ लोचन । ३६-स्मित-सुख । तहँ-सो ।
१३८ रसिकप्रिया
अथ श्रीराधिकाजू को किलकंचित हाव, यथा—( सवैया )
(२२०) कौने रसै बिहँसै लखि कौनहिं कापर कोपिकै भौंह चढ़ावै ।
भूलति लाज भद्द कबहुँ कबहुँ मुख अंचल मेलि दुरावै ।
कौन की लेति बलाय, बलाय ल्यौं, तेरी दसा यह मोहिं न भावै ।
ऐसी तौ तू कबहुँ न भई अब तोहिं दई जनि बाइ लगावै ।४०।
शब्दार्थ—रसै = आनंदित होती है । कापर = किस पर । बलाय =
बलैया ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका प्रति ) हे सखी, तू किस आनंद में
मगन हो रही है, किसे देख हँसी है और किस पर क्रुद्ध होकर भौंहें चढ़ाती
है । कभी तो तू लज्जा छोड़ देती है और कभी लज्जावश घूंघट में मुँह छिपा
लेती है । आज किसकी बलैया ले रही है, मैं तेरी बलैया लेती हूँ, बतला ।
तेरी यह दशा मुझे अच्छी नहीं लगती । ऐसी तो तू कभी भी नहीं हुई थी,
विधाता तुझे यह हवा न लगने दे ।
अलंकार—प्रथम समुच्चय ।
सूचना—'सरदार' ने लिखा है कि यहाँ 'कौने रसै' से अभिलाष, 'कौनहि
लखि बिहँसै' से मंद हास, 'कोपिकै भौंह चढ़ावै' से 'क्रोध', 'भूलति लाज' से
'गर्व स्मित', 'कबहूँ मुख अंचल मांहि छिपावै' से भय एवम् लज्जा तथा
बलाय लेति' से हर्ष आदि भाव सूचित होते हैं ।
श्रीकृष्णजू को किलकंचित हाव, यथा—( सवैया )
(२२१) ऐसी है गोकुल के कुल की जिनि दच्छिन नैन किये अनुकूले ।
खंजन से मनोरंजन केसव हास बिलास लता लगि मूले ।
बोलें झुकौ उभकौ अनबोलें फिरौ बिझुके से हिये महिं फूले ।
रूप भए सबके बिष ऐसे हैं कान्ह कहौ रस कौन के भूले ।४१।
शब्दार्थ—दच्छिन = सब पर समान भाव रखनेवाला (नायक) ।
अनुकूल = केवल एक ही से प्रेम रखनेवाला ( नायक ) । उभकौ = चंचल,
लालायित होते हैं । बिझुके = भड़के हुए ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायक प्रति ) हे कृष्ण, गोकुल के कुल में
ऐसी कौन है जिसने आपके दक्षिण नेत्रों को अनुकूल कर लिया है ? सबके
प्रति संचरित होनेवालि नेत्रों को अपनी ही ओर लगा रखा है। मन को आनं-
दित करनेवाले आपके खंजनवत् ( सुंदर ) नेत्र हास-विलास रूपी लता में
भूल रहे हैं । आप बोलने पर झुकते ( रोषयुक्त होते ) हैं और न बोलने पर
४०—रसै-त्रसै । मेलि-मेरे, मांहि । दुरावै-छिपावै । ल्यौं-त्यौं ।
४१—के कुल-को कुल । किये-करे । केसव-के सब । हास०-हार बिहार ।
झुकौ०-झुक उभकें । अनबोलें-बिन बोले । फिरौ-फिरै । के बिष-केसव ।