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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 286 में से

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पृष्ठ 127

६ षष्ठ प्रभाव १२६
'आधि' मानसिक कष्ट अलग कोई व्यभिचारी नहीं, उसे व्याधि के साथ ही
समझना चाहिए या संगति बैठाने के लिए उसे ( 'जुत आधि' को ) 'अवहित्य'
का विशेषण मान लेना चाहिए ।
अथ हाव-लक्षण—( दोहा )
(१६५) प्रेम राधिका कृस्न को, है तातें सिंगार ।
ताके भावप्रभाव तें, उपजत हावबिचार ।१५।
शब्दार्थ—भाव = स्थिति । ताके० = उस शृंगार की स्थिति के कारण ।
विचार = अर्थात् बात, रूप ।
(१६६) हेला लीला ललित मद, बिभ्रम बिहृत बिलास ।
किलकिंचित बिच्छित्ति अरु, कहि बिब्बोक प्रकास ।१६।
(१६७) मोट्टाइत सुनि कुट्टमित, बोधकादि बहु हाव ।
अपने अपने बुद्धिबल, बरनत कबि कबिराव ।१७।
अथ हेला हाव-लक्षण—( दोहा )
(१६८) पूरन प्रेम-प्रताप तें, भूलत लाज-समाज ।
सो हेला तिहिं हरत हिय, राधा श्रीब्रजराज ।१८।
भावार्थ—अत्यंत प्रेम होने के कारण जहां लज्जा न रह जाय । जिसके
कारण देखनेवाले का हृदय वशीभूत हो जाए वही हेला है ।
अथ श्रीराधिकाजू को हेला हाव-यथा—( सवैया )
(१६६) अवलोकनि अंकुस ऐंचि अनूपम भ्रू-जुगपास भलें गल मेली ।
मृदुहास सुबास उठाइ मिली बहै जोन्ह की जामिनी माँझ अकेली।
अधरासव प्याइ किये बस केसवरांय करी रसरीति नवेली ।
बन में बृषभानुसुता सुखहीं हरि कों हरि लै गई हेलहीं हेली ।१६।
शब्दार्थ—ऐंचि = खींचकर । पास = (पाश) फंदा । सुबास = सुगंध ।
जोन्ह की जामिनी = चाँदनी रात । अधरासव = अधरों का आसव (शराब) ।
सुखहीं = सरलता के साथ । हरि कों हरि = कृष्ण को हरण करके । हेलहीं =
खेल ही खेल में । हेली = हे अली, हे सखी ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी से ) चाँदनी रात में अकेली उस
वृषभानु की पुत्री राधिका ने श्रीकृष्ण को चितवन रूपी अंकुश से खींच लिया ।
अद्वितीय दो भौंह रूपी पाश भली भाँति उनके गले में डाल दिए और मृदु
हास तथा सुगंध ( रूपी सहचरों ) द्वारा उन्हें उठवा मँगाया और फिर अधरों
का आसव पिलाकर ( बेहोश हो जाने पर ) अपने वश में कर लिया । इस
१६-बिहृत-बिहित । बिच्छित्ति-बिक्षिस ।' १७-बोधकादि-बोधादिक ।
अपने०-अपनो अपनी । १८-तिहिं-जिहिं । १६-वह-बहु । अधरा०-
अधरारस । रस-रति ।