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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 286 में से

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पृष्ठ 120

१२२ रसिकप्रिया
प्रभाव ही पूरा पड़ सका, दोनो स्थितियों की संधि दिख रही है । अतः कहना
पड़ता है कि उनके जो नेत्र जलज की भाँति खिले थे उनमें बादलों का सा
घिराव हो गया (नेत्रों में आनंदश्रु आ गए) ।
निशि चार को मिलन, यथा—(सवैया)
(१६६) एक समै सब देखन गोकुल गोपी-गोपाल-समूह सिधायो ।
राति है आइ चले घर कों दसहूँ दिसि मेह महा मढ़ि आयो ।
दूसरो बोल ही तें समुझै कहि केसव यों छिति में तम छायो ।
ऐसे में स्याम सुजान बियोग बिदा कै दियो सु कियो मनभायो ।३०।
शब्दार्थ—मेह = मेघ, बादल । मढ़ि आयो = छा गया । दूसरो०-ऐसा
घना अंधकार था कि कोई दिखाई नहीं पड़ता था, बोलने से ही किसी का
ज्ञान होता था । छिति = क्षिति, पृथ्वी । वियोग = वियोग की वेदना ।
कियो० = यथेच्छ और यथेष्ट गोपियों के साथ कामक्रीड़ा कीं ।
अति भय को मिलन, यथा—(कबित्त)
(१७०) जानि आगि लागी बृषभान के निकट भौन,
दौरि ब्रजबासी चढ़े चहूँ दिसि धाइकै ।
जहाँ तहाँ सोर भारी भीर नर-नारिन की
सब ही की छूट गईं लाज हाइ भाइ कै ।
ऐसे में कुँवर कान्ह सारौ सुक बाहिर कै,
राधिका जगाई और जुवती जगाइकै ।
लोचन बिसाल चारु चिबुक कपोल चूमि,
चंपे की सी माला लाल लीनी उर लाइकै ।३१।
शब्दार्थ—जानि = पता पाकर । बृषभान = वृषभानु, राधिका के पिता ।
भौन = भवन । चढ़े = जा पहुँचे । चहुँ दिसि = चारों ओर से । हाइ भाइ =
हावभाव (सुख की स्थिति) । कै = के साथ । सारो = सारिका, मैना ।
चिबुक = ठोड़ी ।
उत्सव को मिलन, यथा—(कबित्त)
(१७१) बल की बरस गाँठि ताकी राति जागिवे कौं,
आई ब्रजसुंदरी सँवारि तन सोनो सो ।
केसौदास भीर भई नंदजू के मंदिरनि,
अध मध ऊरध बच्यो न कांऊ कोनो सो ।
३०—सिधायो-'सिधाए' आदि । बोल०-बोलतहीं । ३१—जानि-जानी,
देखी । बृषभान०-वृषभानु जू के मंदिरनि । भारी-मई । हाइ भाइ-हाइ हाइ ।
सारौ-सारी । की सी-कैसी ।