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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 286 में से

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पृष्ठ 131

षष्ठ प्रभाव १३३
शब्दार्थ—मारहू = कामदेव से भी । सयान = चतुराई । तकिकै =
ध्यान में लाकर, प्रयोग करके । हारे० - हृदय में परेशान होकर हार मान
गए । लौटि = पलटकर, उलटे ही । स्याम घन = घनश्याम श्रीकृष्ण ।
भावार्थ-( सखी की उक्ति सखी से ) हे सखी, आज शोभा से युक्त
वृषभानुनंदिनी ( राधा ) सौंदर्य और मान के मद ( नशे ) में छकी बैठी
थीं। काम से भी सुकुमार श्रीकृष्णजी ने उन्हें मनाने के लिए सब प्रकार के
चातुर्य का प्रयोग किया । वे हँस हँसकर शपथ करते एवम् बारबार पैरों
पड़ते थे । वे जब ( अनेक उपाय करके ) मन में परेशान होकर हार मान
गए और फिर भी मानभंग न हुआ, तभी एकाएक काले बादल जोर जोर से
गरजने लगे । तब तो राधिका ( स्वयम् ) उलटे ही लपककर बिजली की
भाँति घनश्याम की छाती से जा लगीं ।
श्रीकृष्णजू को मद हाव, यथा—( सवैया )
(२०६) मनमोहिनी मोहि सकै न सखी चपला चलचित्त बखानत हैं।
रति की रति क्योंहूँ न कान करैं द्युतिचंदकला घटि जानत हैं।
कहि केसव और की बात कहा रमनीय रमाहूँ न मानत हैं।
वृषभानुसुता हित मत्त मनोहर औरहिं डीठि न आनत हैं। २६॥
शब्दार्थ—मनमोहिनी = मन को लुभानेवाली कोई अन्य स्त्री । चपला =
बिजली को। चलचित्त = चंचल चित्त वाली। रति = कामदेव की पत्नी ।
बखानत हैं = कहते हैं । रति = प्रीति । कान न करना = ध्यान देने योग्य न
समझना । रमनीय = सुंदरी । रमाहूँ = लक्ष्मी को भी । हित = लिए, वास्ते ।
मनोहर = श्रीकृष्ण । डीठि न आनत = आंख में नहीं लाते, उनकी आँख में
और कोई महिला नहीं चढ़ती ।
अलंकार-प्रतीप ।
अथ विभ्रम हाव-लक्षण-( दोहा )
(२१०) बास बिभूषन प्रेम तें, जहाँ होहिं बिपरीत ।
दरसन-रस तन मन रसित, गनि बिभ्रम की रीत ।३०।'
श्रीराधिकाजू को विभ्रम हाव, यथा—( सवैया )
शब्दार्थ—वास = वस्त्र । बिभूषन = गहना । प्रेम तें = प्रेम के कारण ।
होहिं = हो जाएँ । विपरीत = अंडबंड, उलटे पलटे । दरसन-रस = देखने का
आनंद । रसित = आनंदित ( होता है )। रीत = रीति ( ढंग )।
श्री राधिकाजू को विभ्रम हाव, यथा—( सवैया )
(२११) कटि के तट हार लपेटि लियो कल किंकिनी लै उर सों उरमाई ।
कर नूपुर सों पग पोंची रची अँ गिया सुधि अंचल की बिसराई ।

२६—मन-महि । ३०—वास-बांकु, वाक । होहि-होइ । दरसन-रस-
बरस दरसि । की रीति-के गीत ।