रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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(दोहा)
(१७७) इहिं बिधि राधारमन के, बरने मिलन बिसेसि ।
केसवदास निवास बहु, बुधिबल लीजहु लेखि ।३८।
शब्दार्थ - निवास = स्थान, मिलने के स्थान ।
(१७८) और जु तरुनी तीसरी क्यों बरनौ यहि ठौर ।
रस में बिरस न बरनियै कहत रसिक सिरमौर ।३६।
शब्दार्थ - तीसरी तरुनी = तीसरी नायिका (गणिका, सामान्या) ।
(१७६) ये सब जितनी नायिका बरनी मतिअनुसार ।
केसवदास बखानियहु बुधिबल अष्ट प्रकार ।४०।
सूचना - 'सरदार' की टीका में यह दोहा नहीं है।
(१८०) प्रथम मिलन थल मैं कहे, अपनी मतिअनुसार ।
हावभाव-वर्णन करौं, सुनि अब बहुत प्रकार ।४१।
शब्दार्थ - अपनी ० = अपनी उद्भावना से।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां श्रीराधाकृष्ण-
चेष्टादर्शनमिलनस्थान वर्णनं नाम पंचमः प्रभावः ।५।
षष्ठ प्रभाव
अथ भाव-लक्षण-(दोहा)
(१८१) आनन लोचन बचन मग प्रगटत मन की बात ।
ताही सों सब कहत हैं, भाव कबिन के तात ।१।
शब्दार्थ- मग = (मार्ग) द्वारा । तात = प्रिय ।
भावार्थ-मुख (चेहरा), नेत्र और वचन के द्वारा मन की बात का
प्रकट होना 'भाव' कहलाता है।
(१८२) भाव सु पंच प्रकार के, सुनि विभाव अनुभाव ।
थाई, सात्विक कहत हैं व्यभिचारी कबिराव ।२।
शब्दार्थ - थाई = स्थायी ।
अथ विभाव-वर्णन-(दोहा)
(१८३) जिनतें जगत अनेक रस, प्रगट होत अनयास ।
तिनसों बिमति बिभाव कहि, बरनत केसवदास ।३।
३७-गोपनि ०-गुवालनि के गन में । ३८- निवास-बिलास । इति श्री-
राधाकृष्ण-नायक नायिका ।
१-प्रगटत-प्रगटति । २- पंच ०-पांच प्रकार को । सुनि-सुनु । थाई०-
अस्थाई सात्विक क= हैं। ३-जगत-जगुति । बिमति-कहत । कहि-कबि ।