रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
पृष्ठ 130, कुल 286 में से
संदर्भ में पढ़ें१३२ रसिकप्रिया
श्रीकृष्णजू को ललित हाव, यथा—( सवैया )
(२०६) चपला पट मोर किरीट लसै मघवा-धनु-सोभ बढ़ावत हैं ।
मृदु गावत आवत बेनु बजावत मित्र-मयूर नचावत हैं ।
उठि देखि भटू भरि लोचन चातक-चित्त की ताप बुझावत हैं ।
घनस्याम घनाघन बेष घरे जु बने बन तें ब्रज आवत हैं।२६।
शब्दार्थ—पट = वस्त्र, पीतांबर । किरीट = मुकुठ । मघवा-धनु = इंद्र-
धनुष । मित्र-मयूर नचावत हैं = मित्र रूपी मयूरों को नचाते हैं । भटू = हे
सखी । चातक = पपीहा । घनस्याम = श्रीकृष्ण । घनाघन = बरसनेवाला बादल ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका से ) पीतांबर ही बिजली है । सिर
पर के मोरमुकुट से इंद्रधनुष की सी शोभा बढ़ा रहे हैं। धीरे धीरे गाते और
वेणु बजाते आ रहे हैं ( यही मेघ की मंद ध्वनि है ) जिससे अपने मित्र मयूरों
को नचा देते हैं । हे सखी, उठकर नेत्रभर देख, वे चातक के चित्त का ताप
दूर कर रहे हैं । घनश्याम श्रीकृष्ण आज बरसनेवाले बादल का वेश धारण
किए वन से बने ठने ब्रज की ओर आ रहे हैं ।
अलंकार—सांग रूपक ।
अथ मद हाव-लक्षण—( दोहा )
(२०७) पूरन प्रेम-प्रभाव तें, गर्व बढ़ै बहु भाव ।
तिनके तरुन बिकार तें, उपजत है मद हाव ।२७।
भावार्थ—पूर्ण प्रेम के प्रभाव से अनेक प्रकार के गर्व का बढ़ना और
उनके ( नायक नायिका के ) यौवन-विकार के मद का उदय ही मद हाव है ।
श्रीराधिकाजू को मद हाव, यथा—( कवित्त )
(२०८) छबि सों छबीली बृषभानु की कुँवरि आजु,
रही हुती रूपमद मानमद छकिकै ।
मारहू तें सुकुमार नंद के कुमार ताहि,
आए री मनावन सयान सब तकिकै ।
हँसि हँसि सौंहैं करि करि पाँयँ परि परि,
केंसौराय की सौं जब हारे जिय जकिकै ।
ताही समै उठे घन घोरि घोरि दामिनी सी,
लागी लौटि स्याम घन उर सों लपकिकै ।२८।
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━
२६—घनाघन - घने घन । घरे-घने । २७-प्रभाव-प्रताप । २८-छबि-
छल । हुती-द्युति । आए-आपु । मनावन-मनावत । तकि-बकि । पायँ०-पांय
परि कर जोरि । कैसोराय-केसोदास । हारे-रहे । घन-घन घोर दामिनी सी
धाइ, आइ उर लागी स्याम घनहूँसों लपकि कें०, स्याम घन तकि कै०, स्याम
घन घन सों लपकिकैं ।