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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 286 में से

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पृष्ठ 126

१२८ रसिकप्रिया
शब्दार्थ - अनुकरण = पीछे आनेवाले । प्रीति-विधान = प्रेम के विधान में
अथ स्थायी भाव-वर्णन - (दोहा)
(१८६) रति हांसी अरु सोक पुनि क्रोध उछाह सुजान ।
भय निंदा बिसमय सदा थाई भाव प्रमान ।६।
शब्दार्थ- रति = प्रेम । हांसी = हास । उछाह = उत्साह । निंदा =
अर्थात् जुगुप्सा (घृणा) । विस्मय = आश्चर्य ।
अथ सात्त्विक-भाव-वर्णन - ( दोहा )
(१६०) स्तंभ स्वेद रोमांच सुरभंग कंप बैबन्य ।
आँसू प्रलय बखानिये आठौ नाम अनन्य ।१०।
शब्दार्थ-सुरभंग = स्वरभंग । बैबन्य = वैवर्ण्य । अनन्य = जो किसी
दूसरे का (नाम) न हो ।
अथ व्यभिचारी भाव-वर्णन - ( दोहा )
(१६१) भाव जु सबही रसन में उपजत केसवराय ।
बिना नियम तिन सों कहैं व्यभिचारी कबिराय ।११।
शब्दार्थ - बिना नियम० = जो किसी नियम के बिना सभी रसों में प्रकट
हों । तिनसों = तिनको, उन्हें ।
अथ व्यभिचारी-नाम-वर्णन - ( दोहा )
(१६२) निर्वेद ग्लानि संका तथा, आलस दैन्य रु मोह ।
स्मृति धृति ब्रीड़ा चपलता श्रम मद चिंता कोह ।१२।
शब्दार्थ-कोह = ( क्रोध ) रोष, अमर्ष ।
(१६३) गर्ब हर्ष आवेग पुनि, निंद्रा नींद-बिबाद ।
जड़ता उत्कंठा सहित, स्वप्न प्रबोध बिषाद ।१३।
शब्दार्थ-नींद-बिबाद - नींद का विवाद, नींद की कथा अर्थात् निद्रा ।
प्रबोध=विबोध, जागरण ।
(१६४) अपस्मार मति उग्रता, त्रास तर्क औ ब्याधि ।
उन्माद मरन अवहित्थ है, व्यभिचारी जुत आधि ।१४।
शब्दार्थ-अपस्मार = मिरगी । तर्क = वितर्क । ब्याधि = शारीरिक कष्ट ।
आधि = मानसिक कष्ट ।
सूचना- 'विवाद' का अर्थ स्वतंत्र करने से तर्क में पुनरुक्ति हो जाती है ।
६-हाँसी-सुहास । सु-हि । सदा-सहित । प्रमान-बखानु । १०-बैबन्य
-बैदनं । आँसू०-अश्रु प्रलाप । बखानिये-बखानिजै । अनन्य-सुबनं, न अन्य ।
११- कहैं-कहत । १४-त्रास-आस । औ-अति । उन्माद०-अवहित्य भय
आदि दै । अवहित्य-भय आदि दै । है०-तातें होइ ।