रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनायक—कल (दधिदान) देने को कह गई थी, अरी दे।
दासी—झोली फैलाओ (वह भर जाय तो), फिर फेंट भी भर लेना।
क्या आप मार्ग न छोड़ेंगे।
नायक—मैं मार्ग छोड़ने को इस शर्त पर प्रस्तुत हूँ कि तू इस (नायिका
राधिका) की लाजभरी चितवन छुड़ा दे।
दासी—बात सँभाल के कहिए अगर कोई सुन ले तो ! क्या जानते नहीं
कि यह किसकी बेटी है ?
नायक—जानता हूँ, यह वृषभानु की बेटी है, पर तुझे नहीं जानता कि
तू किसकी दासी है। (तू क्यों दाल-भात में मूसरचंद हो रही है)।
जलविहार को मिलन, यथा—(सवैया)
(१७५) हरि राधिका मानसरोवर के तट ठाढ़े री हाथ सों हाथ छियें ।
पिय के सिर पाग प्रिया मुकताहल छाजत माल दुहूँनि हियें।
कटि केसव काछनी सेत कछै सबही तन, चंदन चित्र कियै
निकसे छिति छीरसमुद्र ही तें सँग श्रीपति मानहु श्रीय लियें। ३६।
शब्दार्थ—मानसरोवर = तालाब। छियें = (बुंदेली) छुए, पकड़े हुए।
पाग = पगड़ी। मुकताहल = मुक्ताफल, मोती। पिय के० = प्रिय के सिर पर
पगड़ी है और प्रिया के सिर पर मोती। छाजत = शोभित है। माल० =
दोनों के गले में (पुष्प) मालाएँ पड़ी हैं। छीरसमुद्र = क्षीरसागर। कटि =
कमर। काछनी = कछनी, एक प्रकार की जाँघिया। सेत = श्वेत, उज्ज्वल।
कछै = पहने हुए। छिति = क्षिति, पृथ्वी। श्रीपति = विष्णु। श्रीय =
लक्ष्मी (को)।
अलंकार—उत्प्रेक्षा।
अन्यच्च, यथा—(सवैया)
(१७६) रितु ग्रीषम के प्रतिवासर केसव खेलत हैं जमुना जल में ।
इत गोपसुता वहि पार गोपाल बिराजत गोपनि के दल में ।
अति बूड़त हैं गति मीनन की मिलि जाइ उठैं अपने थल में ।
इहि भाँति मनोरथ पूरि दुवौ जन दूरि रहें छबि सों छल में।३७।
शब्दार्थ—प्रतिवासर = प्रतिदिन। इत = इस ओर। गति मीनन की =
मछलियों की भाँति। मिलि० = पानी के भीतर मिलने के बाद फिर अपने
ही स्थान में जाकर निकलते हैं (जल के भीतर से ऊपर उभरते हैं)। दुवौ
जन = दोनो व्यक्ति, नायक नायिका। छबि सों = सुंदरता से, सफाई से।
छल में = छलपूर्वक लोगों की आंख बचाकर ।
३६—छियें-दिये। मुकताहल-मुक्ताघर, मुक्ताछर। छाजत-राजति।
कछै-कसी, कसे, लसी। चित्र-खोरि। श्रीय-ओहि।