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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 286 में से

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पृष्ठ 121

पंचम प्रभाव १२३
गावति बजावति नचति नाना रूप करि,
जहाँ तहाँ उमँगत आनँद को ओनो सो।
साँवरे की सूनी सेज सोवत ही राधिकाजू,
सोए आनि साँवरेऊ मानि मन गोनो सो। ३२।
शब्दार्थ—बल = बलराम । राति जागिबे को = रतजगा करने के लिए ।
सोनो सो = सोने सा, पीत वर्ण । मंदिरनि = घरों में । अध = नीचे का खंड ।
मध = मध्य का खंड । ऊरध = ( ऊर्ध्व ) ऊपर का खंड । कोनो सो = कोना
तक, थोड़ी जगह भी । गावति बजावति० = स्त्रियाँ गाती बजाती अनेक प्रकार
से नृत्य करती थीं । ओनो = तालाब में से पानी निकलने का मार्ग, निकास ।
उमँगत० = आनंद का प्रवाह सा बह रहा था । साँवरे = श्रीकृष्ण । मानि
मन० = गौना सा मानकर, जैसे गौने में पति पत्नी के पास सो रहता है।
अलंकार—उपमा, उत्प्रेक्षा ।
व्याधि मिस को मिलन, यथा—( सवैया )
(१७२) सोधि निदाननि दान दिये उपचार बिचार किये न धिरानी ।
बेद के सासन ब्याधि-बिनासन होमहुतासनहू न सिरानी।
केसव बेगि चलो बलि बोलति दीन भई बृषभानु की रानी।
आए हौ मेटि मरू करिकै बहुरथौ उनके वह पीर पिरानी। ३३।
शब्दार्थ—निदान = आदिकरण । सोधि निदाननि = व्याधि के निदानों
का शोध कर, व्याधि के मूल कारण का पता लगाकर । दान दए = दान दिए
(धर्मेण हन्यते व्याधिः ) । उपचार = चिकित्सा । बिचार = व्यवस्था ।
उपचार-विचार = औषधोपचार की व्यवस्था । न धिरानी = कम नहीं पड़ी,
धीमी नहीं हुई । सासन = (सं० शासन ) आज्ञा । ब्याधि = रोग । हुतासन
= अग्नि । सिरानी = ठंडी पड़ी, दूर हुई । दीन भई = दुःखित हुई । मरू
करिकै = कठिनाई से ।
भावार्थ—( सखी-वचन नायक से ) व्याधि के कारणों की शोध कर
(ग्रहों की शांति के लिए ) दान दिए गए । चिकित्सा की व्यवस्था की गई ।
पर पीड़ा धीमी नहीं पड़ी । व्याधि को नष्ट करने के लिए वेद (शास्त्र ) की
आज्ञा के अनुकूल अग्नि में होम भी किया गया, पर वह न हटी। बृषभानु की
पत्नी अत्यंत कातर हो रही हैं, उन्होंने आपको बुलवाया है, कृपा करके शीघ्र
ही चलिए । बड़ी मुश्किल से आप जिस पीड़ा को (एक बार पहले ) दूर कर
आए थे, वही पीड़ा उनको फिर होने लगी है।
अलंकार—पर्यायोक्ति ।
३२—अध-आधो। अध०-मांध अध। कोऊ-काहू, कहूँ । ३३—न
धिरानी-नँदरानी । सिरानी-हिरानी । बेगि- क्यों हूँ । हौ-हे ।