रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
( २१ )
१३. रसगङ्गाधर—अलङ्कारशास्त्रीय महान् ग्रन्थ ।
१. पण्डितराज-ग्रन्थावली में इनके सभी ग्रन्थों का आकर्षक प्रकाशन संस्कृत
परिषत्, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद से हुआ है ।
अन्य जगन्नाथ
संस्कृत वाङ्मय में जगन्नाथ नाम के अनेक ग्रन्थकार हो चुके हैं । उनके ग्रन्थ
हैं—सिद्धान्तसम्राट् ( ज्योतिष )—सम्राट् जगन्नाथकृत, सिद्धान्तकौस्तुभ, रेखागणित,
विवादार्णवभङ्ग, रतिमन्मथनाटक, अतन्द्रचन्द्रिकनाटक—मैथिल जगन्नाथकृत, अनङ्ग-
विजयभाण, सभातरङ्ग, अद्वैतामृत, शरभगजविलास, ज्ञानविलास, समुदायप्रकरण
आदि । परन्तु इनमें कोई भी पण्डितराज उपाधि वाले नहीं थे । मिथिला में रघुनन्दन
उपाध्याय पण्डितराज थे, जिन्होंने वादशाह अकबर से तिरहुत राज्य प्राप्त कर अपने
गुरु म० म० महेश ठक्कुर को दे दिया था तथा काव्यप्रकाश की टीका लिखी थी, जो
दरभङ्गा में हस्तलिखित रूप में है ।
रसगङ्गाधर की व्याख्या-सम्पत्ति
रसगङ्गाधर पर निम्नांकित व्याख्याएँ उपलब्ध हैं—
( १ ) गुरुमर्मप्रकाश—म० म० नागेशभट्ट (१७५० ई०) कृत । यह रसगङ्गाधर
पर सर्वप्राचीन टिप्पणी उपलब्ध है, जो इसके खण्डन के उद्देश्य से ही लिखी गयी थी ।
नागेशभट्ट प्रख्यात वैयाकरण थे । ये भट्टोजिदीक्षित के पौत्र हरिदीक्षित के शिष्य होने
के कारण पण्डितराज के विरोधी हुए, क्योंकि भट्टोजि से पण्डितराज का वैरभाव
प्रसिद्ध ही है । नागेश ने अपनी गुरुपरम्परा के समर्थन में ही पण्डितराज का खण्डन
किया है । बहुत स्थलों पर ग्रन्थ के आशय को भी स्फुटित किया है । इसका प्रकाशन
१९३९ ई० में भट्ट मथुरानाथ शास्त्री की सरला टीका के साथ जयपुर से हुआ उत्तरा-
लंकार पर्यन्त और आज तक इतना ही मूल ग्रन्थ भी मिलता है । नागेश की टीका भी
यहीं तक है ।
( २ ) म० म० गङ्गाधर शास्त्री की क्वचित्-क्वचित् टिप्पणी सहित रसगंगाधर
काशी से प्रकाशित हुआ था । इससे पहले यह ग्रन्थ काव्यमाला में मुद्रित हो चुका
था । तृतीय बार रसगङ्गाधर का प्रकाशन भट्ट मथुरानाथ शास्त्री द्वारा जयपुर से हुआ ।
( ३ ) सरला—भट्ट मथुरानाथ शास्त्री की ग्रन्थलापिनी एवं गूढार्थबोधिनी
संक्षिप्त व्याख्या है। यह गुरुमर्मप्रकाश के साथ १९३९ ई० में प्रकाशित हुई और १९४५
तक इसके छः संस्करण निकल गये, इसी से इसकी उपादेयता सिद्ध है ।
( ४ ) हिन्दी अनुवाद—पं० श्रीपुरुषोत्तमशर्मा चतुर्वेदी, नागरी प्रचारिणी
सभा, काशी ।
( २२ )
( ५ ) 'चन्द्रिका'—कविशेखर बदरीनाथ झा—प्रथमानन भाग, शेष भाग पर
पं० मदनमोहन झा—रसगङ्गाधर की आज तक सर्वोत्कृष्ट व्याख्या यही है । ग्रन्थ को
स्पष्ट करते हुए उसका सारभाग पाठकों के समक्ष रख देना, छात्रों एवं विद्वानों के
उपयुक्त सन्तुलित विचार उपस्थित करना एवं साहित्यिक दृष्टि से ग्रन्थ को देखना
इत्यादि कतिपय विशेषताएँ इसे लोकप्रिय बनाती हैं । चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी
से १९५५ ई० में प्रकाशित ।
( ६ ) 'चन्द्रिका' हिन्दी व्याख्या—पं० मदनमोहन झा—यह व्याख्या उपर्युक्त
'चन्द्रिका' संस्कृत व्याख्या के साथ प्रकाशित है । यह सूक्ष्म विवेचना के क्रम में बहुत
स्थलों पर विस्तृत हो गयी है ।
( ७ ) मधुसूदनीप्रकाश संस्कृत-हिन्दी व्याख्या—आचार्य मधुसूदन मिश्र—काशी
हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ।
( ८ ) रसचन्द्रिका—पं० श्रीकेदारनाथ ओझा—यह व्याख्या सम्पूर्णानन्द
संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से १९७७ ई० में प्रकाशित हुई । इसमें ग्रन्थ का
अवतरण, शब्दार्थस्फोरण एवं दार्शनिक दृष्टि से विषय का निरूपण किया गया है ।
कुछ स्थलों में यह शास्त्रान्तर विचार में अतिविशद हो गयी है, जब कि बहुत स्थलों
पर टिप्पणी बन के रह गई है । इसकी भूमिका केवल टीकाकारों की भर्त्सना में
कृतश्रमा है, जैसा वर्णन विद्वान् के लिए अशोभनीय है । काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ की
व्याख्या में एक भी तच्छास्त्रीय त्रुटि नहीं दिखाई गई है, केवल न्यायशास्त्रीय त्रुटि और
वह त्रुटि भी कहाँ तक समीचीन है इसका निर्णय तो परवर्ती आलोचकों, व्याख्याकारों
के विचार में देखे जा सकते हैं । पर उनकी इस भूमिका से स्पष्ट हो जाता है कि
'चन्द्रिका' व्याख्या की दोषगवेषणा को ही यह श्रेय है कि 'रसचन्द्रिका' व्याख्या का
उसने ही निर्माण करा लिया । माननीय व्याख्याकार के सम्बन्ध में विशेष वक्तव्य
नहीं है—साहित्यशास्त्रीय विषय-विवेचन में भी बहुत स्थलों पर शास्त्रवैपरीत्य इनकी
व्याख्या में है जिनकी गणना हम यहाँ नहीं करना चाहते । पाठक इस रसतरङ्गिणी
व्याख्या में उन्हें ढूँढ़ सकते हैं । चन्द्रिका के बाद रचित होने पर भी 'रसचन्द्रिका'
उसका स्थान नहीं ले सकी, न ही लोकप्रिय हो सकी—यह भी ज्ञातव्य है ।
( ९ ) रसतरङ्गिणी—डॉ० श्रीनारायण मिश्र एवं डॉ० शशिनाथ झा—यह
प्रस्तुत संस्करण संस्कृत-हिन्दी व्याख्यात्मक है । यह छात्रोपयोगी के साथ-साथ गम्भीर
विचारों का प्रतिपादक, जटिल स्थलों का परिचायक, पूर्वव्याख्याताओं द्वारा विषय को
प्रकृत शास्त्र से शास्त्रान्तर की ओर बहकाव का नियन्त्रक और कुव्याख्यान का विखण्डक
के रूप में प्रस्तुत हो रहा है ।
( २३ )
प्रस्तुत संस्करण होने में ( छपने में ) बहुत विलम्ब हो गया । दुःसंयोग की
बात हुई कि डॉ० श्रीनारायण मिश्रजी की व्याख्या कुछ अंश छपने के बाद प्रेस में
नष्ट हो गयी । इससे मिश्रमहोदय बहुत खिन्न हुए और छपी हुई व्याख्या के बाद संक्षिप्त
व्याख्या से प्रथमानन को पूर्ण किया । पर दुर्भाग्य की बात ! फिर कुछ अंश छपने के
बाद पाण्डुलिपि नष्ट हो गयी और डॉ० मिश्र ने यह काम छोड़ दिया । प्रकाशक
महोदय ने मुझे प्रेरित किया और मैंने यथामति भावध्वनिप्रकरण के धृतिभाव से आगे
प्रथमानन पर्यन्त संस्कृत-हिन्दी व्याख्या कर दी । इसमें मुझे अधिक आयास नहीं करना
पड़ा, क्योंकि अध्ययन एवं अध्यापन के क्रम में रसगङ्गाधर पुस्तक के हाशिये पर मैंने
टिप्पणी कर ली थी, जिसमें ग्रन्थ के गूढ़ाशय, मतमतान्तर एवं पूर्व व्याख्याकार से
मतभेद अंकित थे और वही मेरी व्याख्या का आधार बन गया ।
यह व्याख्या कहाँ तक सफल हो सकी है, इसकी क्या विशेषताएँ हैं—इस विषय
के विवेचन का भार पाठकों पर ही छोड़ना उचित समझ कर विरत होता हूँ ।
संस्कृत-दिवस १९९६ ई०
स्नातकोत्तर व्याकरण विभाग डॉ० शशिनाथ झाः
का० सिं० द० संस्कृत विश्वविद्यालय विद्यावाचस्पति
दरभङ्गा
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विषय-सूची
विषयः पृष्ठम् | विषयः पृष्ठम्
भूमिका १–२१ | विस्मयः १२६
मङ्गलाचरणादि १ | हासः १२७
काव्यलक्षणम् ८ | भयम् १२७
हेमचन्द्रोक्तलक्षणे आक्षेपः १२ | विभावः, अनुभावः,
साहित्यदर्पणोक्तलक्षणे आक्षेपः २० | व्यभिचारिभावः १२८
प्रतिभाकाव्यकारणम् २१ | रसभेदनिरूपणम् १३१
काव्यं चतुर्विधम् ३० | शृङ्गारः १३१
उत्तमोत्तमकाव्यस्य लक्षणम् ३० | करुणः १३५
उत्तमकाव्यस्य लक्षणम् ५४ | शान्तः १३६
मध्यमं काव्यम् ६२ | रौद्रः १३८
अधमं काव्यम् ६५ | वीरः १४३
प्रकाशकृत्कृतभेदेषु कटाक्षः ६७ | अद्भुतः १५८
ध्वनेर्भेदाः ७० | हास्यः १६१
रसस्वरूपम् ७१ | भयानकः १६४
( १ ) अभिनवगुप्तमते ७८ | बीभत्सः १७५
जगन्नाथेन मतभेदः ७९ | रसानां संख्यानियमः १७८
( २ ) भट्टनायकमते ८२ | रसानां परस्परविरोधः १७९
( ३ ) नव्यमते ९४ | रसदोषाः १८३
( ४ ) भ्रमवादिमते १०४ | गुणनिरूपणम् १९३
( ५ ) लोल्लटमते १०८ | गुणविषये स्वमतम् १९५
( ६ ) शङ्कुकमते ११० | गुणविषये वामनादिमतम् २०१
( ७ ) इतराणि पञ्चमतानि १११ | शब्दगुणाः २०२
भरतकृतरससूत्रस्याष्टधाव्याख्यानम् ११२ | श्लेषः २०२
रस
( २ )
विषयः पृष्ठम् विषयः पृष्ठम्
समाधिः २१० व्याधिः ३०४
अर्थगुणाः २१२ त्रासः ३०५
श्लेषः २१२ सुप्तम् ३०७
प्रसादः २१४ विबोधः ३०८
समता २१४ अमर्षः ३११
माधुर्यं २१७ अवहित्थम् ३१२
सुकुमारता २१७ उग्रता ३१४
अर्थव्यक्तिः २१९ उन्मादः ३१५
उदारता २१९ मरणम् ३१६
ओजः २२४ वितर्कः ३१८
कान्तिः २२५ विषादः ३१९
समाधिः २२६ औत्सुक्यम् ३२२
अर्थे तेषु त्रिष्वेवान्तर्भावः २३० आवेगः ३२३
गुणव्यञ्जकरचना २३७ जड़ता ३२४
रचनायां वर्जनीयता २४८ आलस्यम् ३२५
भावध्वनिः २६६ असूया ३२७
भावलक्षणम् २६७ अपस्मारः ३३०
हर्षः २७९ चपलता ३३१
स्मृतिः २८० निर्वेदः ३३३
व्रीडा २८५ देवादिविषयरतिः ३३४
मोहः २८७ व्यभिचारिभावानां संख्यानियमः ३३६
धृतिः २८८ रसाभासः ३३८
शङ्का २८९ भावाभासः ३४८
ग्लानिः २९० भावशान्तिः ३५०
दैन्यं २९२ भावोदयः ३५१
चिन्ता २९४ भावसन्धिः ३५२
मदः २९६ भावशबलता ३५३
श्रमः २९८ अलक्ष्यक्रमध्वनिः ३६२
गर्वः ३०० वर्णरचनादीनांरसभिव्यञ्जकता ३६८
निद्रा ३०२ उदाहृतश्लोकानुक्रमणी ३७५
मतिः ३०३ रसगङ्गाधरेचर्चिताग्रन्था
ग्रन्थकाराश्च ३७९
――――****――――
: त र्का या स - wait, between या and प:
Is it स? Yes, तर्कायासपरिश्रान्तस्वान्तविश्रान्तिदायिनीम्!
Wait, let me look at स: it's a full स, not स्!
तर्कायासपरिश्रान्तस्वान्तविश्रान्तिदायिनीम्
Wait, let me zoom in on स:
Left part: loop and leg of स. Middle: crossbar. Right: vertical stem.
It's a full स!
So it is: तर्कायासपरिश्रान्तस्वान्तविश्रान्तिदायिनीम्
रसगङ्गाधरव्याख्यां कुर्मो रसतरङ्गिणीम् ॥ २ ॥ग्रन्थार्थमात्मसात्कृत्या तरङ्गिण्या यथायथम् ।orग्रन्थार्थमात्मसात्कृत्व्या?- Let's check L12:
ग्रन्थार्थमात्मसात्कृत्यorग्रन्थार्थमात्मसात्कृत्वा?
Letter:कृthenत्वा!
Wait, look atकृत्वा:कृthenत्+वा=त्वा.
Yes! `ग्रन्थार्थ
- Let's check L12:
:
Line 1:
Page number and header:
२ रसगङ्गाधरः
Line 2:
कलिन्दगिरिनन्दिनीतटसुरद्रुमालम्बिनी
Line 3:
मदीयमतिचुम्बिनी भवतु कापि कादम्बिनी ॥ १ ॥
Line 4:
अपि च कलिन्दगिरिनन्दिन्या यमुनायास्तटेऽवस्थितं सुरद्रुमं कदम्बवृक्षमालम्बितुं
Line 5:
शीलं यस्यास्तथाविधा सा कापि विलक्षणा कादम्बिनी श्रीकृष्णस्वरूपा मदीयमनि- (wait, मदीयमति- or मदीयमनि-?)
Look at line 5:
"मदीयमनि-" or "मदीयमति-"?
Look at: "म दी य म ति-" -> it's clearly मदीयमति-! Look at "मदबुद्धिविषया" right after it! मति = बुद्धि.
Line 6:
चुम्बिनी मदबुद्धिविषया भवतु—इति मङ्गलपद्यार्थः ।
Line 7:
अत्र स्मृतापीत्यनेन लौकिककादम्बिनीतो व्यतिरेको दर्शितः । अपूर्वेयं काद-
Line 8:
म्बिनी साक्षात्कृता स्मृता वा तरुणमातपं हरति, लौकिकी तु शिरस ऊर्ध्वं नभसि वर्त्त-
प्रथमाननम् ३
श्रीमज्ज्ञानेन्द्रभिक्षोरधिगतसकलब्रह्मविद्याप्रपञ्चः
काणादीराक्षपादीरपि गहनगिरो यो महेन्द्रादवेदीत् ।
नापि स एव । प्रसिद्धाया अव्यापकत्वेन यत्किञ्चिदनुरक्ताननुरक्तनरतापहारकत्वमित-
रेषामनुरक्तानामपि तापाऽहारकत्वं चास्ति, अस्याः पुनरशेषानुरक्तजनमात्रतापहा-
रित्वम्, 'कामाल्लोभाद्भयात्', 'काले कारुणिक त्वयैव कृपया ते तारणीया नराः'
इत्यादिरीत्या वाऽनुरक्ताननुरक्तमात्रतापहारित्वमिति । अभङ्गुरेत्यादिनापि स एव,
प्रसिद्धकादम्बिनीवलयीभूतविद्युतस्तनुत्विङ्भङ्गुरा, अस्याः पुनरभङ्गुरा सेति हेतोः ।
बहुवचनान्तेन शतशब्देनानन्त्यार्थकेन च विद्युतां कादम्बिनीव्यापकत्वमत एव च
वलयितेत्यस्य वेष्टितेति तात्पर्यम् । प्रसिद्धविद्युतस्तु शतसंख्याकत्वमपि नास्ति युगपत्,
प्रत्यक्षत एव तद्बाधात् । विनष्टाविनष्टयोश्च सह संख्यानाभावादतीतकालिकत्वा-
दिनापि न निर्वाहः । कथञ्चित् सह संख्यानेऽपि व्यापकत्वं तु तस्याः प्रत्यक्षबाधि-
तमेव । अतोऽत्रापि व्यतिरेको निर्बाधः । द्रुमस्य च कादम्बिन्यालम्बनत्वेन चित्त-
द्रवीभवनरूपावस्था सूच्यते । चुम्बनशब्देन च विषयप्रतिपादनाद्विषयिणस्तन्मयत्वं
सूच्यते । तथा च गीता—
'तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः' इति ॥
कादम्बिनीति स्त्रीलिङ्गनिर्देशोऽनुरागातिशयसूचनाय । अन्येप्यर्था यथाप्रज्ञ-
मव्यवसेयाः । को हि नाम ना शक्तः परिमातुमपरिमेयं शब्दब्रह्म ?
अत्र व्यतिरेकोऽलङ्कारो मुख्यः, तदङ्गत्वेन चातिशयोक्त्यादयोपीति सङ्करः ॥ १ ॥
स्वविद्योत्कर्षख्यापनाय स्वगुरुविद्योत्कर्षमाह—श्रीमदित्यादि । प्रपञ्चो
'विस्तरः । तस्याधिगतिः सतात्पर्यकस्य तस्य यथार्थबोधः । देवः = खण्डदेवः,
विनाऽपि प्रत्ययं पूर्वपदलोपात् । शेषाङ्को वीरेश्वरः, शेषोपनामकत्वात् । शेषः =
इस पद्य द्वारा इस कादम्बिनी मे लौकिक कादम्बिनी से विलक्षणता व्यक्त की
गई है । लौ० कादम्बिनी जिसके शिर के ऊपर आकाश में रहती उसी के तरुण
बाह्य आतप को शान्त कर पाती, वह भी सर्वदा और स्मरण मात्र से नहीं; यह
न तो एक काल में असंख्य विद्युल्लताओ से वेष्टित होती और न इस विद्युल्लता
की कान्ति ही अनश्वर होती; यह यमुना तट पर अवस्थित कदम्ब वृक्ष पर आश्रित
भी नहीं होती जब कि प्रकृत कादम्बिनी—जैसा कहा जा चुका है, इन सभी दृष्टियों
से लौ० कादम्बिनी से भिन्न, अत एव उत्कृष्ट, है । इससे लौ० कादम्बिनी से
प्रकृत कादम्बिनी का व्यतिरेक स्पष्ट हो जाता है ॥ १ ॥
जो श्रद्धेय सन्यासी ज्ञानेन्द्र सरस्वती से सम्पूर्ण वेदान्त शास्त्र को प्राप्त करने,
महेन्द्र पण्डित से अतिकठिन कणाददर्शन ( वैशेषिकदर्शन ) और अक्षपाददर्शन
३ र०
रसगङ्गाधरः
देवादेवाद्ध्यगीष्ट स्मरहरनगरे शासनं जैमिनीयं
शेषाङ्कःप्राप्तशेषोऽमलभणितिरभूत्सर्वविद्याधरो यः ॥
पाषाणादपि पीयूषं स्यन्दते यस्य लीलया ।
तं वन्दे पेरुभट्टाख्यं लक्ष्मीकान्तं महागुरुम् ॥ २-३ ॥
निमग्नेन क्लेशैर्मननजलधेरन्तरुदरं
मयोन्नीतो लोके ललितरसगङ्गाधरमणिः ।
हरन्तर्ध्वान्तं हृदयमधिरूढो गुणवता-
मलंकारान्सर्वानपि गलितगर्वान् रचयतु ॥ ४ ॥
शेषावतारभूतो भगवान् पतञ्जलिर्महाभाष्यनिर्माता । तद्वचनप्राप्तिमुखेन पाणिनिकात्या-
यनवचनप्राप्तिरपि सूचिता, महाभाष्यस्य तदारूढत्वात् । सर्वाणि विशेषणानि सर्व-
विद्याधरत्वे हेतुभूतानि । पाषाणादपीत्यादिना स्ववर्णनकौशलेनाचेतनमपि चेतनवत्
करोतीति प्रतिपादनात्स्वपितरि कवित्वकाष्ठा दर्शिता । लीलयेत्यनेन च तथावर्णने
पितुरायासाभावः सूचितः । लक्ष्मीकान्तमित्यनेन स्वमातुर्लक्ष्म्यभिधाया नाम निर्दि-
ष्टमिति कस्यचिद् व्याख्यानम switch अनौचित्यस्पृशि, एवं रूपेण लोके पित्रोर्नामग्रहणस्यात्यन्त-
विगर्हितत्वात् । अतः सारस्वतस्य पितुर्धनवत्त्वं विष्णुसदृशत्वं वा प्रतीयत इत्येव
युक्तम् ॥ २-३ ॥
ग्रन्थप्रशस्तिमाह—निमग्नेनेत्यादिना । मननरूपजलधेरन्तरुदरमन्तस्तलं क्लेशै-
रनल्पायासैर्नितरां मननेन मया जगन्नाथेन ललितो गुणालङ्कारादिभूषितो रसगङ्गाधर-
स्वरूपः काव्यतत्त्वप्रकाशकत्वान्मणिर्लोक उन्नीतः । सोऽयं गुणवतां सहृदयानां हृदय-
मधिरूढोऽन्येषां काव्यतत्त्वजिज्ञासूनामन्तर्ध्वान्तमज्ञानं हरन् सर्वानपि पूर्वाचार्यरचिता-
लङ्कारग्रन्थान् गलितगर्वान् रचयतु । अत्र च अन्तरुदरम् निमग्नेनेत्यादिना प्रतिपाद्य-
विषयस्य सुचिन्तितत्वमपि सूचितं भवति ॥ ४ ॥
(न्यायदर्शन) को जानने, काशी में खण्डदेव से पूर्व मीमांसा शास्त्र का अध्ययन करने
और शेष वीरेश्वर से शेषावतार भगवान् पतञ्जलि की निर्मल वाणी महाभाष्य
का अधिगम करने से सर्वविद्यासम्पन्न हुए और जिनकी नैसर्गिक काव्यकला से
पत्थर से भी अमृत चूने लग जाता उन विष्णुसदृश पितृचरण पेरुभट्ट को मेरा
प्रणाम समर्पित है ॥ २-३ ॥
मननरूपी सागर के अन्तस्तल में आयासपूर्वक गोता
प्रथमाननम् ५
परिष्कुर्वन्त्वर्थान्सहृदयधुरीणाः कतिपये
तथापि क्लेशो मे कथमपि गतार्थो न भविता ।
तिमीन्द्राः संक्षोभं विदधतु पयोधेः पुनरिमे
किमेतेनायासो भवति विफलो मन्दरगिरेः ॥ ५ ॥
निर्माय नूतनमुदाहरणानुरूपं
काव्यं मयात्र निहितं न परस्य किंचित् ।
किं सेव्यते सुमनसां मनसापि गन्धः
कस्तूरिकाजननशक्तिभृता मृगेण ॥ ६ ॥
मननतरीतीर्णविद्यार्णवो जगन्नाथपण्डितनरेन्द्रः ।
रसगङ्गाधरनाम्नीं करोति कुतुकेन काव्यमीमांसाम् ॥ ७ ॥
निमग्नेनेत्यादिसूचितार्थमेव भङ्ग्यन्तरेणाह—परिष्कुर्वन्त्वित्यादिना । कतिपये
सहृदयधुरीणा भामहदण्डिमम्मटादयः पूर्वाचार्याः । तिमिर्नाम मत्स्यविशेषः । तथा च
तिमीन्द्रप्रयासस्याफलतयाऽल्पफलतया वा यथा प्रचुरामृतफलो मन्दरगिरिप्रयासो न
गतार्थस्तथैव ममाप्ययं प्रयासोऽशेषकाव्यतत्त्वप्रमितिजननपरो न गतार्थ इत्याशयः ।
अत्रैकस्यैवार्थस्य पूर्वार्द्धोत्तरार्धयोः प्रकारान्तरेण विधिनिषेधमुखेनोक्तः प्रतिवस्तू-
पमालङ्कारः ॥ ५ ॥
स्वकीयप्रबन्धस्य प्रबन्धान्तरापेक्षयोत्कर्षं दर्शयति-निर्मायेत्यादिना । मयोदाह-
रणानुरूपं नूतनं काव्यं निर्मायात्र ग्रन्थे निहितम्, परस्य तु न किमप्यत्र निक्षिप्तम् ।
अयमेव प्रकृतप्रबन्धस्योत्कर्षः प्रकृतपक्षे विवक्षितः । सुमनसाम् = पुष्पाणाम् । अत्राप्यु-
त्तरार्धे शब्दान्तरेण पूर्वार्थार्थकथनात् प्रतिवस्तूपमा ॥ ६ ॥
भामह, दण्डी, मम्मट आदि सहृदयों मे अग्रगण्य आचार्य काव्यार्थ का परिष्कार
भले हीं कर चुके हों, फिर भी मेरा यह प्रयास व्यर्थ नही हो सकता । तिमि-तिमि-
ङ्गिल आदि मछलियां सागर मे भले ही उथल-पुथल मचाती रहें, फिर भी क्या
इतने से हीं मन्दराचल का समुद्रमन्थन-प्रयास निरर्थक हो सकता ? कथमपि
नहीं ॥ ५ ॥
अपेक्षित उदाहरण के अनुरूप नवीन काव्य की रचना कर उसे मैने इसमें
समाविष्ट किया है, अन्य की रचना का इसमें कहीं भी समावेश नही हुआ है ।
क्या कस्तूरी को उत्पन्न करने की क्षमता रखने वाला गन्धमृग पुष्पों की सुगन्धि
को मम से भी कभी चाहता ? कभी नहीं ॥ ६ ॥
मननरूपी नौका से विद्या-सागर को पार कर चुकने वाला पण्डितराज जगन्नाथ
अनायास ही काव्यतत्त्वविचारपरक रसगङ्गाधरनामक ग्रन्थ की रचना कर रहा
है ॥ ७ ॥
" takes up the second half.
In "संदर्भ...यं":
There are letters:
सं
द
र्भो
ऽ
यं
Wait, look at the space between 'भ' and 'यं':
It has TWO elements:
- A vertical line with a slant on top? No!
Wait, look at the word:
Does it sayसंदर्भोऽयंorसंदर्भोडयं?
Wait, if you look atसंदर्भोऽयं:
In Devanagari: र्भो has: भ + kana + repha on kana.
And then ऽ.
Yes! The vertical line is the kana of 'ो'!
And after the kana is 'ऽ'!
Wait! Let me look again:
Is there a kana AND a 'ऽ'?
Yes! Look at that:
There is भ.
Then a vertical line (the kana of 'भो')!
Then an 'ऽ'!
Wait, why did I think it was 'ड'?
Because the kana and the ऽ are close together!
Ah! The kana is a vertical line. Then the ऽ is right next to it!
Wait, look at the top: the shirorekha runs over both!
Wait, in Devanagari, does the shirorekha run over ऽ?
In many fonts, the avagraha ऽ is hanging from the shirorekha!
Yes, in classical Indian typography (like Nirnaya Sagar Press, Chowkhamba, etc.), the avagraha ऽ
प्रथमाननम् ७
व्युत्पत्तेः कविसहृदययोरावश्यकतया गुणालंकारादिभिर्निरूपणीये तस्मिन्
विशेष्यतावच्छेदकं तदितरभेदबुद्धौ साधनं च तल्लक्षणं तावन्निरूप्यते—
सहृदयत्वं तस्यैव यः कविकर्मानुभविता । अत एवात्र शास्त्रे सहृदयपदेन काव्यार्थ-
भावनाजनकसंस्कारविशेषवानेव गृह्यते । शास्त्रान्तरे च तत्तदर्थभावनाजनकसंस्कार-
विशेषवानेव सहृदयः । आवश्यकतयेति । तत्त्वं च काव्यार्थव्युत्पत्ते स्तद्विवेचनो-
पयोगित्वेन रसास्वादनसहकारित्वेन च बोध्यम् । गुणा माधुर्यादयः, अलङ्काराः
शब्दाश्रिता अर्थाश्रिता उभयाश्रिताश्चानुप्रासोपमाश्लेषप्रभृतयः । अत्र गुणालङ्कारा-
दिभिरिति तृतीया गुणादीनामुपलक्षणत्वं बोध्यते । अत एवैभिः काव्यतत्त्व-
ज्ञानेऽपि नैषां सर्वकाव्यनिष्ठत्वाऽऽग्रहो मुक्तके प्रबन्धे च सर्वावयवनिष्ठत्वाऽऽग्रहः ।
यावल्लक्ष्यकालमविद्यमानमपि व्यावर्तकमुपलक्षणं मन्यते । यथा काकवन्तो देव-
दत्तस्य गृहा इत्यादौ काकः । अत एव 'उदितं मण्डलं विधोः' इत्यादौ नाव्याप्तिरिति
वक्ष्यति स्वयमेव । तस्मिन् = काव्ये । विशेष्यतावच्छेदकमिति । अयमाशयः—
काव्यज्ञानानुकूलः शब्दप्रयोगो निरूपणमत्र । तथा च गुणालङ्काराद्युपलक्षितं काव्यं
निरूपणीयम् । निरूपणस्य विशेष्यं काव्यम् इति काव्ये विशेष्यता, तदवच्छेदको धर्मः
काव्यत्वम्, तच्च किंस्वरूपम् इति प्रतिपादनीयम् । तदेव निरूपितं सत् काव्यस्येतर-
भेदानुमितौ हेतुरिति । काव्यत्वं च रमणीयार्थप्रतिपादकशब्दत्वस्वरूपम्, तद्धे-
तुका चेतरभेदानुमितिः 'काव्यं स्वेतरभिन्नम्, रमणीयार्थकप्रतिपादकशब्दत्वात्,
यत्र यत्र स्वेतरभिन्नत्वाभावः = स्वेतरत्वं तत्र तत्र रमणीयार्थप्रतिपादकशब्दत्वाभावः,
यथा गौर्गच्छतीत्यादौ, न चेदं तथा, तस्मान्न तथा' इत्याकारिका । तल्लक्षणम् =
काव्यलक्षणम् ।
प्रयोजनों की प्राप्ति के लिए कवि तथा सहृदय दोनों को ही साङ्गोपाङ्ग काव्य के
स्वरूपादि का यथार्थबोध होना आवश्यक है । अतः श्लेष-प्रसाद आदि गुणों एवं
उपमा आदि अलङ्कारों से उपलक्षित काव्य के स्वरूप आदि का निरूपण इस ग्रन्थ में
करना है । इस प्रसङ्ग में निरूपण के विशेष्यभूत काव्य में जो विशेष्यता है उसका
अवच्छेदक (काव्यत्व) और अन्य पदार्थ से काव्य के भेद का साधक जो लक्षण
उसका निरूपण प्रथमतः किया जा रहा है—
[गुण एवम् अलंकार आदि को काव्य का विशेषण नहीं अपि तु उपलक्षण माना
गया है। जो विशेष्य मे वर्त्तमान होते हुए उसको अन्य पदार्थ से भिन्न सिद्ध करता
हो उसे विशेषण और जो उपलक्ष्य में सर्वदा विद्यमान न रहकर भी उसको अन्य से
भिन्न सिद्ध करता हो—उपलक्ष्य का स्पष्ट परिचय कराता हो, उसे उपलक्षण कहा
जाता। संक्षेप मे यह ज्ञातव्य है कि उपलक्षण का (क) उपलक्ष्य मे सर्वदा रहना और
(ख) सभी उपलक्ष्यों में रहना अनिवार्य नही है। काव्य के सन्दर्भ मे उपलक्षण का
८ रसगङ्गाधरः
रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम् ॥
रमणीयता च लोकोत्तराह्लादजनकज्ञानगोचरता । लोकोत्तरत्वं चा-
रमणीयेत्यादि—रमणीयस्यार्थस्य प्रतिपादकः शब्दः काव्यम् । प्रतिपत्तिश्चात्र
ज्ञानम्, तज्जनकः शब्दः काव्यम् । अत्र 'शब्द इत्यनुक्तौ रमणीयार्थज्ञानजनकाभिन-
यादावतिव्याप्तिरतस्तदुपादानम् । प्रतिपादकेत्यनेन वाचकलक्षकव्यञ्जकानां सर्वेषा-
मेव ग्रहणम्, तेषां तथाविधार्थज्ञानजनकत्वादविशेषात् । अत एव वाचक इति लक्षक
इति व्यञ्जक इति वा नोक्तम् । उपस्थितिश्च वाचकत्वादिना भवतु, तत्र न विशेषः ।
शब्दश्चात्र वाक्यात्मको महावाक्यात्मको वा विवक्षितः, शब्दस्य मूलतो वाक्यात्मक-
त्वात् । अत एव वाक्यादेव विवक्षितार्थबोधः । पदमात्रे काव्यत्वव्यवहाराभावश्चा-
परो हेतुरत्र । यत्र च पदे तदंशे वोत्कर्षाधायकत्वं व्यञ्जकत्वादिना तत्रापि तद्घटित-
वाक्य एव काव्यत्वम्, अन्यथैकस्मिन्नेव वाक्येऽनेककाव्यत्वप्रसङ्गः । अर्थप्रतिपादकः
शब्दः काव्यमित्युक्तौ गौश्चलतीत्यादावतिव्याप्तिरतो रमणीयत्वमर्थस्य विशेषणम् ।
रमणीयशब्दप्रतिपादके व्याकरणकोशादौ काव्यत्वातिप्रसङ्गनिरासाय तत्रार्थ-
सन्निवेशः । शब्दे रमणीयत्वं चार्थरमणीयत्वेनैव काव्यत्वोपयोगि, न स्वरूपगतम्,
गुणालङ्कारादेरुपलक्षणत्वोक्तेः । रमणीयार्थप्रतिपादकत्वक्षमत्वं च यदि रमणीयत्वं
विवक्षितं तर्हि स्वरूपतोऽपि शब्दे तदस्तु कथञ्चित् ।
अत्रेदं बोध्यम् —रमणीयत्वं व्युत्पत्तिश्रद्धातिशयादिभेदाद् भिद्यते । लोकोत्तरा-
ह्लादोऽप्यत एव भिन्न एव । अतो योगिनो यादृशं रमणीयत्वं तत्त्वमस्यादिवाक्यार्थे
तादृशं नान्यत्रेति रमणीयार्थप्रतिपादकशब्दत्वसामान्यं न काव्यत्वपर्यवसायि ।
अतो रमणीयार्थविशेष एव प्रकृतोपयोगी । स चायं विशेषः किं स्वरूप इत्यादि निरू-
पयितुकामो रमणीयत्वमादौ व्याचष्टे—रमणीयता चेत्यादिना । यद्विषयकज्ञाने
लोकोत्तराह्लादजनकता तत्त्वं रमणीयत्वम् इति तात्पर्यम् । ज्ञानपदं चात्र
भावनापरमिति वक्ष्यत्यग्रे । अर्थस्याऽज्ञातस्याह्लादाऽजनकत्वात् परित्यज्य
ज्ञानगोचरतापर्यन्तानुधावनम् । ज्ञायमानश्चार्थो न लोकोत्तराह्लादजनकः,
अर्थाऽभावे तदनुदयप्रसङ्गात् । अतोऽर्थज्ञानस्य तादृशाह्लादजनकत्वमभिहितं
ग्रन्थकृता । लोकोत्तरत्वं निर्वक्ति—लोकोत्तरत्वमिति । अनुभवसाक्षिकः=
दूसरा रूप महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि सभी काव्यों में गुणालंकारादि का होना ग्रन्थकार
की दृष्टि मे आवश्यक नहीं है । ]
रमणीय अर्थ का प्रतिपादक शब्द काव्य है ॥ १ ॥
जिसके ज्ञान (भावना) से लोकोत्तर आह्लाद उत्पन्न होता हो वही अर्थ रमणीय
होता है । आह्लादनिष्ठ लोकोत्तरत्व चमत्कारत्वनामक 'जाति' का ही नामान्तर है ।
आह्लाद में इस जाति के अस्तित्व में प्रमाण सहृदयों—काव्यार्थविषयक भावना से
प्रथमाननम् ९
ह्लादगतश्चमत्कारत्वापरपर्यायोऽनुभवसाक्षिको जातिविशेषः । कारणं च
तदवच्छिन्ने भावनाविशेषः पुनःपुनरनुसंधानात्मा । 'पुत्रस्ते जातः,' 'धनं
ते दास्यामि' इति वाक्यार्थधीजन्यस्याह्लादस्य न लोकोत्तरत्वम् । अतो न
तस्मिन्वाक्ये काव्यत्वप्रसक्तिः । इत्थं च चमत्कारजनकभावनाविषयार्थ-
सहृदयानुभवमात्रैकप्रमाणगम्यः । सहृदयश्चात्र काव्यार्थभावनाजनकसंस्कार-
वानेवेत्यावेदितपूर्वम् । अतो नातिप्रसङ्गः । चमत्कारकारणमाह—कारणं-
मिति । तदवच्छिन्ने = चमत्कारत्वावच्छिन्ने चमत्कारिणि लोकोत्तर आह्लादे ।
भावनाविशेष इत्यत्र सहृदयनिष्ठत्वं काव्यार्थमात्रविषयकत्वं विपरीतभावना-
ऽसहकृतत्त्वादि च विशेषः । पुनः पुनरनुसन्धानात्मेत्यनेन चेदं सूचितं यत्काव्यार्थस्य
भूयो भूयोऽनुसन्धाने स्मरणात्मके लोकोत्तरानन्दो जायते । अत एवार्वाचीनोत्तरचरित-
स्यापि पुनस्तदध्ययने रुचिर्भवति । यदा यदा काव्यार्थश्चिन्त्यते तदा तदाऽलौ-
किकाह्लादो जायत एवासति प्रतिबन्धके । एतेन प्रत्येक़ानुसन्धानेऽपि तादृशाह्लाद-
जनकता वर्त्तत एवेति सूच्यते । काव्यार्थेतरविषयकानुसन्धानप्रवाहे तु नैवम्, आद्या-
नुसन्धानेऽपूर्वाऽऽह्लादे जायमानेऽपि द्वितीयाद्यनुसन्धानेषु क्रमेणानन्दमात्राहासस्य
प्रमितेः । विकाराक्रान्तत्वमेव हि लौकिकत्वं भावानाम्, तद्रहितत्वं च लोकोत्तर-
त्वम् । किञ्च काव्यार्थेतरमात्रविषयकोऽनुसन्धानप्रवाहोऽपि सहृदयेषु न प्रसिद्धः ।
एतदेवाऽभिप्रेत्याह—पुत्रस्ते जात इत्यादि । न लोकोत्तरत्वमिति । तदर्थ-
भावनाजन्यत्वाऽभावादिति हेतुः । एतदेव ज्ञानपदमपहाय भावनापदप्रयोगस्य
प्रयोजनम् । वाक्य इति । वाक्यं चात्र काव्याऽघटकं विवक्षितम् । तद्घटके तथा-
विधवाक्येऽपि काव्यत्वस्य दुरपह्नवत्वात् । अत एव काव्यतदितरार्थविषयकभाव-
नायामपि न चमत्कारजनकत्वम्, तस्याः पूर्वोक्तविशेषव्यावृत्तत्वात् । अतो न
तथाविधार्थविषयकसमूहालम्बनभावनामादायातिप्रसङ्गः । भावनायाः समूहालम्बन-
त्वविरहश्च निर्युक्तिकः । अत एव भावनाया ज्ञानप्रवाहरूपतया तस्यां काव्यार्थेत-
राऽविषयकत्वमित्यपि नोचितम्, द्वित्रासु ज्ञानव्यक्तिषु तद्विषयकत्वसम्भवात् । सर्वासु
ज्ञानव्यक्तिषु तदविषयकत्वमित्यपि न सुवचम्, सर्वशब्दार्थस्याननुगतत्वेन यस्य
द्वित्रा एव ज्ञानव्यक्तयो जातास्तत्र च तद्विषयकत्वम् तस्य सर्वामामेव ज्ञानव्यक्तीनां
तदविषयकत्वसम्भवात् । सर्वेषां सर्वभावनाविषयत्वविवक्षणे त्वसम्भव इत्यलम् ।
सूत्रोक्तकाव्यलक्षणं परिष्करोति—इत्थं चेत्यादिना । चमत्कारजनिका या
ओतप्रोत सज्जनों का अनुभव ही है । इसीलिए काव्य से बहिर्भूत 'तुम्हारे पुत्र उत्पन्न
हुआ है' और 'तुम्हें धन दूँगा' इत्यादि वाक्यों में उक्त काव्यलक्षण को अतिव्याप्ति
नहीं होती, क्योंकि ये वाक्य आह्लादजनक होकर भी लोकोत्तराह्लादजनक नहीं हैं ।
इस प्रकार उक्त काव्यलक्षण का फलितार्थ यह हुआ—
१० | रसगङ्गाधरः
प्रतिपादकशब्दत्वम्, यत्प्रतिपादितार्थविषयकभावनात्वं चमत्कारजनक-
भावना—भावनाविशेषः, तद्विषयो योऽर्थः—रमणीयोऽर्थः, तस्य प्रतिपादकः शब्दः
काव्यम्, तत्त्वं च काव्यत्वमितिप्रथमलक्षणार्थः । अत्र विषयभेदेन व्यक्तिभेदेन च
भावनाविशेषस्याप्यानन्त्याद् गौरवमित्यतो लक्षणान्तरमाह—यत्प्रतिपादितेत्यादि ।
भावनात्वम् = भावनाविशेषत्वम्—भावनाविशेषस्यैव चमत्कारजनकत्वेनातिप्रसक्तस्य
भावनात्वस्य जनकतायच्छेदकत्वाभावात् । पूर्वनिर्दिष्टत्वाच्च सर्वत्र ग्रन्थ-
कृता विशेषशब्दो नोपात्तः । जनकतायच्छेदकमिति । काव्यार्थविषयको
भावनाविशेषश्चमत्कारजनकः, तस्मिन् भावनाविशेषे जनकता, तस्याश्चावच्छेदकं =
काव्यार्थविषयकभावनाविशेषत्वम् । येन रूपेण जनकता तद्रूपं जनकतायच्छेदकम् ।
जनकतासमानाधारं हि (यत्र यत्र जनकता वर्त्तते तत्र तत्र वर्त्तमानम्) अनतिप्रसक्तम्
(जनकता यत्र न वर्त्तते तत्रावर्त्तमानम्) किमपि जनकताऽवच्छेदकं भवति । प्रकृते
जनकताऽर्थविषयकभावनाविशेषे, तत्समानाधारो धर्मोऽर्थविषयकभावनाविशेषत्वम्
इति भवत्येतदवच्छेदकमर्थविषयकभावनाविशेषनिष्ठजनकतायाः । जनकता च
तेनावच्छेदकेनावच्छिन्ना । अवच्छेदकघटकीभूतस्थाप्यवच्छेदकत्वम् इति अर्थोऽपि
जनकताऽवच्छेदकः । भावनाविशेषविषयीभूतस्याप्यवच्छेदकघटकीभूतत्वेन तथा-
विधार्थ एवावच्छेदको नार्थान्तरम् । अत एव स्वविशिष्टेत्यादिलक्षणेऽर्थस्यैव
जनकताऽवच्छेदकत्वमुक्तम् । जनकता च जन्यतानिरूपिता भवति । जन्याभावे
किमपि जनकमपि न भवति । अतो जनकं जन्यसापेक्षम् । जनकताऽप्यत एव जन्यता-
सापेक्षा । कपालं घटस्य जनकम्, घटश्च कपालाज्जन्यः । तन्तुः पटस्य जनकः,
पटश्च तन्तुजन्यः । अतः कपाले सा जनकता, घटे च जन्यता । परन्तु कपाले
या जनकता सा न पटनिष्ठजन्यतासापेक्षा, तन्तौ या जनकता सा न घटनिष्ठजन्यता-
सापेक्षेति हेतोः कपालनिष्ठजनकता घटनिष्ठजन्यतासापेक्षत्वादेतन्निरूपिता—(घट-
निष्ठाजन्यता निरूपिता कपालनिष्ठजनकता) भवति, जन्यतायां चात्र पक्षे निरूपकता
वर्त्तते । एवं व्यत्यासेन जन्यताऽपि जनकता निरूपिता भवति । तत्र यथासम्भवं
वचनविन्यासः शाब्दबोधे कर्त्तव्यः । यदि जन्यं विशेष्यभूतं तर्हि जनकता निरूपिता
जन्यता, जनकं यदि `विशेष्यभूतं तर्हि जन्यतानिरूपिता जनकतातेति कथ्यते । अतश्च
प्रकृतलक्षणे चमत्कारजनकतावच्छेदकमित्यस्य चमत्कारनिष्ठजन्यता निरूपितार्थ-
विषयकभावनानिष्ठजनकताया अवच्छेदकमिति सरलार्थः । लक्षणे यत्तत्पदे शब्दं
परामृशतः । अतस्तत्त्वमित्यस्य शब्दत्वमर्थः । भावनाविशेषत्वस्य सर्वेष्वेव भावना-
(क) चमत्कारजनक भावनाविशेष के विषयीभूत (= रमणीय) अर्थ का प्रतिपादक
शब्द (वाक्य) काव्य है, अथवा (ख) जिस शब्द से प्रतिपादित अर्थ की भावना
(भावनाविशेष) में रहने वाला भावनात्व (= भावनाविशेषत्व) भावनाविशेषनिष्ठ
तावच्छेदकं तत्त्वम्, स्वविशिष्टजनकतावच्छेदकार्थप्रतिपादकतासंसर्गेण
चमत्कारत्ववत्त्वमेव वा काव्यत्वमिति फलितम्।
विशेषेष्वेकतया नात्र लक्षणे पूर्वलक्षणवद् भावनाविशेषानन्त्यप्रयुक्तं गौरवम्। अत्र
च लक्षणे 'प्रत्युच्चारणं शब्दो भिद्यते' इति मताश्रयणे तु यत्पदेनानुपूर्वी विवक्षणीया,
तत्त्वमित्यस्यापि तादृशानुपूर्वीकत्वमित्यर्थो ग्राह्यः। तथा च यादृशानुपूर्वीप्रतिपादि-
तार्थविषयकभावनात्वं चमत्कारनिष्ठजनकताया अवच्छेदकं तादृशानुपूर्वीकत्वं काव्य-
त्वमिति लक्षणार्थोऽवसेयः। अननुगतार्थकयत्तच्छब्दयोरत्र लक्षणे प्रवेशेऽपि न क्षतिः,
एतादृशाननुगमस्य व्यवहारबाधकत्वाऽभावात्। अथवा भावनाविशेषत्वस्यावच्छेद-
कत्वमभ्युपगत्य—'चमत्कारनिष्ठजन्यतानिन्नूपितभावनाविशेषनिष्ठजनकतावच्छेदका-
वच्छिन्न ( भावनाविशेष ) विषयीभूतार्थप्रतिपादकशब्दत्वं काव्यत्वम्' इति, अर्थस्या-
वच्छेदकत्वपक्षे तु—'चमत्कारनिष्ठजन्यतानिन्नूपितभावनाविशेषनिष्ठजनकतावच्छेद-
कार्थप्रतिपादकशब्दत्वं काव्यत्वम्' इति लक्षणं बोध्यम्। अर्थस्यावच्छेदकत्वाभ्युपगमे
लाघवं चापाततो दृश्यत एव। अत्र च भावनाविशेषतवस्यैवावच्छेदकत्वं ग्रन्थकृदभि-
मतम् न भावनात्वस्य, 'कारणं च तदवच्छिन्ने भावनाविशेषः' इत्युक्तत्वात्। अतश्च
भावनात्वस्यावच्छेदकत्वेऽपि लक्षणे तत्प्रवेशे न तात्पर्यम्, भावनात्वस्य काव्यतदि-
तरार्थभावनामात्रवृत्तितयाऽव्यावर्त्तकत्वादित्यादिकथनं चिन्त्यम्। अत्र च काव्य-
लक्षणघटकपदार्थानां यथायथं विशेषणविशेष्यरूपेण निवेशादिदं 'प्रकारविधया'
लक्षणकरणम् इति प्रसिद्धिः। अत्र चाधिकपदार्थोपस्थितेर्गौरवम्। अतः संसर्ग-
मुद्रया लक्षणान्तरमाह—स्वविशिष्टेत्यादि। संसर्गविधया लक्षणकरणे तु लक्षण-
घटकानां बहूनां पदार्थानां संसर्गमध्ये प्रवेशात्पदार्थोपस्थित्यादिकृतं लाघवं भवति।
चमत्कारजनकता का अवच्छेदक हो वह शब्द काव्य है, अथवा (ग) 'स्वविशिष्टज-
नकतावच्छेदकार्थप्रतिपादकत्व' [स्व(=चमत्कारत्व) से विशिष्ट (=चमत्कार)
में वर्त्तमान जन्यता से निरूपित (अर्थविषयक) भावनाविशेष में वृत्ती जनकता के
अवच्छेदकीभूत अर्थ का प्रतिपादक होना] इस परम्परा सम्बन्ध से चमत्कारत्ववान्
शब्द ही काव्य है। प्रथम लक्षण में निर्दिष्ट भावनाविशेष के व्यक्तिभेद तथा विषय-
भेद से अनन्त होने से सकलभावनाविशेषनिष्ठ भावनाविशेषत्वस्वरूप एक अनुगत
धर्म को आधार मानकर लघुतर द्वितीय लक्षण किया गया है। यथासंभव विशेषण-
विशेष्य के क्रम से पदार्थों को निविष्ट करके किया गया द्वितीय लक्षण 'प्रकारमुद्रा'
से और लक्षणघटक अनेक पदार्थों को संसर्गकोटि में रखकर किया गया तृतीय
कक्षण 'संसर्गमुद्रा' से विहित है। संसर्गमुद्रा से किए गए लक्षण में पदार्थोपस्थित्यादि
में लाघव होता है किन्तु प्रकृत में निर्दिष्ट परम्परा सम्बन्ध के प्रामाणिक न होने
से द्वितीय लक्षण ही उत्तम है।
१२ रसगङ्गाधरः
यत्तु प्राञ्चः ‘अदोषौ सगुणौ सालंकारौ शब्दार्थौ काव्यम्’ इत्याहुः, तत्र
विचार्यते—शब्दार्थयुगलं न काव्यशब्दवाच्यम्, मानाभावात् । काव्यमुच्चैः
पठ्यते, काव्यादर्थोऽवगम्यते, काव्यं श्रुतमर्थो न ज्ञात इत्यादिविश्वजनीन-
तत्र संसर्गस्य द्वैविध्यम् साक्षात्परम्पराभेदात् । तयोश्च साक्षात्संसर्गविषये विप्रति-
पत्त्यभावात् तस्य संसर्गत्वेन भाने लक्षणं लाघवान्वितमिति निर्विवादम् । परम्परायाः
संसर्गत्वं तु तत्रैवाभिमतं यत्र तेन संसर्गेणैकपदार्थविशिष्टस्य पदार्थान्तरस्य प्रतीतिः
प्रसिद्धा, न सर्वत्र । परम्परामात्रस्य संसर्गत्वे तु सर्वं सर्वेण विशिष्टं स्यादित्यनर्थः ।
अतो यत्र परम्परायाः संसर्गत्वं प्रतीतिबलायातं तत्र तस्य संसर्गतया भाने प्रामाणिके
संसर्गविधया लक्षणं लघुतरं भवति, प्रकारमुद्रया तत्र तावत्पदार्थनिवेशे तु गुरुतरं
लक्षणम् । प्रकृतलक्षणे चमत्कारत्ववत्त्वं काव्यत्वमित्यत्र स्वविशिष्टेत्यादिसंसर्गः ।
अत्र स्वं चमत्कारत्वम्, तद्विशिष्टः चमत्कारः, तन्निष्ठजन्यता निरूपिता जनकता-
ऽर्थविषयकभावनाविशेषे, तत्रावच्छेदकीभूतोऽर्थः, तत्प्रतिपादकत्वं काव्य इति काव्येन
चमत्कारत्वस्य स्वविशिष्टेत्यादिपरम्परासम्बन्ध उक्तः । अनेन संसर्गेण काव्यं
चमत्कारत्ववत्, तत्त्वं च काव्यत्वमिति लक्षणार्थः । अस्य संसर्गत्वं तु 'काव्यं
चमत्कारववद्' इत्यादिप्रतीतिसाक्षिकमेव, नान्यथा । तदाकारा च प्रतीतिर्न
प्रामाणिकी । अत एतादृशपरम्परायाः संसर्गत्वकल्पनं न युक्तमिति सत्यपि लाघवे
तस्य प्रमाणाऽननुगृहीततया गुरुतरमपि द्वितीयलक्षणमेव वरमिति विदुषां विमर्शः ॥
इदानीं काव्यप्रकाशकारोक्तं काव्यलक्षणं दूषयितुमुपक्रमते—यत्त्वित्या-
दिना । अनलंकृती पुनः क्वापीत्यस्यार्थतः संग्राहकं सालङ्काराविति । माना-
भावादिति । अयमर्थः—'लोकतोऽर्थप्रयुक्ते शब्दप्रयोगे', 'अर्थन्वान्यप्रमाणत्वाद्'
प्राचीन आलङ्कारिक (काव्यप्रकाशकार) मानते हैं कि दोषों से रहित, गुणयुक्त
एवम् अलङ्कारविशिष्ट शब्द और अर्थ दोनों ही काव्य हैं । इस विषय में निम्न-
लिखित विचार किया जा रहा है—
शब्दार्थद्वय काव्यशब्द का वाच्यार्थ नहीं हो सकता । शब्दनिष्ठ शक्ति द्वारा
प्रतिपादित अर्थ ही वाच्यार्थ कहलाता है । किस शब्द में किस अर्थ को प्रकट करने
वाली शक्ति है—यह निर्णय मुख्यतः शिष्टव्यवहार से होता है । काव्यपद में शब्दार्थ-
युगल को प्रकट करने की शक्ति का ग्राहक (निर्णायक) कोई शिष्टव्यवहार तो है
नहीं । ऐसी स्थिति में काव्यपद को शब्दार्थद्वय का वाचक नहीं माना जा सकता ।
वस्तुतः सार्वजनीन व्यवहार तो शब्दार्थद्वय के विपरीत शब्दविशेष, अर्थात् रमणी-
यार्थप्रतिपादक शब्द, को प्रकट करने वाली शक्ति को ही काव्यपदनिष्ठ सिद्ध करते ।
उदाहरणार्थ—'काव्यमुच्चैः पठ्यते', 'काव्यादर्थोऽवगम्यते' और 'काव्यं श्रुतमर्थो न
ज्ञातः' इत्यादि व्यवहार हैं । इनसे स्पष्ट है कि काव्यपद शब्दविशेषमात्र मे शक्त
व्यवहारतः प्रत्युत शब्दविशेषस्यैव काव्यपदार्थत्वप्रतिपत्तेश्च ।
व्यवहारः शब्दमात्रे लक्षणयोपपादनीय इति चेत् ? स्यादप्येवम्, यदि
इत्यादिसिद्धान्तात् कस्य शब्दस्य कोऽर्थ इत्यत्र शिष्टव्यवहार एव प्रमाणम् ।
तथा च काव्यशब्दस्य शब्दार्थयुगलवाचकत्वं तत्समर्थकशिष्टव्यवहाररूपप्रमाणाऽभा-
वान्न सम्भवतीति । द्वित्रशिष्टव्यवहारस्य च न प्रमाणत्वम्, प्रमासाधनत्वाभावादिति
कालिदास एवाह—‘सर्वज्ञस्याऽप्येकस्याभ्युपगमो न निर्णयाय’ इति । अत्रैकपदमल्पा-
र्थकम् । अनादिवृद्धव्यवहारस्यैवार्थनिर्णायकत्वनियमादेकव्यवहारे तथात्वाभावादिति
निष्कर्षः । एतावता साधकप्रमाणाभाव उक्तः । सम्प्रति बाधकप्रमाणमप्यऽह—
काव्यमित्यादिना । पठ्यत इति । पाठश्च शब्दस्यैव नार्थस्येति सिद्धं काव्यस्य शब्द-
मात्रपरत्वम् । काव्यादित्यादि । काव्यस्य ज्ञातस्यैवार्थबोधकतया तस्य शब्दार्थोभय-
परत्वे काव्यज्ञानेनार्थस्यापि ज्ञानात् किमन्यदवशिष्यते यस्यावबोधः कार्यः स्यादिति
तात्पर्यम् । प्रत्युत = शब्दार्थयुगलवाचकत्वविपर्ययेण । शब्दविशेषस्यैवेति ।
अयमाशयः—आदिकविना स्वयमेव—
“भविष्यदुत्तरं काव्यं जगुस्तुस्तौ कुशीलवौ”
इति वदता काव्यस्य शब्दमात्रपरत्वे व्यवस्थापिते परस्ताच्च विश्वजनीनव्यवहारेण
तथात्वे समर्थिते न शब्दमात्रपरत्वं काव्यशब्दस्यापह्लोतुं कश्चिद्रीष्टे । यद्यपि क्वचि-
त्सादिव्यवहारस्यापि दृष्टमर्थनिर्णायकत्वं तथापि तत्प्रायेण यदृच्छाशब्द एव, तत्रापि
बहुतरशिष्टसमर्थने सत्येवेति तदभावे न काव्यशब्दस्य शब्दार्थोभयपरत्वं युक्तमिति ।
उक्तव्यवहारमन्यथा व्याचक्षाण आशङ्कते—व्यवहार इति । लक्षणया = एकदे-
शलक्षणया । तथा च नोक्तव्यवहारस्य बाधकत्वमित्याशयः प्रश्नस्य । न केवलं बाधक-
प्रमाणाभावादिष्टसिद्धिः, साधकप्रमाणमपि तदर्थमपेक्षणीयमेव, तथा च साधकप्रमाणा-
भावे न काव्यशब्दस्य शब्दार्थोभयपरत्वं युक्तम्, ततश्च मुख्यार्थबाधाभावेन लक्षणाऽपि
न सङ्गच्छत इति प्रोक्तव्यवहारस्य मुख्यार्थपर्यवसायित्वे व्यवस्थिते न शब्दार्थपरत्वं
है, शब्दार्थद्वय में नहीं । यतः प्रथम व्यवहार मे काव्य के श्रवण की बात कही
गई है; श्रवण तो शब्दमात्र का सम्भव है, अर्थ का नहीं । द्वितीय व्यवहार मे
काव्यशब्द से हेत्वर्थक पञ्चमी और अर्थशब्द से प्रथमा दोनों की भिन्नता के प्रति-
पादक हैं । यह काव्यशब्द के शब्दमात्रपरक होने से ही सम्भव है । तृतीय व्यवहार
मे काव्य के श्रावणप्रत्यक्षज्ञान का विषय होने पर भी अर्थ के उक्त ज्ञान का विषय न
होने से दोनों की भिन्नता सिद्ध है । अतः उक्त व्यवहारों से काव्यशब्द की
शब्दमात्रबोधकता प्रमाणित है ।
उक्त व्यवहारों में शब्दमात्र में काव्यपद का प्रयोग एकदेश-लक्षणा से बताते हुए
काव्यपद के मुख्यार्थरूप मे शब्द और अर्थ को मानना भी असंगत है, क्योंकि यहाँ
१४ रसगङ्गाधरः
काव्यपदार्थतया पराभिमते शब्दार्थयुगले काव्यशब्दशक्तेः प्रमापकं दृढतरं
किमपि प्रमाणं स्यात् । तदेव तु न पश्यामः । विमतवाक्यं त्वश्रद्धेयमेव ।
इत्थं चासति काव्यशब्दस्य शब्दार्थयुगलशक्तिग्राहके प्रमाणे प्रागुक्त-
व्यवहारतः शब्दविशेषे सिद्ध्यन्तीं शक्तिं को नाम निवारयितुमीष्टे ?
एतेन विनिगमनाभावादुभयत्र शक्तिरिति प्रत्युक्तम् । तदेवं शब्दविशेष-
स्यैव काव्यपदार्थत्वे सिद्धे तस्यैव लक्षणं वक्तुं युक्तम्, न तु स्वकल्पि-
तस्य काव्यपदार्थस्य । एषैव च वेदपुराणादिलक्षणेष्वपि गतिः । अन्यथा
तत्रापीयं दुरवस्था स्यात् ।
काव्यशब्दस्येत्याशयेन समाधत्ते—स्यादप्येवमित्यादिना सन्दर्भेण । दृढतरमिति ।
स्वसमबलस्वाधिकबलविपरीतप्रमाणाभाववदित्यर्थः । एतेन = प्रोक्तव्यवहारस्वरूपवि-
निगमकसत्त्वेन । विनिगमना चैकतरपक्षपातिनी युक्तिः, तस्या अभावात् । दुरवस्था
लाक्षणिकत्वाभ्युपगमस्वरूपा प्रकृते बोध्या ।
प्राचीनसमर्थनप्रकारान्तरं निराचष्टे—यत्त्वित्यादिना । आस्वादः, आस्वाद्यत
इत्यास्वादो रसः, ‘कृदभिहितो भावो द्रव्यवत् प्रकाशते’ इति नियमात् । तस्योद्बोध-
कत्वं व्यञ्जकत्वम्, न तु जनकत्वम्, रसस्य नित्यत्वेन तज्जननाऽसम्भवात् । तदाह—
रसव्यञ्जकतयेति । प्रकृते = काव्यलक्षणनिरूपणप्रसङ्गे । लक्षणीयत्वं काव्यलक्षण-
लक्षणा का आधार मुख्यार्थबाध नही है । यदि अन्य दृढतर प्रमाण से काव्यपद मे
शब्दार्थोभय की वाचकता प्रमाणित हो चुकी होती तब तो उक्त व्यवहारों में मुख्यार्थ
का बाध हो जाने से काव्यपद को शब्दमात्र मे लाक्षणिक माना जा सकता था ।
परन्तु वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है । विरोधी प्राचीन आचार्य का वक्तव्य तो प्रमाण-
समर्थित न होने से श्रद्धायोग्य है हीं नहीं । अतः उक्तव्यवहारों मे काव्यपद को
लाक्षणिक कहना अयुक्त है । इस प्रकार जब शब्दार्थयुगल में काव्यपद की शक्ति
का ग्राहक कोई प्रमाण है ही नहीं तब उक्त व्यवहारस्वरूप प्रमाण से शब्दमात्र में
काव्य पद की शक्ति के निर्णय को कोई रोक नहीं सकता । “एकतरपक्ष समर्थक
युक्ति (= विनिगमना), अर्थात् काव्यपद की शक्ति शब्दमात्र मे है, अर्थ मे नही
अथवा अर्थमात्र में है, शब्द में नहीं, के समर्थक प्रमाण के अभाव मे शब्दार्थयुगल में
ही उसकी शक्ति सिद्ध हीती है—” यह मत भी उक्त रीति से ही निरस्त हो जाता
है । इस प्रकार काव्यपद के शब्दविशेषमात्रवाचक सिद्ध हो जाने पर उसी का
लक्षण बताना उचित है, किसी के कपोलकल्पित काव्यपदार्थ का नहीं । काव्य-
पदार्थनिर्णय की जो रीति है वही वेद, पुराण, इतिहास आदि के लक्षणों में
भी अपनानी चाहिए, नहीं तो 'वेदः पठितः', वेदस्यार्थो नाऽवगम्यते' इत्यादि
व्यवहारों की असंगति पूर्ववत् बनी रह जाएगी ।