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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 414 में से

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पृष्ठ 46

१४ रसगङ्गाधरः
काव्यपदार्थतया पराभिमते शब्दार्थयुगले काव्यशब्दशक्तेः प्रमापकं दृढतरं
किमपि प्रमाणं स्यात् । तदेव तु न पश्यामः । विमतवाक्यं त्वश्रद्धेयमेव ।
इत्थं चासति काव्यशब्दस्य शब्दार्थयुगलशक्तिग्राहके प्रमाणे प्रागुक्त-
व्यवहारतः शब्दविशेषे सिद्ध्यन्तीं शक्तिं को नाम निवारयितुमीष्टे ?
एतेन विनिगमनाभावादुभयत्र शक्तिरिति प्रत्युक्तम् । तदेवं शब्दविशेष-
स्यैव काव्यपदार्थत्वे सिद्धे तस्यैव लक्षणं वक्तुं युक्तम्, न तु स्वकल्पि-
तस्य काव्यपदार्थस्य । एषैव च वेदपुराणादिलक्षणेष्वपि गतिः । अन्यथा
तत्रापीयं दुरवस्था स्यात् ।
काव्यशब्दस्येत्याशयेन समाधत्ते—स्यादप्येवमित्यादिना सन्दर्भेण । दृढतरमिति ।
स्वसमबलस्वाधिकबलविपरीतप्रमाणाभाववदित्यर्थः । एतेन = प्रोक्तव्यवहारस्वरूपवि-
निगमकसत्त्वेन । विनिगमना चैकतरपक्षपातिनी युक्तिः, तस्या अभावात् । दुरवस्था
लाक्षणिकत्वाभ्युपगमस्वरूपा प्रकृते बोध्या ।
प्राचीनसमर्थनप्रकारान्तरं निराचष्टे—यत्त्वित्यादिना । आस्वादः, आस्वाद्यत
इत्यास्वादो रसः, ‘कृदभिहितो भावो द्रव्यवत् प्रकाशते’ इति नियमात् । तस्योद्बोध-
कत्वं व्यञ्जकत्वम्, न तु जनकत्वम्, रसस्य नित्यत्वेन तज्जननाऽसम्भवात् । तदाह—
रसव्यञ्जकतयेति । प्रकृते = काव्यलक्षणनिरूपणप्रसङ्गे । लक्षणीयत्वं काव्यलक्षण-
लक्षणा का आधार मुख्यार्थबाध नही है । यदि अन्य दृढतर प्रमाण से काव्यपद मे
शब्दार्थोभय की वाचकता प्रमाणित हो चुकी होती तब तो उक्त व्यवहारों में मुख्यार्थ
का बाध हो जाने से काव्यपद को शब्दमात्र मे लाक्षणिक माना जा सकता था ।
परन्तु वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है । विरोधी प्राचीन आचार्य का वक्तव्य तो प्रमाण-
समर्थित न होने से श्रद्धायोग्य है हीं नहीं । अतः उक्तव्यवहारों मे काव्यपद को
लाक्षणिक कहना अयुक्त है । इस प्रकार जब शब्दार्थयुगल में काव्यपद की शक्ति
का ग्राहक कोई प्रमाण है ही नहीं तब उक्त व्यवहारस्वरूप प्रमाण से शब्दमात्र में
काव्य पद की शक्ति के निर्णय को कोई रोक नहीं सकता । “एकतरपक्ष समर्थक
युक्ति (= विनिगमना), अर्थात् काव्यपद की शक्ति शब्दमात्र मे है, अर्थ मे नही
अथवा अर्थमात्र में है, शब्द में नहीं, के समर्थक प्रमाण के अभाव मे शब्दार्थयुगल में
ही उसकी शक्ति सिद्ध हीती है—” यह मत भी उक्त रीति से ही निरस्त हो जाता
है । इस प्रकार काव्यपद के शब्दविशेषमात्रवाचक सिद्ध हो जाने पर उसी का
लक्षण बताना उचित है, किसी के कपोलकल्पित काव्यपदार्थ का नहीं । काव्य-
पदार्थनिर्णय की जो रीति है वही वेद, पुराण, इतिहास आदि के लक्षणों में
भी अपनानी चाहिए, नहीं तो 'वेदः पठितः', वेदस्यार्थो नाऽवगम्यते' इत्यादि
व्यवहारों की असंगति पूर्ववत् बनी रह जाएगी ।