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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ एवं रमणीयार्थ मंगलाचरण

विट्ठलदास संस्कृत सीरीज- २
रसगङ्गाधरः
प्रथमाननम्
व्याख्याकारद्वयः
प्रो० डा० श्रीनारायण मिश्रः
एवम्
डा० शशिनाथ झा विद्यावाचस्पतिः
चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी

इस पृष्ठ पर कोई पाठ (text) अंकित नहीं है; यह एक रिक्त (कोरा) पृष्ठ है।

1-1
रसगङ्गाधरः
...... वाराणसी

प्रकाशक : चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी
मुद्रक : चौखम्बा प्रेस, वाराणसी
संस्करण : तृतीय, वि०सं० २०६४, सन् २००८
मूल्य : रू० १६०.००

© चौखम्बा कृष्णदास अकादमी
के० ३७/११८, गोपाल मन्दिर लेन
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पो० बा० नं० १११८, वाराणसी-२२१००१ (भारत)
फोन : (०५४२) २३३३४५८ & P.P. २३३५०२०

अपरं च प्राप्तिस्थानम्
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BITTHALDAS SANSKRIT SERIES
2


RASAGAṄGĀDHARA
OF
PAṆḌITRĀJ JAGANNĀTHA
FIRST ĀNANA
WITH
'Rasataraṅgiṇī' Sanskrit-Hindi Commentaries
By
Prof. Dr. Shrinarayan Mishra
Sanskrit Department
Faculty of Arts, B. H. U., Varanasi .
&
Dr. Shashinath Jha Vidyavacaspati
Reader, P.G. Deptt. of Vyakaran
K. S. D. Sanskrit University, Darbhanga.
चौखम्बा कृष्णदास अकादमी
वाराणसी
CHOWKHAMBA KRISHNADAS ACADEMY
VARANASI

Publisher : Chowkhamba Krishnadas Academy, Varanasi
Printer : Chowkhamba Press, Varanasi

© CHOWKHAMBA KRISHNADAS ACADEMY
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Post Box No. 1118, Varanasi- 221001
( INDIA )
Phone : (0542) 2333458 & P.P. 2335020

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भूमिका
सहृदय-हृदयविजेता, श्लाघ्यः सर्वैः कविर्मान्यः ।
तत्कर्ममर्म-वीक्षक-साहित्यज्ञस्ततोऽपि वन्द्योऽस्ति¹ ॥
कवि क्रान्तदर्शी ( आर-पार देखने वाला ) होता है² । उसका हृदय विशाल,
दृष्टि सूक्ष्म, मति जागरूक, मन प्रसन्न और वाणी सुललित होती है। वह अदृश्य जगत्
में प्रवेश करने की क्षमता रखता है और दृश्य जगत् में भी जहाँ सामान्य लोग देखते
हुए भी जिसे न देख पाते हों या देखकर भी व्यक्त न कर पाते हों, उसे वह देख और
व्यक्त कर लोगों को चमत्कृत कर देता है। ललित वाणी में ललित भाव को उपस्थित
कर देना ही तो कवि का काम है। इसी वाणी और भाव (अर्थ) के सन्तुलित
सहभाव को साहित्य कहते हैं—
साहित्यमनयोः शोभाशालितां प्रति काप्यसौ ।
अन्यूनानतिरिक्तत्वं मनोहारिण्यवस्थितिः³ ॥
इस प्रकार भावार्थक ष्यञ्-प्रत्ययान्त साहित्य शब्द धर्मबोधक (भावार्थक)
होने से शब्दार्थस्वरूप काव्य का (धर्मी का) बोधक न होकर तत्प्रतिपादक शास्त्र का
बोधक बन जाता है—हितेन सह = सहितं, तस्य भावः साहित्यम् । परन्तु आचार्यं
कविशेखर बदरीनाथ झाजी का मत है⁴ कि यहाँ स्वार्थिक प्रत्यय ही माना जाय ।
तदनुसार 'सहितमेव साहित्यम्' सहभावापन्न (शब्द और अर्थ के सन्तुलित रूप)
काव्य एवं उसके उपकारक छन्द, गुण, अलंकार, रीति, रस, भाव आदि के निरूपक
ग्रन्थ साहित्य कहलाने लगते हैं। यथा—'सुखमेव सौख्यम्, चरित्रमेव चारित्र्यम्,
चतुर्वर्णमेव चातुर्वर्ण्यम्' प्रयोग प्रसिद्ध हैं, उसी तरह 'सहितमेव साहित्यम्' यहाँ स्वार्थिक
प्रत्यय मानने पर धर्मी काव्य और उसके धर्म काव्यशास्त्र इन दोनों का बोधक साहित्य
हो जाता है —
साहित्यं सहितानां भावः काव्यैतदङ्गानाम् ।
साहितानि तानि वा तत्, सप्तममाख्यायते शास्त्रम्⁵ ॥
१. भूमिकाकार द्वारा मङ्गलाचरण ।
२. कवयः क्रान्तदर्शिनः ।
३. वक्रोक्तिजीवितम् १-१० ।
४. मैथिली-काव्यविवेक-सम्पादक डॉ० शशिनाथ झा ।
५. साहित्यमीमांसा-श्लोकसं० २ कविशेखर बदरीनाथ झा ।
(गङ्गानाथझा कोमेमोरेशन भोल्यूम, ओरिएण्टल बुक एजेन्सी, पूना)

( २ )
साहित्य विद्या को ही आचार्य राजशेखर ने१ अपनी काव्यमीमांसा में पञ्चम
वेद, सप्तम दर्शन और पञ्चदश विद्यास्थान कहा है। काव्य और काव्यशास्त्र में
अङ्गांगिभाव सम्बन्ध है, जिनमें काव्य है अङ्गी ( प्रधान ), साध्य और लक्ष्य तथा
काव्यशास्त्र है अङ्ग ( काव्य का उपकारक ), साधन और लक्षण । इन दोनों लक्ष्य
और लक्षणों के समुदाय को ही साहित्य कहना२ उचित है। जैसा कि आचार्य पतंजलि
ने महाभाष्य ( प्रथमाह्निक ) में "लक्ष्यलक्षणे व्याकरणम्" कहकर लक्षण ( सूत्र )
और लक्ष्य ( प्रयोग, उदाहरण ) के सम्मिलित रूप को ही व्याकरण कहा है, उसी
तरह काव्यशास्त्रीय लक्षण एवं उनके उदाहरण ( काव्य ) साहित्य कहे जाते हैं। केवल
काव्यशास्त्र के लिए साहित्य पद का प्रयोग लाक्षणिक है। साहित्यशब्दार्थ व्यापक है
और काव्यपदार्थ व्याप्य, यह स्पष्ट ही है। यह एक व्यापक नियम है कि अङ्गी के
फल ( प्रयोजन ) से ही अङ्ग का भी फल सिद्ध हो जाता है। तदनुसार काव्य के फल
से ही काव्यशास्त्र भी फलवान् हो जाता है। इसलिए सभी काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों में
काव्य का ही फल दिखाया गया है, शास्त्र का नहीं।
इस सन्दर्भ में सर्वप्रथम स्थान कवि का आता है। वह स्वतन्त्र है, निरङ्कुश
है, अतः साहित्य जगत् में सबसे पहले उसी का आविर्भाव हुआ—
"कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भू-
र्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः"३।
रसस्वरूप ब्रह्म से ब्रह्मा के रूप में सृष्टि के आरम्भ में कवि का आविर्भाव
हुआ। तब उससे काव्य निस्सृत हुआ। इस परम्परा में काव्य का दूसरा स्थान है।
उससे सभी मुग्ध हुए, सभी तृप्त हुए, सबों ने उसे देखा। पर देखने वालों में भी कोई
सूक्ष्म द्रष्टा निकल गया, जिसे आलोचक कहा जाता है। यह तीसरे स्थान पर आता
है। उसने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से देखकर अपनी वाणी द्वारा उसकी प्रशंसा या निन्दा की
और फिर उसे परवर्त्ती कवियों के लिए प्रचारित किया, वही हुआ काव्यशास्त्र,
जिसमें लक्षण के साथ-साथ लक्ष्य ( काव्योदाहरण ) भी होता है और समस्त काव्य-
जगत् ही इसके उदाहरण हो गये। इस तरह यह चौथे स्थान पर आता है। यही
शास्त्र साहित्य है, आलोचनाशास्त्र है, समीक्षाशास्त्र है। कवि-काव्य-आलोचक-
आलोचना की यही श्रृंखला है। इनमें परस्पर उत्पाद्योत्पादक, कार्यकारण, उपकार्यो-
पकारकभाव आदि सम्बन्ध हैं। कभी तो कवि के अनुसार शास्त्र चलता है, तो कभी
१. शास्त्रनिर्देशाध्याय।
२. मैथिली-काव्यविवेक, पृ०-१४।
३. शुक्लयजुर्वेदसंहिता, ४०।८।

( ३ )
शास्त्र के अनुशासन में कवि रहता है, आलोचक से सावधान रहता है और यही वह
सावधानी है, जो भवभूति जैसे महाकवि को निखारा और उच्च स्थान पर बैठाया ।
सुना जाता है कि आलोचकों ने भवभूति के महावीरचरित नाटक के विषय में बहुत
आक्षेप किया था । कवि सम्हल गये और उनका उत्तर दिया—
ये नाम केचिदिह नः प्रथयन्त्यवज्ञां
जानन्ति ते किमपि तान् प्रति नैष यत्नः ।
उत्पत्स्यते हि मम कोऽपि समानधर्मा
कालो महान् निरवधिर्विपुला च पृथ्वी १ ॥
फिर उनके उत्तररामचरित नाटक को देखकर तो आलोचकों को कहना ही
पड़ा—"उत्तरे रामचरिते भवभूतिर्विशिष्यते" । इसी प्रकार महाकवि दण्डी के विषय
में भी किंवदन्ती है कि उन्होंने दशकुमारचरित की पूर्वपीठिका जब लिखी तो आलोचकों
का तीखा प्रहार उन पर पड़ा । वे रुक गये, अपने को सम्हाला, परिश्रम करके आक्षेपों
का समाधान ढूँढ़ा और इसी छानबीन के क्रम में स्वयं एक अलङ्कारशास्त्रीय ग्रन्थ ही
रच डाले—काव्यादर्श, जो इस शास्त्र का एक मूर्धन्य ग्रन्थ हुआ । इसके बाद इन्होंने
दशकुमारचरित की उत्तरपीठिका लिखी, जिसकी सब ओर से प्रशंसा हुई । इसीलिए
उनकी पूर्वपीठिका और उत्तरपीठिका में इतना अन्तर है ।
ऐसे ऐसे महाकवि भी जिनकी कद्र करते हैं, ऊँचा स्थान देते हैं, उन
आलोचकों का महत्त्व इसी से आँका जा सकता है । इन आलोचकों को न केवल
पूर्ववर्ती सभी काव्यों की जानकारी रहती है, अपितु सभी आलोचकों के सिद्धान्तों की
भी जानकारी आवश्यक है। कवि से सूक्ष्म दृष्टि उनकी होती है। जिन भावों को
कवि ने सोचा तक न होगा, उनके ही शब्दों से उन भावों को निकाल कर गुण या
दोष दिखाने में वे पटु होते हैं। सूक्ष्मदर्शिता, निष्पक्षता, निर्भीकता, सारगर्भिता,
सामयिकता, सार्वदेशिकता आदि कतिपय गुण इनमें आवश्यक माने गये हैं। कवि की
आलोचना करने से पहले उन्हें स्वयं कवि बनना आवश्यक है। पक्षपातिता, भीरुता,
लोभ आदि कतिपय दुर्गुण जिस आलोचक में रहे, वह निन्दनीय माना जाता है ।
अतएव आलोचक को संयत रखने के लिए काव्यशास्त्र ( साहित्यविद्या ) परम
आवश्यक है, क्योंकि अनियन्त्रित प्रवाह से परम हानि निश्चित है ।
अनुबन्ध-निबन्धन—
प्रत्येक शास्त्र के आदि में ही उसके विषय, प्रयोजन, सम्बन्ध और अधिकारी
—इन चार अनुबन्धों का निरूपण आवश्यक होता है, क्योंकि इनके ज्ञान के बिना जिज्ञासु
१. मालतीमाधव-प्रस्तावना ।

( ४ )
इसके अध्ययन में प्रवृत्त ही नहीं हो सकते हैं, जबकि उन्हीं के उपयोग के लिए शास्त्र
का प्रणयन होता है । ग्रन्थ के अध्ययन में जिज्ञासु को प्रवृत्ति कराने वाले तत्त्व को ही
अनुबन्ध कहते हैं । किसी भी कार्य में लोग तभी प्रवृत्त होते हैं जब उन्हें उसमें 'इदं
मदिष्टसाधनम्'—'यह मेरा अभीष्ट साधन करने वाला है' इस प्रकार का ज्ञान हो जाय ।
इसे ही इष्टसाध्यताज्ञान कहते हैं । सुमेरु पर्वत लाने में उक्त ज्ञान के रहने पर भी
लोग प्रवृत्त नहीं होते हैं, क्योंकि उसमें कृतिसाध्यताज्ञान नहीं है, अर्थात् जब तक 'इदं
मत्कृतिसाध्यम्'—'यह मुझसे किया जाने योग्य कार्य है' इस प्रकार का ज्ञान भी प्रवृत्ति
के प्रति कारण है और विषमिश्रित स्वादिष्ट भोजन में उक्त दोनों ज्ञान के रहने पर भी
बलवत् अनिष्ट ऐसा ज्ञान होने पर वह इष्ट ही नहीं है । अतः प्रवृत्ति के प्रति मुख्य
दो ज्ञान ही कारण हैं—इष्टसाध्यता ज्ञान और कृतिसाध्यता ज्ञान । अब प्रस्तुत में
प्रयोजन से इष्टसाध्यता ज्ञान होता है और विषय, सम्बन्ध और अधिकारी से कृति-
साध्यता ज्ञान होता है । विषय हुआ प्रतिपादनीय वस्तु, प्रयोजन हुआ फल, अधिकारी
हुआ प्रवृत्त होने योग्य व्यक्ति और सम्बन्ध हुआ प्रतिपाद्य विषय के साथ प्रतिपादक
शास्त्र का संसर्ग ( विषय और ग्रन्थ में प्रतिपाद्य-प्रतिपादकभाव सम्बन्ध ) ।
प्रस्तुत साहित्यशास्त्र का विषय है काव्य एवं उसके उपयोगी (गुण, अलंकार,
रीति, रस, भाव, ध्वनि आदि ) पदार्थ । इनका ज्ञान प्राप्त करना ही प्रयोजन है ।
इन विषयों के जिज्ञासु व्यक्ति अधिकारी हैं और इस विषय और शास्त्र में बोध्य-बोधक-
भाव सम्बन्ध है ।
उपर्युक्त आलोचकों, काव्यशास्त्रकारों की संस्कृतवाङ्मय में सुदीर्घ परम्परा
रही है । आचार्य भरतमुनि ( ई० पू० द्वितीय शताब्दी ) से लेकर आज तक इसकी
श्रृंखला बनी हुई है । बीच-बीच में अनेक वाद आये, सम्प्रदाय चले और अपना प्रभाव
छोड़ते गये, यह शास्त्र आगे बढ़ता गया, विषय की सूक्ष्मता आती गयी । सोलहवीं
शताब्दी से प्रत्येक शास्त्र में प्राचीन-नव्य का भेद होने लगा, भाषा परिष्कृत शैली को
पकड़ने लगी । इस शास्त्र में यह बात कुछ बाद में आयी, जिसे लिये हुए सत्रहवीं
शताब्दी में अवतीर्ण हुए पण्डितराज जगन्नाथ अपने प्रौढ़-परिष्कृत ग्रन्थ रसगङ्गाधर
के साथ ।
रसगङ्गाधर
यह साहित्यशास्त्र का मूर्धन्य ग्रन्थ है । रसस्वरूप गङ्गा को धारण करने
वाला—'रसञ्चासौ गङ्गा रसगङ्गा, तस्याः धरः (धारकः), धरतीति धर इति' इस
व्युत्पत्ति के अनुसार यह रसप्रतिपादक के रूप में साक्षात् शिव ( गङ्गाधर ) ही है ।
तदनुसार इसका विषय रस है, जो साहित्यशास्त्र में सर्वप्रधान होने से अपने शास्त्रमात्र
का संग्राहक हो जाता है, इस शास्त्र के सभी तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करता है—

( ५ )
'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति'—प्रधान के अनुसार ही व्यवस्था होती है, इस न्याय के
अनुसार साहित्यशास्त्र का नाम रसशास्त्र १ होता है और इसे ही पण्डितराज जगन्नाथ
ने इस ग्रन्थ का रसगङ्गाधर नाम रखकर सूचित किया है। परन्तु वे परम्परानुसार
प्रचलित नाम "अलङ्कारशास्त्र" कहना२ ही उचित समझते हैं और यह नाम भी
प्राधान्य न्याय३ से ही सङ्गत होता है, क्योंकि इस शास्त्र का आधा से अधिक भाग
अलंकार-विवेचन में ही रहता है। परन्तु आधुनिक युग में 'साहित्य' शब्द अधिक
प्रचलित है, जो ४राजशेखर, श्रीहर्ष, कविकर्णपूर आदि के द्वारा समर्थित है। साहित्य
के प्रसंग में म० म० गङ्गाधर शास्त्री का एक पद्य यहाँ उद्धरणीय है—
नाचान्तं यच्चिरत्नैरपरिचितचरं यच्च वाचालचेलै-
रौचित्यं यन्न मुञ्चेदपि च विरचयेद् यच्चमत्कारिचेतः।
तादृक्प्रौढिप्रकर्षप्रणयभणिति या सूयते काव्यरत्नं
पुण्यैः कस्याप्यगण्यैः परिणमति मुखे सा हि साहित्यरीतिः'५ ॥
इस विवेचन से स्पष्ट हुआ कि साहित्य के सभी तत्त्व रसगङ्गाधर के विवेचनीय
विषय हुए और वे सभी विषय यहाँ सूक्ष्मरूप से विस्तृत विवेचित हुए हैं। पर खेद का
विषय है कि यह ग्रन्थरत्न पूर्णरूप में उपलब्ध नहीं है। अन्तभाग में कुछ खण्डित है,
जिसमें कुछ अलंकारों का विवेचन था । मध्य में भी कुछ प्रकरण त्रुटित जान पड़ते
हैं; यथा—अभिधा और लक्षणा के बाद व्यञ्जनानिरूपण नहीं है, रीतिविवेचन और
दोषनिरूपण नहीं है। यह बात भी ध्यातव्य है कि ग्रन्थ के अध्याय, जिसे आनन कहा
गया है, उसका विभाजन भी उपयुक्त नहीं जान पड़ता है। अतः स्पष्ट है कि प्रति-

१. "रसविद्याविदः केचिद् ग्राम्यामाहुस्तु कोमलाम्" । (अलङ्कारसमुद्गः—
इन्द्रपतिः पृ० ६ )
२. "अलङ्कारान् सर्वानपि गलितगर्वान् रचयतु" । (रसगङ्गाधर-आरम्भिक पद्य)
३. ग्राम में सभी जातियों के रहने पर भी मल्लग्राम, ब्राह्मणग्राम आदि नाम
उनकी प्रधानता से ही है ।
४. काव्यमीमांसा—"शब्दार्थयोर्यथावत् सहभावेन विद्या साहित्यविद्या ।
नैषधीयचरित के अन्त में—"साहित्ये सुकुमारवस्तुनि" ।
साहित्यपाथोनिधिमन्थनोत्थं कर्णामृतं रक्षत हे कवीन्द्राः ।
यत्तस्य दैत्या इव लुण्ठनाय काव्यार्थचौराः प्रगुणीभवन्ति ॥ (कर्णपूरः) ।
विश्वनाथ के ग्रन्थ का नाम साहित्यदर्पण भी साहित्यशास्त्र कहने के पक्ष
में है।
५. विभ्रममनीषा—२-२, दरभंगा में प्रकाशित ।

( ६ )
लिपिकारों के द्वारा इस ग्रन्थ के पत्रों में हेराफेरी हुई है । गङ्गाधर ( शिव ) पञ्चानन
कहे गये हैं । तदनुसार इस रसगङ्गाधर के भी पाँच आनन होने चाहिए । यहाँ द्वितीय
आनन के बाद बहुत दूर तक विषय एवं प्रकरण बदलने पर भी आनन-विभाजन नहीं
हुआ है, जो मध्य में ग्रन्थ के कुछ अंश के अप्रास होने की सूचना देते हैं । प्रथम आनन
में काव्य, उसके भेद एवं असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यध्वनि ( अभिधामूलध्वनि के प्रथम भेद,
रसध्वनि ) का साङ्गोपाङ्ग विवेचन ( रस, गुण, भावध्वनि, रसाभासादि सहित )
हुआ है । इस आधार पर द्वितीय आनन में संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ( अभिधामूलध्वनि के
द्वितीय भेद, जिसमें वस्तुध्वनि और अलङ्कारध्वनि अन्तर्भूत है ) का, तृतीय आनन में
लक्षणामूलध्वनि का, चतुर्थ आनन में व्यञ्जना का और पञ्चम आनन में अलङ्कारों के
विवेचन की कल्पना की जा सकती है । काव्यदोष का। निरूपण यद्यपि आवश्यक है,
क्योंकि दोष-परित्याग तभी सम्भव है जब उसका परिचय हो, तथापि पण्डितराज ने
अपनी विवशतावश उसका निरूपण नहीं किया होगा । विवशता यह थी कि ग्रन्थारम्भ
में ही इनकी प्रतिज्ञा है कि हम स्वरचित उदाहरण ही देंगे, दूसरे का नहीं और दुष्ट-
काव्य का निर्माण पण्डितराज की लेखनी से हो हो नहीं सकता। इसलिए दोषनिरूपण
इस ग्रन्थ में नहीं रहा होगा । परन्तु अभी जो ग्रन्थ उपलब्ध है, जिस रूप में प्राप्त है,
उसी से सन्तोष करना होगा, उसी पर विचार करना उचित होगा ।
नव्यपरिष्कृत आलोचनात्मक शैली में विषय की सूक्ष्मता से परिचय कराना
पण्डितराज की अद्भुत प्रतिभा का परिचायक है । इस ग्रन्थ के द्वारा इन्होंने साहित्य-
शास्त्र को वह गरिमा प्रदान की जो दर्शनादि शास्त्रों को प्राप्त है । शास्त्रान्तर के
पण्डित, जो इसं विद्या को अन्यथासिद्ध मानकर मखौल उड़ाते थे, इस ग्रन्थ के सूक्ष्म
विवेचन के चक्कर में पड़कर इस शास्त्र के गहन अध्ययन करने को विवश हुए । यही है
इस शास्त्र को पण्डितराज की देन, रसगङ्गाधर का महत्त्व ।
इसमें प्राचीन आचार्यों के मतों की विशद समीक्षा की गयी है और विषय-
विवेचन अतिविस्तृतरूप में यथेच्छ हुआ है । प्राचीन ग्रन्थ पद्यबद्ध या कारिका
के साथ वृत्तियुक्त रहते थे, परन्तु यह ग्रन्थ केवल गद्य में, प्रांजल, परिष्कृत, अवच्छेद-
कतायुक्त गद्य में है । अतः यहाँ विषय को सूक्ष्मरूप में विस्तृत विवेचन का अवसर
प्राप्त हुआ । साहित्यशास्त्रीय विकास के चरम उत्कर्ष के समय इस ग्रन्थ की रचना
हुई, अतः उन सभी विषयों का सम्यक् प्रतिपादन-समीक्षण इसमें हो सका, जिनका
पूर्ववर्त्ती ग्रन्थों में होना सम्भव न था । इन्होंने उदाहरण के रूप में यहाँ स्वरचित
पद्यों का ही उपस्थापन किया है, जिससे यह ग्रन्थ सुरभित हो गया और पण्डितराज
का कवित्वरूप भी उदात्त रूप में प्रकटित हो गया है। ये केवल आलोचक ही नहीं,
वरन् उच्चकोटि के कवि भी थे । इसलिए रसगङ्गाधर का स्थान साहित्यशास्त्र में

( ७ )
सर्वोपरि माना जाता है । यह ग्रन्थ प्रत्येक विषय पर अपनी नवीन मान्यता, नया
मतस्थापन देता चलता है—काव्यलक्षण से लेकर अलंकारनिरूपण तक आद्यन्त यही
क्रम है और इनकी यह मान्यता आज भी आलोचकों के लिए महत्त्वपूर्ण बनी हुई है ।
विषय-विवेचन—
( १ ) काव्य-प्रयोजन—काव्य में प्रवृत्त होने के लिए उसके प्रयोजनों को
जान लेना आवश्यक है । सर्वप्रथम इसमें प्रवृत्त होने वाला कवि होता है, जो इसकी
रचना करता है । उसके बाद सहृदय उसे सुनते या पढ़ते हैं । इन दोनों को इसका
प्रयोजन ज्ञात रहना आवश्यक है । इसीलिए रसगङ्गाधर में कहा गया है—"कवि-
सहृदययोरावश्यकतया"१। कवि के आशय को सभी नहीं समझ सकते हैं, उसे केवल
सहृदय ही समझते हैं । 'कवेः समानं हृदयं येषां ते सहृदयाः'—कवि के समान हृदयवाला
सहृदय२ होता है, जो उसके हृदय की बात को समझ जाता है । कविपरम्परागत
अनेक बातें ऐसी हैं जो प्रसिद्ध होने के कारण कही नहीं जाती हैं, संकेत से ही समझी
जा सकती हैं, पर उस प्रसिद्धि से परिचित ही उसे समझ सकता है, सहृदय कहला
सकता है । अतः काव्य पढ़ने से पहले सहृदय बनना, कवि के अन्तर में छिपे भावों
को पकड़ने की कला का ज्ञान रखना आवश्यक है । इन दोनों के लिए यहाँ पाँच
प्रयोजन कहे गये हैं और इत्यादि कहकर प्राचीनोक्त अन्य प्रयोजनों में भी अपनी सम्मति
दिखायी गयी है । उक्त पाँचों नाम हैं—( १ ) कीर्त्ति—यशःप्राप्ति, जो केवल कवि
के लिए है, ( २ ) परमाह्लाद—परमानन्द की प्राप्ति ( कवि और सहृदय दोनों के
लिए ), ( ३ ) गुरुप्रसाद—गुरु की प्रसन्नता से विद्या-व्यवहार का ज्ञान ( दोनों के
लिए ), ( ४ ) राजप्रसाद—इससे दोनों को धनागम, ( ५ ) देवताप्रसाद—इससे
दोनों का अमङ्गल-निवारण होता है ।
मम्मट ने काव्य के ६ प्रयोजन दिखाये हैं—
३काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये ।
सद्यःपरनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे ॥
तदनुसार—( १ ) यशःप्राप्ति, ( २ ) अर्थप्राप्ति, ( ३ ) लोकव्यवहारज्ञान,
( ४ ) अमङ्गलनाश, ( ५ ) सद्यः परमानन्द की प्राप्ति, ( ६ ) कान्तासम्मित वाक्य
से उपदेशप्राप्ति । इनमें तृतीय और षष्ठ का समावेश पण्डितराज के इत्यादि पद से कर
लेना चाहिए ।
१. रसगङ्गाधर, पृ० ७ ।
२. अथवा—'प्रशस्तं हृदयं येषां ते सहृदयाः, प्राशस्त्यञ्च काव्यवासनापरि-
पक्वत्वम्, कविहृदयप्रवेशसामर्थ्यवत्त्वं वा' ।
३. काव्यप्रकाश के आरम्भ में ।

( ८ )
इसके अतिरिक्त चतुर्वर्ग की प्राप्ति और कलाओं में नैपुण्य—ये प्रयोजन १
विश्वनाथोक्त हैं । इनमें भी धर्म से अमङ्गलनाश, अर्थ से धनप्राप्ति, काम और मोक्ष
से परमानन्द की प्राप्ति को मान लेने पर कलानैपुण्य एक अतिरिक्त प्रयोजन होता है ।
इन प्रयोजनों के सम्पादक काव्य का ही लक्षण अभिप्रेत है । शायद इसीलिए काव्य-
लक्षण से पहले उसका प्रयोजन प्रतिपादित होता है ।
उपर्युक्त प्रयोजनों में केवल परमानन्द ( रसास्वादमूलक ) ही काव्य के प्रयोजन
हैं, शेष प्ररोचक २ उपायमात्र हैं ।
( २ ) काव्य-लक्षण—कवि की रचना काव्य कहलाती है । उसका प्रथम कार्य
चिन्तन सुललित भावों की अवधारणा अर्थरूप ही है, पर उसे व्यक्त करने हेतु उसका
द्वितीय कार्य पदावली-गुम्फन शब्दरूप ही होता है । तदनुसार सुललित भावों को व्यक्त
करने वाली पदावली काव्य है, यही वस्तुस्थिति है । इसे ही आलङ्कारिकों ने अपने-अपने
ढंग से काव्यलक्षण के रूप में व्यक्त किया है । इस विषय में आचार्य दण्डी ने
अग्निपुराण के अनुसार अपना लक्षण दिया—
"शरीरं तावदिष्टार्थव्यवच्छिन्ना पदावली" ३ ।
तदनुसार अभीष्ट = सहृदयहृदयाह्लादक अर्थ से व्यवच्छिन्न = विलक्षणीकृत
पदसमुदाय को काव्य कहते हैं ।
इनसे भी प्राचीन आचार्य भामह ( ५०० ई० ) ने कहा—"शब्दार्थौ सहितौ
काव्यम्" ४—चमत्कारजनक शब्द और अर्थ को काव्य कहते हैं । उसी समय से यह
विवाद शुरू हुआ कि शब्द ही काव्य है या शब्द और अर्थ काव्य हैं ! सम्पूर्ण उत्तर-
भारत के विद्वान् भामह के अनुयायी हो गये और शब्दार्थों का आज तक समर्थन कर
रहे हैं । इसी तरह दक्षिण भारतीय दण्डी के अनुसरण पर केवल शब्द को काव्य
कहने में अड़े हुए हैं । रुद्रट, वामन, आनन्दवर्धन, मम्मट, भोजराज, वाग्भट आदि
आचार्य शब्दार्थयुगल को काव्य मानने के पक्ष में हैं, जबकि विश्वनाथ और जगन्नाथ
शब्द को ही काव्य कहते हैं-। यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि जो भी केवल शब्द
को काव्य कहते हैं, उनके भी मत में अर्थ उसका विशेषण रहता ही है । तब विवाद
रहा दोनों को प्रधान मानने या अर्थ को विशेषण मानने का ही और यह विवाद
अभी भी जारी है ।
१. सरस्वतीकण्ठाभरण से साहित्यदर्पण में उद्धृत ।
२. रसगङ्गाधर की प्रस्तावना—पं० मदनमोहन झा सम्पादित संस्करण ।
३. काव्यादर्श ।
४. काव्यालङ्कार ।

( ९ )
वामन, भोजराज, मम्मट, जयदेव आदि आचार्य काव्यलक्षण में दोषत्याग
और गुणग्रहण निविष्ट करते हैं। कतिपय आचार्य तो काव्यशास्त्रीय रीति, रस,
अलङ्कार तत्त्व भी जोड़ देते हैं । इनका लक्षण इनके द्वारा उक्त प्रयोजनों के साधक
होने के कारण ही इतने बड़े हो चले हैं । विश्वनाथ ने तो इन विस्तृत लक्षणों को
अतिसंक्षिप्त कर दिया और रसात्मक वाक्य को ही काव्य कहा है । परन्तु नीरस
पर्वतादि-वर्णन में उन्हें प्रबन्धगत रस का आश्रयण करना पड़ा है और ऐसे मुक्तक
वर्णन को वे काव्य हो नहीं मानते । परन्तु चमत्कार अनुभूत रहने पर काव्य न मानना
समुचित नहीं है ।
इसके बाद पण्डितराज ने सभी लक्षणों की बारीकी से छानबीन की और
अपना लक्षण दिया—
“रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम् ।”
अपने इस लक्षण का इन्होंने सूक्ष्म परिष्कार भी प्रस्तुत किया है, जो इसी ग्रन्थ
में रहने के कारण यहाँ नहीं दिया जा रहा है । इस परिष्कार में विरोधियों के सभी
आक्षेपों का समाधान हो जाता है ।
विचार कर देखने से ज्ञात होता है कि पण्डितराज ने सर्वप्राचीन लक्षण को
ही मान लिया है, शब्दान्तर से प्रस्तुत किया है, जिसे अग्निपुराणकार व्यास एवं दण्डी
ने कहा था । फर्क इतना ही है कि पदावली के स्थान में शब्द कहा गया है । इष्ट शब्द
से रमणीय ही अभिप्रेत हो सकता है । इस प्रकार हम देखते हैं कि काव्यलक्षण अपने
अनेक रूपों को धारण करते हुए सहस्राधिक वर्षों के बाद फिर जहाँ से प्रारम्भ हुआ
था वहीं पहुँच गया ।
( ३ ) काव्य-कारण—बिना कारण से कार्य नहीं हो सकता है और कारण
का समुचित रूप से रहने पर कार्य अवश्य होता है । काव्यरचना एक कार्य है ।
उसका भी कारण होना चाहिए, जिसे जान लेने पर काव्यकर्ता, प्रेरक, इच्छुक आदि
उस कारण के प्रति यत्नवान् होंगे और काव्यप्राप्ति करने में सफलता पायेंगे । अतः
काव्यशास्त्र के ग्रन्थों में काव्यकारण पर विचार किया जाता है । इस विषय में इन
शास्त्रकारों के दो दल हैं । दण्डी¹ आदि ने प्रतिभा, शास्त्रानुशीलन और अभ्यास इन
तीनों को मिलित रूप से काव्य का कारण माना है, जबकि रुद्रट आदि ने केवल
प्रतिभा को ।
१. नैसर्गिकी च प्रतिभा, श्रुतं च बहुनिर्मलम् ।
अमन्दश्चाभियोगोऽस्याः, कारणं काव्यसम्पदः ॥ ( काव्यादर्श )

( १० )
आचार्य भामह¹ के मत से प्रतिभा, शब्दार्थज्ञान, काव्यज्ञों की शिक्षा और अनेक
निबन्धों के अनुशीलन से प्राप्त व्युत्पत्ति काव्य के कारण हैं। वामन के अनुसार लोक-
व्यवहार और शास्त्रों में निपुणता, नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा ( प्रतिभा ) अथवा
जन्मान्तरीय संस्कारात्मक शक्ति-विशेष और काव्यज्ञों के निदेश पर काव्यरचना में
पुनः-पुनः प्रवृत्ति ( अभ्यास ) ये सभी काव्य के कारण हैं। रुद्रट² के अनुसार शक्ति,
व्युत्पत्ति और अभ्यास कारण हैं। मम्मट का भी यही मत है³। जयदेव⁴ केवल प्रतिभा
को कारण मानते हैं और प्रतिभा के सहकारी कारण शास्त्रानुशीलन और अभ्यास को
कहते हैं।
पण्डितराज के मत में केवल प्रतिभा से ही काव्य की सृष्टि होती है और
प्रतिभा का कारण कहीं अदृष्ट ( पूर्वजन्मार्जित ) और कहीं व्युत्पत्ति और अभ्यास है।
बालकवि कर्णपूर बचपन में ही बिना व्युत्पत्ति और अभ्यास के सुन्दर काव्य लिखने
लगे। ऐसे बालकवियों में विरुदावलीकार रघुदेव मिश्र, पुरंजनचरितनाटककार कृष्णदत्त
उपाध्याय आदि प्रसिद्ध हुए। इनके काव्यनिर्माण को देखते हुए स्पष्ट है कि प्रतिभा
का एक स्वतन्त्र कारण धर्मस्वरूप अदृष्ट मानना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में बिना
व्युत्पत्ति और अभ्यास के भी अदृष्ट से एवं बिना अदृष्ट के भी व्युत्पत्ति और अभ्यास
से प्रतिभा की उत्पत्ति से 'कारण⁵ के अभाव में भी कार्य की सत्ता' रूप व्यतिरेक-
व्यभिचार प्राप्त हो जायेगा, जिसके निवारण के लिए "अदृष्ट से उत्पन्न प्रतिभा के प्रति
अदृष्टमात्र कारण" एवं "व्युत्पत्ति और अभ्यास से उत्पन्न प्रतिभा के प्रति व्युत्पत्ति और
अभ्यास कारण" इस तरह अलग-अलग कार्यकारणभाव माना गया है। अब कारण के
भेद से दो प्रतिभाएँ हो जायेगी और कहीं पर अदृष्टजन्य प्रतिभा के अभाव में भी
व्युत्पत्ति और अभ्यासजन्य प्रतिभा से काव्य होने से पूर्ववत् ⁶ व्यभिचार प्राप्त ही रहेगा,
१. काव्यं तु जायते जातु, कस्यचित् प्रतिभावतः ।
शब्दाभिधेये विज्ञाय, कृत्वा तद्विदुपासनम् ॥
विलोक्या न्यनिबन्धांश्च, कार्यः काव्यक्रियादरः ॥ ( काव्यालङ्कार )
२. त्रितयमिदं व्याप्रियते शक्तिर्व्युत्पत्तिरभ्यासः । ( रुद्रट-काव्यालङ्कार )
३. शक्तिर्निपुणता लोकशास्त्रकाव्याद्यवेक्षणात् ।
काव्यज्ञशिक्षयाभ्यास इति हेतुस्तदुद्भवे ॥ ( काव्यप्रकाश )
४. "प्रतिभैव श्रुताभ्याससहिता कवितां प्रति हेतुः" । ( चन्द्रालोक )
५. जब प्रतिभा के दोनों कारण हैं तो इनमें से एक के भी न रहने पर कारण-
भाव हो जायेगा ।
६. उपरिवत् ।

( ११ )
जिसके निवारण के लिए 'अदृष्टजन्य प्रतिभा से उत्पन्न काव्य के प्रति अदृष्टजन्य
प्रतिभा कारण' और व्युत्पत्त्यभ्यासजन्य प्रतिभा से उत्पन्न काव्य के प्रति व्युत्पत्त्यभ्यास-
जन्य प्रतिभा कारण' ऐसा पृथक् कार्यकारणभाव मानना चाहिए ।
राजशेखर का मत है¹ कि समाधि ( मानसिक एकाग्रता ) और अभ्यास (बाह्य
प्रयास ) ये दोनों ही मिलकर शक्ति को प्रकट करते हैं और यही शक्ति काव्य का
कारण है, जो दो प्रकार की होती है—कारयित्री और भावयित्री ।
यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि साहित्यशास्त्र में शक्ति और प्रतिभा
एक ही वस्तु है, जब कि न्यायदर्शन में शक्ति ज्ञानजन्य संस्कार² को और प्रतिभा नव-
नवोन्मेषशालिनी बुद्धि-विशेष को ( जो संस्कार का जनक है ) कहते हैं। वेदान्त में
भी ज्ञान को आत्मा, बुद्धि को अन्तःकरण एवं संस्कार को ज्ञानजन्य माना जाता है।
यहाँ तो "या शब्दग्राममर्थसार्थमलङ्कारतन्त्र-मुक्तिमार्गमन्यदपि तथाविधहृदयं प्रतिभा-
सयति सा प्रतिभा" ऐसा कहते हुए राजशेखर ने प्रतिभा को व्यक्त किया है और
इसे ही भामह, दण्डी, वामन, अभिनवगुप्त, जयदेव और जगन्नाथ प्रतिभा कहते हैं,
जब कि इसी प्रतिभा को रुद्रट, आनन्दवर्धन और मम्मट शक्ति कहते हैं । अतएव
दोनों एक ही तत्त्व हैं, क्योंकि अभिनवगुप्त ने "अव्युत्पत्तिकृतो दोषः शक्त्या संव्रियते
कवेः" इस ध्वनिकार की पंक्ति की व्याख्या में शक्ति को प्रतिभा कहा है ।
इस सम्बन्ध में किसी समन्वयवादी आचार्य का मत उपयुक्त जान पड़ता है
कि काव्य की उत्पत्ति में प्रतिभा, वृद्धि में अभ्यास और सौन्दर्य में व्युत्पत्ति कारण है—
'काव्यं तु जायते शक्तेर्वर्धतेऽभ्यासयोगतः ।
तस्य चारुत्वनिष्पत्तौ व्युत्पत्तिस्तु गरीयसी' ॥
यह मत पण्डितराज के अनुकूल है और उन बालकवियों की काव्योत्पादिका
शक्ति का भी समाधान इससे हो जाता है ।
( ४ ) रसस्वरूप—'रस्यते = आस्वाद्यते इति रसः' इस व्युत्पत्ति के
अनुसार सहृदय सामाजिक जिसे काव्य या नाट्य के द्वारा आस्वादित करे, जिससे
अनिर्वचनीय आनन्द को प्राप्त करे, उसे रस कहते हैं । इस आस्वादन के साधन को
अलङ्कारशास्त्र में विभाव, अनुभाव और व्यभिचारिभाव ( सञ्चारीभाव ) कहते हैं ।
इन तीनों के मेल से प्रकटित स्थायीभाव रस कहलाते हैं । रसरूपताप्राप्ति से पूर्व तक
ये सभी भाव ही कहलाते हैं, तो चित्तवृत्ति ( चित्त में रहने वाले धर्म ) ही होते हैं ।
१. काव्यमीमांसा ।
२. साहित्यिक के अनुसार ही शक्ति को संस्कारस्वरूप मानकर । "शक्तिः,
कवित्वबीजभूतः संस्कारविशेषः" ।

( १२ )
ये स्थायीभाव नौ हैं—रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, घृणा, विस्मय और
निर्वेद । इनके कारण को विभाव कहते हैं, जिसके दो भेद हैं—आलम्बन और
उद्दीपन । यथा—शृङ्गार रस में शकुन्तलादि आलम्बन और एकान्तस्थानादि उद्दीपन
हैं । यद्यपि विभाव स्थायिभाव के उत्पादक नहीं होते हैं, वे ( स्थायी ) तो सहृदयहृदय
में वासनारूप से सूक्ष्म आकार में पहले ही से रहते हैं । विभाव तो उनका विकास
मात्र करता है, तथापि लौकिक विभाव के उत्पादक रहने के कारण अलौकिक
( शास्त्रनिष्ठ ) विभाव को भी वैसा कहना अनुचित न होगा, क्योंकि अविकसित
वस्तु प्रतितियोग्य न रहने के कारण अनुत्पन्न कोटि में ही रहती है ।
सच तो यह है कि लौकिक रत्यादि स्थायीभावों का शकुन्तलादि विभाव
उत्पादक होते हैं, पर काव्यारूढ़ होने पर वे ही अलौकिक विभाव बनकर रसास्वाद के
अवसर पर रस से एकीभाव को प्राप्त करते हैं । यह भी ज्ञातव्य है कि स्थायीभाव
और रस में तादात्म्य रहने के कारण स्थायीभाव के आलम्बन और उद्दीपन ही रम के
भी आलम्बन एवं उद्दीपन होते हैं ।
स्थायीभाव के कार्य को अनुभाव कहते हैं, जो आलम्बन पर आश्रित बाह्य रूप
से प्रकटित होता रहे । जैसे अग्नि धूम को प्रकाशित करता है । यह काव्य में निबद्ध
रहने के कारण अलौकिक होता है । सात्त्विक भाव भी अनुभाव के ही अन्तर्गत आते
हैं । जो विभाव से भी विलक्षणरूप से जल में बुद्बुद के समान प्रकाशित हो तथा कभी
स्थायीभाव में ही विलीन हो जाय—ऐसे रसोपकारक क्षणिक भाव को व्यभिचारीभाव
कहते हैं । निर्वेदादि ३३ व्यभिचारीभाव कहे गये हैं । स्थायीभाव भी अपरिपुष्ट रहने
पर रसान्तर के उपकारक होकर व्यभिचारीभाव कहलाते हैं । सभी भावों में स्थायी-
भाव प्रधान होता है । उक्त नौ स्थायीभाव शृङ्गारादि नौ रसों में परिणत होते हैं ।
रसानुभूति के विषय में सर्वप्राचीन उल्लेख भरतनाट्यशास्त्र का रससूत्र है—
“विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः”—उपर्युक्त दोनों विभाव, अनुभाव
और व्यभिचारिभाव के संयोग से रस की प्रतीति होती है । इस सूत्र की व्याख्या चार
प्रकार की उपलब्ध होती हैं, जो रसस्वरूप के चार सिद्धान्त बने हुए हैं—लोल्लट का
उत्पत्तिवाद, शङ्कुक का अनुमितिवाद, भट्टनायक का भुक्तिवाद और अभिनवगुप्त का
अभिव्यक्तिवाद । इसके अतिरिक्त रस के विषय में पण्डितराज जगन्नाथ ने सात मतों
को प्रस्तुत किया है—( १ ) नव्यमत ( अनिर्वचनीयतावाद ), ( २ ) भावना के
माहात्म्य से मानस बोध ( भ्रमवाद ), ( ३ ) भाव्यमान विभाव ही रस है, ( ४ ) वैसा
अनुभाव, ( ५ ) वैसा व्यभिचारीभाव, ( ६ ) वैसे विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी-
भाव मिलितरूप में और ( ७ ) इनमें से जिस पर चमत्कार रहे वही ।

( १३ )
इनमें जिस लक्षण में विभावादि तीनों नहीं ( केवल एक ही ) हैं, वह भरत के
रससूत्र से विरुद्ध होने से परम्परा-विरुद्ध है । वे हैं केवल विभाव, केवल अनुभाव और
केवल व्यभिचारिभाव को रस मानने वाले लक्षण । परन्तु इनमें भी अन्य का आक्षेप-
लभ्य रहना तो निश्चित ही है । अतः आक्षेपलभ्य के द्वारा ही रससूत्र का संगमन
कर लेते हैं ।
आचार्य मदनमोहन झा ने विकासवादी क्रम से इन वादों को कालक्रम
( प्राचीनतानुसार ) इस प्रकार वर्णित किया है—( १ ) विभाव ही रस है, ( २ )
अनुभाव, ( ३ ) व्यभिचारिभाव, ( ४ ) तीनों के रहने पर जिसमें चमत्कार हो वही
रस है, ( ५ ) तीनों ही रस हैं, ( ६ ) रससूत्र के अनुसार उत्पत्तिवाद, ( ७ )
अनुमितिवाद, ( ८ ) भुक्तिवाद, ( ९ ) अभिव्यक्तिवाद, ( १० ) नव्यमत ( अनिर्वच-
नीयता ) और ( ११ ) भ्रमवाद ।
परन्तु यह मत उपयुक्त तब होता, यदि किसी प्राचीन ग्रन्थ में इनका उल्लेख
होता । भरत से पहले पाँच मत थे, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । इसका उल्लेख सर्वप्रथम
जगन्नाथ ने ही किया है । अतः ये मत या तो उनके स्वयं उद्भावित हैं या उनके समय
में चल पड़े थे ।
पण्डितराज ने जो इन मतों का क्रम रखा है, उसमें सर्वप्रथम अपना मत, जो
मान्य आचार्य अभिनवगुप्त का है, को रखा है; उसके बाद अन्य मतों का प्रतिपादन भर
उन्हें अभिप्रेत है, खण्डन नहीं, क्योंकि सिद्धान्त से पृथक् अन्य मत स्वतः उपेक्षणीय हो
जाते हैं । जो कोई “नव्यास्तु”¹ से कथित मत को इनका अपना मत कहते हैं, उन्हें
समझना चाहिए कि सिद्धान्त आदि या अन्त में ही रखा जाता है । आदि में सिद्धान्त
देकर उस पर आचार्य अभिनवगुप्त की सम्मति दिखाने से ही उसे निर्णय की पदवी
मिल जाती है ।
यह भी ज्ञातव्य है कि रसनिरूपण के प्रथम पक्ष में ही पण्डितराज ने जो
“भावना-विशेषमहिम्ना” विशेषण दिया है, वह किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में न होने

१. शकुन्तलाविषयिणी रति का सम्बन्ध सहृदय से न रहने के कारण उन्हें
आस्वाद कैसे हो, इस हेतु 'साधारणीकरण' व्यापार मानकर सहृदय के
हृदय में उस रति को प्रविष्ट कराते हैं । पण्डितराज का कथन है कि ये
सब काव्यार्थभावना की ही महिमा से होते हैं, तो फिर हम केवल उसी
'भावना' से शकुन्तलारति को साक्षात् ही सामाजिक में आरोपित कर
क्यों न काम चला लें ? इस हेतु साधारणीकरण व्यापार क्यों मानें ? यही
इनके मत का बीज है ।
२ भू०

( १४ )
से इनके मस्तिष्क की उपज है और यह विशेषण इनके द्वारा प्रथमतः प्रतिपादित अन्य
सातों मतों में भी निविष्ट है। इस नवीन उद्भावना को इन्होंने अपने काव्यलक्षण के
परिष्कार में भी दिया है—"कारणं च तदवच्छिन्ने भावनाविशेषः पुनः पुनरनु-
सन्धानात्मा", "चमत्कारजनकभावनाविषयार्थप्रतिपादकशब्दत्वम्"। इस तरह रस-
स्वरूपनिरूपण में "भावनाविशेष" पण्डितराज की अपनी चीज है, जैसा कि इसकी
व्याख्या करते हुए महावैयाकरण दीनबन्धु झा ने लिखा है१—"भावनाविशेषमहिम्ना =
ज्ञानविशेष-सामर्थ्येन, एतेन साधारणीकरणाय व्यापारान्तरकरणमनावश्यकमिति सूचितं
भवति । इदमेव ग्रन्थकृन्मते रसस्वरूपं प्रकाशाद् विशेषश्च"—"पुनः पुनः अनुसन्धानात्मक
ज्ञानविशेष के सामर्थ्य से' इसी विशेषण से सूचित होता है कि साधारणीकरण के लिए
व्यञ्जना या भावकत्व-भोजकत्वव्यापार आदि मानना अनावश्यक हो जाता है और यही
ग्रन्थकार जगन्नाथ के मत से रस का स्वरूप है तथा काव्यप्रकाश से विलक्षण है।
अतः विद्वानों का मत है कि अपनी प्रतिभा से पण्डितराज ने ही सभी मतों की
उद्भावना की है। इनमें कतिपय तो रससूत्र के विरुद्ध होने से और शेष कल्पनामात्र
सिद्ध२ ( अव्यावहारिक ) होने से साहित्यशास्त्रीय विद्वानों को ग्राह्य नहीं हैं। केवल
दार्शनिक दृष्टि से चिन्तित 'नव्यास्तु' मत किसी साहित्यिक के लिए उपयुक्त नहीं हो
सकता। अतः समालोचक इन मतों की उपेक्षा करते आये हैं और स्वयं ग्रन्थकार ने भी
नवीन प्रकार प्रदर्शित करने के कौतूहल से ही इन्हें ग्रन्थ में निविष्ट किया है, सिद्धान्त
नहीं माना है।
रस-विषयक सिद्धान्त मत—
सहृदय के हृदय में वासणारूपेण सदा से स्थित ( नित्य ) रत्यादि स्थायीभाव
ही बाह्य विभावानुभावव्यभिचारिभावों के व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव सम्बन्ध से साधारणरूप
में अनुभूयमान होते हुए अलौकिक आस्वादपदवी को प्राप्त कर रस कहलाता है—यह
परमाचार्य अभिनवगुप्त के मत का सारांश है। पण्डितराज का प्रथम सिद्धान्त इसी की
व्याख्या है। वे व्याख्या द्वारा निम्नांकित कथ्य को व्यक्त करते हैं—
(१) जब विभावादि अनुकूल वर्णों से युक्त चमत्कृत काव्य में निविष्ट रहता है।
(२) यह काव्य सहृदय के हृदय में प्रविष्ट कर गया होता है।
(३) सहृदय बार-बार अनुसन्धान करते हुए विभावादिकों को साधारणीकृत
कर लेते हैं।
१. रसगङ्गाधरीय-रसस्वरूपनिरूपणव्याख्या—'रसिकमनोरञ्जिनी' ग्रन्थ के
परिशिष्ट में—नाग प्रकाशक, दिल्ली—१९९५ ई० ।
२. मैथिलीकाव्यविवेक, पृ० ६४।