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सर्वकोश
रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 414 में से

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पृष्ठ 8

( २ )
साहित्य विद्या को ही आचार्य राजशेखर ने१ अपनी काव्यमीमांसा में पञ्चम
वेद, सप्तम दर्शन और पञ्चदश विद्यास्थान कहा है। काव्य और काव्यशास्त्र में
अङ्गांगिभाव सम्बन्ध है, जिनमें काव्य है अङ्गी ( प्रधान ), साध्य और लक्ष्य तथा
काव्यशास्त्र है अङ्ग ( काव्य का उपकारक ), साधन और लक्षण । इन दोनों लक्ष्य
और लक्षणों के समुदाय को ही साहित्य कहना२ उचित है। जैसा कि आचार्य पतंजलि
ने महाभाष्य ( प्रथमाह्निक ) में "लक्ष्यलक्षणे व्याकरणम्" कहकर लक्षण ( सूत्र )
और लक्ष्य ( प्रयोग, उदाहरण ) के सम्मिलित रूप को ही व्याकरण कहा है, उसी
तरह काव्यशास्त्रीय लक्षण एवं उनके उदाहरण ( काव्य ) साहित्य कहे जाते हैं। केवल
काव्यशास्त्र के लिए साहित्य पद का प्रयोग लाक्षणिक है। साहित्यशब्दार्थ व्यापक है
और काव्यपदार्थ व्याप्य, यह स्पष्ट ही है। यह एक व्यापक नियम है कि अङ्गी के
फल ( प्रयोजन ) से ही अङ्ग का भी फल सिद्ध हो जाता है। तदनुसार काव्य के फल
से ही काव्यशास्त्र भी फलवान् हो जाता है। इसलिए सभी काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों में
काव्य का ही फल दिखाया गया है, शास्त्र का नहीं।
इस सन्दर्भ में सर्वप्रथम स्थान कवि का आता है। वह स्वतन्त्र है, निरङ्कुश
है, अतः साहित्य जगत् में सबसे पहले उसी का आविर्भाव हुआ—
"कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भू-
र्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः"३।
रसस्वरूप ब्रह्म से ब्रह्मा के रूप में सृष्टि के आरम्भ में कवि का आविर्भाव
हुआ। तब उससे काव्य निस्सृत हुआ। इस परम्परा में काव्य का दूसरा स्थान है।
उससे सभी मुग्ध हुए, सभी तृप्त हुए, सबों ने उसे देखा। पर देखने वालों में भी कोई
सूक्ष्म द्रष्टा निकल गया, जिसे आलोचक कहा जाता है। यह तीसरे स्थान पर आता
है। उसने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से देखकर अपनी वाणी द्वारा उसकी प्रशंसा या निन्दा की
और फिर उसे परवर्त्ती कवियों के लिए प्रचारित किया, वही हुआ काव्यशास्त्र,
जिसमें लक्षण के साथ-साथ लक्ष्य ( काव्योदाहरण ) भी होता है और समस्त काव्य-
जगत् ही इसके उदाहरण हो गये। इस तरह यह चौथे स्थान पर आता है। यही
शास्त्र साहित्य है, आलोचनाशास्त्र है, समीक्षाशास्त्र है। कवि-काव्य-आलोचक-
आलोचना की यही श्रृंखला है। इनमें परस्पर उत्पाद्योत्पादक, कार्यकारण, उपकार्यो-
पकारकभाव आदि सम्बन्ध हैं। कभी तो कवि के अनुसार शास्त्र चलता है, तो कभी
१. शास्त्रनिर्देशाध्याय।
२. मैथिली-काव्यविवेक, पृ०-१४।
३. शुक्लयजुर्वेदसंहिता, ४०।८।