रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका
सहृदय-हृदयविजेता, श्लाघ्यः सर्वैः कविर्मान्यः ।
तत्कर्ममर्म-वीक्षक-साहित्यज्ञस्ततोऽपि वन्द्योऽस्ति¹ ॥
कवि क्रान्तदर्शी ( आर-पार देखने वाला ) होता है² । उसका हृदय विशाल,
दृष्टि सूक्ष्म, मति जागरूक, मन प्रसन्न और वाणी सुललित होती है। वह अदृश्य जगत्
में प्रवेश करने की क्षमता रखता है और दृश्य जगत् में भी जहाँ सामान्य लोग देखते
हुए भी जिसे न देख पाते हों या देखकर भी व्यक्त न कर पाते हों, उसे वह देख और
व्यक्त कर लोगों को चमत्कृत कर देता है। ललित वाणी में ललित भाव को उपस्थित
कर देना ही तो कवि का काम है। इसी वाणी और भाव (अर्थ) के सन्तुलित
सहभाव को साहित्य कहते हैं—
साहित्यमनयोः शोभाशालितां प्रति काप्यसौ ।
अन्यूनानतिरिक्तत्वं मनोहारिण्यवस्थितिः³ ॥
इस प्रकार भावार्थक ष्यञ्-प्रत्ययान्त साहित्य शब्द धर्मबोधक (भावार्थक)
होने से शब्दार्थस्वरूप काव्य का (धर्मी का) बोधक न होकर तत्प्रतिपादक शास्त्र का
बोधक बन जाता है—हितेन सह = सहितं, तस्य भावः साहित्यम् । परन्तु आचार्यं
कविशेखर बदरीनाथ झाजी का मत है⁴ कि यहाँ स्वार्थिक प्रत्यय ही माना जाय ।
तदनुसार 'सहितमेव साहित्यम्' सहभावापन्न (शब्द और अर्थ के सन्तुलित रूप)
काव्य एवं उसके उपकारक छन्द, गुण, अलंकार, रीति, रस, भाव आदि के निरूपक
ग्रन्थ साहित्य कहलाने लगते हैं। यथा—'सुखमेव सौख्यम्, चरित्रमेव चारित्र्यम्,
चतुर्वर्णमेव चातुर्वर्ण्यम्' प्रयोग प्रसिद्ध हैं, उसी तरह 'सहितमेव साहित्यम्' यहाँ स्वार्थिक
प्रत्यय मानने पर धर्मी काव्य और उसके धर्म काव्यशास्त्र इन दोनों का बोधक साहित्य
हो जाता है —
साहित्यं सहितानां भावः काव्यैतदङ्गानाम् ।
साहितानि तानि वा तत्, सप्तममाख्यायते शास्त्रम्⁵ ॥
१. भूमिकाकार द्वारा मङ्गलाचरण ।
२. कवयः क्रान्तदर्शिनः ।
३. वक्रोक्तिजीवितम् १-१० ।
४. मैथिली-काव्यविवेक-सम्पादक डॉ० शशिनाथ झा ।
५. साहित्यमीमांसा-श्लोकसं० २ कविशेखर बदरीनाथ झा ।
(गङ्गानाथझा कोमेमोरेशन भोल्यूम, ओरिएण्टल बुक एजेन्सी, पूना)