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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 128 में से

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पृष्ठ 76

64 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
उसका पति उसके पास जा रहा था, जो उक्त महाशय की उमंग का शिकार हो
गया। मैंने यथाशक्तिपूर्ण प्रबंध किया था कि जब तक कोई बंदूक लेकर सामना
करने न आए, या मुकाबले में गोली न चले तब तक किसी आदमी पर फायर
न होने पाए। मैं नर-हत्या करके डकैती को भीषण रूप देना नहीं चाहता था।
फिर भी मेरा कहा न मानकर अपना काम छोड़ गोली चला देने का यह परिणाम
हुआ। गोली चलाने की ड्यूटी जिनको मैंने दी थी वे बड़े दक्ष तथा अनुभवी
मनुष्य थे, उनसे भूल होना असंभव है। उन लोगों को मैंने देखा कि वे अपने
स्थान से पाँच मिनट बाद पाँच फायर करते थे। यही मेरा आदेश था।
संदूक तोड़कर तीन गठरियों में थैलियाँ बाँधीं। सबसे कई बार कहा- देख
लो कोई सामान रह तो नहीं गया। इस पर भी एक महाशय चद्दर डाल आए।
रास्ते में थैलियों में से रुपया निकालकर गठरी बाँधी और उसी समय लखनऊ
शहर में आ पहुँचे। किसी ने पूछा भी नहीं, कौन हो, कहाँ से आए हो ? इस
प्रकार दस आदमियों ने एक गाड़ी को रोककर लूट लिया। उस गाड़ी में चौदह
मनुष्य ऐसे थे, जिनके पास बंदूक या रायफलें थीं। दो अंग्रेज सशस्त्र फौजी
जवान भी थे, पर सब शांत रहे। ड्राइवर महाशय तथा एक इंजीनियर महाशय
दोनों का बुरा हाल था। वे दोनों अंग्रेज थे। ड्राइवर महाशय इंजन में लेटे रहे।
इंजीनियर महाशय पाखाने में जा छिपे। हमने कह दिया था कि मुसाफिरों से कुछ
न कहेंगे सिर्फ सरकार का माल लूटेंगे। इस कारण मुसाफिर भी शांतिपूर्वक बैठे
रहे। समझे कि तीस-चालीस आदमियों ने गाड़ी को चारों ओर से घेर लिया है।
केवल दस युवकों ने इतना बड़ा आतंक फैला दिया। साधारणतः इस बात पर
बहुत से लोग विश्वास करने में भी संकोच करेंगे कि दस नवयुवकों ने गाड़ी खड़ी
करके लूट ली। जो भी हो वास्तव में बात यही थी। इन दस कार्यकर्त्ताओं में
अधिकतर तो ऐसे थे जो आयु में सिर्फ लगभग बाईस वर्ष के होंगे और जो
शरीर से बड़े पुष्ट भी न थे। इस सफलता को देखकर मेरा साहस बहुत बढ़
गया। मेरा जो विचार था, वह अक्षरशः सत्य सिद्ध हुआ। पुलिस वालों की वीरता