रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवृहत् संगठन 65
का मुझे अंदाजा था। इस घटना से भविष्य के कार्य की बहुत बड़ी आशा बँध
गई। नवयुवकों का भी उत्साह बढ़ गया। जितना कर्ज़ा था निपटा दिया। अस्त्रों
की खरीद के लिए लगभग एक हजार रुपये भेज दिए। प्रत्येक केन्द्र के कार्यकर्त्ताओं
को यथास्थान भेजकर दूसरे प्रांतों में भी कार्य-विस्तार करने का निर्णय करके कुछ
प्रबंध किया। एक युवक-दल ने बम बनाने का प्रबंध किया, मुझसे भी सहायता
चाही, मैंने आर्थिक सहायता देकर अपना एक सदस्य भेजने का वचन दिया। किंतु
कुछ त्रुटियाँ हुईं, जिससे संपूर्ण दल अस्त-व्यस्त हो गया।
मैं इस विषय में कुछ भी न जान सका कि दूसरे देश के क्रांतिकारियों ने
प्रारंभिक अवस्था में हम लोगों की भाँति प्रयत्न किया या नहीं। यदि. पर्याप्त
अनुभव होता तो इतनी साधारण भूलें न करते। त्रुटियों के होते हुए भी कुछ भी
न बिगड़ता और न कुछ भेद खुलता, न इस अवस्था को पहुँचते, क्योंकि मैंने जो
संगठन किया था उसमें किसी ओर से मुझे कमजोरी न दिखाई देती थी। कोई भी
किसी प्रकार की त्रुटि न समझ सकता था। इसी कारण आँख बंद किए बैठे रहे।
किन्तु आस्तीन में साँप छिपा हुआ था, ऐसा गहरा मुँह मारा कि चारों खाने चित्त
कर दिया।
जिन्हें हम हार समझे थे गला अपना सजाने को,
वही अब नाग बन बैठे हमारे काट खाने को।
नवयुवकों में आपस की होड़ के कारण बहुत विवाद तथा कलह भी हो
जाती थी, जो भयंकर रूप धारण कर लेती। मेरे पास जब मामला आता तो मैं
प्रेमपूर्वक समिति की दशा को देखकर, सबको शांत कर देता। कभी नेतृत्व को
लेकर वाद-विवाद चल जाता। एक केंद्र के निरीक्षक से वहाँ के कार्यकर्त्ता अत्यंत
असंतुष्ट थे। क्योंकि निरीक्षक से अनुभवहीनता के कारण कुछ भूलें हो गई थीं।
यह अवस्था देख मुझे बड़ा खेद तथा आश्चर्य हुआ, क्योंकि नेतागिरी का भूत
सबसे भयानक होता है। जिस समय से यह भूत खोपड़ी पर सवार होता है, उसी
समय से सब काम चौपट हो जाता है। केवल एक-दूसरे के दोष देखने में समय