पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
सातवां समय ३५ ] पृथ्वीराजरासौ । ३६३
गुज्जर वै परधान । जैन धुम्मी मत लड्ढी ॥
एकादस चहुआन । धर धारह आलुड्डी ॥
सहस एक असवर । धार वै गै घर मंड्यौ ॥
नाहर राइ नरिंद । कोट पहन वै चढ़क्यौ ॥
ढुंढयौ षेत चहुआन बर । अरु भारथ आहुह्यौ ॥
चामर सु कवच धरि षेत में । सुधा विविध विधि लुह्यौ ॥
छं० ॥ १६७ ॥ रु० ॥ १०४ ॥
डोला पंच पचीस । स्वामी संजुत्त चढाइय ॥
घाइ कन्ह घट घुम्मि । घाइ एकादस राइय ॥
चंपि बीर चालुक्क । राज मेलान तुच्छ करि ॥
गल गज्जै सामंत । बरै बरनी नाहर बरि ॥
रविवार बीर पंचमि दिवस । एकादस रविभुअन ग्रह ॥
अष्टम सु चक्र जोगिनि ग्रहण । बर बज्जेति नरिंद तह ॥
छं० ॥ १६८ ॥ रु० ॥ १०५ ॥
पट्टन में पृथ्वीराज का राज्याभिषेक होना ॥
देव दसमि कै दीह । नयर पहन चहुआनं ॥
गुर पंचम रवि नवम । सुवर ग्यारह ससि धानं ॥
तीय थान बर भौम । सुक्र सप्तम बल किन्ना ॥
केंद्री बर बुद्ध । राह सब कौंद अहिन्ना ॥
आनंद चंदं बरदाइ घन । राजभिषेकन पहि करि ॥
साजंत भूमि जीते सुपत्ति । तेज तुंग दुज्जन सुहरि ॥
छं० ॥ १६९ ॥ रु० ॥ १०६ ॥
१०४ पाठान्तर—गुज्जर । परघांन । धुंम्मो । धुमी । चहुवांन । आलुही । नाहरराय । चढ्यौ ।
चहुवांन । आहुट्यौ । लुट्यौ ॥
१०५ पाठान्तर—डोंला । स्वांमी । स्वांमि । घाय । घूंमि । घुंम्मि । धाय । ईकादस ।
मेलांन । तुछ । बरैं । बरौ । बजेति ॥
१०६ पाठान्तर—चहुवांनं । चहुआनं । यांन । कीनो । केंद्री । सबकोद अहिना । बरदय
धनं । पट । दुजन ॥
३६४ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३६
दूहा ॥ तिरिय वक्र अधचक्र नन । ऊरध वक्र प्रमान ॥
पून नखिच चहुआन वै । पट अभिषेक समान ॥
छंद ॥ १७० ॥ छ० ॥ १०७ ॥
कवित्त ॥ पून नखिच कविचंद । कौन वान् उपावै ॥
पटभिषेक राजान । बहुत आगम प्रभावै ॥
ग्रच प्रसाद * तोरन उतंग । कूच जंचह सक ठावै ॥
ध्वजा बंधि पत्ताक । संष चामर मंडावै ॥
उद्यत्त परब पनि अर्चन । बहु विवेक घंमच सुधरि ॥
नन कूप तडागन वापियन । धन सुकियन सुकियन बरि ॥
छंद० ॥ १७१ ॥ छ० ॥ १०८ ॥
नाहरराय का हारकर अपनी कन्या के विवाह का
लग्न लिखवाकर भेजना ॥
छंद पहरि ॥ सब सथ्थ तथ्य हुअ एक ठांम । मुक्कांम कीन गिरिनार गांम ॥
सब लोक महाजन मिले आइ । चिंत्यौ सुचित्त नाहर सुभाइ ॥छं॥१७२॥
जिणि मेल होइ सो करि उपाइ । दिप्पियै दीप ल्हो नहीं खाइ ॥
पहुमी सुकाज अर तजत प्रान। पहुमीस काज धन देत दान ॥ छंद॥ १७३ ॥
पहुमीय काज जग बाजि देत । उपाइ नेक पहुमी सुलेत ॥
पुत्री सुएक तिन तन कुआरि । दीसंत देह जनु मदनधारि ॥ छंद ॥ १७४ ॥
बुल्लाइ विप्र लिखि लगन तथ्य । पठाइ दीन नृप पिथ्थ जय्थ ॥
आनंद राज सब सेन अंग । फुल्ले कि कमल जनु दिषि पतंग ॥
छंद० ॥ १७५ ॥ छ० ॥ १०९ ॥
१०७ पाठान्तर=तिरीय । प्रमाणं । चहुआन कौं । पटभिषेक । समांन ॥
१०८ पाठान्तर-कौन । उपावै । पाट विभेक रजांन । पाटभिषेक राजांन । आरांम ।
- अधिक पाठ है ॥ उतंग । पताक । उदयं । उद्यंत । पांनिं । पांनि । घुंम्मह । तटांकने । धन
मुकियन मुकियन वरि । मुकियन चुकियन वर ॥
१०९ पाठान्तर-सब्ब । सर्थ । तथ । हूष । ठांम । मुकाम । गिरनारि । गांम । सब्ब । मिलियं ।
आय । चिंत्यौ । सुभाय ॥ १७२ ॥ जिंहिं । होय । उपाय । दिषियै । नही । लाय । पुहमी । प्रांन ।
दांन ॥ १७३ ॥ उपाय । कुवार । धार ॥ १७४ ॥ बुलाय । तच्छ । पठाइ । पिथ । जय । फूले ॥ १७५ ॥
सतवां समय ३७ ] पृथ्वीराजरासो । ३६५
पृथ्वीराज का ब्याहने को जाना ॥
कवित्त ॥ नट्ठा नाहरराइ । सेन ढूंक्यौ चहुआनं ॥
राज जीति गज लब्धि । सीस लग्गा असमानं ॥
सुम मल्लह परिछार । मत्त कीनौ अमिस जुध ॥
बरन बीर संमुहौ । राज लग्गे सुमंत सुध ॥
पंचमी बार रवि रात दिन । मंज नाम बर जोग गुर ॥
गिरि नाम करन राजन बर । चह्यौ बीर बारंस डर ॥
छं० ॥ १७६ ॥ ११० ॥
पृथ्वीराज का तोरन की बंदना करना ॥
कवित्त ॥ बंदिं राज तोरन्न सुचंग * । मुति नख्यै अच्छित अलि ॥
मनां * चंद किरनि छूटंत । भान नखै मयूष छबि ॥
ठाम ठाम घिय गान । जानि अच्छरि कैलासच्च ॥
सुभ सिंगार सोभंत । भूमि रचि अलि रस बासच्च ॥
तोरन सुचरु आचार करि । कै जनवासत मंडपहि ॥
दिष्षंत नयन भुल्लहि चरित । काः कवि ब्रन्दहि आव कहि ॥
छं० ॥ १७७ ॥ रु० ॥ १११ ॥
पृथ्वीराज का नाहरराय की कन्या से विवाह होना ॥
दूहा ॥ करि आचार सब पंडित । पानि ग्रहन फुनि व्याह ॥
सोम बास ससुनाइकै । धनि नाहर कत्याह ॥
छं० ॥ १७८ ॥ रु० ॥ ११२ ॥
११० पाठान्तर-नठा । नाहरराय । ढूंक्यौ । चहुआनं । लभि । मल्लह । मत्तह । मत । अमित ।
जुधु । लगा । राति । नाम । गिर । नांम । बरन । चढौ । बीरंसु ॥
१११ पाठान्तर-तोरन । * अधिक पाठ रै । मुति । नयें । छुट्ठत । नंपै । ठांम ठांम ।
जीय । गांन । गांम ॥
११२ पाठान्तर-पंडितन । पांनि । फुनि । सोबास्रब सुनायकैं । सोबास ससुनाइकै ।
धंनि । कत्याह ॥
३६६ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३८
नाहरराय का कहना कि आपके काम में सीस देने के
सिवाय और कुछ देने के योग्य हम नहीं हैं ॥
दूहा ॥ नाहर बोलू नरिंद कहि । का तुम जोग जगीस ।
और देन हम है कहा । काम सीस हम ईस ॥
छंद० ॥ १७८ ॥ रु० ॥ ११३ ॥
नाहरराय की कन्या का गुण और रूप वर्णन ॥
साटक ॥ तन्जे स्याम सुरंग वाम तनयं, मन्मध्य वल्ली कळा ।
सुषं धामय तेज दीपक कळा, तारुन्य लच्छी ग्रहा ॥
रूपं रंजित मंजु माल कळया, वासंत पंचावली ।
श्रवं लक्कन काम धीरज गुणै, धन्यौ दुती दंपती ॥
छंद० ॥ १८० ॥ रु० ११४ ॥
पृथ्वीराज का जीतकर स्त्री के साथ लौटना ॥
कवित्त ॥ संभारि बैरन जीत । पीर चालुक्क काम बच ॥
उभै जोध खो जितै । जोरू कर बत्त कालि कल ।
बीर निसानति सग्ग । बगिग आनन्द निसानं ॥
प्रान चेत बर बीर । चक्र्यौ संभरि दिसि थानं ॥
अर विब्भर खग्ग मग गय गएय । रचिय तिम्मगत जुद्ध इक्छ ॥
काकंक कोटि भंजै विषछ । सुबर बीर बीरछ जु पुछ ॥
छंद० ॥ १८१ ॥ रु० ॥ ११५ ॥
अरिल्ल ॥ लै तरुनी डोला चढि राजं । डोला लंगरिरारु बिराजं ॥
धन रंगा तोर त्तिय धन्यं । जिन रख्यौ जीवत नृप मन्यं ॥
छंद० ॥ १८२ ॥ रु० ॥ ११६ ॥
११३ पाठान्तर—नाहरराव । नाहरराय । कहा । देन । और । दैन । है । कांम ॥
११४ पाठान्तर-तन्मं । स्यामं । वांम । मनमथ । वाली । सुषं । लछी । गृहा । पचावली ।
श्रवं । लक्षन । कांम । गुनै ॥
११५ पाठान्तर-रिन । जोत । करवत । कालिकल । निसानं । बगिग । निसानं । थानं ।
विप्भर । अगमगह गइय । तिम । भंजे । एच्छ ॥
११६ पाठान्तर-लंगरीराय । धनि लंगा तोर तीय धन्यं । जीवित । मंन्यं ॥
सातवां समय ३६ ] पृथ्वीराजरासो । ३६७
संग वरनि डोला चढ़ि गजं । सनौं रत्ति दुति काम समाजं ॥
को अलि डोलनि सथ्य सुसाजं । चढ़ि सब सथ्य बजावत बाजं ॥
छं० ॥ १८३ ॥ रु० ॥ ११७ ॥
पृथ्वीराज का ग्यारह डोलों सहित होना ॥
गाहा ॥ करी जर्जन सरीरं । भीरं भंजि स्वामि का खेवं ॥
ग्यारह डोल सुसथ्यं । कथं पत्तेव संभरि गेहं ॥
छं० ॥ १८४ ॥ रु० ॥ ११८ ॥
पृथ्वीराज का विवाह कर घर पहुँचना ॥
दूहा । ग्रह पत्तै जित्तौ सथन । परनि सुचंगी बाज ॥
जंभा वीनं न्निम्मयौ । कुँअरप्पन सुचि लाज ॥
छं० ॥ १८५ ॥ रु० ॥ ११९ ॥
पृथ्वीराज की प्रशंसा ॥
कवित्त ॥ वंस अनन्त चहुआन । भयौ न पिथ समकोई ॥
जिन षंडे छत्र षग्ग । दीन वंदै सब खोई ॥
जिन नाहर राइ नरिंद । पंडव सच पञ्जारिय ॥
जिन वंभनवा सो सिंघ । वान ढल्यो गंजाड्य ॥
अरि घरन घरनि घर चैन नहि । सयन निसंकन संचरहि ॥
वन गहन बहन विह्वल फिरहि । बंदर ज्यौं कंदर वसहि ॥
छं० ॥ १८६ ॥ रु० ॥ १२० ॥
इति श्री कविचंद विरचिते पृथिराजरासके नाहरराइ
कथा वर्णनं नाम सप्तमो प्रस्तावः ॥ ७ ॥
॥ इति ॥
११७ पाठान्तर- बरनि । मनो । रति । डोलन । सथ ॥
११८ पाठान्तर-करि । भंजि । सुसथं । संभरी ॥
११९ पाठान्तर-गृह । विमयो ॥
१२० पाठान्तर-चहुवांन । भय । पियह । नाहरराय । नाहरराव । पंजायीय । सैं ।
बांन । ठट्ठौ । ठढौ । चैन नह । ज्यो ॥
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अथ सेवाती मुंगल कथा लिख्यते ॥
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( आठवां खण्ड । )
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सोमेश्वर के मंडोवर जीतने और लूट को सरदारों में
बांट कर प्रबल प्रताप के साथ राज्य
करने का वर्णन ॥
कवित्त ॥ सुभसि देस सोमेस । पेस मैवास महीपन ॥
सुभट यह संघट्ट । दिठ्ठि कुँवरं किय जीपन ॥
मंडोवर परिहार । मारि उज्जारि जेर किय ॥
सामतंन सस रंग । लच्छि लब्भी सुवंटि दिय ॥
दिन दसा देस दरबार दुति । दान जग्ग रत्ता रचै ॥
पहु प्रबल पारि पच्छारि करि । अदट दह जगवनि गरै ॥
छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥
सोमेश्वर के गुणों और उसकी गुणग्राहकता का वर्णन ॥
कवित्त ॥ अरिद्द दंड बल संड । गर्भ गर्भन डर कंडहि ॥
सगपन एक पग चास । पञ्चक सेवा सिर मंडहि ॥
दुजनि देव गुरु गाहू । पाइ पुज्जियहि निरंतर ॥
पंडित गुनी गुनग्य । द्रव्य चै वञ्चहि दिसंतर ॥
दरबार भीर सुभटन घटन । कला कवित्त नाटिक्क नटहि ॥
छत्तीस राग रागनि रसनि । तंत ताल कंठन ठटहि ॥
छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥
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१ पाठान्तर-सुभट्ट । दिट्ठ । कुअ्रं । कुंवरं । जिप्पन । उजारि । लछि । लभि । लभी । लीय ।
दांन । पछारी । हन ॥
२ पाठान्तर-कंडह । दुजन । गाई । गाय । पाय । पुजहि । पुजियहि । रागन । रसन ।
तंत ताठ ॥
३७० | पृथ्वीराजरासो । | [ आठवां समय २
सोमेस्वर का मेवात के राजा मुग्गल (मुङ्गलराय) के
पास कर लेने के लिये दूत भेजना ॥
कवित्त ॥ एक सुदिन सोमेस । दूत हज्जूर बुलाइय ॥
मैवाति सुगल नरिंद । पत्त पठ्ठइ लिपिदिय ॥
भूमि आस जौ करहि । भरहि तौ दंड सेव करि ॥
नतर समर डर डरपि । समुद उत्तरहि पारं तरि ॥
फिर धारि हुकुम चर चलिय तहँ । जहां मुग्गल संडल मची ॥
सोमेस सूर प्रथिराज कल । तिम संमुच चर वर कछी ॥
छं० ॥ ३ ॥ रू० ॥ ३ ॥
राजा मुङ्गल का यह पत्र पाकर क्रोध प्रगट करके दूत को
लौटा देना और सोमेस्वर का पत्रोत्तर पाकर क्रोध
करना और उस पर चढ़ाई करने की आज्ञा देना ॥
छंद पद्धरी ॥ पढ़ि पत्त पिच्छ मुग्गल नरिंद । प्रज्जरिंग रोस मैवात इंद ॥
बहु दिवस सोमंनृप हुअ सुषंग । किम उज्झवत्त कट्टी मुषंग ॥ छं० ॥ ४ ॥
किम सलिल उंट मुष चढै नीर । किम पवन गवन गति धरै धीर ॥
किम सूर सीत गुन गह्रै अंग । किम धर्मराज धरै दया अंग ॥ छं० ॥ ५ ॥
किम तजै ब्याल बल विषम मुष । किम तजै जटी गल्ल गरल दुष ॥
किम तजै उदधि उर अगनि दाह । किम तजै चंद रवि राह ग्राह. छं ॥६॥
धरि नाम कचि कौं दंड देहू । इह बत्त मुष कौं राज लेहू ॥
अरु करन सेव कचि चहुआन । मन मंझझ हँसि मति राज कान ॥ छं ॥
सेवामु साँचि श्रीनाथ पाइ । तिहि चरन चित्त लग्यौ सदाइ ॥
भंडार दंड कौ सस्त्र पान । जब तब सुलेखु पाजुर निदान ॥ छं० ॥ ८ ॥
सिर पाव मंगि बुद्धिक प्रवीन । पछिराइ चरन बर बिदा दीन ॥
फिरि दूत पच्छ अजमेर आइ । दिय पत्त लग्गि सोमेस पाइ ॥ छं ॥ ९ ॥
बंचिय सुलेख कायथ प्रमान * । सुनि सोम राज चहुआन भान ॥
३ पाठान्तर-हजूर । मेवाती । नरिंद । पठाय । लिपि । भूमियांास । उतराहि । हुकम ।
तहां । तह ॥
- प्रमान = प्रमानराय नामक कायथ सोमेसराज की पेशी का मुंशी था ॥
करतार छय्य पग दान दोइ । धन सह गर्व जिन करौ कोइ ॥ कं० ॥ १० ॥
अनसंक कंक सम बंक धीर । तिहि दान दंड सो जुद्ध श्रीर ॥
प्रज्जरिग सोम सुनि श्रवन दूत। जिहि गेह पिथ्थ अवतार भूत ॥ कं० ॥ ११ ॥
बुल्लाइ सूर सामंत राज । दुय घटी सुहूरत सधौ आज ॥
मेवात मही ऊजारि जारि । पुर ग्राम नैर दीजै प्रजारि ॥ कं० ॥ १२ ॥
पन खोदि बंक गढ ढाचि होहिं । इम करिय भूमि मैवात लेहिं ॥
कित्तीक सहिप मुंगल नरेस । वन बंधि संधि बिन करि अभेस ॥ कं० ॥ १३॥
पज्जन बोलि कूरंभ राव । पुंडीर चंद जनु अग्नि वाव ॥
दाहिम नरिंद कैमास संग । चामंड गव अरि दन्त अभंग ॥ कूं० ॥ १४ ॥
गुज्जर कनं क बड़ राम देव । गहिलेोत राव गोइंद खेव ॥
इतने सुभट सजि जूझ धार । वजि पंच सबद वाजे करार ॥ कं० । १५ ॥ रु०॥ ४॥
ज्योतिषियों से मुहूर्त दिखोवार पुष्य नक्षत्र से चढ़ाई
के लिये निकलना ॥
दूहा ॥ बोलिय जोतिग गनिक दुज । परी मुहूरत सद्द ॥
तेरसि पुष्य रु भ्रगु दसा । चढि चल्ले निसि अद्ध ॥ कं० ॥ १६ ॥ रु० ॥ ५ ॥
घर की रक्षा के लिये पृथ्वीराज को घर पर छोड़ा ॥
दूहा ॥ रत्तजु इह विधि गेह भय । सुनि सोमेस सुभाल ॥
सिसु रख्खि रु संगृह्ही वछौ । मुंभत दिसा विसाल ॥कं० ॥ १७ ॥ रु० ॥ ६॥
४ पाठान्तर-पिथ । मुंगल । नरिंद । पजरिग । प्रज्जरिंग । रोम । मेद्वात । सुपग ।
उछ्रवत्त । कठी ॥ ४ ॥ सूलित उलटी । शीत ॥ ५ ॥ व्यांल । मुख । मुंष । दुःद । दुष ॥ ६ ॥ नांम ।
छित्री । मुःप । चाहुश्रांत । चाहुश्रांत । मक्त । होत । होस । आंन ॥ ७ ॥ पाय । तिहिं । दंड मेा
भंडार वर सस्त्र पांति । निदान ॥ ८ ॥ बुलिक प्रवीन । पहिराय । पछ । आप । हीय । लगि ।
पाय ॥ ९ ॥ कायध प्रमांन । चहुवान । भांनं । हय । दांत । दोय । मदहिं । कोय ॥ १० ॥ तिहिं
दांन । प्रजरिग । जि.हिं । गेह । पिथ ॥ ११ ॥ बोलाय । दुग्र । महूरत । उजारि । यांम । नयर
१२ ॥ पनि । करिय । करितु । मेवात । कित्तक । सुभूंम ॥ १३ ॥ पजूं । जनुं । चामंडराव ।
॥ जर । रामदेव । गोयंद । भट ॥ १५ ॥
५ पाठान्तर-बोलिय । धरी । पुरूष । भृगु दशा । चले । निशि ॥
६ पाठान्तर-रति यु विधि इह येह भय । रषे संगृह । दिशा विशाल ॥
३०२ पृथ्वीराजरासो। आठवां समय ४]
यात्रा के समय अच्छे शगुन मिलने ॥
दूहा ॥ प्रथम प्रयानच सुंदरी । मिली अंक लिय बाल ॥
पीतांबर अंबर धरै । दीप जोति रचि थाल ॥
छंद० ॥ १८ ॥ रु० ॥ ७ ॥
दूहा ॥ कलस कामिनी इक्क सिर। प्रात होत नृप पिख्ख ॥
मच्छ कंध काछार करि । खुर धुनि बाहम इक्ख ॥
छंद० ॥ १९ ॥ रु० ॥ ८ ॥
दूहा ॥ अन्य सगुन सुभ पिख्खि सब । गुंज गचर नीसान ॥
तमचर कर उज्जल्ल अवनि । प्रगटे पुब्ब दिसान ॥
छंद० ॥ २० ॥ रु० ॥ ९ ॥
पृथ्वीराज को राज्य में छोड़कर सोमेश्वर का मेवात
पर चढ़ाई करना और उसकी सूचना पत्र
द्वारा मुङ्गदलराय को दे कहना कि
लड़े वा दंड दे आधीन हो ॥
छंद भुजंगी ॥ चल्यौ चंपि सोमेस मेवात थानं । रच्यौ राज प्रिथराज गेहं निधानं ॥
फटी फौज बैरीन की झाल दिक्खी । तबै कग्गदं प्रेषराजं विसख्खी ॥ छंद० ॥ २१ ॥
वरं बीर धीरं मछा बैर पुत्त्रं । मगै राज सोमेस सौं जुद्ध अब्बं ॥
मछा तेज जाजुल्य भारी सुषग्गं । करै बैर सारथ्थ पारथ्थ जग्गं ॥ छंद० ॥ २२ ॥
इसौ सूर सोमेस दीपौ म्लानं । दियं कग्गदं मुंगलं राजथानं ॥
करो छेय छेयं किधौ अप्पि दंडं । तजौ आज पच्छै षगं षंडि कुंडं ॥
छंद० ॥ २३ ॥ रु० ॥ १० ॥
७ पाठान्तर-पयानह । प्रयांनह । लियें । पीतंबर ॥
८ पाठान्तर-एक शिर । पिषि । मल्ल । वामस ॥
९ पाठान्तर-सुभुन सब । निसांन । उजल । प्रगटी । दिसांन ॥
१० पाठान्तर-मेवात । प्रिथिराज । प्रिथिराज । गेहं । निधानं । दीषी । तबैं । विसषी ॥ २१ ॥
मगैं । युद्ध । अंब्बं । भारी सुजाजुल्य षग्गं । सारथ पारथ ॥ २२ ॥ इसो । मेला नं । दीयौ । पक्के ।
कुंडि ॥ २३ ॥
आठवां समय ४] पृथ्वीराजरासो । ३०३
मुद्दलराय का पत्तोत्तर देकर सोमेस्वर और पृथ्वीराज
दोनो से लड़ाई मांगना ॥
साटक ॥ स्वस्ति श्री सउमेस राजन बरं । प्रिथ्राज राजं बरं ॥
तो पत्तं सुनि अन्न कग्गद बरं । पल्यंज आकृतयं ॥
जाजा भंजन सेन साहस रने । प्रातं प्रतं जुद्धयं ॥
नां किज्जै तिन टाम पचिय घरं । छिभ्या किमा कामनं ॥
छं० ॥ २४ ॥ रु० ॥ ११ ॥
सोमेस्वर का अपने लड़के के बध के विषय में संशय करना ॥
दूहा ॥ सिसु संसौ सम्ही फिख्यौ । उभय काम बध बीर ॥
जौ मुक्कै चिय अधम छत । तौ दल सद्धि सरीर ॥
॥छं० २५ ॥ रु० ॥ १२ ॥
और पृथिराज के पास मुद्दलराय के पत्र का संदेसा
भेजना और उसका रोस में आकर पिता के
पास रण में आ मिलना ॥
कवित्त ॥ छह भग्गा तिय पुच्छ । तात मुक्यौ संदेसं ॥
अरिन सयन संमुद्धौ । जुद्ध मंगन अंदेसं ॥
बाल कठिन कर ग्रह्यौ । भ्रम रखन पित कागर ॥
जु कछु अग्ग संभवै । सोइ किज्जै सुमंत नर ॥
चढि बाल वियोगन कंत अप । सो निस रख्यै राज सिसु ॥
सामंत दोह भय प्रात बर । चढि चल्ल्यौ संग्राम किसु ॥
छं० ॥ २६ ॥ रु० ॥ १३ ॥
कवित्त ॥ सुन्यौ राज प्रथिराज । तात मुक्यौ संदेसं ॥
भयौ रोस जाजुल्य । तुल्य पावक सुमिसं ॥
११ पाठान्तर-स्वस्तश्रो । सोमेस । प्रथीराज । प्रथिराज । तो । श्रवन । पलपंच । पल्यंन ।
प्रात । प्रातं । नां । किजै । ठाम । पिञ्जिय । छिमया ॥
१२ पाठान्तर-दोहरा । संह्री । पर्यौ । उभै । मुकै ॥
१३ पाठान्तर-भगा । पुछ । पुद्धि । मुक्यो । संदेस । अरिय । सैनं । अंदेस । रखन । यु ।
आप । निशि । रख्यो । राजें । सामंत । राज बर । चढे । चल्पो । संगाम ॥
३७४ | पृथ्वीराजरासो । | [ सातवां समय ६
कवन षत्त कूह तत्त । मत्त बंधौ अरि गेहं
मक्खिम जुद्ध चिन मुझ्झ । करे नह सेष रनेहं ॥
बुल्लाइ अप्प भर अप्प सँग । चढि चल्यौ निसि चय्य सह ॥
पत्तौ सुजाइ तिन ठाम तब । सुष्ष सयन सोमेस सह ॥
छंदं ॥ २७ ॥ छ० ॥ १४ ॥
पृथ्वीराज का पिता के पास पहुंच कर सब सेना को सोते
हुए पाना और सोमेस का उससे न बोलना ॥
गाथा ॥ पत्तौ पहु ढिग तातं । दिष्यौ सोतय्य सब्ब सेनायं ॥
न बुल्यौ सोमेसं । पृथिराजं मिष्टयं बैनं ॥ छं० ॥ २८ ॥ रू० ॥ १५ ॥
उसका पिता को निद्रा में और शत्रु की सेना को
देख भाल कर उत्तापित होना ॥
अरिल्ल ॥ मच्चा तेज तन जग्गिय बीरं । तात दिषि निद्रा घन श्रीरं ॥
पहिलोइ अरि सेन सँपत्तिय । ज्यौं अरियं घन बीज पिवत्तिये ॥
छं० ॥ २९ ॥ रू० ॥ १६ ॥
और उस का शत्रु की सेना पर झपटना ॥
दूहा ॥ सयन कुंडि पति सयन सैं। झपल्लौ इन उन मान ॥
खीनर तीतर देखि कै । झपत्यौ जानि सिचांन ॥ छं० ॥ ३० ॥ ६० ॥ १७ ॥
पृथ्वीराज और मुद्दलराय का युद्ध ॥
कवित्त ॥ जनु कि सिंघ बण गज्जि । झपटि करि करनि जुथ्य पर ॥
जनु कि अंजनिस जात । पात दनु दिषि बुध्यबर ॥
जनु कि भीम भीमंडा । दंत हंतीय उखारन ॥
१४ पाठान्तर-सुन्या । पावक । करे । बुलाय । अप । आप संग । चल्यौ । निशि । ब्यमह । पत्तौ । ठांम सुप्र । सेंन । सोमेस जहां ॥
१५ पाठान्तर-सो सब्ज सच्छ सेनायं । तथ । सब । नहं । बुल्यौ । पृथीराजं ॥
१६ पाठान्तर-बीर । दिषि । निंद्रा घट श्रीर । पहिलौ । अरि । संपतिय संपत्तिय । पिवंत्तिय ॥
१७ पाठान्तर-सेंन कुंडि पति सेंन सो । उनमांन । लीनेर । जांनि ।
आठवां समय ७ ] पृथ्वीराजरासो । ३०५
जनु कि गरुड़ मन्त्र गज्जि । वज्जि पंनग बहु पारन ॥
तिम सूर झपटि सोमेस सुन्न । जनु अकास तारक तूटिय ॥
सम जोर रोर अरि उड्डवन । सार सार सचुन जुटिय ॥
छं० ॥ ३१ ॥ रू० ॥ १८ ॥
कवित्त ॥ उन मुंगल गहि इंद । इंद देवन जनु पारस ॥
हर दल कर वन्न कोर । गोड मंडिय भर भारस ॥
गहिर गुंज नीसांन । आंनु वहल गुर गज्जिय ॥
वरन वरन वैरप्प । इंद धनुषह सम रज्जिय
द्वय नारि धारि आतस अनँत । सेार रोर चंमर उड़िय ॥
जाने कि विरचि वारधि लहरि । सत्ति म्रजाद बूडन कुटिय ॥
छं० ॥ ३२ ॥ रु० ॥ १६ ॥
ऐसे पृथ्वीराज के अन्य सूर मुङ्गल के योद्धाओं से लड़े ॥
गाथा ॥ इम रंजे रन रंगं ॥ सूरं नूरं अंगं अमितायं ॥
जनु * विरचे महिष महिंद्रं ॥ वज्जं पात घाव अंगायं ॥
छं० ॥ ३३ ॥ रु० ॥ २० ॥
कन्ह का मेवातियों से युद्ध ॥
कवित्त ॥ उसन्नंग दर धौर । ठौर रप्पन सेवातिय ॥
सीस नाइ मुंगल नरिंद * । कछर कृष्यौ घन घातिय ॥
हूंत सु कन्ह नरनाह । दाह दावावल जह्निय ॥
धक्क वक्क धरि धक्क । जानि मचना रँभ झल्लिय ॥
पय हुंत मंत उरझे जनुकि । मेछ बूंद सर कर कुटिय ॥
सरजाल चाल अनहद अवनि । तिमिर पसर रविकर मिटिय ॥
छं० ॥ ३४ ॥ रु० ॥ २१ ॥
१८ पाठान्तर-कर । करिन । जुथ । अंजनी । दिषि । हथ धर । गनि । बजि । तिम सु सूर सोमेस सुन्न । जुटिय । उड्डयन ॥
१६ पाठान्तर-मही । गहर । नीसांन । जांनु । रञ्जिय । जांनै । म्याद ॥
२० पाठान्तर-सूर । नूर । अंग । * अधिक पाठ है । महिंद्रं ॥
२१ पाठान्तर-ठौर। ठौर । मेवातीय । नांह । मुंगल । * अधिक पाठ है । घातीय । जलिय । जानि । रंभ । झलिय ॥
३७६ पृथ्थीराजरासो । [ आठवां समय ८
कैमास का पठान बाजीदखां से जुद्ध ॥
कवित्त ॥ वाम अंग पठान । विरचि बाजीद † सुपंनिय ॥
उन उप्पर कैमास । हुकम प्रथीराज सुदिंनिय ॥
सीस नांपू बल बाहू । जाइ लग्गिय घन रोसन ॥
तीर तुषक्क तरवारि । तच्छि निकरै उर ओरन ॥
अबरद्द नद्द नीसान धुनि । लगी लाग मारु बजन ॥
रन तूर तूर तवलन चक्क । गहक धक्क रज्जे रजन ॥
छं० ॥ ३५ ॥ रू० ॥ २२ ॥
कूरंभ से राम गूजर का युद्ध ॥
कवित्त ॥ दख्खिन दिसि कूरंभ । नांम नरेन निथदिय ॥
तिन पर गुज्जर राम । करन दस दूवस वदिय ॥
समर अमर परैं सूर । चंपि जनु जांनि उद्भारिय ॥
लोए उच्चरि बुड़ि जाँचि । मुररि मरदांन मुक्कारिय ॥
अन भंग अंग तन तन तकहिँ । हकहिँ बकहिँ बज्जहिँ सखिय ॥
अनभूम भूत भिरैं भूत भुव । समर श्रोन सरिता चखिय ॥
छं० ॥ ३६ ॥ रू० ॥ २३ ॥
इतने में पृथ्वीराज का रण के बीच अचानक जा पहुँचना
और घोर युद्ध का होना ॥
छंद भुजंगी ॥ जयं जाय पत्तौ प्रथीराज जुद्धं । करी सब्ब सेना बिरुद्दं बिरुद्दं ॥
२२ पाठान्तर-वाम । पठांन । सुयं । नीय । प्रथीराज दनियं । नांह । बाहूं । लाइं । तबक ।
तरवार । निकसै । उंरन । नीसांन । हक्क । रंजे ॥
† बाजीदखां नामक पठान मुद्गलराय का एक बड़ा लड़ाका सेनापति अर्थात् जनरल
था और परदेशी सिपाही उसके विभाग में थे । यह वृत्त इस महाकाव्य में जो मुसलमानी भाषा
के शब्द आते हैं उनके विषय की शंका मिटाने के लिये बड़ा उपयोगी है ॥
२३ पाठान्तर-दखिन । दिशि । नांम । नरि ननिवट्टिय । गुजर । रांम । दूबल । वटिय । परे ।
परे । जांनि । लोहरि । जांहि । मरदांव । मुकारीय । तकहिं । बकहि । हकहिं । भिरें । भुय । झलिय ॥
आठवां [समय ६ ] पृथ्वीराजरासो । ३७७
वजे ताल कालं मच्च मल्ल वीरं । दुहुं बांच लेना विहंडं सुधीरं ॥ छं० ॥३७॥
गढी बाग गट्टी कढे लोच तत्ते । मनौ कारनं काम दुर्गा विरत्ते ॥
स्वयं सूर सूरं मची में पचारैं । लगैं लोच अंगं वकै मार मारैं ॥ छं० ॥३८॥
उडै छिंछ स्त्रगं मनौ अग्नि ज्वाला । चलै जानि पत्तं बसंतं तमाला ॥
हिनंकैति कोति पग्गं चिनंकैति ताजी । भिल्लै भूप भूपं मच्चा वीर गाजी ॥छं० ३९॥
छिनकैति पग्गं तुरैं सीस लच्छै । उठै छिंछ इच्छं मनो दाव पच्छै ॥
लगैं गुर्ज सीसं इसे टोप तुट्टैं । मनो दंग दाईं लगै बंस फुट्टैं ॥ छं०॥४०॥
इसे मंच ऋची लगे नाग पग्गे । प्रलै काल प्याखं मनौ वीर जग्गे ॥
छं० ॥ ४१ ॥ रू० ॥ २४ ॥
मुङ्गलराय की फौज का तितर बितर होना और
उसका पकड़ा जाना ॥
कवित्त ॥ कहुँ तिसत्त धर धुकत । लुक्त कहुँ सुभट घात छत्त ॥
ढुकत काल कँहु पच । कुकन कहुं सेन पाडू जल ॥
रुक्त समर भट भीर । धुकत धर मह कक्क जनु ॥
सुक्त कंठ श्रम समर । ढुकत कातर फौजन तनु ॥
इस सोमेस राइ चहुंवान सुअ । अरि समुंद जनु बद्धयौ ॥
चढ्ढिय जिहाज जस जट्ठि पत्त । मुंगल मचि गहि कढ्ढयौ ॥
छं० ॥ ४२ ॥ रु० ॥ २५ ॥
कवि का सोमेस्वर की सेना और घोड़े हाथी आदि की
यज्ञादि अनेक उपमाओं के साथ प्रशंसा करना ॥
दूहा ॥ चमकत सार सनाह पर, हय गय नरभर लग्गि ॥
मनौ इच्छ परि भिंगिनिय, करत केलि निसि जग्गि छं० ॥४३॥ रु०॥२६॥
२४ पाठान्तर—दुहूं । वाह ॥ ३७ ॥ गढी । मनौं । काम । दुगा । महोमे । महोमैं । पचारै ।
लगै । बकै । मारै ॥ ३८ ॥ छिंद्छि । अंगं । संगं । मनौ । ज्वाल माला । सावंतंत माला । भानकैति ।
हिनंकेति । भिल्लै । * सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं हैं ॥ ३९ ॥ भिन्नकैति । तुटै । शीश । लल्ले ।
उठै । इच्छं । मनौं । फल्ले । लगै । लगैं । शीशं । टुटै । मनौ । लगै । फुट्टे ॥ ४० ॥ मंत । पिल्ली । मानों । वीर ॥
२५ पाठान्तर-कहुं । तमंत । तमंत्त । कहुं । कहु । यात्त । टुकत । कहुं । कहु । सेंन ।
मद । ढुकत । तन । * अधिक पाठ है । राय । चहुवांन । चढिय । मुंगल्ल ॥
२६ पाठान्तर-निर । भिंगनां । निशि ॥
२
३०८ पृथ्विीराजरासो । [ आठवां समय १०
कवित्त ॥ जग्गि सूर सोमेस । सेन सज्यौ हयगय नर ॥
राका निसि जनु उदधि । चढैं छल्लोर चंद पर ॥
सुन्यौ श्रवन दृढ बैन । लरचि प्रथिराज जलनदछ ॥
पुच्छ चांपि जनु सिंघ । दिषि प्रजल्यौ नयन झल ॥
दडू बंब दृतिय जनु गगन रव । छुटि चंदुन गज गुरि चलिय ॥
दीसंत मत्त छहैं नयन । मनौं प्रबत पंषछ चलिय ॥ छं० ॥ ४४ रू०॥२७॥
दूहा ॥ ठनक घंट घुघ्घर धमक, धमक धरनि बर पाहू ॥
झमकत सुंड लपेट भट, भरत देत गिर राहू ॥ छं० ॥ ४५ ॥ रू० ॥ २८ ॥
दूहा ॥ पग लंगर जंजीर जरि, कज्जल गिरवर चंग ॥
दिघदंत बग घन बरन । झरत मदंग छहंग ॥
छं० ॥ ४६ ॥ रू० ॥ २९ ॥
दूहा ॥ पब्बय कै पावस जलद, दल दाढन उठि कोर ।
दिषावत दल बहलन, भर घर परत अघोर ॥
छं० ॥ ४७ ॥ रू० ॥ ३० ॥
दूहा ॥ दंति पंक्ति कज्जल बरन, दिषि ढलमल ढाल ॥
करछरंत बैरष लषी, दल सोमेस भुआल ॥
छं ० ॥ ४८ ॥ रू० ॥ ३१ ॥
दूहा ॥ उठी कोर हथ गय प्रवल, दिठ दुअन कुटि धीर ॥
दिषि धनु धर हथनारि धरि, भरकि अरहरी भीर ॥
छं० ॥ ४९ ॥ रू० ॥ ३२ ॥
छंद विराज* ॥ कियं चित्त पंगे । घटं घट भंगे ॥
उमंगे सुअग्गे । मनौं बीर जग्गे ॥ छं० ॥ ५० ॥
२७ पाठान्तरा-रन । चढै । सून्यो । बैनं । पृथीराज । पुछ । दिषि । प्रज्जरै । दई । दहूय ।
चंदून । छहै । छकैं । मनो । पंषकि ॥
२८ पाठान्तर-ठनक । घुघर । धमकि । पाय । राय ॥
२९ पाठान्तर-कजल । दिग्ध । दिघ । सदंग ॥
३० पाठान्तर-दिषावत । दिषावै । दल बल दलन ॥
३१ पाठान्तर-दंत पंत । दिषि । ढल मल । वैरषलकी ॥
३२ पाठान्तर-हय दल । देखि धनुष हथ नारि धरि । फरकि ॥
- इसी समय के रूपक २२ की टिप्पण के साथ इस रूपक को भी ध्यान में लेना चाहिए ॥
ग्यारहवां समय ११ ] पृथ्वीराजरासो । ३०६
देखे वीर लग्गे । बढै चारु अग्गे ॥
डितैं नाचि डिग्गे । मचा सोर अग्गे ॥ छं० ॥ ५१ ॥
परैंके अहग्गे । न वैरीन सग्गे ॥
तजै नाम पग्गे । ... ... ... छं० ॥ ५२ ॥ रु० ॥ ३३ ॥
गाथा । जग्गेयं जुध वानं । कुंभे यनं कंकालं कार्यं ॥
दंतं मुप्प करेयं । वाछंतं वीर सुभटायं ॥ छं० ॥ ५३ रु० ॥ ३४ ॥
रन में मरे और घायल कैसे पड़े दीखते थे और कौन कौन
योद्धा किस किस से घायल हुए और मारे गए ॥
कवित्त ॥ हय हिंसहिं गज चिक्कारि । भगर सम दिषि हुन्नाचल ॥
वखि पंपिनि बेताल । नंदि नंदिय ओन्नाचल ॥
गिद्धि सिद्धि किल्लकांत । ईस सुंडावलि संधय ॥
चकि कैमंध पर त्रुटि । चढी देवी दल संधय ॥
उपमान तास कवि चंद कहि । सुभत सनाह सुकाञ्चनिय ॥
जाने कि कृष्ण वृंदावनह । रास रमै निसि ग्वाखिनिय ॥
छं० ॥ ५४ ॥ रु० ॥ ३५ ॥
कवित्त ॥ * जच्चैं बाजीद पठान । सघन पुरसांन पांन तहँ ।
हय कटि दुव तंडीर । उभय कम्भान तांनि सच ॥
उंच कछर कंधान । छोट गिरि दांन लव भुच्च ॥
रक्त त्रांन सुष चप्पु । कांक अनसंक अवनि धुच्च ॥
३३ पाठान्तर-इतर पुस्तकों में इस छंद का नाम रसावल वा रसावला लिखा है परन्तु
हमारी सं० १६४७ की पुस्तक में शुद्ध नाम विराज है वह हमने प्रयोग में लिया है क्योंकि यहां
पर उसका ही लक्षण मिलता है अर्थात् वह दो लघुगु का होता है और रसावल दो गुलगु का
होता है ॥ घट । मनों । बढ़े । आगें । अग्रे । अग डिगें । नांहि । सोर बग्गे । फरेंके अछगे ।
सगे । तजै । नांम ॥
३४ पाठान्तर-कुंभेयन कंफलं कादं । दंदं मुप । सुभटादं ॥
३५ पाठान्तर-हिंसहिं । हिंसहि । दिपि । पंषिन । गिड्डु । सिड्डु । संघिय । कमंध । परि ।
तिहि उपमान । उपमांना । निकि ग्वालिनोय ॥
३८० पृथ्वीराजरासो । [ आठवां समय १२
भरि बांच कान निक्खि लोच मुठि । दिष्षि षवासति ओट करि ॥
ओडन समेत संनाच षस । सर सुविधि फुट्टिग निकरि ॥
छं० ॥ ५५ ॥ रु० ॥ ३६ ॥
कवित्त ॥ धुक्कत धरनि षवास । कोपि कयमास काज कर ॥
वज्ज्र घात बख्खिबंड । छन्निग तरवारि टोप पर ॥
टोप तुट्टि सिर फुट्टि । सम सुसंनाच चीर छुच्च ॥
बख्खर पख्खर तुट्टि । तुट्टि द्वय खंड परिय जुच्च ॥
जय जया सद्द आकास छुच्च । सुमन सघन उप्पर झरिग ॥
देष्षंत कछर करिबार बर । स्सेन सघन बिंदुंरि उरिग ॥
छं० ॥ ५६ ॥ रु० ॥ ३७ ॥
जहँत देन धर धरन । तहँत बड गुज्जर रामच ॥
तहँ मुंगल रषन समर । संग घत्तिय सिर सामच ॥
तुरखबोंध सिर टोप । फुट्टि छुप्परि रत बुद्धिय ॥
तहां उठंग ढूक बीर । जानि जमराँन सुरुट्टिय ॥
तरवारि तेज नारेन छन्नि । धर असंध तुद्दिग धरट्ट ॥
अनभूत दृस्ट अवसान बढि । करच्चि देव बंदन बरट्ट ॥
छं० ॥ ५७ ॥ रु० ॥ ३८ ॥
कवित्त ॥ जहां अंगद मरदांन । कन्ह तहां जांनि नाग भुच्च ॥
मिल्ले तक्किक तरवार । झारि उब्भारि सीस दुच्च ॥
मेक्विय मांगद्द सीस । टोप कहिय सिर धारिय ॥
नर बांधै झटि कहि । अद्ध अद्धं करि डारिय ॥
३६ पाठान्तर-जहां । बांणीद पठांन । तहं । तहां । दुच्च । चत्रु । भिरि । मिलि क्रोह ।
दिषि ।
३७ पाठान्तर-केमास । बलिचंड । जुट्टि । बषर । पषर । जुट्टि । जुट्टि कैं षंड परिय
जुग्र । जै जया । हुय । दिष्यंत । बिंदुंरि डरिग ।
३८ पाठान्तर-जहांन । जहंन । धरत । तहांत । तहत । गुजर । रांम । तहां । मुंगल ।
रषन । घत्तिय । सांमह । विधि । सेर । बुट्टिय । उठग । ईक । जांनि । यमरांन । जमरांन ।
जुट्टिग । अवसांन ॥
पाठवां समय १३ ] पृथ्वीराजरासो । ३८१
घर गिरत मंत साहू सरद्द । धय पंक्षां असिवर जरिय ।
जै जया सद्द सुरपुर अच्यौ । इम सुकन्द वै धर परिय ॥
छं० ॥ ५८ ॥ रु० ॥ ३९ ॥
कवित्त ॥ कन्द कटत वै धरनि । करनि जित मित सारं सचि
बहै दुग्ध तरवारि । कंहू कवि लप्पटाइ नचि ॥
उडतहि धथ पग न्यार । सीस हक्कारि घर धावहिँ ॥
हंस हंस के मिलहि । माल अच्छारि के नावहिँ ॥
अद्धभूत भयानक भगर सुम । नगर लाग लग्यिय रनच ॥
झंकार चक्र काच कूच सचि । जयं सबद मचिय घनच ॥
छं० ॥ ५९ ॥ रु० ॥ ४० ॥
जयजयकार का उपमान्रों के सहित वर्णन ॥
कवित्त ॥ मुषनि वट्ठि झंकारि । तलव टंकार लाग लगि ॥
वजि भेरी झंकार । धार झंकार पाग पगि ॥
छुहि सीर संकार । लुहि भंडार धीर मुति ॥
धुकाहि धज्ज भंडार । झुकहि संडार सार धुति ॥
अचरिज्ज अवनि संमर चरनि । वरनि कवि कहा सब सक्राय ॥
समरंग दुदछ पिख्खिय सुभट । जकाय कोय दुनकुय चक्राय ॥
छं० ॥ ६० ॥ रु० ॥ ४१ ॥
छंद तोटक* ॥ भ्रमरावति छंदय चंद कहं । पढि पिंगल अच्छिर जे निमखं ॥
बजई झनकार सुझस्स्रिस घनं । धच तुंबर रिक्खिय नाद धुनं ॥
छं० ॥ ६१ ॥
३९ पाठान्तर-जहां । मरदांन । तहां नर नाह कंन्हक । कमकि बाहि पग भ्रट्ट । भारि
उभारि सीस दुम । मेल्हिय । मंगदं । शीश । धारीय । नर नांहे असि कट्टि । यदु अड्डु करि
डारीय । जरिय ॥
४० पाठान्तर-मार मचि । उड़हि । हक्कहि । अछरि । भयानक । लगिय । जय ॥
४१ पाठान्तर-बढि । धंज ॥
३८२ पृथ्वीराजरासो । [ आठवां समय १४
झननं कढ़ि षग्ग कला दुसरी । प्रगटे जनु बिज्ज घणं पसरी ॥
उपमा निसरी असि बैठि चयं । फिर नागनि नाग सनौं भचयं ॥
छंदं० ॥ ६२ ॥
जु करै दल दोइय तीर मरं । वच्चै जनु टिड्डिय खेत परं ॥
दुतिई उपमा कवि यौं मनयी । किय अंगन चंद निसा जगयी ॥
छंदं० ॥ ६३ ॥
जु चहं चह चंबक बञ्जि घनं । कि नचै उपमा अग ईस जनं ॥
जु फिरै गज गुंजत रोस चढ़ं । षग्ग बहन्न जानि किवाइ बढ़ं ॥
छंदं० ॥ ६४ ॥
किस्सु रोपिय झुंडय सूर रनं । कि सुभै सुवसंत षजूरि जनं ॥
जुबरै बरनो घन अच्छ वरं । खुलरै चिय चांपि विपिट्ठ करं ॥
छंदं० ॥ ६५ ॥ रू० ॥ ४५ ॥
जु बहै सिर उप्पर राम सरं । सु मनौं अरिविंदन स्रौंर अरं ॥
गज सीस सिरीन जु छिंक परी । कच अंगन इंद वधू बिथुरी ॥
छंदं० ६६ ॥ रू० ॥ ४६ ॥
कुटि चक्र लगे गज कुंभ जिसे । मनु बह्वल पै सतू चंद जिसे ॥
दुअ छद्य गुरु जन सीस जरो । दधि भाजन ग्वालिन कोरि घरी ॥
छंदं० ॥ ६७ ॥ रू० ॥ ४७ ॥
जु कियौ दल दोडन दुंद जुधं । मिलअंत सुझंषिन दिष्षि उधं ॥
बिसयौ दल मुंगल मार मरं । बढिई प्रथिराज नरिंद कुरं' ॥
छंदं० ॥ ६८ ॥ रू० ॥ ४२ ॥
४२ पांठान्तर- * इस छंद का नाम इतर पुस्तकों में भ्रमरावली लिखा है सो अशुद्ध है
किन्तु वह तोटक वा त्रोटक नामक है-इनमें इतना ही अंतर है कि तोटक चार ललगु का होता
है और भ्रमरावली पांच का ॥ अच्छिर । बजी । रिभिय ॥ ६१ ॥ फिरै । नागसि । मनौं ॥ ६२ ॥
तीरन मार । वहै । अपार ॥ दुती उपमा कवि यौं मन लगि । कि अंगन चंद्र निसा महि जगिग
॥ ६३ ॥ चहं चहं । चढंत । जांनि । बढंत ॥ ६४ ॥ कि रोपिय । अच्छ ॥ ६५ ॥ उपर । मनो ॥ ६६ ॥
मनो । हथ । गुरजन ॥ ६७ ॥ सुजुद्धु । मिलंत । रंषिनि । दिषिय । उड्डु । षिस्यौ । मरोर । बढी ।
नरिंदह । कोर ॥ ६८ ॥