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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 384, कुल 470 में से

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पृष्ठ 384

३७४ | पृथ्वीराजरासो । | [ सातवां समय ६
कवन षत्त कूह तत्त । मत्त बंधौ अरि गेहं
मक्खिम जुद्ध चिन मुझ्झ । करे नह सेष रनेहं ॥
बुल्लाइ अप्प भर अप्प सँग । चढि चल्यौ निसि चय्य सह ॥
पत्तौ सुजाइ तिन ठाम तब । सुष्ष सयन सोमेस सह ॥
छंदं ॥ २७ ॥ छ० ॥ १४ ॥
पृथ्वीराज का पिता के पास पहुंच कर सब सेना को सोते
हुए पाना और सोमेस का उससे न बोलना ॥
गाथा ॥ पत्तौ पहु ढिग तातं । दिष्यौ सोतय्य सब्ब सेनायं ॥
न बुल्यौ सोमेसं । पृथिराजं मिष्टयं बैनं ॥ छं० ॥ २८ ॥ रू० ॥ १५ ॥
उसका पिता को निद्रा में और शत्रु की सेना को
देख भाल कर उत्तापित होना ॥
अरिल्ल ॥ मच्चा तेज तन जग्गिय बीरं । तात दिषि निद्रा घन श्रीरं ॥
पहिलोइ अरि सेन सँपत्तिय । ज्यौं अरियं घन बीज पिवत्तिये ॥
छं० ॥ २९ ॥ रू० ॥ १६ ॥
और उस का शत्रु की सेना पर झपटना ॥
दूहा ॥ सयन कुंडि पति सयन सैं। झपल्लौ इन उन मान ॥
खीनर तीतर देखि कै । झपत्यौ जानि सिचांन ॥ छं० ॥ ३० ॥ ६० ॥ १७ ॥
पृथ्वीराज और मुद्दलराय का युद्ध ॥
कवित्त ॥ जनु कि सिंघ बण गज्जि । झपटि करि करनि जुथ्य पर ॥
जनु कि अंजनिस जात । पात दनु दिषि बुध्यबर ॥
जनु कि भीम भीमंडा । दंत हंतीय उखारन ॥
१४ पाठान्तर-सुन्या । पावक । करे । बुलाय । अप । आप संग । चल्यौ । निशि । ब्यमह । पत्तौ । ठांम सुप्र । सेंन । सोमेस जहां ॥
१५ पाठान्तर-सो सब्ज सच्छ सेनायं । तथ । सब । नहं । बुल्यौ । पृथीराजं ॥
१६ पाठान्तर-बीर । दिषि । निंद्रा घट श्रीर । पहिलौ । अरि । संपतिय संपत्तिय । पिवंत्तिय ॥
१७ पाठान्तर-सेंन कुंडि पति सेंन सो । उनमांन । लीनेर । जांनि ।