पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 392, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें३८२ पृथ्वीराजरासो । [ आठवां समय १४
झननं कढ़ि षग्ग कला दुसरी । प्रगटे जनु बिज्ज घणं पसरी ॥
उपमा निसरी असि बैठि चयं । फिर नागनि नाग सनौं भचयं ॥
छंदं० ॥ ६२ ॥
जु करै दल दोइय तीर मरं । वच्चै जनु टिड्डिय खेत परं ॥
दुतिई उपमा कवि यौं मनयी । किय अंगन चंद निसा जगयी ॥
छंदं० ॥ ६३ ॥
जु चहं चह चंबक बञ्जि घनं । कि नचै उपमा अग ईस जनं ॥
जु फिरै गज गुंजत रोस चढ़ं । षग्ग बहन्न जानि किवाइ बढ़ं ॥
छंदं० ॥ ६४ ॥
किस्सु रोपिय झुंडय सूर रनं । कि सुभै सुवसंत षजूरि जनं ॥
जुबरै बरनो घन अच्छ वरं । खुलरै चिय चांपि विपिट्ठ करं ॥
छंदं० ॥ ६५ ॥ रू० ॥ ४५ ॥
जु बहै सिर उप्पर राम सरं । सु मनौं अरिविंदन स्रौंर अरं ॥
गज सीस सिरीन जु छिंक परी । कच अंगन इंद वधू बिथुरी ॥
छंदं० ६६ ॥ रू० ॥ ४६ ॥
कुटि चक्र लगे गज कुंभ जिसे । मनु बह्वल पै सतू चंद जिसे ॥
दुअ छद्य गुरु जन सीस जरो । दधि भाजन ग्वालिन कोरि घरी ॥
छंदं० ॥ ६७ ॥ रू० ॥ ४७ ॥
जु कियौ दल दोडन दुंद जुधं । मिलअंत सुझंषिन दिष्षि उधं ॥
बिसयौ दल मुंगल मार मरं । बढिई प्रथिराज नरिंद कुरं' ॥
छंदं० ॥ ६८ ॥ रू० ॥ ४२ ॥
४२ पांठान्तर- * इस छंद का नाम इतर पुस्तकों में भ्रमरावली लिखा है सो अशुद्ध है
किन्तु वह तोटक वा त्रोटक नामक है-इनमें इतना ही अंतर है कि तोटक चार ललगु का होता
है और भ्रमरावली पांच का ॥ अच्छिर । बजी । रिभिय ॥ ६१ ॥ फिरै । नागसि । मनौं ॥ ६२ ॥
तीरन मार । वहै । अपार ॥ दुती उपमा कवि यौं मन लगि । कि अंगन चंद्र निसा महि जगिग
॥ ६३ ॥ चहं चहं । चढंत । जांनि । बढंत ॥ ६४ ॥ कि रोपिय । अच्छ ॥ ६५ ॥ उपर । मनो ॥ ६६ ॥
मनो । हथ । गुरजन ॥ ६७ ॥ सुजुद्धु । मिलंत । रंषिनि । दिषिय । उड्डु । षिस्यौ । मरोर । बढी ।
नरिंदह । कोर ॥ ६८ ॥