पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 391, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाठवां समय १३ ] पृथ्वीराजरासो । ३८१
घर गिरत मंत साहू सरद्द । धय पंक्षां असिवर जरिय ।
जै जया सद्द सुरपुर अच्यौ । इम सुकन्द वै धर परिय ॥
छं० ॥ ५८ ॥ रु० ॥ ३९ ॥
कवित्त ॥ कन्द कटत वै धरनि । करनि जित मित सारं सचि
बहै दुग्ध तरवारि । कंहू कवि लप्पटाइ नचि ॥
उडतहि धथ पग न्यार । सीस हक्कारि घर धावहिँ ॥
हंस हंस के मिलहि । माल अच्छारि के नावहिँ ॥
अद्धभूत भयानक भगर सुम । नगर लाग लग्यिय रनच ॥
झंकार चक्र काच कूच सचि । जयं सबद मचिय घनच ॥
छं० ॥ ५९ ॥ रु० ॥ ४० ॥
जयजयकार का उपमान्रों के सहित वर्णन ॥
कवित्त ॥ मुषनि वट्ठि झंकारि । तलव टंकार लाग लगि ॥
वजि भेरी झंकार । धार झंकार पाग पगि ॥
छुहि सीर संकार । लुहि भंडार धीर मुति ॥
धुकाहि धज्ज भंडार । झुकहि संडार सार धुति ॥
अचरिज्ज अवनि संमर चरनि । वरनि कवि कहा सब सक्राय ॥
समरंग दुदछ पिख्खिय सुभट । जकाय कोय दुनकुय चक्राय ॥
छं० ॥ ६० ॥ रु० ॥ ४१ ॥
छंद तोटक* ॥ भ्रमरावति छंदय चंद कहं । पढि पिंगल अच्छिर जे निमखं ॥
बजई झनकार सुझस्स्रिस घनं । धच तुंबर रिक्खिय नाद धुनं ॥
छं० ॥ ६१ ॥
३९ पाठान्तर-जहां । मरदांन । तहां नर नाह कंन्हक । कमकि बाहि पग भ्रट्ट । भारि
उभारि सीस दुम । मेल्हिय । मंगदं । शीश । धारीय । नर नांहे असि कट्टि । यदु अड्डु करि
डारीय । जरिय ॥
४० पाठान्तर-मार मचि । उड़हि । हक्कहि । अछरि । भयानक । लगिय । जय ॥
४१ पाठान्तर-बढि । धंज ॥