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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 383

आठवां समय ४] पृथ्वीराजरासो । ३०३
मुद्दलराय का पत्तोत्तर देकर सोमेस्वर और पृथ्वीराज
दोनो से लड़ाई मांगना ॥
साटक ॥ स्वस्ति श्री सउमेस राजन बरं । प्रिथ्राज राजं बरं ॥
तो पत्तं सुनि अन्न कग्गद बरं । पल्यंज आकृतयं ॥
जाजा भंजन सेन साहस रने । प्रातं प्रतं जुद्धयं ॥
नां किज्जै तिन टाम पचिय घरं । छिभ्या किमा कामनं ॥
छं० ॥ २४ ॥ रु० ॥ ११ ॥
सोमेस्वर का अपने लड़के के बध के विषय में संशय करना ॥
दूहा ॥ सिसु संसौ सम्ही फिख्यौ । उभय काम बध बीर ॥
जौ मुक्कै चिय अधम छत । तौ दल सद्धि सरीर ॥
॥छं० २५ ॥ रु० ॥ १२ ॥
और पृथिराज के पास मुद्दलराय के पत्र का संदेसा
भेजना और उसका रोस में आकर पिता के
पास रण में आ मिलना ॥
कवित्त ॥ छह भग्गा तिय पुच्छ । तात मुक्यौ संदेसं ॥
अरिन सयन संमुद्धौ । जुद्ध मंगन अंदेसं ॥
बाल कठिन कर ग्रह्यौ । भ्रम रखन पित कागर ॥
जु कछु अग्ग संभवै । सोइ किज्जै सुमंत नर ॥
चढि बाल वियोगन कंत अप । सो निस रख्यै राज सिसु ॥
सामंत दोह भय प्रात बर । चढि चल्ल्यौ संग्राम किसु ॥
छं० ॥ २६ ॥ रु० ॥ १३ ॥
कवित्त ॥ सुन्यौ राज प्रथिराज । तात मुक्यौ संदेसं ॥
भयौ रोस जाजुल्य । तुल्य पावक सुमिसं ॥
११ पाठान्तर-स्वस्तश्रो । सोमेस । प्रथीराज । प्रथिराज । तो । श्रवन । पलपंच । पल्यंन ।
प्रात । प्रातं । नां । किजै । ठाम । पिञ्जिय । छिमया ॥
१२ पाठान्तर-दोहरा । संह्री । पर्यौ । उभै । मुकै ॥
१३ पाठान्तर-भगा । पुछ । पुद्धि । मुक्यो । संदेस । अरिय । सैनं । अंदेस । रखन । यु ।
आप । निशि । रख्यो । राजें । सामंत । राज बर । चढे । चल्पो । संगाम ॥