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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 376, कुल 470 में से

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पृष्ठ 376

३६६ पृथ्वीराजरासो । [ सातवां समय ३८
नाहरराय का कहना कि आपके काम में सीस देने के
सिवाय और कुछ देने के योग्य हम नहीं हैं ॥
दूहा ॥ नाहर बोलू नरिंद कहि । का तुम जोग जगीस ।
और देन हम है कहा । काम सीस हम ईस ॥
छंद० ॥ १७८ ॥ रु० ॥ ११३ ॥
नाहरराय की कन्या का गुण और रूप वर्णन ॥
साटक ॥ तन्जे स्याम सुरंग वाम तनयं, मन्मध्य वल्ली कळा ।
सुषं धामय तेज दीपक कळा, तारुन्य लच्छी ग्रहा ॥
रूपं रंजित मंजु माल कळया, वासंत पंचावली ।
श्रवं लक्कन काम धीरज गुणै, धन्यौ दुती दंपती ॥
छंद० ॥ १८० ॥ रु० ११४ ॥
पृथ्वीराज का जीतकर स्त्री के साथ लौटना ॥
कवित्त ॥ संभारि बैरन जीत । पीर चालुक्क काम बच ॥
उभै जोध खो जितै । जोरू कर बत्त कालि कल ।
बीर निसानति सग्ग । बगिग आनन्द निसानं ॥
प्रान चेत बर बीर । चक्र्यौ संभरि दिसि थानं ॥
अर विब्भर खग्ग मग गय गएय । रचिय तिम्मगत जुद्ध इक्छ ॥
काकंक कोटि भंजै विषछ । सुबर बीर बीरछ जु पुछ ॥
छंद० ॥ १८१ ॥ रु० ॥ ११५ ॥
अरिल्ल ॥ लै तरुनी डोला चढि राजं । डोला लंगरिरारु बिराजं ॥
धन रंगा तोर त्तिय धन्यं । जिन रख्यौ जीवत नृप मन्यं ॥
छंद० ॥ १८२ ॥ रु० ॥ ११६ ॥
११३ पाठान्तर—नाहरराव । नाहरराय । कहा । देन । और । दैन । है । कांम ॥
११४ पाठान्तर-तन्मं । स्यामं । वांम । मनमथ । वाली । सुषं । लछी । गृहा । पचावली ।
श्रवं । लक्षन । कांम । गुनै ॥
११५ पाठान्तर-रिन । जोत । करवत । कालिकल । निसानं । बगिग । निसानं । थानं ।
विप्भर । अगमगह गइय । तिम । भंजे । एच्छ ॥
११६ पाठान्तर-लंगरीराय । धनि लंगा तोर तीय धन्यं । जीवित । मंन्यं ॥