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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 382, कुल 470 में से

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पृष्ठ 382

३०२ पृथ्‍वीराजरासो। आठवां समय ४]
यात्रा के समय अच्छे शगुन मिलने ॥
दूहा ॥ प्रथम प्रयानच सुंदरी । मिली अंक लिय बाल ॥
पीतांबर अंबर धरै । दीप जोति रचि थाल ॥
छंद० ॥ १८ ॥ रु० ॥ ७ ॥
दूहा ॥ कलस कामिनी इक्क सिर। प्रात होत नृप पिख्ख ॥
मच्छ कंध काछार करि । खुर धुनि बाहम इक्ख ॥
छंद० ॥ १९ ॥ रु० ॥ ८ ॥
दूहा ॥ अन्य सगुन सुभ पिख्खि सब । गुंज गचर नीसान ॥
तमचर कर उज्जल्ल अवनि । प्रगटे पुब्ब दिसान ॥
छंद० ॥ २० ॥ रु० ॥ ९ ॥
पृथ्‍वीराज को राज्य में छोड़कर सोमेश्वर का मेवात
पर चढ़ाई करना और उसकी सूचना पत्र
द्वारा मुङ्गदलराय को दे कहना कि
लड़े वा दंड दे आधीन हो ॥
छंद भुजंगी ॥ चल्यौ चंपि सोमेस मेवात थानं । रच्यौ राज प्रिथराज गेहं निधानं ॥
फटी फौज बैरीन की झाल दिक्खी । तबै कग्गदं प्रेषराजं विसख्खी ॥ छंद० ॥ २१ ॥
वरं बीर धीरं मछा बैर पुत्त्रं । मगै राज सोमेस सौं जुद्ध अब्बं ॥
मछा तेज जाजुल्य भारी सुषग्गं । करै बैर सारथ्थ पारथ्थ जग्गं ॥ छंद० ॥ २२ ॥
इसौ सूर सोमेस दीपौ म्लानं । दियं कग्गदं मुंगलं राजथानं ॥
करो छेय छेयं किधौ अप्पि दंडं । तजौ आज पच्छै षगं षंडि कुंडं ॥
छंद० ॥ २३ ॥ रु० ॥ १० ॥
७ पाठान्तर-पयानह । प्रयांनह । लियें । पीतंबर ॥
८ पाठान्तर-एक शिर । पिषि । मल्ल । वामस ॥
९ पाठान्तर-सुभुन सब । निसांन । उजल । प्रगटी । दिसांन ॥
१० पाठान्तर-मेवात । प्रिथिराज । प्रिथिराज । गेहं । निधानं । दीषी । तबैं । विसषी ॥ २१ ॥
मगैं । युद्ध । अंब्बं । भारी सुजाजुल्य षग्गं । सारथ पारथ ॥ २२ ॥ इसो । मेला नं । दीयौ । पक्के ।
कुंडि ॥ २३ ॥