पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 387, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवां [समय ६ ] पृथ्वीराजरासो । ३७७
वजे ताल कालं मच्च मल्ल वीरं । दुहुं बांच लेना विहंडं सुधीरं ॥ छं० ॥३७॥
गढी बाग गट्टी कढे लोच तत्ते । मनौ कारनं काम दुर्गा विरत्ते ॥
स्वयं सूर सूरं मची में पचारैं । लगैं लोच अंगं वकै मार मारैं ॥ छं० ॥३८॥
उडै छिंछ स्त्रगं मनौ अग्नि ज्वाला । चलै जानि पत्तं बसंतं तमाला ॥
हिनंकैति कोति पग्गं चिनंकैति ताजी । भिल्लै भूप भूपं मच्चा वीर गाजी ॥छं० ३९॥
छिनकैति पग्गं तुरैं सीस लच्छै । उठै छिंछ इच्छं मनो दाव पच्छै ॥
लगैं गुर्ज सीसं इसे टोप तुट्टैं । मनो दंग दाईं लगै बंस फुट्टैं ॥ छं०॥४०॥
इसे मंच ऋची लगे नाग पग्गे । प्रलै काल प्याखं मनौ वीर जग्गे ॥
छं० ॥ ४१ ॥ रू० ॥ २४ ॥
मुङ्गलराय की फौज का तितर बितर होना और
उसका पकड़ा जाना ॥
कवित्त ॥ कहुँ तिसत्त धर धुकत । लुक्त कहुँ सुभट घात छत्त ॥
ढुकत काल कँहु पच । कुकन कहुं सेन पाडू जल ॥
रुक्त समर भट भीर । धुकत धर मह कक्क जनु ॥
सुक्त कंठ श्रम समर । ढुकत कातर फौजन तनु ॥
इस सोमेस राइ चहुंवान सुअ । अरि समुंद जनु बद्धयौ ॥
चढ्ढिय जिहाज जस जट्ठि पत्त । मुंगल मचि गहि कढ्ढयौ ॥
छं० ॥ ४२ ॥ रु० ॥ २५ ॥
कवि का सोमेस्वर की सेना और घोड़े हाथी आदि की
यज्ञादि अनेक उपमाओं के साथ प्रशंसा करना ॥
दूहा ॥ चमकत सार सनाह पर, हय गय नरभर लग्गि ॥
मनौ इच्छ परि भिंगिनिय, करत केलि निसि जग्गि छं० ॥४३॥ रु०॥२६॥
२४ पाठान्तर—दुहूं । वाह ॥ ३७ ॥ गढी । मनौं । काम । दुगा । महोमे । महोमैं । पचारै ।
लगै । बकै । मारै ॥ ३८ ॥ छिंद्छि । अंगं । संगं । मनौ । ज्वाल माला । सावंतंत माला । भानकैति ।
हिनंकेति । भिल्लै । * सं० १६४७ की पुस्तक में नहीं हैं ॥ ३९ ॥ भिन्नकैति । तुटै । शीश । लल्ले ।
उठै । इच्छं । मनौं । फल्ले । लगै । लगैं । शीशं । टुटै । मनौ । लगै । फुट्टे ॥ ४० ॥ मंत । पिल्ली । मानों । वीर ॥
२५ पाठान्तर-कहुं । तमंत । तमंत्त । कहुं । कहु । यात्त । टुकत । कहुं । कहु । सेंन ।
मद । ढुकत । तन । * अधिक पाठ है । राय । चहुवांन । चढिय । मुंगल्ल ॥
२६ पाठान्तर-निर । भिंगनां । निशि ॥
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