पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 381, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरतार छय्य पग दान दोइ । धन सह गर्व जिन करौ कोइ ॥ कं० ॥ १० ॥
अनसंक कंक सम बंक धीर । तिहि दान दंड सो जुद्ध श्रीर ॥
प्रज्जरिग सोम सुनि श्रवन दूत। जिहि गेह पिथ्थ अवतार भूत ॥ कं० ॥ ११ ॥
बुल्लाइ सूर सामंत राज । दुय घटी सुहूरत सधौ आज ॥
मेवात मही ऊजारि जारि । पुर ग्राम नैर दीजै प्रजारि ॥ कं० ॥ १२ ॥
पन खोदि बंक गढ ढाचि होहिं । इम करिय भूमि मैवात लेहिं ॥
कित्तीक सहिप मुंगल नरेस । वन बंधि संधि बिन करि अभेस ॥ कं० ॥ १३॥
पज्जन बोलि कूरंभ राव । पुंडीर चंद जनु अग्नि वाव ॥
दाहिम नरिंद कैमास संग । चामंड गव अरि दन्त अभंग ॥ कूं० ॥ १४ ॥
गुज्जर कनं क बड़ राम देव । गहिलेोत राव गोइंद खेव ॥
इतने सुभट सजि जूझ धार । वजि पंच सबद वाजे करार ॥ कं० । १५ ॥ रु०॥ ४॥
ज्योतिषियों से मुहूर्त दिखोवार पुष्य नक्षत्र से चढ़ाई
के लिये निकलना ॥
दूहा ॥ बोलिय जोतिग गनिक दुज । परी मुहूरत सद्द ॥
तेरसि पुष्य रु भ्रगु दसा । चढि चल्ले निसि अद्ध ॥ कं० ॥ १६ ॥ रु० ॥ ५ ॥
घर की रक्षा के लिये पृथ्वीराज को घर पर छोड़ा ॥
दूहा ॥ रत्तजु इह विधि गेह भय । सुनि सोमेस सुभाल ॥
सिसु रख्खि रु संगृह्ही वछौ । मुंभत दिसा विसाल ॥कं० ॥ १७ ॥ रु० ॥ ६॥
४ पाठान्तर-पिथ । मुंगल । नरिंद । पजरिग । प्रज्जरिंग । रोम । मेद्वात । सुपग ।
उछ्रवत्त । कठी ॥ ४ ॥ सूलित उलटी । शीत ॥ ५ ॥ व्यांल । मुख । मुंष । दुःद । दुष ॥ ६ ॥ नांम ।
छित्री । मुःप । चाहुश्रांत । चाहुश्रांत । मक्त । होत । होस । आंन ॥ ७ ॥ पाय । तिहिं । दंड मेा
भंडार वर सस्त्र पांति । निदान ॥ ८ ॥ बुलिक प्रवीन । पहिराय । पछ । आप । हीय । लगि ।
पाय ॥ ९ ॥ कायध प्रमांन । चहुवान । भांनं । हय । दांत । दोय । मदहिं । कोय ॥ १० ॥ तिहिं
दांन । प्रजरिग । जि.हिं । गेह । पिथ ॥ ११ ॥ बोलाय । दुग्र । महूरत । उजारि । यांम । नयर
१२ ॥ पनि । करिय । करितु । मेवात । कित्तक । सुभूंम ॥ १३ ॥ पजूं । जनुं । चामंडराव ।
॥ जर । रामदेव । गोयंद । भट ॥ १५ ॥
५ पाठान्तर-बोलिय । धरी । पुरूष । भृगु दशा । चले । निशि ॥
६ पाठान्तर-रति यु विधि इह येह भय । रषे संगृह । दिशा विशाल ॥