पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 379, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ सेवाती मुंगल कथा लिख्यते ॥
❖
( आठवां खण्ड । )
—:-o-:-—
सोमेश्वर के मंडोवर जीतने और लूट को सरदारों में
बांट कर प्रबल प्रताप के साथ राज्य
करने का वर्णन ॥
कवित्त ॥ सुभसि देस सोमेस । पेस मैवास महीपन ॥
सुभट यह संघट्ट । दिठ्ठि कुँवरं किय जीपन ॥
मंडोवर परिहार । मारि उज्जारि जेर किय ॥
सामतंन सस रंग । लच्छि लब्भी सुवंटि दिय ॥
दिन दसा देस दरबार दुति । दान जग्ग रत्ता रचै ॥
पहु प्रबल पारि पच्छारि करि । अदट दह जगवनि गरै ॥
छं० ॥ १ ॥ रू० ॥ १ ॥
सोमेश्वर के गुणों और उसकी गुणग्राहकता का वर्णन ॥
कवित्त ॥ अरिद्द दंड बल संड । गर्भ गर्भन डर कंडहि ॥
सगपन एक पग चास । पञ्चक सेवा सिर मंडहि ॥
दुजनि देव गुरु गाहू । पाइ पुज्जियहि निरंतर ॥
पंडित गुनी गुनग्य । द्रव्य चै वञ्चहि दिसंतर ॥
दरबार भीर सुभटन घटन । कला कवित्त नाटिक्क नटहि ॥
छत्तीस राग रागनि रसनि । तंत ताल कंठन ठटहि ॥
छं० ॥ २ ॥ रू० ॥ २ ॥
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━
१ पाठान्तर-सुभट्ट । दिट्ठ । कुअ्रं । कुंवरं । जिप्पन । उजारि । लछि । लभि । लभी । लीय ।
दांन । पछारी । हन ॥
२ पाठान्तर-कंडह । दुजन । गाई । गाय । पाय । पुजहि । पुजियहि । रागन । रसन ।
तंत ताठ ॥