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सर्वकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 390, कुल 470 में से

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पृष्ठ 390

३८० पृथ्वीराजरासो । [ आठवां समय १२
भरि बांच कान निक्खि लोच मुठि । दिष्षि षवासति ओट करि ॥
ओडन समेत संनाच षस । सर सुविधि फुट्टिग निकरि ॥
छं० ॥ ५५ ॥ रु० ॥ ३६ ॥
कवित्त ॥ धुक्कत धरनि षवास । कोपि कयमास काज कर ॥
वज्ज्र घात बख्खिबंड । छन्निग तरवारि टोप पर ॥
टोप तुट्टि सिर फुट्टि । सम सुसंनाच चीर छुच्च ॥
बख्खर पख्खर तुट्टि । तुट्टि द्वय खंड परिय जुच्च ॥
जय जया सद्द आकास छुच्च । सुमन सघन उप्पर झरिग ॥
देष्षंत कछर करिबार बर । स्सेन सघन बिंदुंरि उरिग ॥
छं० ॥ ५६ ॥ रु० ॥ ३७ ॥
जहँत देन धर धरन । तहँत बड गुज्जर रामच ॥
तहँ मुंगल रषन समर । संग घत्तिय सिर सामच ॥
तुरखबोंध सिर टोप । फुट्टि छुप्परि रत बुद्धिय ॥
तहां उठंग ढूक बीर । जानि जमराँन सुरुट्टिय ॥
तरवारि तेज नारेन छन्नि । धर असंध तुद्दिग धरट्ट ॥
अनभूत दृस्ट अवसान बढि । करच्चि देव बंदन बरट्ट ॥
छं० ॥ ५७ ॥ रु० ॥ ३८ ॥
कवित्त ॥ जहां अंगद मरदांन । कन्ह तहां जांनि नाग भुच्च ॥
मिल्ले तक्किक तरवार । झारि उब्भारि सीस दुच्च ॥
मेक्विय मांगद्द सीस । टोप कहिय सिर धारिय ॥
नर बांधै झटि कहि । अद्ध अद्धं करि डारिय ॥
३६ पाठान्तर-जहां । बांणीद पठांन । तहं । तहां । दुच्च । चत्रु । भिरि । मिलि क्रोह ।
दिषि ।
३७ पाठान्तर-केमास । बलिचंड । जुट्टि । बषर । पषर । जुट्टि । जुट्टि कैं षंड परिय
जुग्र । जै जया । हुय । दिष्यंत । बिंदुंरि डरिग ।
३८ पाठान्तर-जहांन । जहंन । धरत । तहांत । तहत । गुजर । रांम । तहां । मुंगल ।
रषन । घत्तिय । सांमह । विधि । सेर । बुट्टिय । उठग । ईक । जांनि । यमरांन । जमरांन ।
जुट्टिग । अवसांन ॥