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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

( 46 )
महाराज एव महाराजः । यावदिदानीं मैथिलीं पश्यामि ।
अवदातिका--भट्टिनी ! भर्तृदारकः खल्वागच्छति । नापनीतं
वल्कलम् ?
रामः--मैथिलि ! किमास्यते ?
सीता--हम् आर्यपुत्र । जयत्वार्यपुत्रः ।
रामः--मैथिलि ! आस्यताम् । (उपविशति)
सीता--यद् आर्यपुत्र आज्ञापयति । (उपविशति)
अवदातिका--भट्टिनी ! स एव भर्तृदारकस्य वेषः ।
अलीकमिवतद् भवेत् ।
सीता--तादृशो जनोऽलीकं न मन्त्रयते । अथवा बहुवृत्तान्तानि
राजकुलानि नाम ।
रामः--मैथिलि ! किमिदं कथ्यते ।
सीता--न खलु किञ्चित् । इयं दारिका भणति-अभिषेकोऽभिषेक
इति ।
रामः--अवगच्छामि ते कौतूहलम् । अस्त्यभिषेकः । श्रूयताम् ।
अद्यास्मि महाराजेनोपाध्यायामात्यप्रकृतिजनसमक्षमेकप्रकारं
संक्षिप्तं कोसलराज्यं कृत्वा बाल्याभ्यस्तमङ्कमारोप्य मातृगोत्रं
स्निग्धमाभाष्य “पुत्र राम ! प्रतिगृह्यतां राज्यम्” इत्युक्तः ।
सीता--तदानीमार्यपुत्रेण किं भणितम् ?
रामः--मैथिलि ! त्वं तावत् किं तर्कयसि ?
सीता--तर्कयाम्यपुत्रेणाभणित्वा किञ्चिद् दीर्घं निःश्वस्य
महाराजस्य पादमूलयोः पतितमिति ।
रामः--सुष्ठु तर्कितम् । अस्य तुल्यशीलानि द्वन्द्वानि सृज्यन्ते । तत्र
हि पादयोरस्मि पतितः ।
मम बाष्पेण पतता तस्योपरि ममाप्यधः ।
पितुम् क्लेदितौ पादौ ममापि क्लेदितं शिरः ॥ (६)
सीता--ततस्ततः ।
रामः--ततोऽप्रतिगृह्यमाणेऽप्यनुनये ऽप्यात्मनजरादोषैः स्वैः प्राणैरस्मि
शापितः ।

( 47 )

शब्दार्थ-लङ्घिते = आरूढ होने पर । स्कन्धोच्चारण = कंधो तक ऊंचा उठा
कर । नम्यमानवदन = घड़ो के मुख को झुका कर । प्रच्योतितोये = जल को
गिराने पर । विसर्जिते = विदा करने पर । विस्मितः = आश्चर्यचकित ।
विस्मयः-आश्चर्य । अपनीतभारोच्छ्वसितम् = बोझ के उतर जाने से हल्का ।
दिष्ट्या = सौभाग्य से (यह शब्द अव्यय है) । मैथिलीम् = सीता को । आस्यते =
बैठी हुई हो । अलीक = मिथ्या । दारिका = लडकी । अवगच्छामि = समझता
हूं । कौतूहलम् = उत्सुकता को । प्रकृतिजन = प्रजा के प्रमुख लोग । बाल्या-
भ्यस्त = शैशव से परिचित । अङ्कम् आरोप्य = गोद मे बैठा कर । मातृ-
गोत्र = माता के नाम से अर्थात् कौसल्यानन्दन कह कर । स्निग्धं = प्रेमपूर्वक ।
आभाष्य = बोलकर । प्रतिगृह्यताम् = स्वीकार करो । तदानीम् = तब । आर्य-
पुत्रेण = पतिदेव के द्वारा । तर्कयसि = अनुमान करती हो । अभणित्वा =
नही बोल कर । पादमूलयोः = दोनो पात्नो पर । सुष्ठु = ठीक । तुल्यशीलानि =
समान स्वभाव वाले । द्वन्द्वानि = स्त्री-पुरुषो के युगल । सृज्यन्ते = बनाए जाते
हैं । समम् = एक साथ । वाष्पेण = आसुओ से । क्लेदितौ = गीले हो गए ।
अन्वय-पटहे आरब्धे, गुरुजने स्थिते भद्रासने लङ्घिते, घटे स्कन्धो-
च्चारणनम्यमानवदनप्रच्योतितोये, राज्ञा आहूय, विसर्जिते मयि, जनः मे धैर्येण
विस्मय । भो., यदि स्वः पुत्र. पितुः वचः कुरुते, तत्र कः विस्मय. । (५)
अन्वय-समम्, तस्य बाष्पेण ममोपरि पतता, मम अधः पतता, मम
शिरः क्लेदितम्, मे पितुः पादौ क्लेदितौ च । (६)
हिन्दी अर्थ
(राम का प्रवेश)
राम-ओह,
बाजे बजने लगे थे । गुरुजन वहाँ पर उपस्थित थे । मै सिहासन पर
समासीन था । तीर्थों के जल से भरे हुए मगल कलशो को उठाकर
मेरा अभिषेक किया जा रहा था । इतना हो जाने पर भी महाराजा ने
मुझे बुलाकर बिदा कर दिया । इस स्थिति मे मेरी दृढ़ता पर लोग
आश्चर्य मे हो गए । किन्तु अपना पुत्र यदि पिता की आज्ञा को पालता
है, तो इसमे आश्चर्य की क्या बात है ? (५)
"पुत्र, इस समय राज्याभिषेक को रहने दो" इस प्रकार स्वयं महाराजा
से बिदा प्राप्त कर, अपने भार का उतरा समझ कर मेरा मन छुटकारे

( 48 )
की साँस ले रहा है। सौभाग्य से मैं वही राम हूँ और महाराज, महा-
राज ही है। तो फिर अब सीता से मिल लूँ।
अवदातिका - महारानी, ये राजकुमार आ रहे हैं। आपने तो वल्कल
नहीं उतारा।
राम - सीते, क्या बैठी हुई हो ?
सीता - ऐ, पतिदेव हैं। पतिदेव की जय हो।
राम - सीते, बैठो। (बैठते हैं)
सीता - जो आज्ञा। (बैठ जाती है)
अवदातिका - महारानी, राजकुमार का वेश तो अभी भी वही है। - वह बात
झूठी सी लगती है।
सीता - वैसे आदमी झूठी खबर नहीं फैलाते। अथवा राजपरिवारों में अनेको
घटनाएं होती रहती हैं।
राम - हे सीते, यह क्या कह रही हो ?
सीता - कुछ नहीं। यह लड़की अभिषेक-अभिषेक कह रही थी।
राम - मैं तुम्हारी उत्कण्ठा समझ रहा हूँ। हां, आज अभिषेक था। सुनो।
आज पिताजी ने आचार्य, मन्त्री, पुरवासीगण, सभी की उपस्थिति
में एक प्रकार से छोटा सा दरबार लगा कर, मुझे बाल्यावस्था
से परिचित अपनी गोद में बैठा कर, बड़ी ममता से "कौशल्या नन्दन"
के नाम से बुला कर कहा-बेटा, यह राज्यभार स्वीकार करो।
सीता - इस पर आपने क्या कहा ?
राम - सीते, तुम इस पर क्या अनुमान करती हो ?
सीता - मेरा विचार है कि उस समय आप बिना कुछ बोले ही लम्बी सांस
लेकर महाराज के चरणों पर गिर गए होगे।
राम - ठीक सोचा। विधाता एक जैसे विचार वाले जोड़े कम ही बनाता है।
मैं सचमुच उनके चरणों मे जा गिरा। उस समय मेरी और पिताजी
की आंखें एक साथ भर आईं। उनके आसुओ से मेरा सिर और मेरे
अश्रुजल से उनके चरण कमल भीग गए।
सीता - इसके बाद क्या हुआ ?
राम - इसके बाद जब मैंने उनकी अनुनय को अस्वीकार कर दिया, तब
उन्होंने अपने जीर्ण-शीर्ण प्राणों की शपथ दी।

सीता—तव फिर क्या हुआ ?
मूल
रामः—ततस्तदानीम्,
शत्रुघ्नलक्ष्मणगृहीतघटेऽभिषेके
छत्रे स्वयं नृपतिना रुदता गृहीते ।
सम्भ्रान्तया किमपि मन्थरया च कर्णे
राज्ञः शनैरभिहितं च न चास्मि राजा ॥ (७)
सीता—प्रियं मे। महाराज एव महाराजः, आर्यपुत्र एवार्यपुत्रः।
रामः—मैथिलि ! किमर्थं विमुक्तालङ्कारासि ?
सीता—न खलु तावदाबध्नामि ।
रामः—न खलु। प्रत्यग्रावतारितैर्भूषणैर्भवितव्यम्। तथाहि—
कर्णौ त्वरापहृतभूषणभुग्नपाशौ
संस्रंसिताभरणगौरतलौ च हस्तौ।
एतानि चाभरणभारनतानि गात्रे
स्थानानि नैव समतामुपयान्ति तावत् ॥ (८)
शब्दार्थ—सम्भ्रान्तया = घबराहट मे आने वाली। मन्थरया = मन्थरा
नामक दासी के द्वारा। अभिहितम् = कहा गया। न चास्मि = च + अस्मि =
मैं नहीं हूं अर्थात् मै नही बना। विमुक्तालङ्कारा = आभूषणों का परित्याग
करने वाली। असि = (तुम) हो। प्रत्यग्रावतारितैः = अभी-अभी उतारे गए।
भवितव्यम् = होनी चाहिए। त्वरा = शीघ्रता से। भुग्नपाशौ = टेढ़े बने ग्रन्थि
के समान भूषण धारण के स्थान वाले (दोनों कान)। संस्रंसित = दूर करना
या हटाना। गौरतलौ = श्वेत वर्ण की हथेलियों वाले। आभरणभारनतानि =
गहनों के बोझ से झुके। गात्रे = शरीर पर। स्थानानि = भाग। समताम् =
स्वाभाविक स्थिति मे। उपयान्ति = प्राप्त होते हैं। तावत् = अभी तक।
अन्वय—शत्रुघ्नलक्ष्मणगृहीतघटे अभिषेके, रुदता नृपतिना स्वयं छत्रे
गृहीते, सम्भ्रान्तया मन्थरया राज्ञः कर्णे शनैः किमपि अभिहितं च, न च राजा
अस्मि। (७)

( 50 )
अन्वय—कर्णौ त्वरापहृतभूषणभुग्नपाशी, हस्तौ च संस्रसिता-
गौरतलौ, गात्रे आभरणभारनतानि एतानि स्थानानि तावत् समता
उपयान्ति । (८)
हिन्दी अर्थ
राम—तब उस समय—
शत्रुघ्न और लक्ष्मण ने तीर्थजल के घड़े को थामा, रोते हुए म
राज ने स्वतः छत्र सम्भाला और इस प्रकार अभिषेक का क
प्रारम्भ हुआ। इतने मे ही हाफती हुई मन्थरा ने आकर राजा
कानों मे धीरे से कुछ कहा और में राजा नहीं हुआ। (७)
सीता—यह मुझे अच्छा लगा । महाराज महाराज ही रहे और आर्य
आर्यपुत्र ही रहे ।
राम—सीते, गहनों को क्यो उतार डाला ?
सीता—नही, नही, पहना करती हूँ ।
राम—नही तो, पहनती तो हो। गहने अभी ही उतारे जान पड़ते हैं
क्योकि--
शीघ्रता में आभूषण उतारने के कारण कानो के छेद अभी भी हु
नीचे की ओर झुके हुए हैं। हस्ताभरण उतारने के कारण दब
पड़ने से हथेलियो का रंग अभी भी पहले की तरह नही हुआ है
आभूषणो के भार से झुके हुए तुम्हारे शरीर के ये अवयव अभी त
स्वाभाविक दशा को प्राप्त नहीं कर सके है। (८)
(६) मूल
सीता—पारयत्यार्यपुत्रोऽनीकमपि सत्यमिव मन्त्रयितुम् ।
रामः—तेन हि अलङ् क्रियताम् । अहमादर्शम् धारयिष्ये । (तथ
कृत्वा निर्वर्ण्य) तिष्ठ ।
आदर्शे वल्कलानीव किमेते सूर्यरश्मयः ।
हसितेन परिज्ञात क्रीडेयं नियमस्पृहा ॥ (६)
अवदातिके ! किमेतत् ?
अवदातिका--भर्तः ! "किन्नु खलुशोभते न शोभते' इति कौतूहलेन
वस्त्राणि ।

( ५१ )
रामः-मैथिलि ! किमिदम् ? इक्ष्वाकूणां वृद्धालङ्कारस्त्वया
धार्यते । अस्त्यस्माकं प्रीतिः । आनय ।
सीता-मा खलु मा खल्वार्यपुत्रोऽमङ्गलं भणतु ।
रामः-मैथिलि ! किमर्थम् वारयसि ?
सीता-उज्झिताभिषेकस्यार्यपुत्रस्यामङ्गलमिव मे प्रतिभाति ।
रामः- मा स्वयं मन्युमुत्पाद्य परिहासे विशेषतः ।
शरीरार्धेन मे पूर्वमाबद्धा हि यदा त्वया ॥ (१०)
(नेपथ्ये)
हा हा महाराजः ।
सीता— आर्यपुत्र ! किमेतत् ?
रामः-(आकर्ण्य)
नारीणां पुरुषाणा च निर्मर्यादो यदा ध्वनिः ।
सुव्यक्तं प्रभवामीति मूले दैवेन ताडितम् ॥ (११)
तूर्णम् ज्ञायतां शब्दः ।
शब्दार्थः—पारयति = समर्थ है । अलीकम्-असत्य को । धारयिष्ये=
पकडे रहूँगा । निर्वर्ण्य = देखकर । सूर्यरश्मयः=सूर्य की किरणे । परिज्ञातम्
=समझ लिया है । नियमस्पृहा=व्रत लेने की अभिलाषा । वृद्धालङ्कार =
बुढापे की शोभा । वारयसि=मना कर रही हो । उज्झिताभिषेकस्य =
राज्याभिषेक का परित्याग करने वाले । अमङ्गलम् इव=अशुभ के समान ।
प्रतिभाति=ज्ञात होता है । मा=मत । मन्युम्=क्रोध को । उत्पाद्य = उत्पन्न
करके । शरीरार्धेन=शरीर के आधे भाग द्वारा । आबद्धा = बाध लिया है ।
निर्मर्यादः=उच्चता की सीमा से रहित अर्थात् करुणापूर्ण । सुव्यक्तम्=सुस्पष्ट
है । प्रभवामि=समर्थ हूँ । मूले प्रधान स्थान बने महाराज पर । दैवेन=
विधाता के द्वारा । ताडितम्=प्रहार किया गया है । तूर्णम्-शीघ्रता से ।
अन्वयः—आदर्शे वल्कलानि इव एते सूर्यरश्मय किम् हसितेन परिज्ञा-
तम्, इयं क्रीडा, नियमस्पृहा । (६)
अन्वयः—परिहासे स्वयं मन्यु मा उत्पाद्य । हि यदा मे शरीरार्धेन
त्वया पूर्वम् आबद्धा । (१०)
अन्वयः—नारीणा पुरुषाणा च यदा निर्मर्यादः ध्वनिः, प्रभवामि इति
दैवेन मूले ताडितम् इति सुव्यक्तम् । (११)

( 52 )
हिन्दी अर्थ
सीता—आप असत्य को भी सत्य के समान कह सकते है ।
राम—तो फिर तुम आभूषण पहनो । मैं काच दिखाता हूँ । (वैसा करके,
देख कर) ठहरो ।
दर्पण में यह कुछ वल्कल-सा दीख रहा है। कही ये सूर्य की किरणें तो
नही है । अच्छा, तुम्हारी हँसी ने सारा रहस्य बता दिया । सच
बताओ, क्या इसे हँसी खेल मे पहना है अथवा साधना करने का ही
विचार है । (६)
अवदातिके, क्या बात है ?
अवदातिका—स्वामी, "क्या यह अच्छा लगता है अथवा नही" इसी उत्सुकता
मे पहन लिया है ।
राम—सीते, क्या ऐसा ही है । तुमने तो इक्ष्वाकुवंशियो की वृद्धावस्था के
आभूषण इस वल्कल को धारण कर लिया है। हमारी भी इसमे रुचि
है । लाओ तो ।
सीता—नही, आप ऐसी अपशकुन की बात मत करिए ।
राम—हे सीते, तुम क्यो मुझे रोक रही हो ?
सीता—अभी-अभी आपका अभिषेक होते-होते रुक गया है । अत. आपका
वल्कल धारण करना मुझे अशुभ-सा लगता है ।
राम—हास-परिहास मे तुम स्वयं दैन्य (मन्यु) को उत्पन्न मत करो अर्थात्
विनोद मे अमगल की आशंका मत करो। क्योकि जब मेरी
अर्धाङ्गिनी होकर तुमने पहले ही वल्कल पहन लिया, तो समझो
मैने भी पहन लिया । (१०)
(नेपथ्य में)
हाय, हाय, महाराज !
सीता—आर्य पुत्र, यह क्या है ?
राम—(सुनकर) पुरुषो और स्त्रियो का जब यह सम्मिलित 'आर्त्त स्वर
सुनाई पड़ रहा है, इससे प्रतीत होता है कि विधाता ने यह सिद्ध
करने के लिए कि "मै सर्वशक्तिमान हूँ" मूल पर ही प्रहार
किया है । (११)
इस कोलाहल का शीघ्र पता लगायो ।

( 53 )
७) मूल—
(प्रविश्य)
काञ्चुकीयः —परित्रायतां परित्रायतां कुमारः ।
राम —आर्य ! कः परित्रातव्यः ?
काञ्चुकीयः—महाराजः ।
रामः—महाराजः इति । आर्य ! ननु वक्तव्यम् एकशरीरसंक्षिप्ता
पृथिवी रक्षितव्येति । अथ कुत उत्पन्नोऽयं दोषः ।
काञ्चुकीयः— स्वजनात् ।
रामः--स्वजनादिति । हन्त ! नास्ति प्रतीकारः ।
शरीरेऽरिः प्रहरति हृदये स्वजनस्तथा । कस्य स्वजनशब्दो
मे लज्जामुत्पादयिष्यति ॥ (१२)
काञ्चुकीयः— तत्रभवत्या कैकेय्याः ।
रामः - किमम्बाया ? तेन हि उदर्केण गुणेनात्र भवितव्यम् ।
काञ्चुकीयः—कथमिव ?
रामः—श्रूयताम्,
यस्याः शक्रसमो भर्ता मया पुत्रवती च या ।
फले कस्मिन् स्पृहा तस्या येनाकार्यं करिष्यति ॥ (१३)
काञ्चुकीयः—कुमार ! अलमुपहतासु स्त्रीबुद्धिषु स्वमार्जवमुपनि-
क्षेप्तुम् । तस्या एव खलु वचनाद् भवदभिषेको निवृत्तः ।
रामः -आर्य ! गुणाः खल्वत्रे ।
काञ्चुकीयः—कथमिव ?
रामः—श्रूयताम्,
वनं दमननिवृत्तिः पार्थिवस्य तावन्मम
पितृपरवत्ता बालभावः स एव ।
नवनृपति विमर्गे नास्ति शङ्का प्रजानामथ च न
परिभोगैर्वञ्चिता भ्रातरो मे ॥ (१४)
काञ्चुकीयः—अथ च तयानाहूतोपसृतया भरतोऽभिषिच्यतां राज्य
इत्युक्तम् । अत्राप्यलोभः ?
रामः —आर्य !(भवान् खल्वस्मत्पक्षपातादेव नार्थमवेक्षते)
कुतः,
शुल्के विपणितं राज्यं पुत्रार्थे यदि याच्यते ।
तस्या लोभोऽत्र नास्माकं भ्रातृराज्यापहारिणाम् ॥ (१५)

( 54 )
काञ्चुकीयः—अथ ।
रामः—अतः परं न मातुः परिवादं श्रोतुमिच्छामि । महाराजस्य
वृत्तान्तस्तावदभिधीयताम् ।
काञ्चुकीयः—ततस्तदानीम्,
शोकादवचनाद् राजा हस्तेनैव विसर्जितः ।
किमप्यभिमतं मन्ये माहन्नृपतिर्गतश्च ॥ (१६)
रामः—कथं मोहमुपगतः ?
शब्दार्थ—परित्रायताम् रक्षा की जाए । परित्रातव्यः=रक्षणीय ।
दोषः=अवगुण अर्थात् आपत्ति । प्रतीकारः=दूर करने का उपाय । उदर्कैण
=उत्तर फल अर्थात् परिणाम । शक्रसमः=इन्द्र के तुल्य । स्पृहा=इच्छा ।
अकार्यम्=धर्तृव्यसन रूप बुरा कार्य । उपहतासु=नष्ट हुई अर्थात् कुटिल
बनी । आर्जवम्=सरलता को । उपनिक्षेप्तुम्=आरोपित करने के लिए ।
निवृत्तः=रुक गया है । पितृपरवत्ता=पिता का नियन्त्रण । नवनृपतिविमर्शे=
नये राजा के विचार में । शङ्का=विचिकित्सा या संशय । परिभोगैः=राजसुख
की आनन्द प्राप्ति से । अनाहूतोपमृत्यया = बिना बुलाए पहुँचने वाली ।
अर्थम्=वस्तुतत्व को । अवेक्षते=देखते हैं । शुल्के=विवाह के मूल्य मे । विप-
णितम्=विशेष सम्भावित । पुत्रार्थे=पुत्र के निमित्त । याच्यते=मागा जाता
है । परिवादं=निन्दा को । अभिधीयताम्=कहा जाए । अवचनात् =बिना कुछ
कहे । विसर्जितः=भेज दिया । अभिमतं=चाहा गया । मन्ये=मै समझता हूँ ।
मोह=संज्ञाहीनता को ।
अन्वय—परिः शरीरे प्रहरति तथा स्वजनः हृदये । कस्य स्वजन शब्दः
मे लज्जाम् उत्पादयिष्यति । (१२)
अन्वय—यस्याः शक्रसमः भर्त्ता । या च मया पुत्रवती । तस्याः
कस्मिन् फले स्पृहा । येन अकार्यम् करिष्यति । (१३)
अन्वय—तावत् पार्थिवस्य एव वनगमननिवृत्तिः । मम पितृपरवत्ता ।
स एव बालभावः । नवनृपतिविमर्शे प्रजाना शङ्का न अस्ति । अथ च मे
भ्रातरः परिभोगैः न वञ्चिताः । (१४)
अन्वय—यदि शुल्के पुत्रार्थे विणणितं राज्य याच्यते, अत्र तस्याः
लोभः । भ्रातृराज्यापहारिणाम् अस्माकम् न । (१५)
अन्वय—राजा शोकात् अवचनात् हस्तेन एव विसर्जितः । नृपतिः
किमपि अभिमतम् मोहम् च गतः मन्ये । (१६)

( 55 )

ही अर्थ
(प्रवेश करके)
ञ्चुकीय—कुमार, रक्षा करे, रक्षा करे।
राम—आर्य, किसकी रक्षा ?
ञ्चुकीय—महाराज की।
म— क्या महाराज की ? तब तो यो कहिए कि एक ही शरीर मे बंधी हुई
पृथ्वी की रक्षा की जाए। किन्तु यह आपत्ति आई कहा से ?
ाञ्चुकीय—अपने ही परिवार के व्यक्ति से।
ाम—क्या आत्मीय जन से ? तब तो इसे दूर करने का उपाय नही है।
शत्रु तो केवल शरीर पर आक्रमण करता है, किन्तु आत्मीय जन
मर्म स्थान पर आघात करते हैं। न जाने इस विपत्ति मे कौन स्वजन
निमित्त बना है, जो मेरे लिए लज्जा उत्पन्न करेगा। (१२)
काञ्चुकीय—महारानी कैकेयी।
राम—क्या मेरी जननी ? तब तो अवश्य ही इसका परिणाम अच्छा होगा।
काञ्चुकीय—किस प्रकार ?
राम—सुनिए,
जिसके पतिदेव इन्द्र के समान हो और जिसका मै पुत्र होऊँ। भला
उसे क्या कामना हो सकती है ? जिसके लिए वे ऐसा बुरा कार्य
करेगी।
काञ्चुकीय हे राजकुमारः स्वभावतः मारी गई नारी बुद्धि पर अपने
सीधेपन का आरोप मत करो। उसी के कहने से तो आपका अभिषेक
रुक गया है।
राम—आर्य, इसमें तो बहुत सी अच्छाइया है।
काञ्चुकीय—वे किस प्रकार हैं ?
राम—सुनिए, सर्वप्रथम तो महाराज का वन जाना रुक गया। मुझ पर पिता
की छत्रच्छाया बनी रही, उसी प्रकार का बालभाव अर्थात् पूर्ववत्
सुख की स्थिति विद्यमान रही। नया राजा पता नहीं अच्छा होगा
या बुरा, यह आशंका भी प्रजागण को नही है और मेरे अन्य
भाई भी राज्य के उपभोग के आनन्द से वंचित नही रहे। (१४)
काञ्चुकीय—किन्तु उस कैकेयी ने बिना बुलाए ही जाकर राजा दशरथ

( 56 )
से कहा कि भरत का राज्य सिंहासन पर अभिषेक कर दो।
इसमें लोभ नहीं है ?
राम--आर्य, (हमारी ओर अधिक स्नेह होने के कारण ही आप वास्तविक्ता
को नहीं देख रहे है। क्योकि, यदि विवाह के मूल्य मे पुत्र
लिए विशेष-रूप से सम्भावित राज्य को मागा जाता है, तो इसमे
उसका लोभ है और भाई के राज्याधिकार को लेने वाले हम लोग
क्या लोभ रहित है ? (१५)
काञ्चुकीय--किन्तु ।
राम--मैं इसके आगे जननी की निन्दा नही सुनना चाहता हूँ । त
फिर महाराजा के समाचार कहो ।
काञ्चुकीय--इसके बाद फिर,
राजा के द्वारा दुःख के कारण बिना कुछ बोले ही मैं हाथ के सकेत :
आपके पास भेजा गया हूँ । राजा उस स्थिति की अपेक्षा कुछ
अधिक अच्छी लगने वाली मूर्च्छा को प्राप्त हो गए, ऐसा मेरा विचा-
है । (१६)
(८) मूल
(नेपथ्ये)
कथं कथ मोहमुपगत इति ?
यदि न सहसे राज्ञो मोहं धनुः स्पृश मा दया
रामः-- (आकर्ण्य पुरतो विलोक्य)
अक्षोभ्यः क्षोभितः केन लक्ष्मणो धैसार्यगरः ।
येन् रुष्टेन पश्यामि शताकीर्णमिवाग्रत. ॥ (१७)
(ततः प्रविशति धनुर्वाणपाणिर्लक्ष्मणः)
लक्ष्मण.- (सक्रोधम्) कथ कथं मोहमुपगत इति ।
यदि न सहसे राज्ञो मोहं धनुः स्पृश मा दया
(स्वजननिभृत. सर्वोऽप्येव मृदुः परिभूयते ।
अथ न रुचित मुञ्च त्वं मामहं कृतनिश्चयो
युवतिरहित लोकं कर्तुं यतश्छलित वयम् ॥ (१८)
सीता--आर्यपुत्र ! रोदितव्ये काले सौमित्रिणा धनुगृहीतम् । अपूर्व
खल्वस्यायास. ।
रामः-- सुमित्रामातः ! किमिदम् ।

( ५७ )
लक्ष्मणः—कथं कथं किमिद नाम ?
क्रमप्राप्ते हृते राज्ये भुवि शोच्यासने नृपे ।
इदानीमपि सन्देहः किं क्षमा निर्मनस्विता ॥ ( १६ )
रामः—सुमित्रामातः । अस्मद्राज्यभ्रंशो भवत उद्योगं जनयति ।
आ., अपण्डितः खलु भवान् ।
भरतो वा भवेद् राजा वयं वा ननु तत् समम् ।
यदि तेऽस्ति धनु.श्लाघा स राजा परिपाल्यताम् ॥ ( २० )
लक्ष्मणः—न शक्नोमि रोषं धारयितुम् । भवतु भवतु । गच्छाम-
स्तावत् । (प्रस्थित.)
रामः—त्रैलोक्यं दग्धुकामेव ललाटपुटसंस्थिता ।
भ्रुकुटिर्लक्ष्मणस्यैषा नियतीव व्यवस्थिता ॥ ( २१ )
सुमित्रामातः ! इतस्तावत् ।
शब्दार्थ—सहसे = सहन करते हो । अक्षोभ्यः = शान्त । क्षोभितः =
चंचल बना दिया गया । रुष्टेन = कुपित बने हुए । शताकीर्णाम् = सैकड़ों
लोगो से घने बने हुए । स्वजननिभृतः = आत्मीयों पर क्षमाशील । मृदुः =
शान्त । परिभूयते = अपमानित होता है । यतः = जिस कारण से । अपूर्वः =
अनोखा । आयासः = खेद । सुमित्रामातः = सुमित्रा माता य य स = सुमित्रा
जिसकी जननी है, वह अर्थात् सुमित्रा का पुत्र = लक्ष्मण । शोच्यासने = दुःख-
पूर्णा आसन या स्थिति वाले । निर्मनस्विता = आत्माभिमान शून्यता
अस्मद्राज्यभ्रंशः = हमारा राज्य से च्युत् होना । भवतः = आपके । उद्योगं =
परिश्रम को । जनयति = प्रेरित करती है । अपण्डितः = विवेकहीन । धनुः-
श्लाघा = धनुर्विद्या में प्रवीणता । रोषं = क्रोध को । दग्धुकामा = जलाने की
इच्छा वाले । ललाटपुटसंस्थिता = भालपर विधमान । भ्रुकुटिः = भौंह ।
नियती = भाग्य की इच्छा । व्यवस्थिता=स्थिर निश्चय वाली ।
अन्वय- अक्षोभ्यः धैर्यसागरः लक्ष्मणः केन क्षोभितः ? रुष्टेन येन
अग्रतः शताकीर्णाम् इव पश्यामि । (१७)
अन्वय—यदि राज्ञः मोहं न सहसे, धनुः स्पृश, दया मा । स्वजननिभृतः
मृदुः सर्वः एवं परिभूयते । अथ न रुचित, त्वं मां मुञ्च । अहं

( 60 )
रामः—वने खलु वस्तव्यम् !
सीता—तत् खलु मे प्रासादः ।
रामः—श्वश्रूश्वशुरशुश्रूषापि च ते निर्वर्तितव्या ।
सीता—एनामुद्दिश्य देवतानां प्रणामः क्रियते ।
रामः—लक्ष्मण ! वार्यतामियम् ।
लक्ष्मणः—आर्य ! नोत्सहे श्लाघनीये काले वारयितुमत्रभवतीम् ।
कुतः—
(अनुचरति शशाङ्कं राहुदोषेऽपि तारा)
पतति च वनवृक्षे याति भूमिं लता च ।
त्यजति न च करेणुः पङ्कलग्नं गजेन्द्रं
व्रजतु चरतु धर्मं भर्तृनाथा हि नार्यः ॥ (२५)
(प्रविश्य)
चेटी—जयतु भट्टिनी । नेपथ्यपालिन्यार्यरैवा प्रणम्य विज्ञापयति-
अवदातिकाया संगीतशालाया आच्छिद्य वल्कला आनीताः ।
इमेऽपरा अननुभूता वल्कलाः । निर्वर्त्यतां तावत् किल
प्रयोजनमिति ।
रामः—भद्रे, आनय, सन्तुष्टैषा । वयमर्थिन ।
चेटी—गृह्णातु भर्ता । (तथा कृत्वा निष्क्रान्ता)
(रामो गृहीत्वा परिधत्ते )
शब्दार्थ—स्थैर्यम् = धैर्य को । उत्पादथता = उत्पन्न करने वाले ।
नमयि = उठाया जाये । अवेक्षमाणो = प्रतीक्षा या पालन करने वाले ।
मुञ्चानि = छोड़ा जाए । मातरि = माता कैकेयी पर । हरन्त्याम् = लेने वाली ।
दोषेषु बाह्यम् = दोष या अपराध में लिप्त न होने वाले । हनानी = मारा
जाए । रुचिरं = अच्छा लगने वाला । पातकेषु = महा पापों में । अविज्ञाय =
नहीं जान कर । उपालभसे = डांट रहे है । निवेदितम् प्रकट की है । अप्रभुत्वम्
= अधीशता को । मङ्गलार्थे = अच्छा कार्य करने के लिए । अनया = इस
अवदातिका के द्वारा । नैवाप्तम् = नहीं प्राप्त किया है । नोपपादितम् = नहीं
[कि]या है । व्यवसितम् = सोचा है । श्वश्रू = सास । शुश्रूषा = सेवा । निर्वति-
[तव्या] = की जानी चाहिए । वार्यताम् = मना करो । उत्सहे = समर्थ हूँ ।

( 61 )

श्लाघनीये = प्रशंसनीय । राहुदोषे = राहु से ग्रस लेने पर । तारा = चन्द्रमा
की पत्नी रोहिणी । याति = चली जाती है । करेणु = हथिनो । पङ्कलग्नम्
= कीचड़ मे फँसे हुए । व्रजतु = जाए । चरतु = आचरण करे । 'भर्तृनाथा =
स्वामी के अधीन । आच्छिद्य = छीन कर । अननुभूताः = काम में नहीं लिए
गए । निर्वर्त्यताम् = पूरा कीजिए ।
अन्वय-सत्यम् अवेक्षमाणे ताते धनु नमयि । स्वधनं हरन्त्यां मातरि
शर मुञ्चानि, दोषेषु बाह्यम् अनुज भरत हनानि, त्रिषु पातकेषु रोषणाय किं
रुचिरम् । (२२)
अन्वय-यत्कृते महति क्लेशे राज्ये मे मनोरथ. न । चतुर्दश वर्षाणी
त्वया वने वस्तव्यम् किल । (२३)
अन्वय-अनया दत्तान् वल्कलान् तावत् मङ्गलार्थे आनय । अन्यः
नृपै नैवाप्त नोपपादितं धर्म करोमि । (२४)
अन्वय- राहुदोषे ऽपि तारा शशाकम् अनुचरति । च वनवृक्षे पतर्ति
लता भूमि याति । करेणुः पंकलग्नं गजेन्द्र न त्यजति । व्रजतु धर्मम् चरतु ।
हि नार्यः भर्तृनाथा । (२५)
हिन्दी अर्थ
लक्ष्मण-आर्य यह आया ।
राम-तुमको शान्त करने के लिए ही मैने ऐसा कहा है । अब तुम ही
बताओ ।
अपनी प्रतिज्ञा का पालन करने वाले पिताजी पर धनुष उठाया जाये ।
पूर्व प्रतिज्ञात अपने विवाह शुल्क को माँगने वाली, माता पर
वाण छोड़ूँ । अथवा निर्दोष बने हुए छोटे भाई भरत को मारूँ ।
इन तीनो भयंकर पापो मे से तुम्हारे क्रोध को कौन-सा अच्छा
लगता है ? (२२)
लक्ष्मण-(आँसू भर कर) हाय धिक्कार है । हमे विना जाने ही आप
उलाहना दे रहे है ।
जिसके कारण महान् दुःख हो रहा है, उस राज्य के प्रति मेरी
अभिलाषा नही है । मुझे पीडा यह है कि १४ वर्ष तक आपको वन
में रहना पड़ेगा । (२३)
राम-क्या इस पर महाराज बेंहोश हो गए । हाय, उन्होने तो अपनी
अधीरता दिखा दी । हे सीते,

( 62 )
इस सेविका के द्वारा दिये गए ये वल्कल वस्त्र मुझे शुभ कार्य करने
के लिए दो । मैं दूसरे राजाओं द्वारा नही प्राप्त किए गए और न
किए गए आचरण को करूँगा । (२४)
सीता--आर्यपुत्र लीजिए ।
राम- हे सीते ! तुमने क्या निश्चय किया है ?
सीता-मैं तो आपकी सहधर्मचारिणी हूँ ।
राम-मुझे तो अकेले को ही जाना है ।
सीता-इसीलिए तो आपके साथ चल रही हूँ ।
राम-वहाँ तो जगल में रहना पड़ेगा ।
सीता-वह मेरे लिए राजमहल होगा ।
राम-तुमको सास-ससुर की सेवा भी तो करनी चाहिए ।
सीता-इसके लिए मैं देवताओ को प्रणाम करती हूँ ।
राम- हे लक्ष्मण, इसे रोको ।
लक्ष्मण-आर्य, ऐसे सम्माननीय अवसर पर इन देवी को नही रोक सकता
हूँ क्योकि—
राहु के द्वारा चन्द्रमा के ग्रहण कर लेने पर भी रोहिणी चन्द्रमा के
साथ रहती है । वन मे वृक्ष के गिर जाने पर उसके साथ लिपटी
हुई लता भी पृथ्वी पर आ जाती है । हथिनी कीचड़ मे सने हाथी
को नही छोड़ती है । अत. यह सीता भा वन जाए और अपने धर्म
(कर्त्तव्य) का आचरण करे क्योकि स्त्रियो के लिए तो पति ही
सर्वस्व होते है । (२५)
(प्रवेश करके)
चेटी—महारानी की जय हो ! सज्जागृह की रक्षिका आर्या रेवा प्रणाम करके
सूचित करती है कि अवमातिका मगीतशाला से कुछ वल्कल वस्त्र
स्वय ही ले आई है । हो सकता है कि वे अच्छे नही हो । ये दूसरे
नये वल्कल है । इनसे आप अपना प्रयोजन पूरा कर लीजिए ।
राम-भद्रे, इधर लाओ । यह तो सतुष्ट है । मुझे आवश्यकता है ।
चेटी-स्वामी ग्रहण करें । (उन्हे देकर निकल जाती है ।)
(राम लेकर पहनते है ।)
(१०) मूल
लक्ष्मणः—प्रसीदत्वार्यः ।

( 65 )
अन्वय-वधूसहायं सौभ्रातृव्यवसितलक्ष्मणानुयात्रम् ते वनगमनं
उत्थाय जीर्णः क्षितितलरेगुरूषिताङ्गः कान्तारद्विरदः इव उप-
(३०)
अन्वय—चीरमात्रोत्तरीयाणा वनवासिना किं दृश्यम् । राजा अस्मासु
नः शिरःस्थानानि पश्यतु ॥ (३१)
अर्थ
ण—आप प्रसन्न होइए । आज तक आप सभी प्रकार के वस्त्र, आभूषण,
माला आदि सभी पदार्थों मे से आधा देतेआए है । फिर अकेले ही इस
वल्कल को क्यो बांध लिया है । क्या इस वल्कल में आप लोभी बन
गए है । (२६)
—हे सीते, इसे रोको ।
ता—लक्ष्मण, तुम रुक जाओ ।
मण—आर्य, तुम अकेली ही मेरे पूज्य राम के चरणों की सेवा करना
चाहती हो । दाहिना पांव तुम्हारा है । मेरा बाया होगा । (२७)
ता—आप पतिदेव दया करे । लक्ष्मण दुःखी हो रहा है ।
म—हे लक्ष्मण, सुनो । यह वल्कल—तपस्या रूपी युद्ध में कवच के समान,
संयम रूपी हाथी को वश करने में अंकुश, इन्द्रिय रूपी घोडो के लिए
लगाम तथा धर्म रूपी रथ का सारथी है, अतः तुम इनको ग्रहण
करो । (२८)
क्ष्मण—कृतकृत्य । (ले
—इस समाचार मार्ग पर एकत्रित हो
— है । इन्हे

( 64 )
चीरमात्रोत्तरीयाणां किं दृश्यं वनवासिनाम् ।
रामः—
गतेष्वस्मासु राजा नः शिरःस्थानानि पश्यतु ॥ (३१)
(इति निष्क्रान्ताः सर्वे)
प्रथमोऽङ्कः।
शब्दार्थ—निर्योगात् = वस्त्र, कञ्चुक आदि पहनने के उपयोगी वस्त्र
से । सर्वेभ्यः = सभी भोग्य वस्तुओं से । चीरं = वल्कल । मत्सरी = लोभ की
प्रवृत्ति । गुरोः = बड़े भाई राम की । दक्षिणः = दाहिना । सव्यः = बायां ।
दयतां = दया कीजिए । संतप्यते = व्यथित हो रहा है । सौमित्रिः = लक्ष्मण ।
नियमद्विरदांकुशः = वृत रूपी हाथी के वशीकरण का साधन । खलीनम् =
लगाम (रवे अश्वमुखच्छिद्रे लीनम् इति) । धर्मसारथिः = धर्म रूपी रथ का
चालक । परिवत्ते = पहनता है । सन्निरुद्धः = परिपूर्ण । राजमार्गः = सड़क ।
उत्सार्यताम् = हटाया जाए । यास्यामि = चलूंगा । अपनीयताम् = हटा दो ।
अवगुण्ठनम् = घूंघट । स्वैरं = यथेच्छ रूप में । कलत्रम् = स्त्री को अर्थात्
सीता को । बाष्पाकुलाक्षैः = अश्रू भरे नेत्रों वाले । वदनैः = मुख से ।
भवन्तः = आप लोग । निर्दोषदृश्याः = दोषरहित दर्शनीय । व्यसने = आपत्ति-
काल में । वधूसहायं = सीता के साथ । सौभ्रात्रव्यवसित = भाई के स्नेह से
निश्चित मन वाले । लक्ष्मणानुयात्रम् = लक्ष्मण के अनुगमन को । रेणुरुषिता-
ङ्गः = धूल से सने शरीर वाले । कान्तारद्विरद = जंगली हाथी । उपयाति
आ रहे हैं । जीर्णः = वृद्ध । चीरमात्रोत्तरीयाणां = वल्कल रूपी रेशमी वस्त्र
ले । किं दृश्यम् = क्या देखना । शिरःस्थानानि = प्रधान निवास स्थानों को ।
अन्वय—निर्योगात् भूषणात् माल्यात् सर्वेभ्यः मे अर्धम् प्रदाय एका-
चीरम् बद्धम् । खलु चीरे मत्सरी असि । (२६)
अन्वय—त्वम् एका गुरोः पादशुश्रूषां कर्तुम् इच्छसि । दक्षिणः
तव एव । मम सव्यः भविष्यति । (२७)
अन्वय—तपःसंग्रामकवचम् नियमद्विरदाङ्कुशः इन्द्रियाश्वानाम् खली-
धर्मसारथिः गृह्यताम् । (२८)
अन्वय—बाष्पाकुलाक्षैः वदनैः भवन्तः एतत् कलत्रम् स्वैरम् हि
पश्यन्तु । नार्यः यज्ञे विवाहे व्यसने वने च निर्दोषदृश्याः हि भवन्ति । (२६)

( 65 )
अन्वय—वधूसहायं सौभ्रातृव्यवसितलक्ष्मणानुयात्रम् ते वनगमनं
वा उत्थाय जीर्णः क्षितितलरेगुरुषिताङ्गः कान्तारद्विरदः इव उप-
ते। (३०)
अन्वय—चीरमात्रोत्तरीयाणां वनवासिनां किं दृश्यम् । राजा अस्मासु
षु नः शिरःस्थानानि पश्यतु ॥ (३१)
न्दी अर्थ
क्ष्मण—आप प्रसन्न होइए । आज तक आप सभी प्रकार के वस्त्र, आभूषण,
माला आदि सभी पदार्थों मे से आधा देतेआए है । फिर अकेले ही इस
वल्कल को क्यो बाध लिया है । क्या इस वल्कल में आप लोभी बन
गए है । (२६)
ाम—हे सीते, इसे रोको ।
सीता—लक्ष्मण, तुम रुक जाओ ।
लक्ष्मण—आर्य, तुम अकेली ही मेरे पूज्य राम के चरणों की सेवा करना
चाहती हो । दाहिना पांव तुम्हारा है । मेरा बायां होगा । (२७)
सीता—आप पतिदेव दया करें । लक्ष्मण दुःखी हो रहा है ।
राम—हे लक्ष्मण, सुनो । यह वल्कल—तपस्या रूपी युद्ध में कवच के समान,
संयम रूपी हाथी को वश करने में अंकुश, इन्द्रिय रूपी घोड़ो के लिए
लगाम तथा धर्म रूपी रथ का सारथी है, अतः तुम इनको ग्रहण
करो । (२८)
लक्ष्मण—कृतकृत्य हो गया हूं । (लेकर पहनता है )
राम--इस समाचार को सुन कर पुरवासी लोग राजमार्ग पर एकत्रित हो
गए है । इन्हे समझाकर हटा दीजिए ।
लक्ष्मण—आर्य, मैं आगे चलता हूँ । हट जाइए, हट जाइए ।
राम—सीते, अपना घू घट हटा दो ।
सीता—जैसी आर्यपुत्र की आज्ञा । (घूंघट हटाती है)
राम--हे हे पुरवासियो, आप लोग सुनिए, सुनिए । आप लोग निःशंक
होकर अश्रुपूर्ण नेत्रो से सीता को देख ले । यज्ञ, विवाह, सकट और
वन गमन के अवसर पर स्त्रियो को देखना निर्दोष है । (२६)
(प्रवेश करके)

( 66 )
काञ्चुकीय—हे कुमार, मत जाइए । ये महाराज दशरथ-सीता के सँ
आपका वनगमन तथा भ्रातृस्नेह के वशीभूत लक्ष्मण का अनुगमन न
कर, वृद्ध महाराज उठ कर पृथ्वी की धूलि से धूसरित शरीर वा
वन्य गजराज की भाँति काँपती चाल से आप लोगो को देखने के लि
इधर ही आ रहे हैं । (३०)
लक्ष्मण—आर्य,
वस्त्र के रूप में केवल वल्कल मात्र को पहने हुए हम वन-
वासियो को देखकर क्या करेंगे ?
राम—हमारे चले जाने पर महाराज हमारे प्रधान निवास स्थानो को देखा
करेंगे ।
(इस प्रकार सब निकल जाते हैं )
प्रथम अंक समाप्त ।

द्वितीय अंक
(१) मूल
(ततः प्रविशति काञ्चुकीयः)
काञ्चुकीयः—भो भोः प्रतिहारव्यापृताः ! स्वेषु स्वेषु
स्थानेष्वप्रमत्ता भवन्तु भवन्तः ।
(प्रविश्य)
प्रतीहारी—आर्य ! किमेतत् ?
काञ्चुकीयः—एष हि महाराजः सत्यवचनरक्षणपरो राममरण्यं
गच्छन्तमुपावर्तयितुमशक्तः पुत्रविरहशोकाग्निना दग्धहृदय
उन्मत्त इव बहु प्रलपन् समुद्रगृहके शयानः—
मेरुश्चलन्निव युगक्षयसन्निकर्षे
शोषं व्रजन्निव महोदधिरप्रमेयः ।
सूर्यः पतन्निव च मण्डलमात्रलक्ष्यः
शोकाद् भृशं शिथिलदेहमतिर्नरेन्द्रः ॥ (१)
प्रतीहारी—हा हा एवंगतो महाराजः ।
काञ्चुकीयः—भवति ! गच्छ ।
प्रतीहारी—आर्य ! तथा । (निष्क्रान्ता)
काञ्चुकीयः—(सर्वतो विलोक्य) अहो नु खलु रामनिर्गमन दिना-
दारभ्य शून्यैवेयमयोध्या सलक्ष्यते । कुतः—
नागेन्द्रा यवसाभिलाषविमुखाः सास्रेक्षणा वाजिनो
हेषाशून्यमुखः सवृद्धवनिताबालाश्च पौरा जनाः ।
त्यक्ताहारकथाः—सुदीनवदनाः क्रन्दन्त उच्चैर्दिशा
रामो याति यया सदारसहजस्तामेव पश्यन्त्यमी ॥ (२)
यावदहमपि महाराजस्य समीपवर्ती भविष्यामि । (परिक्रम्या-
वलोक्य) अये ! अयं महाराजो महादेव्या सुमित्रया च
सुदृ सहमपि पुत्रविरहसमुद्भव शोकं निगृह्यात्मानमेव संस्थापयन्ती-