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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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की साँस ले रहा है। सौभाग्य से मैं वही राम हूँ और महाराज, महा-
राज ही है। तो फिर अब सीता से मिल लूँ।
अवदातिका - महारानी, ये राजकुमार आ रहे हैं। आपने तो वल्कल
नहीं उतारा।
राम - सीते, क्या बैठी हुई हो ?
सीता - ऐ, पतिदेव हैं। पतिदेव की जय हो।
राम - सीते, बैठो। (बैठते हैं)
सीता - जो आज्ञा। (बैठ जाती है)
अवदातिका - महारानी, राजकुमार का वेश तो अभी भी वही है। - वह बात
झूठी सी लगती है।
सीता - वैसे आदमी झूठी खबर नहीं फैलाते। अथवा राजपरिवारों में अनेको
घटनाएं होती रहती हैं।
राम - हे सीते, यह क्या कह रही हो ?
सीता - कुछ नहीं। यह लड़की अभिषेक-अभिषेक कह रही थी।
राम - मैं तुम्हारी उत्कण्ठा समझ रहा हूँ। हां, आज अभिषेक था। सुनो।
आज पिताजी ने आचार्य, मन्त्री, पुरवासीगण, सभी की उपस्थिति
में एक प्रकार से छोटा सा दरबार लगा कर, मुझे बाल्यावस्था
से परिचित अपनी गोद में बैठा कर, बड़ी ममता से "कौशल्या नन्दन"
के नाम से बुला कर कहा-बेटा, यह राज्यभार स्वीकार करो।
सीता - इस पर आपने क्या कहा ?
राम - सीते, तुम इस पर क्या अनुमान करती हो ?
सीता - मेरा विचार है कि उस समय आप बिना कुछ बोले ही लम्बी सांस
लेकर महाराज के चरणों पर गिर गए होगे।
राम - ठीक सोचा। विधाता एक जैसे विचार वाले जोड़े कम ही बनाता है।
मैं सचमुच उनके चरणों मे जा गिरा। उस समय मेरी और पिताजी
की आंखें एक साथ भर आईं। उनके आसुओ से मेरा सिर और मेरे
अश्रुजल से उनके चरण कमल भीग गए।
सीता - इसके बाद क्या हुआ ?
राम - इसके बाद जब मैंने उनकी अनुनय को अस्वीकार कर दिया, तब
उन्होंने अपने जीर्ण-शीर्ण प्राणों की शपथ दी।