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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 296 में से

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श्लाघनीये = प्रशंसनीय । राहुदोषे = राहु से ग्रस लेने पर । तारा = चन्द्रमा
की पत्नी रोहिणी । याति = चली जाती है । करेणु = हथिनो । पङ्कलग्नम्
= कीचड़ मे फँसे हुए । व्रजतु = जाए । चरतु = आचरण करे । 'भर्तृनाथा =
स्वामी के अधीन । आच्छिद्य = छीन कर । अननुभूताः = काम में नहीं लिए
गए । निर्वर्त्यताम् = पूरा कीजिए ।
अन्वय-सत्यम् अवेक्षमाणे ताते धनु नमयि । स्वधनं हरन्त्यां मातरि
शर मुञ्चानि, दोषेषु बाह्यम् अनुज भरत हनानि, त्रिषु पातकेषु रोषणाय किं
रुचिरम् । (२२)
अन्वय-यत्कृते महति क्लेशे राज्ये मे मनोरथ. न । चतुर्दश वर्षाणी
त्वया वने वस्तव्यम् किल । (२३)
अन्वय-अनया दत्तान् वल्कलान् तावत् मङ्गलार्थे आनय । अन्यः
नृपै नैवाप्त नोपपादितं धर्म करोमि । (२४)
अन्वय- राहुदोषे ऽपि तारा शशाकम् अनुचरति । च वनवृक्षे पतर्ति
लता भूमि याति । करेणुः पंकलग्नं गजेन्द्र न त्यजति । व्रजतु धर्मम् चरतु ।
हि नार्यः भर्तृनाथा । (२५)
हिन्दी अर्थ
लक्ष्मण-आर्य यह आया ।
राम-तुमको शान्त करने के लिए ही मैने ऐसा कहा है । अब तुम ही
बताओ ।
अपनी प्रतिज्ञा का पालन करने वाले पिताजी पर धनुष उठाया जाये ।
पूर्व प्रतिज्ञात अपने विवाह शुल्क को माँगने वाली, माता पर
वाण छोड़ूँ । अथवा निर्दोष बने हुए छोटे भाई भरत को मारूँ ।
इन तीनो भयंकर पापो मे से तुम्हारे क्रोध को कौन-सा अच्छा
लगता है ? (२२)
लक्ष्मण-(आँसू भर कर) हाय धिक्कार है । हमे विना जाने ही आप
उलाहना दे रहे है ।
जिसके कारण महान् दुःख हो रहा है, उस राज्य के प्रति मेरी
अभिलाषा नही है । मुझे पीडा यह है कि १४ वर्ष तक आपको वन
में रहना पड़ेगा । (२३)
राम-क्या इस पर महाराज बेंहोश हो गए । हाय, उन्होने तो अपनी
अधीरता दिखा दी । हे सीते,