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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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( 62 )
इस सेविका के द्वारा दिये गए ये वल्कल वस्त्र मुझे शुभ कार्य करने
के लिए दो । मैं दूसरे राजाओं द्वारा नही प्राप्त किए गए और न
किए गए आचरण को करूँगा । (२४)
सीता--आर्यपुत्र लीजिए ।
राम- हे सीते ! तुमने क्या निश्चय किया है ?
सीता-मैं तो आपकी सहधर्मचारिणी हूँ ।
राम-मुझे तो अकेले को ही जाना है ।
सीता-इसीलिए तो आपके साथ चल रही हूँ ।
राम-वहाँ तो जगल में रहना पड़ेगा ।
सीता-वह मेरे लिए राजमहल होगा ।
राम-तुमको सास-ससुर की सेवा भी तो करनी चाहिए ।
सीता-इसके लिए मैं देवताओ को प्रणाम करती हूँ ।
राम- हे लक्ष्मण, इसे रोको ।
लक्ष्मण-आर्य, ऐसे सम्माननीय अवसर पर इन देवी को नही रोक सकता
हूँ क्योकि—
राहु के द्वारा चन्द्रमा के ग्रहण कर लेने पर भी रोहिणी चन्द्रमा के
साथ रहती है । वन मे वृक्ष के गिर जाने पर उसके साथ लिपटी
हुई लता भी पृथ्वी पर आ जाती है । हथिनी कीचड़ मे सने हाथी
को नही छोड़ती है । अत. यह सीता भा वन जाए और अपने धर्म
(कर्त्तव्य) का आचरण करे क्योकि स्त्रियो के लिए तो पति ही
सर्वस्व होते है । (२५)
(प्रवेश करके)
चेटी—महारानी की जय हो ! सज्जागृह की रक्षिका आर्या रेवा प्रणाम करके
सूचित करती है कि अवमातिका मगीतशाला से कुछ वल्कल वस्त्र
स्वय ही ले आई है । हो सकता है कि वे अच्छे नही हो । ये दूसरे
नये वल्कल है । इनसे आप अपना प्रयोजन पूरा कर लीजिए ।
राम-भद्रे, इधर लाओ । यह तो सतुष्ट है । मुझे आवश्यकता है ।
चेटी-स्वामी ग्रहण करें । (उन्हे देकर निकल जाती है ।)
(राम लेकर पहनते है ।)
(१०) मूल
लक्ष्मणः—प्रसीदत्वार्यः ।