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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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( 56 )
से कहा कि भरत का राज्य सिंहासन पर अभिषेक कर दो।
इसमें लोभ नहीं है ?
राम--आर्य, (हमारी ओर अधिक स्नेह होने के कारण ही आप वास्तविक्ता
को नहीं देख रहे है। क्योकि, यदि विवाह के मूल्य मे पुत्र
लिए विशेष-रूप से सम्भावित राज्य को मागा जाता है, तो इसमे
उसका लोभ है और भाई के राज्याधिकार को लेने वाले हम लोग
क्या लोभ रहित है ? (१५)
काञ्चुकीय--किन्तु ।
राम--मैं इसके आगे जननी की निन्दा नही सुनना चाहता हूँ । त
फिर महाराजा के समाचार कहो ।
काञ्चुकीय--इसके बाद फिर,
राजा के द्वारा दुःख के कारण बिना कुछ बोले ही मैं हाथ के सकेत :
आपके पास भेजा गया हूँ । राजा उस स्थिति की अपेक्षा कुछ
अधिक अच्छी लगने वाली मूर्च्छा को प्राप्त हो गए, ऐसा मेरा विचा-
है । (१६)
(८) मूल
(नेपथ्ये)
कथं कथ मोहमुपगत इति ?
यदि न सहसे राज्ञो मोहं धनुः स्पृश मा दया
रामः-- (आकर्ण्य पुरतो विलोक्य)
अक्षोभ्यः क्षोभितः केन लक्ष्मणो धैसार्यगरः ।
येन् रुष्टेन पश्यामि शताकीर्णमिवाग्रत. ॥ (१७)
(ततः प्रविशति धनुर्वाणपाणिर्लक्ष्मणः)
लक्ष्मण.- (सक्रोधम्) कथ कथं मोहमुपगत इति ।
यदि न सहसे राज्ञो मोहं धनुः स्पृश मा दया
(स्वजननिभृत. सर्वोऽप्येव मृदुः परिभूयते ।
अथ न रुचित मुञ्च त्वं मामहं कृतनिश्चयो
युवतिरहित लोकं कर्तुं यतश्छलित वयम् ॥ (१८)
सीता--आर्यपुत्र ! रोदितव्ये काले सौमित्रिणा धनुगृहीतम् । अपूर्व
खल्वस्यायास. ।
रामः-- सुमित्रामातः ! किमिदम् ।