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परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary

भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished320 पृष्ठ

१६८ परशुरामकल्पसूत्रम्
की अर्धरात्रि में ही कृष्णजन्म मनाया जाता है। अर्धरात्रि का निशीथ समय चतुर्थ
सन्ध्या का पुण्यप्रद समय भी है। उपासक उस अवस्था का एकान्त सदुपयोग
करता है। उस समय श्रीविद्यासाधक को अनिवार्यतः जगे रहना चाहिये। जगकर
उस समय क्या करना चाहिये, इसका निर्देश कर रहे हैं—
शरीर की संरचना की ओर साधक का ध्यान आकृष्ट करते हुए सूत्रकार
कह रहे हैं कि, मनुष्य का हृदय एक आकाश है। यह परम उत्कृष्ट आकाश
है, उस द्वादशदल कमल रूप आकाश-देश से एक स्वाभाविक शब्द ध्वनित
होता रहता है। हाथों से कान दबा लेने पर वह विचित्र शब्द सुनाई पड़ता
है। वह मध्यरात्र में बाह्य शब्दों के शान्त रहने पर कान विना बन्द किये
भी सुनाई देता है। यह श्रवण एक प्रकार का श्रवणानुभव सदृश माना जाता
है। उस अनाहत शब्द की श्रुत्यनुभूति में एक प्रकार की आनन्दमयी ऊर्जा
का उल्लास होता है। ऐसे ऊर्जस्वल आनन्द को प्रदान करने वाली यह
अनाहत ध्वनि है। इसका अनुसन्धान साधक को उस समय अवश्य करना
चाहिये॥२॥
शिवादिगुरुनमस्कारः
‘शिवादिश्रीगुरुभ्यो नमः’ इति मूर्ध्नि बध्नीयादञ्जलिम् ॥३॥
शिवादि इति स्पष्टम् ॥३॥
आदिगुरु शिव माने जाते हैं। गुरुजनों के प्रणाम करने के अवसर पर
सर्वप्रथम शिव को ही नमस्कार करना चाहिये। इसके बाद अन्य गुरुजनों का
नमस्कार विहित है। प्रणाम करते हुए शिर पर अञ्जलि बाँधकर मस्तक झुकाने
का भी क्रम अपनाना चाहिये। इस प्रक्रिया में श्रद्धा का प्राधान्य रहना
चाहिये॥३॥
वाराहीपद्धतौ सर्वमन्त्रेषु बीजविशेषस्य योगमाह
वाचमुच्चार्य ‘ग्लौं’ इति च पद्धतावस्यां सर्वे मनवो
जप्याः ॥४॥
अस्यां पद्धतौ सर्वमन्त्रादौ, ‘ऐं ग्लौं’ इति योज्यमित्यर्थः ॥४॥

वाराहीक्रमः १६९
वाराही उपासना के क्रम में सर्वप्रथम जिस नियम पर ध्यान देना चाहिये,
वह है कि, वाक् अर्थात् 'ऐं' बीज मन्त्र के साथ 'ग्लौं' बीज का सभी मन्त्रों
के आदि में प्रयोग करना चाहिये॥४॥
अथ भूतशुद्धिं विधत्ते
मूलादिषण्मन्त्रैर्यथामन्त्रं लिङ्गदेहं शोधयेत् ॥५॥
मूलादिषण्मन्त्रैरधस्तन एव सूत्रे वक्ष्यमाणैः, यथामन्त्रैः, मन्त्रे तथा
लिङ्गदेहं सूक्ष्मदेहं शोधयेत् ॥५॥
आगे के मन्त्र में छः मूलादि मन्त्र कहे गये हैं। उनके अनुसार सूक्ष्मदेह
का शोधन करना चाहिये। यह शास्त्र का आदेश है॥५॥
तान् षण्मन्त्रान् आह
मूलशृङ्गाटकात् सुषुम्नापथेन 'जीवशिवं परशिवे योजयामि
स्वाहा' 'यं सङ्कोचशरीरं शोषय शोषय स्वाहा' 'रं सङ्कोचशरीरं दह
दह पच पच स्वाहा'। 'लं शाम्भवशरीरमुत्पादय स्वाहा'
'हंसः सोहमवतरावतर शिवपदात् जीवसुषुम्नापथेन प्रविश,
मूलशृङ्गाटकमुल्लसोल्लस ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल हंसः सोहं
स्वाहा' इति भूतशुद्धिं विधाय ॥६॥
स्वाहेत्यत्रैकमन्त्रसमाप्तिः। सुषुम्णामार्गेण परशिवे शिवयोजनशोषण-
दाहनाप्लावनशाम्भवशरीरोत्पत्ति-जीवस्वस्थाननयनानि क्रमेण षण्मन्त्रैः
कुर्यात्॥६॥
इस सूत्र में छः मन्त्रों के प्रयोग के साथ ही साथ भूतशुद्धि के सन्दर्भ
में जिस साधना-प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है, वह उपासना को नव्य आयाम
देने वाला है। साधना का सारा सन्दर्भ इसमें है। इसे सम्पन्न कर लेने के बाद
दिव्यता की नयी भूमिका में उपासक प्रवेश कर जाता है।
१. सर्वप्रथम आसन पर विराजमान उपासक मूलाधार चक्र से सुषुम्णा
नाड़ी के मार्ग से अपने जीवशिव को परशिव में संयोजन करने की प्रक्रिया

१७० परशुरामकल्पसूत्रम्
अपनाता है। यह क्रिया मात्र ध्यान की कल्पना मात्र नहीं होती। यह सूत्रप्रोक्त
मन्त्र के माध्यम से चक्र-साधना में निष्णात व्यक्ति ही कर सकता है। जीवशिव
का परशिव में समायोजन औन्मनस दशा की परा भूमि पर ही सम्पन्न हो सकता
है, इस सम्बन्ध में अधिक कहना उचित नहीं। इस प्रथम प्रक्रिया का मन्त्र है—
‘जीवशिवं परशिवे योजयामि स्वाहा’। दूसरी प्रक्रिया इस ज्ञान पर आधारित है
कि, सङ्कोच से मिला यह शरीर पराविद्या प्राप्ति के लिये पर्याप्त नहीं है। इसलिये
इसमें आयी संकोच की आर्द्रता सूख जाय, इसे जला दिया जाय, जले भस्म
को शिवामृत प्रवाह में बहा दिया जाय, तब शाम्भव शरीर को उत्पादित कर
जीवशिव को शिवपद से उसी शाम्भव शरीर में प्रवेश करा दिया जाय। उसी
नवनिष्पन्न प्रकाशमान शाम्भव शरीर की दिव्यता में स्वात्म को प्रतिष्ठित कर
माँ की उपासना की जाय। यह सब प्रकल्पन की क्रिया होती है और बड़ी
महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसमें पाँच मन्त्रों द्वारा पाँच प्रकार के प्रकल्पन हैं, जो
क्रम इस प्रकार है—
२. शोषण—‘यं सङ्कोचशरीरं शोषय शोषय स्वाहा’।
३. दाहन—‘रं सङ्कोचशरीरं दह दह पच पच स्वाहा’।
४. आप्लावन—‘वं परमशिवामृतं वर्षय वर्षय स्वाहा’।
५. शाम्भवशरीरोत्पादन—‘लं शाम्भवशरीरमुत्पादयोत्पादय स्वाहा’।
६. जीवस्वस्थानानयन—‘हंसः सोऽहमवतरावतर शिवपदाज्जीवसुषुम्णापथेन-
प्रविश मूलशृङ्गाटकमुल्लसोल्लस ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल हंसः सोहं
स्वाहा’।
इन मन्त्रों के द्वारा गुरुनिर्दिष्ट क्रमानुसार स्वात्म को दिव्य बना लेना
आवश्यक है। इसके बाद ही आगे की उपासना-प्रक्रिया अपनायी जाती है ।।६।।
अथ मातृकासम्पुटिताभ्यां बीजाभ्यां न्यासमाह
[L25

वाराहीक्रमः १७१
मातृकाभिः आदिक्षान्तैः सम्पुटितां द्वितारीप्रकृतत्वाद् ऐं ग्लौं। तद्यथा
आदिक्षान्तं प्रथमं सबिन्दु उच्चार्य मध्ये ऐं ग्लौं इति वर्णबीजद्वयं पुनरपि
आदिक्षान्तं ततो नमःपदं न्यासरूपत्वात्। एवं वक्ष्यमाणैकचत्वारिंशत्स्थानेषु
न्यसेदित्यर्थः। कं शिरः 'कं शिरोऽम्बुनोः' इत्यमरः। आननवृत्तं मुखवृत्तम्,
अक्षिद्वयं, श्रोत्रद्वयं, नासाद्वयम्, गण्डद्वयम्, ओष्ठद्वयं, दन्तपक्तिद्वयम्, मूर्धा
(शिरोरन्ध्र) आस्यं गुहारूपं, दोर्द्वयं, पादसन्धिद्वयं, पादाग्रद्वयं, पृष्ठः, नाभिः,
जठरं, कुक्षिः, हृद्वक्षः, दोर्मूलं, गलस्यापरभागः, पाश्चात्यदेशः, कक्षः,
पुनर्वामपार्श्वे हृदादिकक्षपर्यन्तं पाणिद्वयं, पादद्वयं, पुनर्जठरं, पुनराननम्, एवम्
एकचत्वारिंशत्स्थाने मातृकासम्पुटितां द्वितारीं न्यसेत् ॥७॥
अ से क्ष पर्यन्त ५० वर्णों की मातृका के प्रत्येक वर्ण में बिन्दु लगाकर
बोलने के बाद वार्त्ताली बीज 'ऐं ग्लौं'—बोलकर पुनः मातृका के अ क्ष वर्ण
सबिन्दु बोले जाने पर एक सम्पुट मन्त्र बनता है। ऐसे मन्त्र को इकतालीस
बार इकतालीस अङ्गों पर बोलकर नमः के साथ न्यास करना चाहिये। इकतालीस
शरीर के अङ्ग सूत्र में निर्दिष्ट हैं—
१ शिर, १ मुखवृत्त, २ नेत्र, २ कर्ण, २ नासापुट, २ कपोल, २ ओष्ठ,
२ दन्तपङ्क्ति, १ ब्रह्मरन्ध्र, १ मुखान्त, २ दोर्मूल, २ मध्यसन्धि, २ मणिबन्ध,
२ अङ्गुल्यग्र, २ उरुमूल, २ जानु, २ पादसन्धि, २ पार्श्व, १ नाभि, १ पृष्ठ,
१ जठर, १ वक्ष, २ हाथ, २ पाद, १ हृदादि-मूर्द्धान्त कुल मिलकर ४१
होते हैं॥७॥
अङ्गुलिन्यासः
अन्धेप्रभृति सप्तार्णपञ्चकमङ्गुष्ठादि-कनिष्ठान्तम् ।।८।।
अत्रापि पूर्वसूत्राद्विन्यस्येत्यस्यानुवृत्तिः। 'अन्धे अन्धिनि नमः' इत्यादि।
'स्तम्भे स्तम्भिनि नमः' इत्यन्तैः पञ्चभिः सप्तार्णमन्त्रैरङ्गुष्ठादिकनिष्ठान्त-
क्रमेण विन्यस्य। मन्त्रस्वरूपं तु—अन्धे अन्धिनि नमः अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
एवमग्रेऽप्यूह्यम्। इत्यङ्गुलिन्यासः ॥८॥
अङ्गुलियों पर न्यास करने के पहले मूलमन्त्र के पहले का भाग वाराहमुखि
तक बोलकर—

१७२ परशुरामकल्पसूत्रम्
१. अन्धे अन्धिनि नमः अङ्गुष्ठाभ्यां नमः,
२. रुन्धे रुन्धिनि नमः तर्जनीभ्यां नमः,
३. जम्भे जम्भिनि नमः मध्यमाभ्यां नमः,
४. मोहे मोहिनि नमः अनामिकाभ्यां नमः और
५. स्तम्भे स्तम्भिनि नमः कनिष्ठिकाभ्यां नमः बोलकर 'अस्त्राय फट्' तक मन्त्र
पूरा कर देना चाहिये। १ से ५ तक के सभी मन्त्र सात-सात अक्षरों के हैं।
इसीलिये इन्हें सप्तार्ण मन्त्र कहते हैं॥८॥
अथ हृदयादिन्यासः
वाङ्नमो भगवतीत्यारभ्य त्रयोदशभिर्हृदयं षड्भिः शिरः,
दशभिः शिखां, सप्तभिः सप्तभिः कवचनेत्रास्त्राणि विन्यस्य।।९।।
वागित्यारभ्य मूलमन्त्रत्रयोदशादिमवर्णैर्हृन्मन्त्रसहितैः शिखायाम्, तदग्रि-
सप्तवर्णैः कवचमन्त्रसहितैः नेत्रेषु, तदग्रिमसप्तवर्णैः अस्त्रमन्त्रसहितैः अस्त्रं च
विन्यसेत्। मन्त्रस्वरूपं यथा—ऐं ग्लौं ऐं नमो भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि
हृदयाय नमः। एवमग्रेऽपि योज्यम्। इति हृदयादिषडङ्गन्यासः ॥९।।
हृदयादि न्यास का विधान इस सूत्र में दिया गया है। सर्वप्रथम द्वितारी
का प्रयोग कर सूत्र के अनुसार वाग्बीज 'ऐं' का उच्चारण करना चाहिये। पुनः
मूलमन्त्र के १३ वर्णों से हृदय में, छः वर्णों से शिर पर, दश वर्णों से शिखा
में, तथा सात-सात से कवच, नेत्र और अस्त्र में विन्यास होना चाहिये। मन्त्रों
का स्वरूप इस प्रकार होना चाहिये—
१. ऐं ग्लौं ऐं नमो भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि हृदयाय नमः।
२. ऐं ग्लौं वाराहि वाराहि शिरसे स्वाहा।
३. ऐं ग्लौं वराहमुखि वराहमुखि शिखायै वषट्।
४. ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि नमः कवचाय हुम्।
५. ऐं ग्लौं रुन्धे रुन्धिनि नमः नेत्रत्रयाय वौषट्।
६. ऐं ग्लौं जम्भे जम्भिनि नमः अस्त्राय फट्।
इस तरह मूल मन्त्र से हृदयादि न्यास का विधान सूत्रानुसार पूरा
होता है ॥९॥

वाराहीक्रमः १७३
आत्मालङ्करणम्
गन्धादिभिरलङ्कृत्य अर्घ्यं शोधयेत् ॥१०॥
आदिपदेन शस्त्रभूषणादिपरिग्रहः। आत्मानमिति शेषः। अर्घ्यं शोधये-
दित्यस्य अग्रिमसूत्रेण सहान्वयः॥१०॥
वस्तुतः यह सूत्र ग्यारहवें सूत्र का पूरक सूत्र है। इसमें किसी प्रक्रिया
अथवा विधि की चर्चा नहीं है। अर्घ्यशोधन के पूर्व साधक को स्वयं आकर्षक
रूप से सजा लेना चाहिये। कपड़े सुन्दर हों, गहने के रूप में गले में स्वर्णमाला,
अङ्गुलिभाग में अँगूठियाँ आदि पहन लेनी चाहिये। इसके बाद अर्घ्य का शोधन
होता है॥१०॥
अथ अर्घ्यशोधनमाह
आत्मनोऽग्रभागे गोमयेन विलिप्ते, हेतुमिश्रितजलेन चतुरस्रं
वर्त्तुलं षट्कोणं त्रिकोणमन्तरान्तरं विलिख्य, अर्घ्यशोधनमनुभिः
श्यामाक्रमोक्तैः आधारार्घ्यपात्राणि संशोध्य सामान्येनाभ्यर्च्य तदर्घ्यं
वषडित्युद्धृत्य, स्वाहेति संस्थाप्य हुं इत्यवकुण्ठ्य वौषट्
इत्यमृतीकृत्य फडिति संरक्ष्य, नमः पुष्पं निक्षिप्य, मूलेन निरीक्ष्य,
तत्पृषतैः पावयित्वा सपर्यावस्तुनि ॥११॥
हेतुमिश्रितेन प्रथममिश्रितेन। चतुरस्रादिमण्डलं प्रवेशरीत्या, चतुरस्रस्य
सर्वबाह्यत्वेन भूरिदर्शनात्। अनन्तरान्तरं परस्परमसंलग्नं यथा तथा मण्डलं
कुर्यात्। अत्र विशेषांशमुक्त्वा शेषधर्मानतिदिशति-अर्घ्यशोधनेनेति। सामान्येन
समस्तमूलमन्त्रेण। शेषं स्पष्टम्। तदर्घ्यं सपर्यावस्तूनीत्यन्तं स्पष्टोऽर्थः।
एतावत्पर्यन्तं विहितमर्घ्यशोधनं सामान्यविशेषार्घ्ययोः समानम्
अविशेषेणोक्तेः ॥११॥
गोमय से लिपी-पुती भूमि अत्यन्त पवित्र मानी जाती है। उसी भूमि पर
हेतु द्रव्यमिश्रित जल से चतुरस्र वर्त्तुल षट्कोण त्रिकोण मण्डल का इस प्रकार
निर्माण होना चाहिये कि, वे एक-दूसरे से बिना स्पर्श किये अन्तर-अन्तर पर
रहें। अर्घ्यशोधन के मन्त्रों से श्यामाक्रम के अनुसार शोधन करते हैं। यह ठीक

१७४ परशुरामकल्पसूत्रम्
नहीं। सामान्य मूलमन्त्र से शोधन का विधान है। इसी से अर्चना भी होनी
चाहिये। षड् जाति मन्त्र द्वारा इसका उद्धार कर स्वाहा मन्त्र से संस्थापित करे।
हुं बीज से उसका अवगुण्ठन करना आवश्यक है। वौषट् से अमृतीकरण, फट्
जाति मन्त्र से संरक्षण देकर 'नमः' इस मन्त्र से फूलों को मण्डप में छींट देना
चाहिये। मूल मन्त्र से अच्छी तरह देखकर अर्घ्य के पवित्र जल-बिन्दुओं से सपर्या
प्रक्रिया में समुपस्थित सारी सामग्री को पवित्र कर लेना चाहिये।।११।।
पुनरप्यर्घ्यशोधनानन्तरं कर्त्तव्यन्यासानाह
शिरोवदनहृद्गुह्यपादेषु पूर्वोक्तसप्तकपञ्चकं विन्यस्य विद्या-
मष्टधा खण्डयित्वा पादादिजानु-जान्वादिकटि-कट्यादिनाभि-
नाभ्यादिहृदय-हृदयादिकण्ठकण्ठादिभ्रूमध्य-भ्रूमध्यादिललाट-
ललाटादिमौलिषु एकत्रिशंत् सप्त सप्त सप्त सप्त सप्त
पञ्चत्रिंशदेका-दशार्णखण्डान् मातृकास्थानेषु मूलमनुपदानि च
न्यस्य ।।१२।।
शिरोवदनेति। पूर्वोक्तसप्तार्णमन्त्रपञ्चकं शिर आदि पञ्चसु स्थानेषु
न्यसेत्। पादद्वयं मिलित्वैकं स्थानम्, विद्यामिति, मूलविद्याम् अष्टधा खण्ड-
यित्वा विभज्य क्रमेण अष्टखण्डानष्टसु स्थानेषु विन्यसेदित्यर्थः। स्थानानि
तानि कानि इत्याकाङ्क्षायामाह—पादादि-जान्विति, ललाटादिमौलीत्यन्तेन।
पादादि-जान्वित्यत्र जानुपर्यन्तमित्यर्थः। तेन प्रथमखण्डन्यासे जान्वन्व-
वलेशो न। एवमग्रेऽपि। अष्टधा खण्डयेदित्युक्तम्। तत्रैकखण्डे कियन्तो वर्णा
इत्याकाङ्क्षायाम् आह—एकत्रिंशदित्यादिना। मूलस्य खण्डाष्टकं क्रमादेक-
त्रिंशदादिसङ्ख्याकं भवतीत्यर्थः। इत्यष्टखण्डन्यासः। मूलपदन्यासमाह—
मातृकास्थानेषु इति। मातृकास्थानानि शिरः १ मुखवृत्तं २ नेत्रद्वितयं ४ कर्णद्वयं
६ नासाद्वयं ८ कपोलद्वयम् १० ओष्ठद्वयं १२ दन्तपङ्क्तिद्वयं १४ जिह्वा
१५ ब्रह्मरन्ध्रं १६ दक्षदोर्मूलं १७ बाहुमध्यं १८ मणिबन्धः १९ अङ्गुलिमूलम्
२० अङ्गुल्यग्रम् २१ एवंवामदोर्मूलादारभ्य अङ्गुल्यग्रान्तं पञ्च २६ दक्षोरूमूलं
२७ दक्षजानु २८ तत्पादसन्धिः २९ तत्पादाङ्गुलिमूलं ३० तदङ्गुल्यग्रम् =
३१ एवं वामभागे पञ्च = ३६ पार्श्वद्वयं = ३७ पृष्ठं ३८ नाभ्यूरुजठराणि

वाराहीक्रमः १७५
(त्रीणि) ४१ हृदि ४२ स्कन्धद्वयं ४४ गलापरभागः ४५ हृदयादिदक्षपाण्यन्तं
४६ हृदयादिवामपाण्यन्तं ४७ हृदयादिदक्षपादान्तं ४८ हृदयादिवामपादान्तं
४९ नाभिमूर्धनी ५१ एवमेकपञ्चाशत् स्थानानि।
एवमेकपञ्चाशत्स्थानेषु मूलमन्त्रस्य एकपञ्चाशत्पदानि न्यसेत् ।।१२।।
इस सूत्र में पहले कहे गये सप्तार्ण मन्त्रपञ्चक न्यास, मूलविद्या का
अष्टखण्ड न्यास और मातृका-स्थानों में मूलविद्या के पदन्यासों का अर्थात् तीन
प्रकार के न्यासों का निर्देश दिया गया है। इनका क्रमिक रूप से इस प्रकार
का विधान करना चाहिये—
१. सप्तार्णमन्त्रपञ्चक न्यास
अ—ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि नमः शिरसि।
आ—ऐं ग्लौं रुन्धे रुन्धिनि नमः वदने।
इ—ऐं ग्लौं जम्भे जम्भिनि नमः हृदि।
ई—ऐं ग्लौं मोहे मोहिनि नमः गुह्ये।
उ—ऐं ग्लौं स्तम्भे स्तम्भिनि नमः पादयोः।
२. अष्ट खण्डों में मूलमन्त्रन्यास-
अ. 'ऐं ग्लौं ऐं नमो भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि वाराहि वाराहि वराहमुखि
वराहमुखि' इससे आपादजानुपर्यन्त।
आ. 'ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि नमः' से जानु से कटि पर्यन्त।
इ. 'ऐं ग्लौं रुन्धे रुन्धिनि नमः' से कटि से नाभि पर्यन्त।
ई. 'ऐं ग्लौं जम्भे जम्भिनि नमः' से नाभि से हृदय पर्यन्त।
उ. 'ऐं ग्लौं मोहे मोहिनि नमः' से हृदय से कण्ठ तक।
ऊ. 'ऐं ग्लौं स्तम्भे स्तम्भिनि नमः' से कण्ठ से भ्रूमध्य तक।
ऋ. 'ऐं ग्लौं सर्वदुष्टप्रदुष्टानां सर्वेषां सर्ववाक्चित्तचक्षुर्मुखगतिजिह्वास्तम्भनं
कुरु कुरु शीघ्रं वश्यं नमः' इतने मन्त्रांश से भ्रूमध्य से ललाटपर्यन्त
न्यास करना चाहिये और आठवें मुख्यांशरूप—

१७६ परशुरामकल्पसूत्रम्
‘ऋ. ‘ऐं ग्लौं ठः ठः ठः ठः हुं अस्त्राय फट्’ से ललाट से ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त
न्यास करना चाहिये। इस प्रकार पूरे मन्त्र को ८ खण्डों में बाँट-
कर पैर से ब्रह्मरन्ध्र तक का मन्त्रन्यास पूरा होता है।
३. मातृका स्थानों में मूल विद्या के पदों का न्यास इस प्रकार करना
चाहिये—
क्रम, मूलविद्या के अंश, मातृका स्थान।
१. ऐं ग्लौं ऐं १. शिरसि (मातृका स्थानों का स्पर्श करना चाहिये)
२. नमः २. मुखवृत्ते
३. भगवति ३. दक्षनेत्रे
४. वार्त्तालि ४. वामनेत्रे
५. वार्त्तालि ५. दक्षकर्णे
६. वाराहि ६. वामकर्णे
७. वाराहि ७. दक्षनासापुटे
८. वराह ८. वामनासापुटे
९. मुखि ९. दक्षकपोले
१०. वराह १०. वामकपोले
११. मुखि ११. ऊर्ध्वोष्ठे
१२. अन्धे १२. अधरोष्ठे
१३. अन्धिनि १३. ऊर्ध्वदन्तपङ्क्तौ
१४. नमः १४. अधोदन्तपङ्क्तौ
१५. रुन्धे १५. जिह्वायाम्
१६. रुन्धिनि १६. ब्रह्मरन्ध्रे
१७. नमः १७. दक्षदोर्मूले
१८. जम्भे १८. बाहुमध्ये
१९. जम्भिनि १९. मणिबन्धे
२०. नमः २०. अङ्गुलिमूले
२१. मोहे २१. अङ्गुल्यग्रे
२२. मोहिनि २२. वामदोर्मूले
२३. नमः २३. वामबाहुमध्ये

वाराहीक्रमः १७७
२४. स्तम्भे २४. वामबाहुमध्ये
२५. स्तम्भिनि २५. वाममणिबन्धे
२६. नमः २६. वामाङ्गुल्यग्रे
२७. सर्व २७. दक्षोरुमूले
२८. दुष्ट २८. दक्षजानौ
२९. प्रदुष्टानां २९. दक्षपादसन्धौ
३०. सर्वेषां ३०. दक्षपादाङ्गुलिमूले
३१. सर्व ३१. दक्षाङ्गुल्यग्रे
३२. वाक् ३२. वामोरुमूले
३३. चित्त ३३. वामजानौ
३४. चक्षुः ३४. वामपादसन्धौ
३५. मुख ३५. वामपादाङ्गुलिमूले
३६. गति ३६. वामाङ्गुल्यग्रे
३७. जिह्वा ३७. पार्श्वद्वये
३८. स्तम्भनं ३८. पृष्ठे
३९. कुरु ३९. नाभौ
४०. कुरु ४०. ऊर्वोः
४१. शीघ्रं ४१. जठरे
४२. वश्यं ४२. हृदि
४३. ऐं ४३. दक्षस्कन्धे
४४. ग्लौं ४४. वामस्कन्धे
४५. ठः ४५. गलापरभागे
४६. ठः ४६. हृदयादिदक्षपाण्यन्तम्
४७. ठः ४७. वामपाण्यन्तम्
४८. ठः ४८. हृदयादिदक्षपादान्तम्
४९. हुं ४९. हृदयादिवामपादान्तम्
५०. अस्त्राय ५०. नाभौ
५१. फट् ५१. मूर्ध्नि
परशुरामकल्पसूत्रानुसार और रामेश्वरवृत्ति के अनुसार इसी क्रम से न्यास
करना चाहिये। इस प्रकार तीनों सूत्रोक्त न्यास पूरे करने चाहिये।।१२।।

१७८ परशुरामकल्पसूत्रम्
तत्त्वन्यासमाह
पूर्वोक्तानष्टखण्डानेकैकश उच्चार्य पूर्वोक्तेषु स्थानेषु 'ह्रां'
शर्वाय क्षितितत्त्वाधिपतये' 'ह्रीं' भवाय अम्बुतत्त्वाधिपतये, ह्रुं रुद्राय
वह्नितत्त्वाधिपतये' 'हैं' उग्राय वायुतत्त्वाधिपतये' 'ह्रौं' ईशानाय
भानुतत्त्वाधिपतये, 'सौ' महादेवाय सोमतत्त्वाधिपतये, 'हं' महादेवाय
यजमानतत्त्वाधिपतये' 'औं' भीमाय आकाशतत्त्वाधिपतये नम इति
तत्त्वन्यासः ॥१३॥
पूर्वोक्तानेकत्रिंशत्सप्तेत्यादिना खण्डितान् अष्टखण्डान् पादादि-
जान्वित्यादिस्थानेषु सर्वत्र। तत्त्वाधिपतये एतदनन्तरं 'नमः' इति पदस्यानुषङ्गेण
योगः। इति तत्त्वन्यासः ॥१३॥
१. पादादिजानुपर्यन्त ५. हृदयादिकण्ठपर्यन्त
२. जान्वादिकटिपर्यन्त ६. कण्ठादिभ्रूमध्यपर्यन्त
३. कट्यादिनाभिपर्यन्त ७. भ्रूमध्यादिललाटपर्यन्त
४. नाभ्यादिहृदयपर्यन्त ८. ललाटादिमौलिपर्यन्त
इन आठ स्थानों में मूल मन्त्र के आठ भागों के साथ सूत्रोक्त ह्रां ह्रीं
ह्रुं हैं ह्रौं सों हं औं बीजों के साथ वाले मन्त्रों को भी बोलकर ऊपर निर्दिष्ट
आठ स्थानों में न्यास करना चाहिये। जैसे प्रथम पूरा मन्त्र 'ऐं ग्लौं ऐं नमो
भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि वाराहि वाराहि वराहमुखि वराहमुखि ह्रां शर्वाय
क्षितितत्त्वाधिपतये पादादिजानुभागे नमः' बोलकर उस अङ्गभाग का स्पर्श करना
चाहिये। इसी तरह मूलविद्या के शेष सात खण्डों को बोलकर सूत्रोक्त मन्त्रों के
साथ क्रमिक अङ्गभागों का न्यासरूप स्पर्श करना चाहिये। जैसे दूसरा मन्त्र भी
इस प्रकार बनाना चाहिये—'ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि ह्रीं भवायाम्बुतत्त्वाधिपतये
नमः' मन्त्र बोलकर जान्वादिकटिपर्यन्त का स्पर्श कर अम्बुतत्त्व का न्यास करना
चाहिये। इसी तरह उक्त स्थानों में वह्नि, वायु, सूर्य, सोम, यजमान और आकाश
तत्त्वों का न्यास शेष मन्त्र बनाकर करना चाहिये ॥१३॥

वाराहीक्रमः १७९
देवीध्यानम्
मूलेन सर्वेण व्यापकं कृत्वा देवीं ध्यात्वा ।।१४।।
ध्यानं सूत्रे वक्ष्यमाणं, तन्त्रान्तरप्रसिद्धध्यानश्लोकरीत्याऽपि ज्ञेयम्।
ध्यानश्लोको यथा—
पाथोरुहपीठगतां पाथोरुहमेचकां कुटिलदंष्ट्रां।
कपिलाक्षित्रितयां घनकुचकुम्भां प्रणत वाञ्छितवदान्याम्।
दक्षोर्ध्वतोऽरिखड्गां मुसलमभीतिं तदन्यतस्तद्वत्
शङ्खं खेटं हलवरान् करैर्दधानां स्मरामि वार्त्तालीम्।।
अत्र अरिः चक्रम्। दक्षोर्ध्वत ऊर्ध्वमारभ्य। तद्वद् वामेऽप्यूर्ध्व-
मारभ्यैव ।।१४।।
इसी सातवें खण्ड के आगामी २४वें सूत्र में माँ वार्त्ताली का ध्यान वर्णित
है। सर्वप्रथम पूरा मन्त्र पढ़कर व्यापक विधि पूरी करनी चाहिये। उसके बाद
ही ध्यान करना चाहिये। यों तो २४वें सूत्र में ध्यान का उल्लेख है, फिर भी
तन्त्रान्तरोक्त मन्त्रों द्वारा ध्यान करने में कोई हर्ज नहीं। उक्त श्लोक-सूत्रानुसार
ही विरचित है। माँ नीलकमल के समान आकर्षक श्यामवर्ण से विभूषित है
और कमलासन पर ही अधिष्ठित है। उसकी दंष्ट्रा टेढी है, आँखें पिंगलवर्णी
हैं, माता के वक्ष पर वात्सल्य के प्रतीक कुचकुम्भ शोभित हैं। प्रणत की प्रार्थना
तुरत पूरी करने के लिये प्रसिद्ध हैं। माँ दाहिने हाथ में खड्ग और चक्र धारण
करती हैं। मुसल और अभयमुद्रा में हैं। इसी तरह बाँयें में भी ऊपर से नीचे
तक शङ्ख, खेटक, हल और वर मुद्रा धारण करती हैं। ऐसी महिमामयी माँ
वार्त्ताली का मैं श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहा हूँ।।१४।।
चक्रनिर्माणम्—
पुरतः पटपट्टसुवर्णरजतताम्रचन्दनपीठादिनिर्मितं दृष्टिमनोहरं
चतुरस्रत्रयं सहस्रपत्रशतपत्राष्टपत्र-षडस्रपञ्चास्रत्र्यस्रबिन्दुलक्षणं
कोलमुखीचक्रं विरच्य ।।१५।।
पटतूलमयः। पट्टः कौशेयः। पीठं फलकम्, आदिपदेन नवरत्न-
परिग्रहः। तेषु निर्मितं दृष्टिमनोहरमित्यनेन दलानां कोणानां च मानवैषम्य-

१८० परशुरामकल्पसूत्रम्
विरहः। दलमाने शास्त्रीयनियमाभावश्च सूचितः। तथापि तत् शारदातिलका-
दुद्ग्राह्य एव यन्त्रनिर्माणक्रमः प्रवेशरीत्या, बिन्दुचक्रस्य चरमपाठात्। शेषं
स्पष्टम् ।। १५ ।।
सामने ही फलक होना चाहिये, जिसमें चक्र की रचना की जा सके।
चक्र का फलक कपास के वस्त्र कौशेय, स्वर्ण, रजत, ताम्र या चन्दन का होना
चाहिये। देखने में वह आकर्षक होना चाहिये। सूत्र में जो विधि निर्दिष्ट है, वह
प्रवेश क्रम से है क्योंकि बिन्दु का उल्लेख सूत्र के अन्त में आया हुआ है।
इसकी रचना के क्रम में सर्वप्रथम चतुरस्र का निर्माण करना चाहिये। ये तीन
एक पर एक बनते हैं। उसके भीतर वृत्त में एक हजार दल वाला कमल, उसके
भीतर शतपत्र, उसके भीतर अष्टपत्र, उसमें षट्कोण, उसमें त्रिकोण और उसमें
बिन्दु की रचना कर लेने पर यन्त्र तैयार हो जाता है। इसे ही वाराही चक्र
कहते हैं।। १५ ।।
चक्रनिर्माणानन्तरं चक्रकर्त्तव्यमाह
तत्र कुसुमाञ्जलिं विकीर्य स्वर्णप्राकाराय सुधाब्धये वराहद्वीपाय
वराहपीठाय नमः। आं आधारशक्तये कुं कूर्माय, कं कन्दाय नमः,
अं अनन्तनालाय नम इति च धर्मादिभिः सह षोडशमन्त्रैः पीठे
अभ्यर्च्य ।। १६ ।।
तत्र चक्रे। स्वर्णप्राकारादयः चतुर्थ्यन्ताः। अष्टौ नमोऽन्ता मन्त्राः। तैः
पीठमध्यपूजनं, धर्मादिचतुर्भिः, अधर्मादिचतुर्भिश्च गणपतिक्रमे कॢप्तस्थाने
पूजनं, मिलित्वा षोडशभिः पीठपूजनं भवति। पीठपदेन देवतायतनं
चक्रमेव ।। १६ ।।
पूजा के उद्देश्य से यागगृह में प्रवेश करते समय चक्र पर पुष्पों भरी
अञ्जलि के द्वारा फूल अर्पित करना उचित है। इसके बाद सोलह मन्त्रों से उसकी
पूजा होनी चाहिये। सोलह मन्त्र इस प्रकार उच्चरित करना चाहिये।
१. ऐं ग्लौं स्वर्णप्राकाराय नमः। २. ऐं ग्लौं सुराब्धये नमः। ३. ऐं ग्लौं
वराहदीपाय नमः। ४. ऐं ग्लौं वराहपीठाय नमः। ५. ऐं ग्लौं आधारशक्तये नमः।
६. ऐं ग्लौं कूं कूर्माय नमः। ७. ऐं ग्लौं कं कन्दाय नमः। ८. ऐं ग्लौं अं

अनन्तनालाय नमः। इन मन्त्रों से चक्रमध्य की पूजा करनी चाहिये। तदुपरान्त
पुनः निम्नलिखित आठ मन्त्रों से पूजा करनी चाहिये। वे मन्त्र इस प्रकार बनते
हैं—९. ऐं ग्लौं धर्माय नमः। १०. ऐं ग्लौं ज्ञानाय नमः। ११. ऐं ग्लौं वैराग्याय
नमः। १२. ऐं ग्लौं ऐश्वर्याय नमः। इन मन्त्रों से अग्नि, नैऋत्य, वायव्य और
ईशान कोणों में पूजा करनी चाहिये। तदुपरान्त १३. ऐं ग्लौं अधर्माय नमः।
१४. ऐं ग्लौं अनैश्वर्याय नमः। १५. ऐं ग्लौं अवैराग्याय नमः। १६. ऐं ग्लौं
अनैश्वर्याय नमः इन मन्त्रों से पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाओं में पूजा
करनी चाहिये। यह पीठपूजा कहलाती है।।१६।।
चक्रमनुमाह
'त्रिपञ्चषडदलाष्टकशतसहस्रारपद्मासनाय नमः' इति चक्र-
मनुना चक्रमिष्ट्वा ।।१७।।
इस सूत्र में साम्राज्ञी कोलमुखी, जो विन्दु में विराजमान हैं, उनके सान्निध्य
में उल्लसित चक्र रूप देवशक्ति-प्रतीक रूप जो निर्मिति है, उसका क्रमिक
उल्लेख भीतर से बाहर की ओर किया गया है। यही चक्रमन्त्र कहलाता है।
इससे चक्र पर पुष्प अर्पित करना चाहिये। वृत्ति में केवल निबन्धकार का खण्डन
है। सूत्र से उसका कोई सम्बन्ध नहीं।।१७।।
ततो मण्डलादीनां यजनम्
वह्निमण्डलाय, सूर्यमण्डलाय, सोममण्डलाय नमः, इति त्रयो
गुणमन्त्राः। आत्ममन्त्राश्चत्वारः। इति सप्तविंशतिकमिदं पीठे
वरिवसनीयम् ।।१८।।
अत्र सोममण्डलाय नम इत्यन्तं मन्त्रत्रयम्। सं सत्त्वाय नमः, रं रजसे
नमः, तं तमसे नमः, इति गुणमन्त्राः। आं आत्मने नमः, अं अन्त-रात्मने
नमः, पं परमात्मने नमः, हीं ज्ञानात्मने नम इति आत्ममन्त्राश्चत्वारः। इत्थं
च स्वर्णप्राकारायेत्यारभ्य सप्तविंशतिः, तैः पीठपूजा कार्येत्यर्थः।।१८।।
इस सूत्र में तीन प्रकार के मन्त्र हैं—
१. तत्त्वमन्त्र—१. ऐं ग्लौं वह्निमण्डलाय नमः। २. ऐं ग्लौं सूर्यमण्डलाय नमः
और ३. ऐं ग्लौं सोममण्डलाय नमः। ये मण्डल तीन हैं।

१८२ परशुरामकल्पसूत्रम्
२. गुणमन्त्र—१. सं सत्त्वाय नमः। २. रं रजसे नमः। ३. तं तमसे नमः।
ये गुणमन्त्र भी तीन ही हैं।
३. आत्ममन्त्र—यें चार हैं, १. आं आत्मने नमः, २. अं अन्तरात्मने नमः।
३. पं परमात्मने नमः। ४. ह्रीं ज्ञानात्मने नमः। इस प्रकार ‘स्वर्णप्राकाराय
नमः’ इस १६वें सूत्र से इस अठारहवें सूत्र तक सप्तविंशति मन्त्रों से इस
सप्तविंशतिक पीठ की पूजा करने का निर्देश सूत्रकार ने दिया है। इसी
क्रम से पूजा होनी चाहिये।।१८।।
हौं प्रेतपद्मासनाय सदाशिवाय नम इति चक्रोपरि देव्यासन-
विमृष्टिः ।।१९।।
प्रेतरूपं यत्पद्मं तदभिन्नं यदासनं तत् स्वरूपो यः सदाशिवस्तस्मै नम
इति योजना, ब्रह्मा ननु सदाशिवे प्रेतरूपत्वं कथम्। एतदुक्तं ज्ञानार्णवे
पार्वतीप्रश्नोत्तरे—
ब्रह्माविष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः।
पञ्चप्रेता वरारोहे निश्चला एव ते सदा।।
अयमभिप्रायः — ब्रह्मादयः सदाशिवान्ता वामाज्येष्ठादिस्वस्वशक्ति-
रहिताः स्पन्दनेऽप्यशक्ताः सन्तः प्रेततुल्या एवेति। विमृष्टिः कल्पनम्।।१९।।
सदाशिव प्रेतपद्मासनस्वरूप माने जाते हैं। ज्ञानार्णव नामक ग्रन्थ में पार्वती
के प्रश्नोत्तर रूप में भगवान् शिव का कथन दिया गया है। उसके अनुसार “ब्रह्मा
विष्णुश्च रुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः। पञ्चप्रेता वरारोहे निश्चला एव ते सदा”। अर्थात्
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव ये पाँचों अपनी-अपनी शक्तियों से रहित
प्रेत माने जाते हैं। शक्तिसमन्वित रहने पर ही अपने कार्य करने में समर्थ होते
हैं। अन्यथा निश्चल ही रहते हैं। इनकी शक्तियाँ क्रमशः वामा, ज्येष्ठा, रौद्री,
अम्बिका और सदाशिवा मानी जाती हैं। इस विचार के पहले ही बिन्दुरूप देवी
के आसन पर ‘ऐं ग्लौं प्रेतपद्मासनाय सदाशिवाय नमः’ मन्त्र से देवी के प्रति
आस्थावान् होकर अभ्यर्थना करनी चाहिये।।१९।।
मूर्त्तिकरणीविद्यामाह
लृषाईं वाराहीमूर्त्तये ठः ठः ठः ठः हुं फट् इति
वाग्ग्लौमादिग्लौंवागन्ता मूर्त्तिकरणीविद्या ।।२०।।

वाराहीक्रमः १८३
'वाग्ग्लौं' आदौ यस्यां, ग्लौं वागन्ते यस्यां, मध्यतनवर्णानाम् ईदृशी
मूर्तिकरणीविद्येत्यर्थः। एतेन आसनकल्पनानन्तरं मूर्तिकल्पनविधिरुन्नेयः।
मन्त्रस्वरूपम्—‘ऐं ग्लौं लृषाईं वाराहीमूर्त्तये ठः ठः ठः ठः हुं फट् ग्लौं ऐं'
इति॥२०॥
इस सूत्र में मूर्तिकरणी विद्या का निर्देश है। पहले आसन की कल्पना
के बाद मूर्तिकल्पन विद्या का प्रयोग करना चाहिये। इस विद्या के आदि मे
'ऐं ग्लौं' का प्रयोग पहले तथा अन्त में इसी का विपर्यय अर्थात् 'ग्लौं ऐं'
करना चाहिये। मन्त्र का स्वरूप इस प्रकार मन्त्रप्रयोग से अनुभूत होता है—
'ऐं ग्लौं लृषाई वाराहीमूर्त्तये ठः ठः ठः ठः हुं फट् ग्लौं ऐं'। आस्थापूर्वक
मन्त्र का प्रयोग करने पर चक्र में एक चमत्कार उन्मिषित होता हुआ-सा
अनुभूत होता है॥२०॥
आवाहनादि मुद्राबन्धनम्
मूलविद्यया आवाहनसंस्थापनसन्निधापनसन्निरोधनसम्मुखी-
करणावकुण्ठनवन्दनधेनुयोनीर्बद्ध्वा ॥२१॥
मूलविद्यामुच्चार्य तत्तन्मुद्रां बध्वा दर्शयन् तं तमर्थं भावयेद् इति भावः।
आवाहनादि मुद्राबन्धप्रकारः प्रसिद्धः। यावत्यो मुद्रा विहितास्तावतीषु मुद्रासु
बध्यमानासु तावद्वारं मूलमावर्त्तयेत्। न तु सकृन्मूलमुच्चार्य सर्वमुद्राबन्धनम्।
इति ज्ञेयम् ॥२१॥
मूलविद्या का उच्चारण कर उन मुद्राओं के बन्ध का प्रदर्शन करना
चाहिये। साथ ही उन मुद्राओं का उन बन्धों के साथ भावन भी करना चाहिये।
सूत्रकार ने सारी मुद्राओं का परिगणन सूत्र में कर दिया है। वे इस प्रकार हैं—
१. आवाहन, २. संस्थापन, ३. सन्निधापन, ४. संनिरोधन, ५. सम्मुखीकरण,
६. अवकुण्ठन, ७. वन्दन, ८. धेनु और ९. योनि। वृत्ति में तन्त्रों के उद्धरण
हैं। इनसे पढ़कर ये बन्ध नहीं बन पाते। गुरुदेव से इन्हें अभ्यासपूर्वक सीखना
चाहिये। इन सारी मुद्राओं के बनाने के लिये पुस्तकों का आश्रय लेने से अच्छा
सीखना ही है॥२१॥

१८४ परशुरामकल्पसूत्रम्
षडङ्गन्यासजालक्रमं च विवृणोति
देव्यङ्गन्यस्तषडङ्गपञ्चाङ्गाः ।।२२।।
षडङ्गमन्त्राः
१. ऐं ग्लौं ऐं नमो भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि हृदयाय नमः।
२. ऐं ग्लौं वाराहि शिरसे स्वाहा।
३. ऐं ग्लौं वराहमुखि वराहमुखि शिखायै वषट्।
४. ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि नमः कवचाय हुम्।
५. ऐं ग्लौं रुन्धे रुन्धिनि नमः नेत्रत्रयाय वौषट्।
६. ऐं ग्लौं जम्भे जम्भिनि नमः अस्त्राय फट्।
पञ्चाङ्गन्यासमन्त्रा ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि इत्यादयः पूर्वोक्ताः। तैर्देव्या-
स्तत्तदङ्गेषु न्यासं भावयेत् ।।२२।।
माँ वार्त्ताली के अङ्गों में मन्त्रन्यास का भावन करना चाहिये। षडङ्गन्यास
मन्त्र मैने ऊपर लिख दिया है। पञ्चाङ्गन्यास क्रमशः अङ्गुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा,
अनामिका और कनिष्ठिका में भावित करना चाहिये। 'अन्धे अन्धिनि' से 'स्तम्भे
स्तम्भिनि' तक 'ऐं ग्लौं' लगाकर 'अङ्गुष्ठाभ्यां नमः' आदि का प्रयोग करना
चाहिये।।२२।।
अथ षोडशोपचारपदार्थकथनपूर्वकं तावतामर्पणं विधत्ते
पाद्यार्घ्याचमनीयस्नानवासोगन्धपुष्पधूपदीपनीराजनच्छत्रचामर-
दर्पणरक्षाचमनीयर्नैवेद्यपानीयताम्बूलाख्यषोडशोपचारक्लृप्त्यन्ते ।।२३।।
षडङ्ग-पञ्चाङ्ग न्यास के अनन्तर षोडशोपचार पूजन करना चाहिये। जैसे
पाद्यमन्त्र—'ऐं ग्लौं पाद्यं कल्पयामि नमः' बनता है, इसी तरह सभी उपचारों
में 'ऐं ग्लौं' जोड़कर अन्त में 'कल्पयामि नमः' लगाने से मन्त्र बन जाते हैं।
इन उपचार वस्तुओं को माँ के समक्ष श्रद्धापूर्वक प्रस्तुत कर परमानन्द का
अनुभव करना चाहिये।।२३।।

अथ देव्या ध्यानप्रकारमाह
ध्यानं देव्या मेघमेचका कुटिलदंष्ट्रा कपिलनयना घनस्तन-
मण्डला चक्रखड्गमुसलाभयशङ्खखेटकहलवरपाणिः पद्मासीना
वार्त्ताली ध्येया।। २४।।
तथा च षोडशोपचारार्पणानन्तरं यावदवकाशमुक्तप्रकारेण मूर्तिं ध्यायेद्
इत्यर्थः। मेघमेचका मेघश्यामला ‘कालश्यामलमेचकाः’ इत्यमरः। कुटिला
(वक्रा) ‘कुटिलं भुग्नं वेल्लितं वक्रमित्यपि’ इत्यमरः। हलं लाङ्गलम् ।। २४।।
षोडशोपचार पूजन के उपरान्त माँ वार्त्ताली का ध्यान करना चाहिये। ध्यान
का श्लोक इसी क्रम के सूत्र १४ में लिखा गया है। वहीं से देखकर श्रद्धापूर्वक
ध्यान में तसल्ली होने से माँ की अनुकम्पा प्राप्त होती है।। २४।।
देवीतर्पणम्
दशधा तस्यास्तर्पणं कुर्यात् ।।२५।।
तर्पणमन्त्रे कोलमुखीति मूलमन्त्रान्ते योज्यम्, न तु वाराहीमिति।
उत्पत्तिवाक्ये कोलमुखीति श्रवणात् ।।२५।।
तर्पण के मन्त्र से देवी का दश बार तर्पण करना चाहिये। तर्पण के
मन्त्र को मूलमन्त्र से वहीं तक लेना चाहिये, जिसमें कोलमुखि शब्द का प्रयोग
किया गया है। जैसे तर्पण के ‘ऐं ग्लौं सौं नमः भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि
वराहमुखि वराहमुखि श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः’ इस मन्त्र से बाँयें हाथ
में जल लेकर दाहिने हाथ के पुष्प को उसमें डुबाकर देवीं को तृप्त करने के
उद्देश्य से तृप्त करना चाहिये। यही तर्पण का विधान है।।२५।।
अथावरणपूजां वक्तुं प्रारभते
त्र्यस्रे जम्भिनीमोहिनीस्तम्भिन्यः ।। २६ ।।
देव्यग्रकोणमारभ्य प्रादक्षिण्‍येन ज्ञेयम्। इति प्रथमावरणम् ।।२६।।
त्रिकोण में प्रथमावरण की पूजा होती है। इसमें देवी के अग्रकोण से
आरम्भ कर प्रादक्षिण्‍य क्रम से पूजन का विधान है। इसका मन्त्र है—

१८६ परशुरामकल्पसूत्रम्
'ऐं ग्लौं जम्भिनीश्रीपादुकां पूजयामि नमः'।
'ऐं ग्लौं मोहिनीश्रीपादुकां पूजयामि नमः'।
'ऐं ग्लौं स्तम्भिनीश्रीपादुकां पूजयामि नमः'।
इन मन्त्रों में पूजयामि और नमः के बीच में तर्पयामि लगाने की भी
परम्परा है॥२६॥
अथ द्वितीयावरणपूजामाह
पञ्चारे अन्थिनी-रुन्धिन्यौ ताश्च ।।२७।।
पञ्चारे पञ्चकोणेषु अन्थिनीरुन्धिन्यौ। ताश्च जम्भिन्यादयः, त्रयश्च मन्त्राः
पूर्वोक्ता ग्राह्याः। मन्त्रस्वरूपम्—'ऐं ग्लौं अन्थिनि नमः अन्थिनीश्रीपादुकां
पूजयामि' क्रमः पूर्ववद् इति द्वितीयावरणम् ।।२७।।
दूसरा आवरणपूजा-स्थान पञ्चकोण माना जाता है। पञ्चकोण की संरचना
बड़ी आकर्षक होती है। रेखाओं के परस्पर कटाव और कोणों की स्वतः निर्मिति
में ब्रह्माण्डीय रहस्यमयता के दर्शन होते हैं।
उस रहस्य-शक्ति की पूजा इस आवरण में भी की जाती है। इन पाँच
शक्तियों की पूजा के सन्दर्भ में अन्थिनी, रुन्धिनी, जम्भिनी, मोहिनी और
स्तम्भिनी की पूजा का विधान है। वृत्ति में मन्त्र स्वरूप इस प्रकार दिया गया
है 'ऐं ग्लौं अन्थिनि नमः अन्थिनीश्रीपादुकां पूजयानि नमः'। इसी तरह क्रमशः
स्तम्भिनी पर्यन्त मन्त्र का ऊहन कर लेना चाहिये। स्तम्भिनी मन्त्र, जैसे—'ऐं
ग्लौं स्तम्भिनि नमः स्तम्भिनीश्रीपादुकां पूजयामि नमः' बनेगा। पूजयामि और नमः
के बीच में तर्पयामि भी लगाते हैं। इस प्रकार द्वितीयावरण की पूजा पूरी होती
है॥२७॥
तृतीयावरणपूजामाह
षट्कोणे आक्षाईं ब्रह्माणी, ईलाईं माहेश्वरी ऊहाई कौमारी,
ॠसाईं वैष्णवी, ऐशाईं इन्द्राणी, औवाईं चामुण्डा, तस्यैवाग्रेषु मध्ये
च यमरयूं यां यीं यूं यैं यौं यः याकिनि जम्भय जम्भय मम
सर्वशत्रूणां त्वग्धातुं गृह्ण गृह्ण अणिमादि वशं कुरु कुरु स्वाहेति।

वाराहीक्रमः १८७
अन्यासां धातुनाथानामप्येवं बीजे नामनि धातौ त्वाराधनकर्मणि मन्त्रः
सन्नाम। रमरयूं राकिणि रक्तधातुं पिब पिब लमरयूं लाकिनि
मांसधातुं भक्षय भक्षय डमरयूं डाकिनि मेदोधातुं ग्रस ग्रस कमरयूं
काकिनि अस्थिधातुं जम्भय जम्भय समरयूं साकिनि मज्जाधातुं गृह्ल
गृह्ल हमरयूं हाकिनि शुक्रधातुं पिब पिब अणिमादिवशं कुरु कुरु
स्वाहा-इति धातुनाथयजनम् ।।२८।।
षट्कोणे कोणाग्रेषु आक्षाईं. इत्यादि षण्मन्त्रैः षड्देवताः पूजयेत्। 'ऐं
ग्लौं' आक्षाईं ब्रह्माणी श्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नम, इति मन्त्रस्वरूपम्।
एवमग्रेऽपि। मध्ये (षट्कोणमध्ये) स्वाहान्तमेकं मन्त्रं दर्शयित्वा एतन्मन्त्र-
वर्णानन्यत्र काँश्चिदतिदिशति—एवमिति। एवम् (उक्तमन्त्रवदित्यर्थः)। एवमति-
देशमुक्त्वा अतिदिष्टमन्त्रवर्णेषु बाधकमूह्यम्। तत्रैव क्वचित्स्थलविशेषे
दर्शयति—बीजेत्यादिना। बीजे इत्येकवचनं जात्याख्यायाम्। 'इति रीत्या
बीजस्थाने वक्ष्यमाणबीजानां सन्नाम ऊहः कार्यः।
एवं धातौ त्वग्धातुस्थाने तत्तद्धातूनां नामनि याकिनीति नामस्थाने
तत्तन्नाम्नामूहश्च कार्यः। शिष्टा मन्त्रवर्णा मम सर्वशत्रूणाम् इत्यादयः समाना
इति भावः। अथ द्वितीयादिमन्त्रेषु विशेषमाह—रमरयूमित्यादिना ।।२८।।
तीसरे आवरण की पूजा का सर्वाधिक विशिष्ट महत्त्व है। षट्कोण के
छः कोणों के कोण-मूलों में क्रमशः पाँच बीज-मन्त्र लगते हैं। ऐं ग्लौं आ क्षाईं
उनके बाद ब्रह्माणी देवी का उल्लेख कर श्रीपादुकां पूजयामि (तर्पयामि) नमः।
यह प्रथम अग्रकोण का मूल मन्त्र बनता है। पूरे मन्त्र इस प्रकार बनेंगे—
१. ब्रह्माणी—ऐं ग्लौं आक्षाईं ब्रह्माणी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
२. माहेश्वरी—ऐं ग्लौं ईलाईं माहेश्वरी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
३. कौमारी—ऐं ग्लौं ऊहाईं कौमारी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
४. वैष्णवी—ऐं ग्लौं ऋसाईं वैष्णवी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
५. इन्द्राणी—ऐं ग्लौं ऐशाईं इन्द्राणी श्रीपादुकां पूजयामि नमः।
६. चामुण्डा—ऐं ग्लौं औवाईं चामुण्डा श्रीपादुकां पूजयामि नमः।