परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 218, कुल 320 में से
संदर्भ में पढ़ें१७६ परशुरामकल्पसूत्रम्
‘ऋ. ‘ऐं ग्लौं ठः ठः ठः ठः हुं अस्त्राय फट्’ से ललाट से ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त
न्यास करना चाहिये। इस प्रकार पूरे मन्त्र को ८ खण्डों में बाँट-
कर पैर से ब्रह्मरन्ध्र तक का मन्त्रन्यास पूरा होता है।
३. मातृका स्थानों में मूल विद्या के पदों का न्यास इस प्रकार करना
चाहिये—
क्रम, मूलविद्या के अंश, मातृका स्थान।
१. ऐं ग्लौं ऐं १. शिरसि (मातृका स्थानों का स्पर्श करना चाहिये)
२. नमः २. मुखवृत्ते
३. भगवति ३. दक्षनेत्रे
४. वार्त्तालि ४. वामनेत्रे
५. वार्त्तालि ५. दक्षकर्णे
६. वाराहि ६. वामकर्णे
७. वाराहि ७. दक्षनासापुटे
८. वराह ८. वामनासापुटे
९. मुखि ९. दक्षकपोले
१०. वराह १०. वामकपोले
११. मुखि ११. ऊर्ध्वोष्ठे
१२. अन्धे १२. अधरोष्ठे
१३. अन्धिनि १३. ऊर्ध्वदन्तपङ्क्तौ
१४. नमः १४. अधोदन्तपङ्क्तौ
१५. रुन्धे १५. जिह्वायाम्
१६. रुन्धिनि १६. ब्रह्मरन्ध्रे
१७. नमः १७. दक्षदोर्मूले
१८. जम्भे १८. बाहुमध्ये
१९. जम्भिनि १९. मणिबन्धे
२०. नमः २०. अङ्गुलिमूले
२१. मोहे २१. अङ्गुल्यग्रे
२२. मोहिनि २२. वामदोर्मूले
२३. नमः २३. वामबाहुमध्ये