परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवाराहीक्रमः १७५
(त्रीणि) ४१ हृदि ४२ स्कन्धद्वयं ४४ गलापरभागः ४५ हृदयादिदक्षपाण्यन्तं
४६ हृदयादिवामपाण्यन्तं ४७ हृदयादिदक्षपादान्तं ४८ हृदयादिवामपादान्तं
४९ नाभिमूर्धनी ५१ एवमेकपञ्चाशत् स्थानानि।
एवमेकपञ्चाशत्स्थानेषु मूलमन्त्रस्य एकपञ्चाशत्पदानि न्यसेत् ।।१२।।
इस सूत्र में पहले कहे गये सप्तार्ण मन्त्रपञ्चक न्यास, मूलविद्या का
अष्टखण्ड न्यास और मातृका-स्थानों में मूलविद्या के पदन्यासों का अर्थात् तीन
प्रकार के न्यासों का निर्देश दिया गया है। इनका क्रमिक रूप से इस प्रकार
का विधान करना चाहिये—
१. सप्तार्णमन्त्रपञ्चक न्यास
अ—ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि नमः शिरसि।
आ—ऐं ग्लौं रुन्धे रुन्धिनि नमः वदने।
इ—ऐं ग्लौं जम्भे जम्भिनि नमः हृदि।
ई—ऐं ग्लौं मोहे मोहिनि नमः गुह्ये।
उ—ऐं ग्लौं स्तम्भे स्तम्भिनि नमः पादयोः।
२. अष्ट खण्डों में मूलमन्त्रन्यास-
अ. 'ऐं ग्लौं ऐं नमो भगवति वार्त्तालि वार्त्तालि वाराहि वाराहि वराहमुखि
वराहमुखि' इससे आपादजानुपर्यन्त।
आ. 'ऐं ग्लौं अन्धे अन्धिनि नमः' से जानु से कटि पर्यन्त।
इ. 'ऐं ग्लौं रुन्धे रुन्धिनि नमः' से कटि से नाभि पर्यन्त।
ई. 'ऐं ग्लौं जम्भे जम्भिनि नमः' से नाभि से हृदय पर्यन्त।
उ. 'ऐं ग्लौं मोहे मोहिनि नमः' से हृदय से कण्ठ तक।
ऊ. 'ऐं ग्लौं स्तम्भे स्तम्भिनि नमः' से कण्ठ से भ्रूमध्य तक।
ऋ. 'ऐं ग्लौं सर्वदुष्टप्रदुष्टानां सर्वेषां सर्ववाक्चित्तचक्षुर्मुखगतिजिह्वास्तम्भनं
कुरु कुरु शीघ्रं वश्यं नमः' इतने मन्त्रांश से भ्रूमध्य से ललाटपर्यन्त
न्यास करना चाहिये और आठवें मुख्यांशरूप—