परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवाराहीक्रमः १७७
२४. स्तम्भे २४. वामबाहुमध्ये
२५. स्तम्भिनि २५. वाममणिबन्धे
२६. नमः २६. वामाङ्गुल्यग्रे
२७. सर्व २७. दक्षोरुमूले
२८. दुष्ट २८. दक्षजानौ
२९. प्रदुष्टानां २९. दक्षपादसन्धौ
३०. सर्वेषां ३०. दक्षपादाङ्गुलिमूले
३१. सर्व ३१. दक्षाङ्गुल्यग्रे
३२. वाक् ३२. वामोरुमूले
३३. चित्त ३३. वामजानौ
३४. चक्षुः ३४. वामपादसन्धौ
३५. मुख ३५. वामपादाङ्गुलिमूले
३६. गति ३६. वामाङ्गुल्यग्रे
३७. जिह्वा ३७. पार्श्वद्वये
३८. स्तम्भनं ३८. पृष्ठे
३९. कुरु ३९. नाभौ
४०. कुरु ४०. ऊर्वोः
४१. शीघ्रं ४१. जठरे
४२. वश्यं ४२. हृदि
४३. ऐं ४३. दक्षस्कन्धे
४४. ग्लौं ४४. वामस्कन्धे
४५. ठः ४५. गलापरभागे
४६. ठः ४६. हृदयादिदक्षपाण्यन्तम्
४७. ठः ४७. वामपाण्यन्तम्
४८. ठः ४८. हृदयादिदक्षपादान्तम्
४९. हुं ४९. हृदयादिवामपादान्तम्
५०. अस्त्राय ५०. नाभौ
५१. फट् ५१. मूर्ध्नि
परशुरामकल्पसूत्रानुसार और रामेश्वरवृत्ति के अनुसार इसी क्रम से न्यास
करना चाहिये। इस प्रकार तीनों सूत्रोक्त न्यास पूरे करने चाहिये।।१२।।