परशुराम कल्पसूत्र (महर्षि परशुराम - आचार्य विद्यानिवास मिश्र सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Parasurama Kalpasutra with Vidya Niwas Mishra Commentary
भगवान् परशुराम (टीकाकार: प्रो. विद्यानिवास मिश्र) द्वारा
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अपनाता है। यह क्रिया मात्र ध्यान की कल्पना मात्र नहीं होती। यह सूत्रप्रोक्त
मन्त्र के माध्यम से चक्र-साधना में निष्णात व्यक्ति ही कर सकता है। जीवशिव
का परशिव में समायोजन औन्मनस दशा की परा भूमि पर ही सम्पन्न हो सकता
है, इस सम्बन्ध में अधिक कहना उचित नहीं। इस प्रथम प्रक्रिया का मन्त्र है—
‘जीवशिवं परशिवे योजयामि स्वाहा’। दूसरी प्रक्रिया इस ज्ञान पर आधारित है
कि, सङ्कोच से मिला यह शरीर पराविद्या प्राप्ति के लिये पर्याप्त नहीं है। इसलिये
इसमें आयी संकोच की आर्द्रता सूख जाय, इसे जला दिया जाय, जले भस्म
को शिवामृत प्रवाह में बहा दिया जाय, तब शाम्भव शरीर को उत्पादित कर
जीवशिव को शिवपद से उसी शाम्भव शरीर में प्रवेश करा दिया जाय। उसी
नवनिष्पन्न प्रकाशमान शाम्भव शरीर की दिव्यता में स्वात्म को प्रतिष्ठित कर
माँ की उपासना की जाय। यह सब प्रकल्पन की क्रिया होती है और बड़ी
महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसमें पाँच मन्त्रों द्वारा पाँच प्रकार के प्रकल्पन हैं, जो
क्रम इस प्रकार है—
२. शोषण—‘यं सङ्कोचशरीरं शोषय शोषय स्वाहा’।
३. दाहन—‘रं सङ्कोचशरीरं दह दह पच पच स्वाहा’।
४. आप्लावन—‘वं परमशिवामृतं वर्षय वर्षय स्वाहा’।
५. शाम्भवशरीरोत्पादन—‘लं शाम्भवशरीरमुत्पादयोत्पादय स्वाहा’।
६. जीवस्वस्थानानयन—‘हंसः सोऽहमवतरावतर शिवपदाज्जीवसुषुम्णापथेन-
प्रविश मूलशृङ्गाटकमुल्लसोल्लस ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल हंसः सोहं
स्वाहा’।
इन मन्त्रों के द्वारा गुरुनिर्दिष्ट क्रमानुसार स्वात्म को दिव्य बना लेना
आवश्यक है। इसके बाद ही आगे की उपासना-प्रक्रिया अपनायी जाती है ।।६।।
अथ मातृकासम्पुटिताभ्यां बीजाभ्यां न्यासमाह
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