नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
परिशिष्ट : टिप्पणी, अनुबन्ध अध्याय १७ ४९७
जैसे :—लावण्यसिन्धुरपरैव हि केयमत्र यत्रोत्पलानि शशिना सह संप्लवन्ते ।
उन्मज्जति द्विरदकुम्भतटी च यत्र यत्रापरे कदलकाण्डमृणालदण्डाः ॥
[ यह कोई अन्य ही लावण्य सरिता है जहाँ चन्द्र के साथ कमल भी तैर
रहे हैं, जिसमें हाथियों की कुम्भतटी उन्मग्न हो रही है और कदलकाण्ड
तथा मृणालदण्ड भी बह रहे हैं । ]
यहाँ स्पृहणीय उत्कृष्ट नेत्र, मुख आदि का परस्पर शोभात्मक तथा आनु-
कूल्य से उपलक्षित समवाय हैं उससे उपपन्न सरिता रूप अपूर्व अर्थ को सिद्ध
करने वाली अर्थ योजना के कारण यह 'युक्ति' है ।
३७. कार्य :—अब कार्य को बतलाते हैं—'यत्रापसारयन्' इत्यादि से ।
दोष को दूर कर गुण का तत्काल वाच्छनीय अर्थ में नियोजन करें या गुण
को हटा कर दोषों की किसी प्रकृत अर्थनीय पदार्थ में योजना करें तो 'कार्य'
होता है । इसका प्रथम स्थिति में यह उदाहरण है :—
'तावत् स्वात्मनि संश्रितद्रुमलताश्लेषोऽध्वगैर्वर्जनम्' इत्यादि ।
[ पथिकजन मार्गस्थित द्रुम के साथ लता के संश्लेष को भी कामोत्तेजक
होने से देखने की इच्छा छोड़ कर त्याग देते हैं, क्योंकि वैसा वे अपने लिये
ठीक नहीं मानते । ] इत्यादि ।
द्वितीय का उदाहरण है अभिनवगुप्तपाद का यह पद्य :—
विश्वप्रभो वितरतां कमलां किमन्यत् भूयात् स कोऽपि घटितो भवतोपकारः ।
दूराध्वगेषु पुनरम्बु तथा विकीर्णमन्ते यथा त्रिभुवने प्रसृतं यशस्ते ॥'
[ हे विश्व के नियन्ता, कमला को हमें प्रदान कीजिये, अन्य बात से हमें
क्या प्रयोजन ! कमला के देने से आपके द्वारा हमारा महान् उपकार हो
जाएगा । दूरस्थ पथिकों के लिये ऐसा जल प्रदान दीजिये जिससे त्रिभुवन में
आपका यश फैल जाए क्योंकि यही अन्तिम कार्य है जो करने योग्य है । ]
यहाँ आपने इसका महान् उपकार किया तथा पथिकों के लिये अतिशय
जल को तृष्णा निवारणार्थ प्रदान किया परन्तु इसके साथ विश्वप्रभो इस अर्थ
की पर्यालोचना से 'कार्य' रूप अर्थ की प्राप्ति हो जाती है ।
३८. अनुनीति :—अब अनुनीति का लक्षण बतलाते हैं—'अपूर्व' इत्यादि
के द्वारा । अपूर्व अर्थात् अतिशय तीव्र क्रोध को उत्पन्न करने के लिये जो
अपराध हो उसे दूर करना 'अनुनीति । जैसे रत्नावली में 'प्रसीदेति
ब्रूयामिदमसति कोपे न घटते' ( र० २ । १६ ) [ आप प्रसन्न हों ऐसा यदि
कहता हूँ तो यह कथन आपके क्रोध के बिना बनता नहीं है ( इत्यादि )
३२ ना० शा० द्वि०
४९८ नाट्यशास्त्र
अर्थात् यह तभी कहा जा सकता है । जब आप कुपित हों जब कि आपके
कुपित होने का कोई अंदेशा ही नहीं है ।
३६. परिदेवन :—अब परिदेवन का स्वरूप बतलाते हैं—‘दोषैर्यदन्य’
इत्यादि से । जैसे बालरामायण में दशरथ के नाम से जो राम को निर्वासन देने
आदि में दोष कहे गये थे उन प्रसिद्ध दोषों का राक्षसों के साथ सम्बन्ध जोड़ना
उचित है, दशरथ के साथ नहीं । ऐसे युक्तियुक्त वाक्यों का प्रयोग करना
‘परिदेवन’ समझना चाहिये । जैसे—नरेन्द्रे वृद्धे स्त्रीवशः यत्नमयशः’ ( राजा
ने बुढ़ापे में स्त्री के वश होकर अयश में अपने को डाल दिया ) इसके
अतिरिक्त किसी प्रयोजन से अन्य के नाम पर अभिहित जो अर्थ है
उनका प्रसिद्ध अर्थों ( दोषों ) के साथ सम्वाद अर्थात् अन्य के मन में स्थित
दोषों का सम्बन्ध बतला देना, जो वस्तुतः किसी अन्य के साथ होना उचित
हो तो ऐसे वाक्यों का कथन भी ‘परिदेवन’ होता है । जैसे इस पद्य में :—
एनां पश्य पुरस्तटीमिह किल क्रीडाकिरातो हरो
गाण्डीवेन किरीटिना सरभसं चूडान्तरे ताडितः ।
इत्याकर्ण्य कथाऽद्भुतं हिमनिधावद्रौ सुभद्रापते—
र्मन्दं मन्दमकारि येन निजयोर्दोर्दण्डयोर्मण्डनम् ।।
[ इस सामने की तटी को तो देखो, यहाँ कीड़ा के बहाने से किरात
वेषधारी भगवान् शिव के चूडान्तर पर ( मस्तक पर ) अर्जुन ने गाण्डीव
धनुष का बड़े वेग से शक्तिशाली प्रहार किया था । ऐसी सुभद्रापति ( अर्जुन )
के शौर्य की अद्भुत कथा को सुन कर जिसने अपने भुजाओं को मन्द मन्द
मण्डलाकार किया या भुजाओं में मण्डन किया । ]
यहाँ तट के विलोकन के उद्देश्य से जो धनञ्जय का व्यापार बतलाया गया
उसने किसी राजा के मन में दोषों का सम्बन्ध उत्पन्न कर डाला अर्थात् उसे
ईर्ष्या हो गयी कि मेरे मनुष्य होने तथा अर्जुन के भी मनुष्य रहने पर मेरी
अर्जुन के सदृश पराक्रम करने की सामर्थ्य कहाँ ( अर्थात् उससे मैं न्यून हो रहा
हूँ ) । अतएव इस मण्डन से अधिकार स्थित लोगों को क्या मद होगा । इस
प्रकार उस विषय में परम औचित्य का ख्यापन रूप प्रयोजन ‘परिदेवन’ है ।
इस प्रकार स्पष्ट है कि कवि के व्यापार के बल से प्राप्त अर्थ जो लौकिक
एवं स्वाभाविक कारण जहाँ विद्यमान हो वहीं ‘लक्षण’ होता है । यह इन
उदाहरणेों से तथा लक्षणों से व्याख्यात हुआ ।
अष्टादश अध्याय
( भाषा-विधान )
१. शास्त्रों में प्रसिद्ध संस्कृत भाषा के विपरीत प्राकृत भाषा के प्रसंग से
संस्कृत से जिनका रूप विपरीत है तथा जिनका विधान नहीं किया गया है
ऐसे शब्दों के भाग रूप का निरूपण तथा नाट्य के अनुरूप व्यवहार में आने
वाले मारिष आदि नामीसमूह के पठनधर्म क्या प्राकृत में भी संस्कृत जैसे ही
होना चाहिए या अन्यथा, इस विचार या आशंका के कारण प्रसंगतः
कर्तव्य दशरूपकों के स्वरूप का भी निरूपण प्रभावित होता है। इसी प्रकार
पूर्व अध्याय के अन्त में पाठ्य का उपसंहार करने से सम्प्रति 'प्राकृत-पाठ्य'
का विवरण आवश्यक है।
२. अपभ्रंश के विषय में विधान को दर्शाने के लिये—'नाना' इत्यादि
से कहा गया है। इसकी व्याख्या इस प्रकार है—नाना अर्थात् भिन्न-भिन्न
जो अवस्थाएँ देश विशेष से हैं उनमें आत्मा अर्थात् नियतस्वभाव जिसमे
हो; अर्थात् प्रसिद्धि के कारण जो देशविशेष में नियत की गई हो ऐसी
भाषाएँ। इससे यह भी प्राप्त हुआ कि संस्कृत भाषा के शब्द ही वाचक हैं
अन्य अर्थात् प्राकृत भाषा के जो शब्द हैं वे अनुमानतः वाचक होंगे। इसीलिये
कहा गया है कि अन्यत्वेन प्रसिद्धि को प्राप्त हुए हैं। प्रश्न-अवस्था शब्द का
यहाँ देशविशेष अर्थ कैसे हुआ। उत्तर—क्योंकि जिसमें लोक निवास करते
हैं अतः देश विशेष अवस्था ही है और फिर देशविशेष में ही लोक निवास भी
होता है।
३. संस्कृत तथा प्राकृत भाषा में प्रातिपदिक शब्द समान होने पर
भी विभक्ति में स्वर के कारण विपर्यास होना आवश्यक रहता है। देशी पद
का भी प्रयोगदशा में स्वरगत सम्बन्ध से ही यहाँ उपयोग किया जाता है अतः
वह भी प्राकृत ही है। अन्य आचार्य के मत में प्राकृत वह है जिसमें व्युत्पन्न
नहीं की गई प्रकृति से प्राप्त तथा अव्युत्पन्न जन से जो शब्द प्रयोज्य है तो
वही प्राकृत। इसके तीन प्रभेद यहाँ उद्देश्य क्रम में दिखलाये हैं।
४-५ जो शब्द संस्कृत तथा प्राकृत में समान है उन्हें दिखलाते हैं—
'कमलामल' इत्यादि से। प्राकृत में विभक्तियों में लिङ्गगत स्वातन्त्र होता है
अतः संस्कृत प्राकृत में ( परस्पर ) भेद रहना स्वाभाविक है। इसीलिये कहा
कि—'संस्कृतेष्वपि' अर्थात् संस्कृत भाषा भी योग को प्राप्त करती है।
५०० नाट्यशास्त्र
भाषा-श्लेष तथा पताका-स्थानक आदि में इनके प्रयोग कहे गये हैं। यहाँ अपि
शब्द से यह भी कहा गया है कि प्राकृत में प्रयुक्त शब्दों में समास होने पर
उन शब्दों में संस्कृत की समानता नहीं होती जैसे कमल, अमल, इन्द्र
इत्यादि में ।
६-७. अब विभ्रष्ट को—‘ये वर्णः’ इत्यादि से दिखलाते हैं तथा पुनः
इसी को आगे—‘एओआर’ इत्यादि कारिका से भी दिखलाते हैं ।
१७. अपरस्पर निष्पन्नाः = एक दूसरे से संश्लिष्ट नहीं होने वाले अर्थात्
असंयोग वाले या असंयोगरूप वर्ण । अब जहाँ वर्ण संयुक्त हैं उनके विषय में
( संयुक्तानाम् ) भी ।
१८. संयुक्त वर्णों के क्रमशः उदाहरण देते हैं—‘ऋप्सत्सथ्याः’ इत्यादि
से । ‘वच्छों’ में वत्स के त्स को छ हो जाता है ।
२२-२३. ब्रह्मा शब्द में म प्रथम और ह बाद में आ गया तथा ‘ब्र’ का
अन्तर्वर्ती रेफ का लोप हो गया है । इसी प्रकार रेफ का सर्वत्र लोप हो
जाता है वह चाहे ऊपर हो या नीचे—जैसे शक्र तथा अर्क में या कभी दोनों
में जैसे ‘निह्रदि’ शब्द में है ।
२५-२७. संस्कृत एवं प्राकृत भाषा ही वक्तृभेद से चार प्रकार की हो ,
जाती है—इसको दिखलाते हैं—‘भाषा’ इत्यादि से । संस्कृतभाषा ही संस्कृत
है । इसमें स्वरभेद आदि समस्त संस्कार प्राप्त होने से यह ‘संस्कृत’ कहलाती
है । भाषाओं के भेद में इसे बतलाने का आशय यही है कि यह भाषा वह है
जिसमें वैदिक शब्दों का बाहुल्य है परन्तु जो आर्यभाषा से विलक्षण है । •
२८-२६. ‘म्लेच्छशब्दोपचारा’ में उपचार पद का अर्थ है व्यवहार ।
पशुपक्षी आदि के शब्दों को भी नाट्य में किसी प्रयोग के अवसर पर सुनाना
संभावित है । एतदर्थ कहते हैं—‘नाट्यधर्मी’ इत्यादि से ।
३२. कारणव्यपदेशेन = अर्थात् किसी कारण के बहाने से या अवस्था आदि
के वश होकर ।
३२. ऐश्वर्येण प्रमत्त पद के द्वारा यहाँ वेदशास्त्रादि के अध्ययन से हीन
हो जाने की स्थिति संकेतित की गयी है ।
५६-६०. गङ्गासागरमध्य—पद से पूर्व दिशा के देशों के निवासी जन
को दिखलाया गया है । विन्ध्यसागरपद से दक्षिण सौराष्ट्र का ग्रहण किया
गया है । सुराष्ट्रावन्तिदेशेषु से पश्चिम सौराष्ट्र तथा वेत्रवती ( बेतवा )
नदी से उत्तरवर्त्ती प्रदेश में स्थित प्रदेश को यहाँ लिया जाता है ।
एकोनविंश अध्याय
( सम्बोधन तथा काकुस्वरव्यञ्जन )
१. वाक्यविधानं तु—यहाँ 'वाक्यविधानं' पद से भाषा को लिया
जाता है क्योंकि भाषा वाक्य के आश्रित होती है तथा वाक्य का प्रयोग किसी
संवाद के ही लिये नाट्य में किया जाता है। इस प्रकार वाक्य तथा भाषा में
अन्योन्य-रूपता का आनयन किया जाता है तथा इसी आशय से वाक्यग्रहण
पद विधान भी हो जाता है।
३. देवानां देवाः—अर्थात् जो देवताओं से स्तुत्य हैं या उनके भी आदर-
पात्र हैं। तथा-पद से यदि स्त्री हो तो उन्हें 'भगवती' पद से सम्बोधित करना
चाहिए।
४-६. नानाश्रुतधराः अर्थात् जो बहुश्रुत हैं। क्षाम्यम् = इस कथन को
स्वीकार किया जाए।
७-८. सचिव = मन्त्री, राजा का सहायक एवं परामर्शदाता। सपरि-
वारम् = आशय यही है कि हीन पात्र जब राजा को सम्बोधित करें तो
अपना नाम लेकर करें तथा उत्तमपात्र सम्बोध्य का भी नाम लेवे।
१३. कर्म अर्थात् कार्य जैसे पाकादि का विज्ञाता या व्यवसायी। विद्या =
त्रयी आदि वेदविद्या। जाति = गोत्र अथवा देश।
१५. शाक्य = बौद्धभिक्षु। निर्ग्रन्थ = क्षपणक। पाषण्ड = पाशुपत सम्प्रदाय
के साधु। स्वसमय = जैसे पाशुपतों के अपने आचारानुसार भासर्वज्ञ इत्यादि
पद से किये गये सम्बोधन।
१६. यौवन में पति को स्त्रियाँ आर्यपुत्र कह कर सम्भाषण करें परन्तु
यौवन से भिन्न दशा में श्वसुर के वंश या उसमें अपत्यप्रत्यय के साथ ही
शब्दप्रयोग किया जाए। जैसे—हे महाराज। यहाँ यौवनपद का आशय है कि
शृङ्गार के उपयुक्त स्थिति में ही।
२२. स्थानीया = पूज्य तथा अवस्था में जो थोड़ी भी बड़ी हों, ऐसी
पारिवारिक स्त्रियाँ।
२६. पत्नी को भार्या शब्द से सम्बोधित करे। इसी कारण नाट्यवेद के
महासत्र में दीक्षित सूत्रधार अपनी नटी पत्नी को 'आर्ये' कह कर बुलाता
५०२ नाट्यशास्त्र
भी है या पिता के नाम से भी—'जैसे 'हे माठरपुत्रि; इत्यादि, या पुत्र के
नाम से भी—जैसे—'हे सोमशर्मजननि इत्यादि ।
२६. पुरोहित आदि उत्तम पात्र भी राजा की तरह भार्या को 'आर्ये'
पद से सम्बोधित करें, परन्तु यौवनावस्था में ।
३०. औत्पत्तिकानि = स्वकल्पित अतएव जो अप्रख्यात है । तल्लिङ्गा-
र्थानि = प्रकृत अर्थ की सूचना करने वाले ।
३१. इसी को निदर्शन के द्वारा स्पष्ट करते हैं—'ब्रह्मक्षत्रस्य' इत्यादि से ।
प्रश्न—नाम तो संज्ञा मात्र होता है उसे जैसा चाहे रख सकते हैं । उत्तर—
नाम के अनुरूप कर्म होना चाहिए अतः नाम रखते समय कर्म का भी ध्यान
रखना चाहिए । नाम का अक्षर ग्रहों के अभिचार एवं यन्त्र, मन्त्र एवं तन्त्र
के अनुसार अनुष्ठित कर्मादि के द्वारा होता है अतः जब पीड़ित हो जाते हैं
तो उनका इन्हीं से शान्तिक या पौष्टिक कर्म द्वारा उपचार भी किया जाता
है तथा पुरुष को फल प्राप्ति भी अपने नाम के अनुरूप ही होती है ।
३७. नट स्वयं कवि भी होता है तथा कवित्व युक्त भी । इसी अभिप्राय
को ध्यान में रख कर भाषाविधान को समझकर पाठ्य के प्रयोग का विधान
बतलाया गया है अर्थात् परिज्ञान पूर्वक काव्य का निर्माण हो तथा अवसर
आने पर पाठ्य का प्रयोग भी रहे । यदि अन्य कवि हो तो पाठ्य की संज्ञा
प्रयोग का मूलभूत तत्त्व हो जाता है। अतः तदनुसार ही प्रयोक्ताओं को
इसका व्यवहार समझ कर करना चाहिए । षडलङ्कार हैं—( १ ) स्वर,
( २ ) स्थान, ( ३ ) वर्ण, ( ४ ) काकु, ( ५ ) अलंकार तथा ( ६ ) अङ्ग ।
इनसे भूषित काव्य ही पाठ्य कहलाता है ।
पाठ्य स्वर आदि छः अलंकारों के अधीन होता है अतः पाठ्य के गुणों
को बतलाने की बात कही गयी है । गुण अर्थात् जो उपकारक है तथा जिनसे
काव्य उपकृत होकर पाठ्य होता है ।
अब गुणों का उद्देशक्रम से व्याख्यान करते हैं—'तत्र' इत्यादि से । इनमें
प्रथम स्वर है जिसके विषय में जो भी वक्तव्य है वह आगे गेयाधिकार प्रकरण
में ( ना० शा० अध्याय २८ में ) दिखलाया जाएगा । स्वर ही काकु में भी
उपयोगी होता है तथा स्थानादि उसके 'परिकर होते हैं। यहाँ स्थान शब्द
के द्वारा काकुओं के अपने रूप की निष्पत्ति हेतु आश्रय दिखलाया गया है ।
उदात्त, अनुदात्त, स्वरित तथा कम्पित नाम से शास्त्र में स्वर प्रसिद्ध हैं,
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १९ ५०३
इनमें जो अनुरणनमय रक्ति या अनुरंजना की प्रक्रिया है उसे छोड़ देना चाहिए
( क्योंकि वह गीत में रहेगी ) । इसे छोड़ कर शेष जो केवल उच्च, नीच तथा
मध्यवर्ती स्थान का स्पर्श होता है वही पाठ्य में उपयोगी है। यदि पाठ्य में
स्वरगत रक्ति का प्रधानतः आश्रय लेगें तो फिर यह गानक्रिया होगी पाठ्य
नहीं। यहाँ गान क्रिया में उच्च आदि स्थानों का स्पर्श ही प्रधान है इसी
बात को प्रकृत में वर्णों का उपादान कर बतलाया गया है ।
॰ चित्तवृत्ति के समर्पण द्वारा अभिनय क्रिया की अनुभावरूपता के लाभ के
लिये रसों के भेद से काकुविधान रखा जाता है। इसी कारण काकुओं का
सर्वत्र अनुगत रूप होता है जिसका स्वर की अतिशयिता में उपयोग ( किया
जाता ) है। इसका आगे भी मुनि ने काकुशब्द के द्वारा उच्च, दीप्त आदि
अलङ्कारों में व्यवहार बतलाया है क्योंकि पूर्णता को प्राप्त अलङ्कार आदि
काकुओं के ही उपकारक या सम्पादक होंगे। क्योंकि काकु अर्थों में अभि-
नेयता लाता है अतः काकु ही प्रधान होता है। अन्यथा यदि काकु प्रधान
नहीं होता तो जिसका अंगों के मध्य पाठ किया गया उस मध्यगत अंग का
उपसंहार और अन्य अंगों का निरूपण आदि सभी असमञ्जस हो जाता । इस
कारण प्रकृत में पाठ्य में काकु ही प्रधान होता है यही सिद्धान्त मान्य है।
अब इन स्वरों के आश्रम को दिखलाते हैं—त्रीणि स्थानानि के द्वारा ।
यहाँ यह ध्यातव्य है कि स्वर किसी स्थान विशेष से ही उद्भूत होते हैं अतः स्वर
ग्रहण से ही स्थान भेद प्राप्त हो जाएगा पुनः स्थान का ग्रहण क्यों किया गया ?
इसका उत्तर यही है कि यहाँ स्थानपद का ग्रहण ६६ प्रकार के स्थान भेदों की
निवृत्ति करने के लिये है। ये छाछठ ( ६६ ) प्रकार किस प्रकार ?—उत्तर—
उरः प्रदेश में २२—जहाँ श्रुतियाँ तथा स्वर हैं। इसी प्रकार कण्ठ तथा मूर्धा
में होकर ये छाछठ ( २२ × ३ = ६६ ) हो जाते हैं। इन स्थानों के स्पर्श होने
पर गान ही होता है पाठ्य नहीं। इसीलिये पाठ्यगुणान् पद में पाठ्य को गुण
अर्थात् उपकरण वाचक मान कर व्याख्यान किया जाता है।
“शारीर्यामथ वीणायाम्” इत्यादि। वीणा दो प्रकार की होती है जिनमें
एक शरीर रूपी वीणा है जिसमें उरः, शिर तथा कण्ठ स्थान हैं। यह वीणा
बिम्ब स्थानीय होती है। दूसरी वीणा तुम्बी घटिता है। दण्डरूपा वीणा बाह्य
वीणा है तथा यह प्रतिबिम्ब स्थानीया है। इस बाह्य वीणा में काकु की सम्पत्ति
विद्यमान होती है जो रंजनात्मक स्वर स्वरूप है। शारीरी के साथ वीणा
शब्द के कहने का आशय यही है कि यह शरीर के मध्य में विवृत हृदयाकाश
के परिग्रहण हेतु है। क्योंकि बिना आकाश के शरीर मात्र में स्वर की निष्पत्ति
नहीं हो सकती, वह यदि होगी तो उस आकाश में ही होगी।
दूसरी जो दण्ड वीणा (तुम्बी घटिता) हैं, वह उत्तरोत्तर चिह्नित स्थान
से विशिष्ट रहकर बाह्य वीणा कहलाती है तथा इसमें भी स्वरों के निष्पत्ति
स्थान होते हैं। शारीरी वीणा में, उरः, कण्ठ तथा शिरः ये तीन स्थान (नियत)
हैं। इसी प्रकार बाह्य वीणा में भी तारों के स्थान बने हैं, वे इसमें सोपान
पंक्ति की तरह क्रमिक हैं। अतएव इनसे काकुस्वर लक्षित होता है तथा इसी
के आधार पर इसका लक्षण हुआ है। काकु जिह्वा के व्यापार से सम्पाद्य
होने से यह 'काकु' कहलाती है।
४१. इस प्रकार इन तीनों स्थानों के रूपों का विभाग कर उनका विषयभेद
दिखलाने के लिये बतलाते हैं—'आभाषणञ्च' इत्यादि के द्वारा। शिरसा =
शिरो निष्पन्न तार से। इसका उपयोग दूरस्थ संभाषण में किया जाता है।
कण्ठेन = मध्यनाद से। इसका उपयोग नातिदूर स्थल के सम्भाषण में होता
है। उरसा = मन्द्र नाद से। इसका उपयोग समीप के सम्भाषण में किया
जाता है।
४२-४३. इस प्रकार इन तीन स्थानों का पृथक् २ उपयोग दिखला कर
अब इन्हीं का एक साथ उपयोग भी दिखलाते हैं—'उरसोदाहृतम्' इत्यादि के
द्वारा। इसका आशय यही है कि पाठ्य का आरम्भ मन्द्र स्वर से करते हुए उसे
तार स्वर तक ले जाकर फिर मन्द्र पर समाप्त कर देना चाहिए। जब न तो
दीप्त रूप क्रोधादि भाव से और न मन्द्र शोकादि से हृदय आविष्ट रहे तो
वक्तव्य वस्तु के विषय गत उत्साह के विस्फारण (व्यक्ति) से स्वर को तार
तक ले जाकर उपसंहार के समय मध्य में विश्राम करे, यही सामान्यतः पाठ्य
का धर्म या विधान होता है।
४३. स्थान भेद को दिखला कर अब वर्णों के स्वरूप को दिखलाते हैं—
'उदात्तश्च' इत्यादि से। उच्च, नीच तथा मध्यम एवं उच्च, नीच रूप अवलम्बन
से स्वरों के चार धर्म हो जाते हैं। पाठ विशेष की क्रिया का विस्तार करने
वाले वर्ण 'गुण' होते हैं अथवा स्वार्थ विशेष को विवृत या प्रकटन करने वाले
वर्ण 'गुण' हैं। यहाँ तपोधनाः (कहने) सम्बोधन का आशय यह है कि आप
सूक्ष्मवेदी है अतः इस विषय के विचार के अधिकारी हैं।
अब गद्य भाग द्वारा वर्णों के विषय दिखलाते हैं—'हास्यशृङ्गारयोः'
इत्यादि से। हास्य तथा शृङ्गाररस में मध्यम तथा पञ्चम इत्यादि रूप में जिस
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १९ ५०५
क्रम से पाठ है उसी रूप में योजना अभीष्ट नहीं है। अतः हास्य में मध्यमा या
पञ्चमी जाति के स्वरों का ग्रहण कर उसी अवसर पर उच्च मध्यम स्थान का
स्पर्श कर पाठ किया जाता है। इसी प्रकार शृङ्गार, हास्य तथा वीर इन तीनों
में षड्जा तथा आर्षभी के अंश को लेकर उसी में उदात्त एवं कम्पित वर्णों से
पाठ किया जाता है। बीभत्स में धैवती के अंश स्वर का आश्रम लेकर स्वरित
वर्ण से पाठ किया जाए, भयानक में उसी धैवतीयांश स्वर का आश्रय लेकर
कम्पित वर्णों से पाठ होता है। इस प्रकार आगे की जातियों के विनियोग के
अनुसारी स्वरों के अनुवाद द्वारा उदात्तादि वर्णों में न कि स्वरों में तात्पर्य
लिया जाए क्योंकि उनका अन्तरालाप ग्रहण ही प्रयोजन है।
४४. इस प्रकार काकु की उत्पत्ति का प्रतिपादन कर उसके अर्थ के विषय
में व्यापार दिखलाते हुए उद्देश्य क्रम का अनुसरण कर उसके प्रभेद दिखलाते
है—'द्विविधा काकु' इत्यादि के द्वारा। वाक्य जहाँ साकाङ्क्ष है वहाँ
साकाङ्क्ष काकु होगी। वक्तृगत आकाङ्क्षा का वाक्य में उपचार रहता है।
उस आकाङ्क्षा का निश्चय प्रकरणादि के बल से तथा आकांक्षा की विशिष्ट-
विषयता का अवगम प्रकरण के बल से होता है। यही बात यहाँ कारिका के
द्वारा कही गयी है। 'अनियुक्तार्थकं वाक्यम्' में इसी अंश को बतलाया है।
वाक्य के सङ्केत-बल के आधार पर जैसा न्यून या अधिक अर्थ प्रतीत हो वैसा
ही प्रमाण बल से निर्णय के योग्य वाक्य हो तो वह निराकांक्ष तथा इसके
विपरीत अर्थवाला हो तो साकाङ्क्ष वाक्य होगा।
वाक्य में स्थित काकु का अब आगे अभिधान करते हैं—'तत्र साकाङ्क्षम्'
इत्यादि गद्य भाग से। जिसका अर्थ नियुक्त नहीं होता वह अनियुक्तार्थ है जिसे
साकाङ्क्ष बतलाया गया है—उसकी मन्द्र स्वर से उपक्रम कर तार स्वर से
समाप्ति करते हुए पाठ किया जाता है। यहाँ ( सब ) क्रिया विशेषण कितने
आते है—इसे भी बतलाने के लिये कहते हैं कि कण्ठ एवं उरः स्थान में हैं।
उदात्तादि वर्ण उच्च, नीच, दीप्त आदि अलंकार जहाँ अपरिसमाप्त दशा में
( अर्धस्पष्ट रूप में ) छोड़ना क्रिया विशेषण है तथा इस क्रियाविशेषण के
रूप में पठ्यमान वाक्य में ध्वनिगत धर्मविशेष या विकार विशेष ( ही )
काकु है। यह काकु आकांक्षा के अन्त में या अर्थ की परिसमाप्ति पर अथवा
उस अर्थ में नहीं अथवा अर्थ विशेष में रहती है अथवा विशेषार्थ के न होने
पर भी होती है। अतः कोई निश्चय नहीं होने से इसके ( काकु के ) अनेक
स्थल होते हैं।
५०६ नाट्यशास्त्र
४५. जो अलं अर्थात् पर्याप्त रूप में काकु के स्वरूप का सम्पादन करता
है वह 'अलङ्कार' है। तीनों स्थानों में प्रत्येक की ऊर्ध्व, अधः तथा मध्य की
कल्पना के द्वारा उदात्त, अनुदात्त, स्वरित तथा कम्पित के निर्वाह के द्वारा
इसका स्वरूप निष्पन्न होता है। इनमें आवेश के अभाव के कारण सभी स्थानों
में मध्यम भाग में यह विद्यमान होता है किन्तु ऊर्ध्व तथा अधः भाग में यह
आवेश की स्थिति या भाव में होता है। इस प्रकार तीनों स्थानों में प्रत्येक
का अवलम्बन करने से छः अलङ्कार बन जाते हैं।
गद्यभाग—उच्चो नाम इत्यादि। इनमें शिर के अधोभाग में दूरस्थ व्यक्ति
के साथ भाषण करने में 'तार' बतलाया गया है जो स्वर काकु का विषय
है। विस्मय के ज्ञान होने पर वही रस काकु तथा दूसरों को भयभीत करने
पर वही अभिनय से विभाव काकु हो जाता है। स्वर काकु से ही श्रुति काकु
होता है जो भिन्न होता है। यह श्रुति काकु आक्षेप के अवसर पर ऊर्ध्व अर्थात्
तारतम होता है जिसका होता स्थान शिर ही है। यहाँ तार शब्द प्रकर्ष का
उपलक्षण है। इन आक्षेपादि में अवस्थाओं के अनुसार श्रुति, विभाव एवं रस
भेद से तीन रूप में काकुओं का विभाग हो जाता है। जो उर के ऊर्ध्वभाग
में है वह मन्द्र है तथा उसी उरः के नीचे भाग में अत्यन्त मन्द्र नीच काकु है।
दीनता की अवस्था में वही काकु दो रूपों को ग्रहण करती है। अपनी चित्त-
वृत्ति के अर्पण करने से रस काकु तथा पररूप में उत्पादन करने पर विभाव
काकु होती है। यहाँ प्रधानतया दोनों का आदर किया गया है और स्थानों से
इन दोनों का आदर नहीं किया जाता किन्तु जो प्रधान है उसी के अंश का
व्यपदेश होता है। स्वाभाविक भाषण वहाँ होता है जहाँ वक्ता आवृत्त-कंठ
स्वर वाला हो। आवृत्तकण्ठ स्वर का अर्थ है संवृत स्वर से युक्त कंठ वाला
व्यक्ति। त्रास के भय से गिर जाने वाला त्रस्त पतित। त्रास के समय काकु
दीप्त ही होती है। कण्ठ स्थान में ऊर्ध्व भाग निष्पन्न होती है, इससे स्पष्टतः
सिद्ध है कि स्थान भेद ही अलङ्कारता का प्रयोजक है।
५६. अब सभी का संग्रह कर कहते हैं—'यानि सौम्यार्थ' इत्यादि से।
सौम्य = जो सोम की तरह आह्लादक हो। सुखभाव = यहाँ सुख के हेतु
तथा कार्य दोनों का सुखभावकृत् शब्द से समासभेद से संग्रह किया गया है।
५७. नाना—नाना आश्रयों से उपेत अर्थात् युक्त का अनेक स्थानों में
निवेश करते हुए पाठ्य का प्रयोग या विधान रखना चाहिए। काकुओं को
पर्याप्त या परिसीमित करने में कारण होता है उनके आश्रयों या स्थानों
का भेद।
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १९ ५०७
अङ्गानि इत्यादि के द्वारा काकु की ही प्रधानता है इसका उपसंहार
करते हैं—‘अथाङ्गानि’ इत्यादि गद्यभाग से । वाक्य का जो न्यास, त्यजन या
अनादरण है वह नाद का ही है । अतः भाव एवं अभाव, उपचय तथा अपचय
और आरोह तथा अवरोह इनके कारण नाद छः प्रकार हो जाता है । स्वर के
रूप में विहित अन्तराल विशिष्ट श्रुतियों में जो वैस्वर्य है, वह ध्वनिगत
विसंवाद से होता है यह ( ऐसे स्थानों पर ) सर्वत्र समझना चाहिए ।
शृङ्गार में ( जो ) उदात्त एवं स्वरित को अर्पण एवं विच्छेद आदि अङ्गों
को तथा विलम्बित को अलङ्कार कहा गया वह दूरस्थ पुरुष के साथ आभाषण
में कर्तव्य है । शिरः स्थान में षड्ज या पञ्चम में से किसी एक के स्थायी स्वर
के आश्रय के द्वारा अंश स्वर के विभाग से चार चार को मिला कर किया
जाता है । यदि ऐसा नहीं मानेंगे तो फिर दूरस्थ के साथ आभाषण आदि
सभी कथन पुनरुक्त हो जाएगा । दीपन तथा प्रशमन के विषय में यह विधि है
कि मन्द्र करने के बाद तार नहीं किया जाता है, इसी प्रकार मन्द्रतार से तार
तर को और तारतर से मन्द्र को भी नहीं करना चाहिए ।
समग्रतः काल-तत्त्व की भावना अशक्य है अतः उद्देश्य ग्रन्थ से ही लय और
विराम कहे जाते हैं तथा जिनमें उद्देश्य कुछ भी नहीं होता । विच्छेद से लय
को स्वीकार किया गया है । विच्छेद का अर्थ है विराम । यह विराम कितने
समय वाला हो इसी प्रश्न से लय भी मान लिया जाएगा । इस प्रकार यह
विच्छेद की भी परीक्षा हो गयी ।
अर्थ की समाप्ति के लिये विराम किया जाता है । अर्थ = अवान्तर वाक्य
का अर्थ । केवल छन्द की अपेक्षा से विराम नहीं किया जाता क्योंकि कवि
प्रयोग के अधीन ( परतन्त्र ) रहता है और जब कवि ( ही ) परतन्त्र है
तो फिर उसे विराम वाले छन्दों में विराम के लिये प्रयत्न करना ( ही )
चाहिए । प्रयोग कवि के आधीन नहीं है इसीलिये कहा भी गया कि विराम
अर्थ की अपेक्षा या अधीनता के कारण किये जाते हैं । एक, दो या तीन आदि
संख्याओं का यहाँ जो निर्देश किया गया है वह ( इसी ) नियम का उपलक्षण
समझना चाहिये । जैसे :—‘किं गच्छ’ इत्यादि पद्य में है ।
प्रश्न—अवान्तर वाक्य के अर्थ में विराम का विधान है तो फिर एक
वाक्यता न रखना ( या मीमांसाशास्त्र के अनुसार वाक्यभेद करना ) दूषण
होता है । उत्तर—कभी-कभी एकवाक्यताभाव दूषण नहीं भूषण भी हो जाता
५०८ नाट्यशास्त्र
है। इसके उपपादन में यही कहा जा सकता है कि किसी वस्तु की सूचना
देने में या अंकुरगत अर्थ (मूलभूत अर्थ) को कहने में उपचार में अल्पाक्षर
वाले पद की काव्य में (या पद्य में) स्थिति रहनी चाहिये। काव्य अनेक
विध सूचाभिनय तथा अंकुर के प्रकारों से युक्त होता है यदि यही स्वल्पाक्षर
वाले असमस्त पद वाला भी हो तो। क्योंकि अनेक या बहुअक्षर वाले पदों के
बीच सूचा तथा अंकुर की उपपत्ति नहीं होती है।
६१. विराम के होने पर (ही) अभिनयस्थ पदार्थ को विषयानुरूप प्रयोग
में दिखलाया जा सकता है, वह पदार्थ विराम से अवगत होता है तथा कार्य
की अवधि या समाप्ति में विराम रखना होता है। तब समापनीय पदार्थ का
स्वरूप उसकी विरामावस्था में प्रतीत हो जाता है इसीलिये कहा गया है कि
विराम होने पर अभिनय अर्थ को दर्शाता है तथा विराम के अभाव में यही
असमञ्जस हो सकता है या यही कि अभिनय के अर्थ का वहन विराम ही
करता है।
६२-६६. इसी तथ्य को बतलाते हैं—‘यत्र व्यग्रा’ इत्यादि से भी। इस
प्रकार इसी बात को पहिले दृष्टि की प्रमुखता के तात्पर्य से बतलायी थी अब
यहाँ दृष्टि समन्वित हस्तों की प्रधानता से बतलाने से पुनरुक्ति नहीं होती
है। इसी की व्यापकता को दिखलाई है ‘प्रायः वीर, रौद्र आदि में करना
चाहिये’ इत्यादि कथनों से। कुञ्चितौ = संकोच युक्त। अलङ्कार यहाँ उच्च,
दीप्त इत्यादि होंगे जिन्हें वृत्त के विराम स्थल में रखना चाहिए। जैसे—
‘यो यः शस्त्रं बिभर्त्ति (वे० सं० ३।) में है भी।
उच्च दीप्त ‘काकु’ को पद के अन्त में नहीं रखा जाए। वीर तथा रौद्र
रस में भी स्रग्धरा प्रभृति लम्बे वृत्तों में अर्ध या आदि में विराम नहीं रखना
चाहिए किन्तु पद के अन्त में ही। जैसा कि कहा भी है—‘प्राणवशेन वा’।
अर्थात् आरम्भ में आधे में प्रायः प्राण वायु का संवेग नहीं होता। आशय यही
कि पद के अन्त में ही विच्छेद किया जाए। अथवा ‘प्राणवशेन में’ प्राणशब्द का
अर्थ है रस भावादि। अतः रस एवं भावादि के औचित्य से यहाँ विच्छेद किया
जा सकता है तथा यह विच्छेद पाद का आरम्भक या आदि में भी हो सकता
है। इससे यह भी दिखलाया गया है कि अनुबन्ध (आरम्भ) भी विच्छेद
में उपयोगी होता है। ‘शेषम्’ इत्यादि। जहाँ चित्तवृत्ति की प्रधानता नहीं
हो किन्तु विभावादि की हो तो वहाँ अर्थ के अनुरोध पर विराम रखे जाते
हैं। क्लृप्ताक्षर अर्थात् सन्ध्यक्षर। कला के प्रमाण वाला जो काल है तदनुसार
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १९ ५०९
विलम्बित लय से पाठ करना चाहिए। इस प्रकार विच्छेद ही प्रमाण है,
यह तथ्य दिखलाया गया।
७०-७१. शेषाणाम्—इत्यादि। यहाँ शेषाणाम् का अर्थ है ह्रस्व अक्षरों
का। अर्थयोगेन पद से का आशय है कि जैसे अर्थ की स्फुट प्रतीति हो उसी
प्रकार विच्छेद करना चाहिये न कि अतिविलम्बित लय से पाठ करे। इस
पर यहाँ प्रश्न होता है कि कला का प्रमाण कितना रहे ? तो इसके उत्तर में
यही समझना चाहिए कि विलम्बित एक, दो, तीन, चार तथा पाँच कलाओं
तक ( का ) रहता है। गुर्वक्षर अर्थात् कृप्याक्षर।
७२. अथवा में वा शब्द से अधिक के लिये भी सहमति या अनुज्ञा देने
का संकेत किया गया है। कारणोपेतम् में कारण का अर्थ है चिन्तन आदि से
दीर्घकाल तक स्मरण होना।
७३. वृत्तविराम से अर्थविराम प्राथमिकता पाता है यही बात 'ये
विरामाः' इत्यादि से दिखलाते है। तज्ज्ञैः में तत् पद का अर्थ है विरामात्मक
वृत्तगत पदार्थ। उत्क्रम्यापि का आशय है कि यद्यपि उपक्रम विशेष का
था किन्तु उपसंहार सामान्य में है। अतएव इस प्रकार विराम को पढ़ा जाए
कि जिससे विवक्षित अर्थ की प्रतीति हो सके।
७४-७५. भिन्नवृत्तम् इत्यादि। वृत्त को तोड़कर नहीं पढ़ना चाहिए।
ऐसा विच्छेद न करे कि जिससे प्रकृत में कोई दूसरा ही वृत्त प्रतीत होने लगे
जिससे भ्रान्ति उत्पन्न हो। अपशब्द एवं भिन्नवृत्त दोषों के कहने से पुनरुक्ति
नहीं समझना चाहिए क्योंकि वस्तुतः उसके अभाव में भी विच्छेद के वश से
उसकी प्रतीति हो जाती है। इसीलिये यह कहा गया कि जहाँ विराम का
स्थल नहीं हो वहाँ विश्राम नहीं किया जाता है। विराम की इस प्रकार
व्यापकता बतलाकर न्यूना या दीप्ता को दिखलाने के लिए कहा कि—'दीन
स्थिति में काकु को दीप्त न करे'। इससे यहाँ बतलाया गया कि शोकादि में
मग्न चित्तवृत्ति को छोड़कर अन्य प्रसंगों में सर्वत्र काकु का दीपन शोभाधायक
होता है।
इस प्रकार स्वर, उसके तीन स्थान या आश्रय, उनके उपयोगी उदात्त
आदि वर्ण एवं उनके स्वरूप, स्वरूप के पूर्ति कारण अलङ्कार और इतिकर्तव्यता
रूप सभी अंगों को यहाँ कहा गया। (यह ध्यान रहे कि) स्वरभेद से काकु
का भेद होता है। स्वरभेद तब होगा जब काकु की विवक्षा होगी और जब
उसी काकु की विवक्षा करेंगे तो रस, भाव आदि धर्मान्तरों की उत्पत्ति या
५१० नाट्यशास्त्र
उदय भी होगा। स्वरों के स्थानों का भेद अलङ्कारों एवं अङ्गों के कारण
नहीं होता है। यहाँ 'वर्जितं काव्यदोषैः' पदों से यह भी दिखलाया कि पूर्व
अध्याय के विवरण से इस अध्याय के अर्थ की संगति है।
७६. इस कारिका से-संस्कृत भाषा के लिये दिखलाये गये काकुविधान
का प्रकृत अध्याय के पूर्व प्रतिपादित प्राकृत भाषा में भी अतिदेश है—यह
दिखलाया गया है।
७७. प्रकृत अध्याय के अर्थ का उपसंहार करते हुए यहाँ अग्रिम अध्याय के
अर्थ का सूत्रपात—'दशरूप' इत्यादि से किया गया है। वक्ष्यमाण या अग्रिम
अध्याय में जिनका विवरण दिया जा रहा है उन दशरूपकों के विधान में
जो उपयुक्त पाठ्य ( कहने योग्य या संवाद ) है उसकी योजना इन्हीं ( प्रकृत
अध्याय में दर्शित ) प्रकारों से की जाए।
७८. यहाँ 'तु' शब्द से व्युत्क्रम की सूचना दी गयी है। इस प्रकार
प्रसङ्ग या क्रमप्राप्त जो काकुविधान नहीं था उसे भी अपेक्षावश बतला दिया
गया है। 'अनुपूर्वशः' का आशय है कि अब जो क्रमप्राप्त दशरूपकों का
विधान विवरण है उसको विभागादि विवरणों के सहित पूर्णतः अगले अध्याय
में कहूँगा ॥ शिवम् ॥
भरतमुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र के श्री बाबूलाल शुक्ल, शास्त्रि प्रणीत
प्रदीप हिन्दी व्याख्यान की अतिरिक्त टिप्पणियों का
द्वितीय-भाग सम्पूर्ण ॥ शिवम् ॥
परिशिष्ट २
पद्यार्धानुक्रमणिका
पद्य पृष्ठ पद्य पृष्ठ
अ अञ्चितौ कूर्परांसौ तु ७८
अङ्कच्छेदे तमन्यस्मिन् १८३ अश्लिष्ट कपोतश्च ३८
अङ्कच्छेदे तु निर्वृत्तं १८४ अचिन्तयन्त्यभिनव २४१
अकार्यं सहसा कृत्वा ३२२ अज्जुकेति च वक्तव्या ३५५
अङ्कुशग्रहणाक्षाशं १४९ अट्टितश्च पुनर्वाम १२४
अकाराद्याः स्वरा ज्ञेया २०२ अट्टितं शकटास्यञ्च ११५
अक्रोधः क्रोधजननै ३२१ अत ऊर्ध्वं व्याख्यास्ये ८३
अङ्गालङ्कारचेष्टा तु १९८ अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि
अङ्गालङ्कारयोज्या तु १९८ ७५, ११४, २६९, ३३४, ३७३
अङ्गकाव्यकृतं हास्यं १५७ अतश्च विपुलाभ्या तु २७१
अङ्गनेपथ्यसत्वानि २०० अतश्च संयुतान् हस्तान् ६४
अङ्गा वङ्गाः कलिङ्गाश्च १९० अतः परं प्रवक्ष्यामि १०, ३४, ४३, ८१,
अङ्गाभिनयमेवादौ ५ ८५, ९४, ११५, १२१, १२७, १६१, २९७,
अङ्गारकारकव्याध ३५४ अतः परं रङ्गपरिक्रमस्य १७७
अङ्गप्रत्यङ्गसंयुक्तः ५ अतः परं लक्षयिष्ये १३
अङ्गसौष्ठवसम्पन्नै १११ अतिक्रान्तक्रमं कृत्वा १०३
अङ्गहारविनिष्पन्नं ६ अतिक्रान्तक्रमे चैव ९३
अङ्गुल्यग्रस्वस्तिकयोगात् ४८ अतिक्रान्तं पुनर्वामं ११६, ११७; १२०
अङ्गुल्यः करणं विप्राः ८२ १२०, १२१
अङ्गुल्यो यस्य हस्तस्य ४९, ६६ अतिक्रान्ता ह्यपक्रान्ता ९७
अङ्गुल्यः संहताः सर्वाः ५५ अतिक्रान्तेन पादेन १४७
अङ्गुल्यः संयुताः वक्राः ६४ अतिक्रान्तैः पदैर्विप्राः १४३
अङ्गुष्ठः कुञ्चितश्चैव ६० अतिक्रान्तं विचित्रञ्च ११५
अङ्गुल्यश्चाञ्चिताः सर्वाः ९२, ९३ अतिवृष्ट्यां सहस्राणि २१६
अग्न्यादिदैवतं प्रोक्तं २२२ अतिपीतं तथा भुक्तं ११४
अघोषा इति ये २०३ अतिरिक्तेऽतिरिक्तञ्च १७५
अचञ्चलमकुब्जश्च ११२ अतिभाषार्यभाषा च ३३५
अचञ्चलमनाश्चैव १४४ अतिभाषा तु देवानां ३३४
अचलैर्मधुरैर्गात्रै ११४ अतिवाक्यक्रियोपेतं १९५
अञ्चितः कुञ्चितश्चैव ९१ अत्तेति गणिकामाता ३५५
अञ्चितापसृतोद्बद्ध ३५ अतोऽधिकाक्षरं छन्दो २१४
५१२ नाट्यशास्त्र
अत्यायतपदश्चावच्च १५७ अधोमुखस्थितश्चैव १७६
अत्र नित्यं प्रयत्नो हि ११२ अधोमुखीनां सर्वासां ५६
अत्र नोक्तं मया यस्तु ३४६ अधोवलोकनेनैव १४६
अत्रोच्यते कथं नैषा १३२ अध्यर्धमेतद् विज्ञेयं १२५
अथानुवृत्तिरङ्गोपपत्ति ३१३ अध्यर्धिका चाषगति ७९
अथवाभिनयोपेतं १११ अनन्तरप्रयोगस्तु ३०६
अथवार्थवशाच्चापि १८१ अनर्थकैः विकारैश्च १५८
अथवा कारणोपेतं ३७२ अनवस्थिततारा च १८
अथवा छन्दतः कार्या ३४२ अनवस्थितसञ्चारा १९
अथ दिव्याः प्रकृतयो १६२ अनाविद्धेषु भावेषु २७
अथ मध्यमनीचेस्तु १३२ अनिबद्धपदं छन्दः २११
अय प्रेषणिकाश्चापि १८२ अनिमित्तप्रकथनो १५४
अथ बाह्यप्रयोगे तु ११४ अनियुक्तार्थकं वाक्यं ३६०
अथवान्यादृशं प्राप्य ७४ अनिष्पणेन गात्रेण १४४
अथ वीरे च कर्तव्या १३९ अनिष्टदर्शने गन्धे २४
अथ वृद्धस्य कर्तव्या १५२ अनिष्टश्रवणे चैव १३५
अथ योन्यन्तरी भाषा ३३६ अनीप्सिते विषादे च ७
अथातो मुखरागस्तु ३३ अनुक्तं श्रूयते यच्च १९६
अथायैव प्रवक्ष्यामि २३ अनुपश्लिष्टशब्दं यत् २९९
अथैषां रसभावेषु २२, २४ अनुष्टुप् चपला सा २६३
अथैषां सम्प्रवक्ष्यामि २६ अनेकस्वाद्विचाराणां २७७
अर्थस्य साधकश्चैव २८३ अनेकभावसंयुक्तं ३०६
अर्थान्तरस्य कथने २८३ अनेकभेदबहुलं ५
अर्थापत्तिः प्रसिद्धिश्च २७५ अनेकवाक्यसंयुक्तं ३२०
अर्थापेचयक्षरस्यूतं २११ अनेकयुक्तिमद्वाक्यं ३२०
अथावेष्टितमेकं स्यात् ४१ अनेकस्य तथैकेन २८७
अथासनविधिः कार्यः १६९ अनेकार्थविशेषैर्यत् ३०७
अद्य मे सफलमायत २३४ अनेकोपाधिसंयुक्तो २८१
अद्भुते विस्मयात् स्तब्धौ ३७० अनेन कार्य स्थानेन १०६, १०८
अदृष्टोऽन्योऽपिवा २८५ अनेनैव क्रमेणैव २५
अधमा इति ये ख्याता १५९ अनेन चारीयोगेन १५५
अधमेषु प्रकीर्णाश्च ७३ अनेनैव विधानेन १४९
अधरोष्ठपानरञ्जन ५० अन्धकारेऽथ याने च १४५
अधोभागचरी दृष्टिः १९ अन्तःस्था संवृतजा २०४
अधोभागविचारा च १८ अन्त्यं सप्तदशश्चैव २५१
अधोमुखतलाविद्धौ ७९ अन्त्यं सप्तदशे पादे २४७
अन्त्यमेकोनविंशच्च २५५
पद्यार्थानुक्रमणिका ५१३
अन्त्योपान्त्ये गुरुर्यत्र २५१ । अभिमुखपराङ्मुखीभ्यां ५३
अन्धकारेऽथ याने च १४५ अभियुक्तैर्विशेषस्तु १०३
अन्त्योपान्त्ये च दीर्घाणि २४६ अभूतपूर्वो यो ह्यर्थः २७८
अन्त्योपान्त्ये च शक्कर्यां २४२, २४४ अभूतपूर्वैर्यन्त्रार्थैः ३१७
अन्यत्रार्थेन सम्बद्धं ३२४ अभ्यन्तरेण करणं ८१
अन्यदा पुनरायेति ३५२ अमी गुणा रूपगुणा २३३
अन्यस्मिंश्चैव पतना- २८२ अथथातथादिकेषु तु ३३१
अन्यापदेशैः कथनं २८४ अयमुद्धितकरणे ९१
अन्यापदेशकथनैः ३१८ अयं विधिस्तु कर्तव्यो १३३
अन्ये चाप्यर्थसंयुक्ता ७१ अयमेवाङ्गुलि परि ६६
अन्येऽपि देशाः प्राच्या १९० अयुग्गणे विधातव्यो २६९, २७०
अन्योन्यजङ्घासंवेधात् ९९ अयुजोर्लक्षणं ह्येतत् २६२
अन्योन्य-सदृशा यत्र ३०३ अरालकटकाख्यौ च ७७
अपक्रान्तः पुनश्चाद्यो ११९ अरालस्य यदा वक्रा ४९
अपक्रान्तः पुनर्वामः ११७ अरालौ तु विपर्यस्ता ६७
अपदेशस्तु परोक्षो ३१७ अर्थस्य च व्यक्तिरुदा ३००
अपराद्धानुसरणे १३५ अर्थहीनं त्वसम्बद्धं २९८
अपरस्परनिष्पन्ना ३३२ अर्धचन्द्रो हरालश्च ३७
अपरिज्ञाततत्त्वार्थः ३२० अर्धतालोत्थितैः पादैः १५१
अपशिसानतत्त्वार्थं ३२० अर्धनारीगतिः कार्या १६७
अपसर्पी पुनर्वामः १२५ अर्धव्याकोशपद्ममात्रा १८
अपसव्यप्रवेशा तु १९१ अर्धेनैकेन यद् वृत्तं २९२
अपस्मारे तथा कार्या २० अलङ्काराः गुणाश्चैव ३०३
अपि कस्यचिद् युवति २३७ अलङ्कारैर्गुणैश्चैव २७६, ३१४
अपि चाध्यायिके कार्ये १३५ अलङ्कारा विरामाश्च ३७३
अपूर्वक्रोधजनितं ३२४ अलङ्कारविरामाभ्यां ३७०
अप्यनुक्तो बुधैर्यत्र ३०२ अलपल्लवकाराला ७९
अप्रत्यक्षार्थसंस्पर्शं २८० अलपल्लवसंस्थाना ७७
अप्रार्थनीयामन्यां वा ३२१ अलपल्लवोध्वणौ च ४०
अभावहन्तवैकल्या २९३ अलम्भलाभाद् भुक्तस्य १५९
अभितप्ता च निर्वेदे २० अलातं वामकक्षैव ११६
अभिनयकरास्तु ये ७१ अलातं वामकं पादं ११८
अभिनेयास्त्वनेनैव ४५ अलातश्च पुनर्वामः १२१
अभिपूर्वस्य णीञ् धातु ४ अलातश्च भवेद् वामः १२०
अभिप्रेतार्थसिद्धयर्थं २७९, २८२ अलोलचक्षुश्च भवेत् १४४
अभिप्लुतार्थं विज्ञेयं २९९ अवकृष्टे मदे चैव १५४
अभिमानावष्टम्भ ६८ अवगीतोऽपि हीनोऽपि ३०५
३३ ना० शा० द्वि०
५१४ नाट्यशास्त्र
अवज्ञाविहतादौ च ३२ | अस्मिंस्ते शिरसि २३०
अवर्ण्यं वर्ण्यते यत्र २९७ | अस्य दृष्टिविधानस्य ११
अवलोक्य दिशः सर्वाः १६१ | अस्याः विविधान् योगान् ५२
अवस्थान्तरमासाद्य १३३ | अस्य शाखा च नृत्तञ्च ६
अवस्रत्तोत्तरपुटा १४ | अस्यैव तु कपित्थस्य ५१
अवाङ्मुखस्त्वं निर्भुग्नं ३२ | अस्यैव च यदा मुष्टेः ५०
अवाङ्मुखस्थितश्चापि १० | अस्यैव चाङ्गुलीभिस्त्वधो ४२
अविशेषाभिधानं यत् २९८ | अस्यैव दक्षिणं पादं १०८
अवृद्धस्य प्रयोगज्ञो १५१ | अस्यैष वैपरीत्येन १४६
अवेक्ष्य वृत्तिबाहुल्यं १९२ | अस्यैव समपादस्य ९२
अव्यक्तार्थप्रवादे च ३६५ | अस्यैव शिखराख्यस्य ५०
अशुद्धकार्यं प्रक्रान्तं ११४ | असौ हि रामारति २९६
अशेषाङ्गाकुकुलापूर् १४९ | अहह्या तु मही यत्र १३८
अश्वयाने गतिः कार्या १५० | अह्नः प्रमाणं गत्वा तु १८३
अश्रुप्रमार्जनं तिलक ४४ | अहमिति च दर्पवचने ८४
अष्टादशं सप्तदशं २५३ | अहं वः कथयिष्यामि ३
अष्टादश द्वितीयञ्च २७३ | आ
अष्टावादौ गुरूणि २५८ | आकम्पितं कम्पितञ्च ६
अष्टाशीतिश्च वृत्तानि २१६ | आकारैकारसंयुक्तं ३७१
अष्टाक्षरकृते पादे २२९ | आकारस्तु स्मृते कार्यं ३१०
अष्टाशीति सहस्राणि २१७ | आकाशगमने चैव १४६
अष्टिरत्यष्टिरपि च २२४ | आकाशेन विमानेन १८२
अष्टौ चैव तु वृत्तानि २१७ | आकाक्षिक्यः स्मृता ह्येता १७, १०४
अष्टौ चैव सहस्राणि २१८ | आका शिकीनां चारीणां १००
अष्टौ षष्ठिश्च वृत्तानि २१६ | आकुञ्चितं कुञ्चितं स्यात् २४
असंख्येय-प्रमाणानि २१५ | आकुञ्चितं समञ्चैव १७५
असंयुताः करा ह्येते ६४ | आकुञ्चितपुटापाङ्ग १८
असंयुताः संयुताश्च ३८ | आकृत्या चेष्टया चिह्नैः ७१
असंस्पर्शाच्च लोकस्य १६० | आकेकरा दुरालोके २१
असंस्थितैः पदैः २२८ | आकेकरपुटा चैव १३
असंस्थितपदा सुविह्वलाङ्गी २६५ | आकेकरा विकोशा च ११
असिचापचक्रतोमर ५० | आखिसं नामकं कुर्यात् १२०
असूयावेदनावज्ञा ३० | आख्यातं पाठ्यकृतं २०७
असूयिते जुगुप्सायां २६ | आख्यानाज्ञा-प्रतिषेध ३१२
अस्पृष्टश्च दकारो ३३० | आगतासि भवनं मम २३४
अस्वस्थकामिते चैव १३५ | आघूर्णमानमध्य्या या १९
अस्वराः सस्वराश्चापि २२० |
पदार्थानुक्रमणिका ५१५
आङ्गिकस्तु भवेच्छाखा ६ | आपाणं आबाणं भवति ३३१
आङ्गिको वाचिकश्चैव ५ | आभाषणञ्च दूरस्थे ३५९
आचार्यबुद्ध्या तानीह १२६ | आभीरोक्तिः शाबरी च ३४४
आश्चर्य अच्छुरियं ३३३ | आभुग्नं तदुरो ज्ञेयं ८४
आत्मभावमुपन्यस्य ३१८ | आभुग्नतालमध्यस्थः ६१
आदर्शधारणं खण्डनं ५१ | आभुग्नमथ निर्भुग्नं ८५
आदित्यांशुरपर्धिन्येषा २२९ | आभ्यन्तरस्तु नृपते १७३
आदौ द्वे च चतुर्थञ्च २४३ | आमन्त्रणैस्तु पाषण्डा ३५२
आदौ द्वे नैधने २२७ | आम्नायसिद्धं सर्वासां ३४०
आदौ द्वे यत्र पादे २१४ | आयतञ्चावहित्थञ्च १६२
आदौ द्वौ पञ्चमश्चैव २३२ | आयतदण्डग्रहणं ५१
आदौ पञ्चाक्षरच्छेदः २३६ | आयतनासादण्डे २७१
आदौ पादे तु यत्र स्यात् २१४ | आयामनादुभयतः ८६
आदौ षट् दशमश्चैव २४१, २४५ | आयुष्मन्निति वाच्यस्तु ३५०
आदौ यत् क्रोधजननं ३१९, ३२१ | आरोढुमुद्वहेद् गात्रं १४६
आद्यञ्चैव चतुर्थञ्च २५७ | आरोहणावतरणम् १४७
आद्यन्तु जनितं कृत्वा ११६, ११८, १२३, | आर्यागीतिरथार्धे च २७४
१२५ | आर्या त्वक्षरपिण्डेन २७३
आद्यस्तु जनितो भूत्वा १२५ | आर्या मुखे तु चापला २७२
आद्यं कुर्यादपक्रान्तं ११९ | आर्येति पूर्वजो भ्राता ३५३
आद्यं चतुर्थमन्यच्च २३१ | आर्येति ब्राह्मणं ब्रूयात् ३४८
आद्यं चतुर्थं दशमं २३९ | आलस्यश्रमखेदेषु १७७
आद्यं चतुर्थं षष्ठञ्च २४५, २४९ | आलिङ्गने महास्तम्भ ६०
आद्यं चारालमुत्तानं १४३, १६६ | आलीढपरिवर्तस्तु १०८
आद्यं तृतीयमन्यच्च २२८, २३३, २३४, | आलीढसंहितं शस्त्रं १०८
२६६ | आलीढं स्थानकं कुर्यात् १०८
आद्यं पादञ्च जनितं ११६ | आलीढं स्थानकं कृत्वा १६०
आद्यः पृष्ठापसर्पी च १२४ | आलेख्यनेत्ररञ्जन ६२
आद्यस्तु जनितः कार्यः १२२ | आवर्जितं प्रयोक्तव्यं ९०
आद्यस्तु जनितो भूत्वा ११८ | आवर्जितं नतं क्षिप्तं ९०
आद्यो दण्डक्रमश्चैव १२० | आवर्जिताः करतले ५७
आद्ये पुनरन्त्ये २२५ | आवर्तन्ते कनिष्ठाद्या ८२
आद्यो भ्रमरकः कार्यः १२२ | आवाहनमवतरणं ४३
आद्यो भ्रमरकश्चैव १२३ | आवाहने विसर्गे ४९
आद्यात् पराणि पञ्चाथ २४७ | आवाहने विसर्गे च १६२
आद्या धनुर्नता कार्या ४७ | आविद्धवक्त्रौ सूच्यास्यौ ४०
आधूतं तु शिरोज्ञेयम् ८ | आवेगे चैव हर्षे च १३५
५१६ नाट्यशास्त्र
आवेष्टयन्ते यदाङ्गुल्यः ८१
आवन्तिका वैदेशिका १८९
आवन्ती दाक्षिणात्या च १८६, १९१
आवन्त्यां दाक्षिणात्यायां १९१
आलोकश्चैव लोकश्च १७९
आशीः प्रियोक्तिः कपट ३१३
आशीर्वादा तथा भावा ४७
आसन्नोक्तश्च यद्वाक्यं १९६
आसां तु सम्प्रवक्ष्यामि २६७
आसाद्य तु रसं हास्यं १३९
आस्कन्दितेन वामेन ११६
आस्पन्दितः पुनश्चार्मः १२२
आस्पन्दितः पुनः सव्यः १२३
आस्पन्दितञ्च वामेन ११८
आस्फोटने च योज्यः ५५
आह्वानञ्च निवारण ४८
आह्लादिश्चोर्ध्वसुकुला २०
आहाराधिष्ठिताः प्राणाः ११३
इ
इतरार्धे तु षष्ठस्य २७४
इतरेण निषीदेच्च १५६
इतिच्छन्दांसि यानीह २२४
इति दन्तोष्ठजिह्वानां ३१
इत्यादि लोकभावार्था ३३
इत्यूर्वोर्लक्षणं प्रोक्तं ९०
इत्येतदङ्गजं प्रोक्तं ९४
इत्येतदुदरस्योक्तं ८७
इत्येतल्लक्षणं प्रोक्तं ३६
इत्येते पर्वतश्रेष्ठाः १८५
इत्येवं जङ्घयोः कर्म ९१
इत्येवं तु भ्रुवोः प्रोक्तं २७
इत्येवं लक्षिता ह्येषा १९
इत्येष दर्शनविधिः २२
इत्येष निषधो हस्तः ६८
इत्येष मुखरागस्तु ३४
इत्येषा सर्वविषमा २६५
इत्येषु रसभावेषु २५
इत्योष्ठकर्मण्युक्तानि ३०
इत्योष्ठलक्षणं प्रोक्तं २९
इदमेव विपर्यस्तं १०६
इष्टार्थख्यापने चैव ३६५
इह भावा रसाश्चैव १८४
इह साम्प्रतमस्येद्य ५६
ई
ईषत् प्रसारिते जङ्घे १७७
ईप्सितेनार्थजातेन ३०१
उ
उक्तं काकुविधानं तु ३७२
उकार बहुलां तज्ज्ञस्तेषु ३४६
उक्तान्तः परश्चैव १२६
उक्ताद्युत्कृतिजातानि २१८
उक्तान्तः परश्चैव १२६
उक्ता ह्येते द्विविधा ७१
उच्चयः सहशार्थो यः २८०
उच्चा दीप्ता द्रुता चैव ३६४
उच्चो दीप्तश्च मन्द्रश्च ३६१
उत्कण्ठिते च तज्ज्ञैः ७०
उत्कर्षणं विकर्षणं ७२
उत्क्षिप्तवक्रा तु यदा ५१
उत्क्षिप्तश्चापि विज्ञेयं १०
उत्क्षिप्तबाहुशिरस ९
उत्क्षेपः पातनञ्चैव २५
उत्क्षेपो विस्मये हर्षे २६
उत्सङ्ग इति विज्ञेयः ६७
उत्तमार्थाद्विशिष्टो यः ३१७
उत्तमानां कराः कार्या ७३
उत्तमानां भवेद्भाषा १४४
उत्तमानां तु कर्तव्या १४०
उत्तमाधममध्यानां १३३
उत्तमानामयं प्रायः १३९
उत्तमानां गतिर्या १३४
उत्तमैर्मध्यमैर्वाचैः ३४७