मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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महेन्द्रविक्रमवर्मा के पिता सिंहविष्णुवर्मा कुलपर्वत के समान थे।
उन्होंने पर्वत सदृश समस्त राज्य को दृढ़ता, सुचारुता प्रदान की; समस्त
पृथ्वी के भार को योग्य शासक के रूप में वहन किया ।
शत्रुषद्वर्ग (पृ० २४)—
छः प्रकार के अन्तःशत्रु माने जाते हैं—काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह
और मत्सर ।
महाभूत (पृ० २४)—
पञ्च महाभूत ये हैं—पृथ्वी, अप्, तेजस्, वायु और आकाश ।
प्रज्ञादानदयानुभावधृतयः (श्लोक ३)—
बुद्धि, उदारता, अनुकम्पा, मर्यादा, दृढ़-सङ्कल्प, दीप्ति, शिल्प
कला-ललित कला, समृद्धि, निष्ठा, पराक्रम, निष्कपटता और नम्रता
आदि—इन बारह गुणों को कलियुग में जब कहीं स्थान प्राप्त नहीं हुआ
अर्थात् कोई उचित पात्र नहीं मिला तो ये सब गुण एक साथ मिलकर
राजा महेन्द्रविक्रमवर्मा की शरण में उसी प्रकार चले गए जैसे प्रलय काल
में देवता, मनुष्य, तिर्यक् (पशु-पक्षी) व स्थावर आदि सृष्टियाँ जगत् के
आदि पुरुष मूल कारण की शरण में चली जाती हैं उसी में लीन हो जाती
हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि महेन्द्रविक्रमवर्मा सर्वगुणसम्पन्न था ।
कल्पान्ते (पृ० २४)—
कल्प—सृष्टि । कल्पान्ते—सृष्टि के अन्त में अर्थात् प्रलय काल में ।
कल्प ब्रह्मा का एक दिन अथवा १००० युग । युग चार होते हैं—
सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि । सत्ययुग का परिमाण १७२८००० वर्ष;
त्रेतायुग का परिमाण १२९६००० वर्ष; द्वापर युग का परिमाण ८६४०००
वर्ष है तथा कलियुग ४३२००० वर्ष के परिमाण वाला है । इन चार युगों
का एक चतुर्युग या महायुग कहलाता है । यह (चारों युग मिलकर) देवताओं
का एक युग होता है । एक हजार महायुगों का एक दिन होता है और एक
हजार महायुगों की ही ब्रह्मा की एक रात्रि होती है—
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥
—भगवद्गीता ८.१७
मत्तविलास-प्रहसन ६८
आदिपुरुष (पृ० २४)—
जगत् का मूल कारण ।
सर्गप्रभेदा (पृ० २४)
देवता, मनुष्य, तिर्यक् व स्थावर आदि सृष्टियां (सर्ग) के भेद हैं।
आकरे सूक्तिरत्नानां (श्लोक ४; पृ० २६)—
राजा महेन्द्रविक्रमवर्मा अपनी राजसभा में छोटे-बड़े सभी कवियों
का समान रूप से आदर करता था। उसकी सभा-गोष्ठियों में काव्य गुणों
से पूर्ण श्रेष्ठ कोटि की कृतियों को तो आदर मिलता ही था परन्तु साथ ही
साथ साधारण कवियों की सामान्य कवितायें या सूक्तियाँ भी बहुत
सम्मानित की जाती थीं।
स्थापना (पृ० २६)—
स्थापना, आमुख और प्रस्तावना—इन तीनों शब्दों का प्रयोग एक
ही अर्थ में किया जाता है। प्रधान कथा-वस्तु का आरम्भ जहाँ से किया
जाता है वहाँ तक प्रस्तावना चलती है। इसी को स्थापना या आमुख
भी कहते हैं। आमुख का लक्षण है—
सूत्रधारो नटीं ब्रूते मार्षं वाऽथ विदूषकम् ।
स्वकार्यं प्रस्तुताक्षेपि चित्रोक्त्या यत्तदामुखं प्रस्तावना वा ।
—दश० ३.७८
अर्थात् जहाँ सूत्रधार नटी, मार्ष (पारिपार्श्विक) अथवा विदूषक के
साथ बात करता हुआ विचित्र उक्तियों द्वारा कथा-वस्तु का सङ्केत करता
हुआ अपने कार्य का वर्णन करता है उसे आमुख कहते हैं।
'इति निष्क्रान्तो' तक यह प्रस्तावना चलती है।
कालिदास ने अपने तीनों नाटकों में 'प्रस्तावना' का प्रयोग किया
है, जबकि भास ने अपने सभी नाटकों में स्थापना का प्रयोग किया है और
शूद्रक ने आमुख का प्रयोग किया है। महेन्द्रविक्रमवर्मा ने भी प्रस्तुत प्रहसन
में स्थापना शब्द प्रयुक्त किया है। सम्भवतः दक्षिण भारत के नाटककारों
की 'स्थापना' शब्द का प्रयोग करने की विशेषता रही होगी।
किन्तु मत्तविलास की दूसरी हस्तलिखित प्रतिलिपि में 'आमुखम्' यह
पाठ-भेद भी उपलब्ध होता है।
७० 'टिप्पणियाँ
पेया सुरा (श्लोक ७; पृ० २८)—
भगवान् शिव कापालिक सम्प्रदाय के प्रवर्तक माने जाते हैं।
श्मशान में वास करना, कपाल धारण करना, भस्म का लेप करना, विकृत
वेष धारण करना इत्यादि इस सम्प्रदाय के नियम हैं। इसी सम्प्रदाय के
अनुसार मद्य-पान करना और स्त्री-सहवास को ही मोक्ष प्राप्ति का साधन
माना गया है। और उसी (कापालिक सम्प्रदाय) के अनुसार कपाली यहाँ
वर्णन करता हुआ कहता है कि इस प्रकार के मोक्ष के मार्ग को बताने वाले
वे भगवान् शिव दीर्घजीवी हों, अर्थात् यह कापालिक सम्प्रदाय लम्बे समय
तक चलता रहे।
अर्हन्तः (पृ० ३०)—
मोक्ष के लिए जो भी व्यक्ति पात्र हो गया है उसे अर्हन् कहते हैं।
सातवीं शताब्दी में अर्हन् शब्द बौद्धों तथा जैनों, दोनों के लिए प्रयुक्त
होता था। प्रस्तुत सन्दर्भ में यह शब्द जैनों के लिए प्रयुक्त हुआ है।
कार्यस्य निःसंशयमात्महेतोः (श्लोक ८; पृ० ३०)—
प्रस्तुत श्लोक में जैनों के हेतुवाद की ओर संकेत किया गया है।
जैन हेतुवादी ये मानते हैं कि कार्य अपने कारण से समान रूप वाला होता है।
कपाली का यह कहना है कि जैन लोग एक ओर तो हेतुवाद का समर्थन
करते हैं और दूसरी ओर तप, समाधि आदि दुःख का कार्य मोक्ष रूपी सुख
को मानते हैं। अर्थात् तपस्या आदि के द्वारा प्राप्त शारीरिक कष्टों से
मोक्ष रूपी आनन्द की प्राप्ति होती है। परन्तु दुःख से सुख की प्राप्ति
असम्भव है क्योंकि कारण (दुःख) और कार्य (सुख) ये दोनों परस्पर विरोधी
तत्त्व हैं। अतः कपाली के कथनानुसार इस प्रकार के कथन से वे बेचारे
हेतुवादी स्वयं ही परास्त हो गए। अर्थात् उनका सिद्धान्त उन्हीं पर व्यर्थ
सिद्ध हो गया।
कार्य-कारण का यही भाव 'बुद्धचरित' के सप्तम सर्ग में भी उप-
लब्ध होता है—
दुःखेन मार्गेण सुखं ह्युपैति सुखं हि धर्मस्य वदन्ति मूलम् ।।८।।
दुःख को सुख का हेतु मानना उचित नहीं है यही कपाली का
विचार है।
मत्तविलास-प्रहसन ७१
ये ब्रह्मचर्य-केशनिर्लोटन••••(पृ० ३०)—
यहाँ जैन धर्म के नियमों की ओर संकेत है। ब्रह्मचर्य का पालन
करना, बालों का लुंचन करना अर्थात् एक-एक करके बालों को उखाड़ना,
मल धारण करना अर्थात् शरीर को मलिन रखना, भोजन के समय का
नियम अर्थात् सूर्यास्त से पहले ही भोजन करना, मैले वस्त्र पहनना आदि
जैन धर्म के नियम हैं। वे लोग कायक्लेश (शारीरिक कष्ट) पर बल देते
हैं। जहाँ एक ओर बुद्ध ने आत्यन्तिक भोग और त्याग को छोड़कर मध्यम
मार्ग को स्वीकार किया तो दूसरी ओर जैनों ने आत्यन्तिक त्याग के मार्ग
को अपनाया।
अनतिशयमनन्तं••••(श्लोक ६; पृ० ३०) —
जिन ऋषि मुनियों ने परमतत्त्व परमानन्द का साक्षात्कार कर लिया
है, उनके अनुसार तपस्या से प्राप्त मोक्ष रूपी सुख अनतिशय अर्थात् अतिशय
से रहित है। उसके बराबर अन्य कोई सुख नहीं है। वह सुख अन्तरहित
है। कपाली का कहना है कि वैसा ही, मुनियों द्वारा वर्णित सुख यहाँ
काञ्चीपुरी में भी पूर्णरूपेण विद्यमान है। परन्तु फिर भी दोनों सुखों में
अन्तर है। काञ्ची का सुख इन्द्रिय-भोग्य और काम-भोग्य है जबकि मोक्ष
रूपी सुख इन्द्रियगम्य नहीं है। कपाली के अनुसार काञ्ची का सुख तपस्या
से प्राप्त सुख से भी बढ़कर है।
एष सुरापणो••••••(पृ० ३२)—
यहाँ मदिराशाला की तुलना यज्ञ स्थल से की गई है। यज्ञ स्थल
पर पताका युक्त एक खम्भा होता है जिससे बलि के पशु को बाँधा जाता है;
यहाँ मद्यशाला में भी पताका लगा हुआ स्तम्भ स्थित है।
सोमः —
सोमरस, मधु इत्यादि पेय पदार्थ होते हैं जो देवताओं को अर्पित किए
जाते हैं। यहाँ मद्यशाला की मदिरा की तुलना सोमरस से की गई है।
ऋत्विजः —
ऋत्विक् पुरोहित होते हैं जो यज्ञ करते हैं। मदिराशाला के
दुकानदार (शोण्डाः) ऋत्विक् तुल्य हैं। चमसाः—सोमपान करने का लकड़ी
के चमचे के आकार का यज्ञ का पात्र होता है। चषकाः—चमड़े का पात्र
जिसमें मदिरा आदि पीते हैं—सुरापात्र, प्याला।
७२ टिप्पणियाँ
हविः —
पुरोडाश आदि विशेष प्रकार का आहार है जो देवताओं को यज्ञ के
अवसर पर अर्पित किया जाता है । मदिराशाला में शूली पर पका हुआ मांस
आदि भोज्य पदार्थ ही मानों हवि स्वरूप है ।
यजूंषि—
यजुर्वेद के मन्त्रः मदिरा पीने पश्चात् नशे में चूर लोगों के प्रलाप
(मत्तवचनानि) ही मानों यजुर्वेद के मन्त्र हैं ।
सामानि—
सामवेद । यज्ञ के अवसर पर सामवेद के मन्त्रों का सस्वर गान
(पाठ) होता है; मद्य पान के पश्चात् मतवालों के गाने सामवेद के गानों के
सदृश हैं ।
उदङ्कः —
तेल आदि रखने के लिए चमड़े का बना हुआ बर्तन, कुप्पा ।
स्रुवाः —
यज्ञ का चमचा ।
तर्षोऽग्निः —
मदिरा की तृष्णा अग्नि तुल्य है । जैसे यज्ञाग्नि में घृत, हवि आदि
डालने से वह और अधिक प्रज्ज्वलित होती है उसी प्रकार मदिरा की तृष्णा
भी स्वतः तीव्र होती जाती है ।
सुरापणाधिपतिः —
मद्यशाला का स्वामी यजमान स्वरूप है ।
मिथ्यात्रिलोचनपावकेन (श्लोक १०; पृ० ३२)—
यह पौराणिक कथा प्रसिद्ध है कि शिव की तपस्या भङ्ग करने के लिए
कामदेव ने नृत्य किया जिसके फलस्वरूपं शिव ने क्रुद्ध होकर अपने तृतीय
नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया और तभी से वह अनङ्ग
कहलाए । यहाँ कपाली यह कल्पना करता है कि कामदेव के विषय में प्रचलित
यह कथा झूठी है । उसके अनुसार कामदेव का शरीर भस्म नहीं बना अपितु
शिव के तीसरे नेत्र की गर्मी से वह शरीर, द्रव रूप में परिणत हो गया । उस
द्रवीभूत पदार्थ ने मदिरा का रूप धारण कर लिया । वही मदिरा मन को
अत्यधिक मतवाला बना देती है ।
टिप्पणियाँ ७३
यह वस्तुतः कपाली की कल्पना मात्र है, वास्तविकता नहीं।
स्नेहात्मिका (पृ० ३२)—
द्रवीभूत । स्नेह—तेल, द्रव ।
प्रस्तुत श्लोक की अन्तिम पङ्क्ति वर्ण-साम्य के कारण कालिदास का
अनुकरण करती है —
'सेयं प्रिये ! मदयति प्रसभं मनांसि' । —मत्तविलास
'मायूरी मदयति मार्जना मनांसि' । —मालविकाग्निमित्रम्, १.२१
अभितापवशात् (पृ० ३२)---
गर्मी के कारण ।
आपद्धर्मम् (पृ० ३४)—
विपत्ति के समय का धर्म ।
विपत्ति के अवसर पर जब शास्त्रों में निर्दिष्ट कर्त्तव्य का पालन
करना कठिन हो उस समय आपद्धर्म को प्रमाण मानकर वह निषिद्ध कार्य
किया जा सकता है। जैसे एक बार दुर्भिक्ष पड़ने पर महर्षि विश्वामित्र को
जब कहीं भोजन प्राप्त नहीं हुआ तब अपने प्राणों की रक्षा के लिए उन्होंने
श्वान का मांस भक्षण, इसी आपद्धर्म को प्रमाण मानकर किया (महाभारत,
शान्तिपर्व, १४१) ।
उसी प्रकार देवसोमा का कहना है कि जब भिक्षा-पात्र कपाल नहीं
मिल रहा है तो आदरपूर्वक लाई गयी भिक्षा का तिरस्कार न करके
आपद्धर्म को प्रमाण मानकर गोसींग में भिक्षा स्वीकार करनी चाहिए।
गोशृङ्गेण (पृ० ३४)—
कापालिकों के पास गाय के सींग से बना भी एक पात्र रहता था
जिसका वे समय पड़ने पर उपयोग कर सकते थे, भिक्षा आदि ग्रहण कर
सकते थे ।
उपासकस्य (पृ० ३६)—
बौद्ध धर्म में उपासक और भिक्षु—इन दो प्रकार के अनुयायियों का
उल्लेख मिलता है । जो लोग गृहस्थ होते हैं, और सन्यासी नहीं हैं, उनको
उपासक कहा जाता है और जो सन्यास धर्म में रहने वाले बौद्ध हैं वे भिक्षु
कहलाते हैं। जैनों में उपासक को श्रावक और भिक्षु को मुनि कहा जाता है।
७४ : मत्त्तविलास-प्रहसन
पांच नियम जो 'पञ्चशील' कहे जाते हैं सर्वसाधारण के लिए
और उपासक के लिए आवश्यक हैं। उपासक के लिए मदिरा पीने और स्त्री-
सहवास की भी अनुमति थी परन्तु भिक्षुओं के लिए इन दोनों का पूर्ण निषेध
था। उनके लिए दस नियम हैं जो 'दशशील' कहे जाते हैं।
मोक्ष की प्राप्ति अत्यन्त दुष्कर है। गृहस्थ के लिए अनेक विघ्न हैं।
उसके लिए साधना सुलभ नहीं हैं। साधारणतः वह स्वर्गोपपत्ति चाहता है।
उसके लिए शील की शिक्षा है। उपासक होने के लिए त्रिशरण 'गमन' विधि
है। जो उपासक होना चाहता है वह बुद्ध, धर्म और सङ्घ की शरण में जाता
है। बुद्ध की शरण में जाने का अर्थ है बुद्धकारक धर्मों की शरण में जाना।
उपासकों के पञ्चशील और भिक्षुओं के दशशील ये हैं—
१. प्राणातिपातविरति, २. अदत्तादानविरति, ३. काममिथ्या-
चारविरति, ४. मृषावादविरति, ५. सुरामद्यमैरेयस्थानविरति, ६. अकाल-
भोजनविरति, ७. नृत्यगीतवादित्रविरति, ८. माल्यगन्धविलेपनविरति,
६. उच्चासनशयनविरति, १०. जातरूपरजतप्रतिग्रहविरति ।
इनमें पहले पाँच नियम पञ्चशील हैं। दशशील में पञ्चशील भी
अन्तर्भूत हैं।
उपासक धर्म श्रवण करते हैं, उपवास, व्रत रखते हैं, भिक्षुओं को
दान देते हैं और चार तीर्थों की यात्रा करते हैं। चार तीर्थ ये हैं—कपिल-
वस्तु, बोधिगया, सारनाथ और कुसिनारा (कुशीनगर)। उपासक को भद्रक-
शील और भद्रकदृष्टि से समन्वागत होना चाहिए। उसको मानसिक,
कायिक तथा वाचिक दुश्चरित से बचना चाहिए। उसको सुचरित करना
चाहिए। इस प्रकार वह अपाय गति से बचता है और स्वर्ग में उत्पन्न
होता है।१
मत्स्यमांसप्रकारबहुलोऽयं (पृ० ३६)—
बुद्ध ने प्रवृत्त मांस का निषेध नहीं किया। अहिंसा के वे अवश्य ही
पूर्ण पक्षपाती थे; परन्तु ऐसे पशु के मांस को, जिसको (पशु को) किसी दूसरे
व्यक्ति ने मारकर पकाया है, उसको खाने की अनुमति बुद्ध ने दी है। मांस,
मछली आदि जिसकी हिंसा स्वयं नहीं की है उसको खाने में कोई पाप नही
है, ऐसा बुद्ध ने माना है।
१. आचार्य नरेन्द्रदेव, 'बौद्ध-धर्म-दर्शन,' पृ० २४।
टिप्पणियाँ ७५
राजविहारमेव (पृ० ३६) —
काञ्ची में स्थित विहार सम्भवतः बहुत बड़े थे जैसा कि इत्सिंग ने,
जो भारत में ६७३ ई० से ६८८ ई० तक रहा, वर्णन किया है। वे बड़े-बड़े
विहार ही कदाचित् राजविहार कहे जाते हों।
पञ्चसुगन्धब्बोवहिअं (पृ० ३६) —
एला (इलायची), लवंग, कस्तूरी, केसर, चन्दन ये पाँच सुगन्धित
पदार्थ ताम्बूल (पान) में प्रयुक्त होते हैं।
सर्वज्ञ (पृ० ३६) —
सर्वज्ञ शब्द बुद्ध के लिए प्रयुक्त होता है।
सर्वज्ञः सुगतो बुद्धो धर्मराजस्तथागतः ।
समन्तभद्रो भगवान्मारजिल्लोकजिज्जिनः ॥१३॥
—अमरकोषः (प्र. का., स्वर्गवर्गः १)
स्थविरेः (पृ० ३६) –
इस पद में श्लेष है। एक ओर स्थविर पद का अर्थ वृद्ध लिया
जा सकता है और दूसरी ओर बौद्धों के स्थविरवाद की ओर भी संकेत
मिलता है।
स्थविरवाद सम्प्रदाय बौद्ध धर्म का सर्वाधिक प्राचीन सम्प्रदाय है।
इस सम्प्रदाय के प्रवचनकार स्वयं भगवान् बुद्ध थे। स्थविरवाद का अर्थ
है स्थविरों अर्थात् वृद्ध ज्ञानी पुरुषों और तत्त्वदर्शियों का मत। बुद्ध के प्रथम
शिष्यों के लिए 'स्थविर' शब्द का प्रयोग किया गया है। बुद्ध मन्तव्य के
विषय में उन स्थविरों का मत ही अन्तिम प्रमाण था। अतः स्थविरवाद
का अर्थ प्रामाणिक मत भी हो गया। २
पिटकपुस्तकेषु (पृ० ३६) —
पिटक अर्थात् पिटारियाँ। बौद्ध धर्म में तीन पिटक सर्वस्व माने
जाते हैं—
१. विनयपिटक (ये आचार सम्बन्धी ग्रन्थ हैं।)
२. सुत्तपिटक (इसमें बुद्ध के उपदेश निहित हैं।)
२. वाचस्पति गैरोला, संस्कृत साहित्य का इतिहास, पृ० ३८३।
७६ मत्तविलास-प्रहसन
३. अभिधम्मपिटक (इसमें दार्शनिक विषयों का विवेचनात्मक
अध्ययन है ।)
इन पिटकों में अनेक छोटे-छोटे ग्रन्थ हैं। विनयपिटक में सात और
अभिधम्मपिटक में छः ग्रन्थ हैं। सुत्तपिटक में पांच निकाय (सुत्तसमूह) हैं—
१. दीघ निकाय (३४ सुत्त), २. मज्झिम निकाय (१५२ सुत्त),
३. संजुत्त निकाय (५६ संजुत्त), ४. अंगुत्तर निकाय (११ निकाय),
५. खुद्दक निकाय—इस निकाय में १५ छोटे-छोटे ग्रन्थ हैं जिनमें बुद्ध के
पूर्वजन्म से सम्बद्ध ५५० कथाओं का संग्रह जातक रूप में मिलता है जो
अत्यन्त विख्यात है।
संक्षेप में बौद्ध धर्म के त्रिपिटक को इस प्रकार समझा जा सकता है—
त्रिपिटक
───────────────────────┬───────────────────────
विनयपिटक सुत्तपिटक अभिधम्म पिटक
(७ ग्रन्थ) (संकलन) | (७ ग्रन्थ)
┌───────┴──────┐ १. धम्मसंगणि
सुत्तविभंग खंधक परिवार २. विभंग
┌───┴───┐ | ३. धातुकथा
महाविभंग भिक्खुणीविभंग ४. पुग्गल पंञति
┌────┴────┐ ५. कथावत्थु
महावग्ग चुल्लवग्ग ६. यमक
┌─────────┬──────────────┬──────────────┬──────┴────────┐ ७. पट्ठान
दीघनिकाय मज्झिमनिकाय संजुत्तनिकाय अंगुत्तरनिकाय खुद्दकनिकाय
(१५ ग्रन्थ)
१. खुद्दक पाठ, २. धम्म पद, ३. उदान, ४. इतिवृत्तक,
५. सुत्तनिपात, ६. विमानवत्थु, ७. पेतवत्थु, ८. थेरगाथा, ९. थेरीगाथा,
१०. जातक, ११. निद्देस, १२. पटिसंविधा, १३ अपदान, १४. बुद्धवंश,
१५. धम्मपिटक या चरीयपिटक ।
टिप्पणियाँ ७७
एकाग्रवासी (पृ० ३८)—
'एकाम्र' शब्द काञ्चीपुरी का बोध कराता है।
संवृतसत्यं परमार्थसत्यं श्रोतुमिच्छामि (पृ० ४०)—
'संवृत' या संवृति का अर्थ है 'आवरण' अर्थात् अविद्या का आवरण।
इस आवरण द्वारा मृषा (झूठा) ज्ञान होता है। यह आवरण हमको उसी
प्रकार आच्छन्न कर लेता है जिस प्रकार जन्म होते ही हमको आकाश
प्रत्येक ओर से आच्छन्न कर लेता है। संवृति स्वतः सिद्ध है। इस
जगत् की सत्ता सांवृतिक है, पारमार्थिक नहीं। केवल परमार्थ सत्य के
अधिगम से ही संवृति सत्य मृषा सिद्ध हो सकता है। सब पदार्थों का स्वभाव
दो प्रकार का होता है—सांवृतिक और पारमार्थिक। मृषादर्शी का जो विषय है
वह संवृतिसत्य कहलाता है; सम्यग्दर्शी का जो विषय है वह परमार्थ सत्य
कहलाता है।
परमार्थ सत्य सर्वज्ञान का अतिक्रमण करता है। वह किसी प्रकार
भी बुद्धि का विषय नहीं हो सकता तथापि परमार्थ तत्त्व सर्वप्रपञ्च विनिर्मुक्त
होता है, इसलिए सर्वोपाधि से शून्य है। वस्तुतः सब भावों की शून्यता ही
परमार्थज्ञान है। संवृति सत्य तो किसी स्तर पर बाधित हो जाता है, परन्तु
परमार्थ सत्य कहीं भी बाधित नहीं होता है।
नागार्जुन ने माध्यमिक शास्त्र में संवृति सत्य और परमार्थ सत्य के
भेद को बताया है।
नमो खरपटाय (पृ० ४०)—
कौटिल्य के अर्थशास्त्र के समय (चौथी शताब्दी) से 'खरपट' चोर-
शास्त्र के रचयिता माने जाते हैं। भास ने भी अपने नाटक चारुदत्त में खर-
पट शब्द का प्रयोग किया है।
वेदान्तेभ्यो गृहीत्वार्थान् (श्लोक १२; पृ० ४०)—
वेदान्त का अर्थ है वेदों का अन्त या ज्ञान की चरम सीमा। आत्म-
साक्षात्कार से प्राप्त होने वाला अनिर्वचनीय सर्वोच्च सत्य अथवा ज्ञान। यही
उपनिषद् भी कहलाता है।
महाभारतादपि (श्लोक १२; पृ० ४०)—
महाभारत में भी इसी आत्म तत्त्व अथवा ब्रह्म का विस्तृत विवेचन
७८ मत्तविलास-प्रहसन
है । भगवद्गीता जो वस्तुतः भगवद्गीतोपनिषद् शब्द का संक्षिप्त रूप है;
तथा जिसमें महाभारत का और सभी उपनिषदों का सार आया है, वेदान्त
का स्रोत है ।
कपाली का यह कथन—'बुद्ध ने वेदान्तों और महाभारत से भी तत्त्वों
को ग्रहण करके अपना कोश भर लिया' — बौद्ध धर्म और वेदान्त तथा महा-
भारत के अनेक सिद्धान्तों के साम्य की ओर सङ्केत करता है ।
भिक्षु धर्म का प्रतिपादन, नैतिक आचरण तथा करुणा से बहुजन
समाज की सेवा—यह बुद्ध का उपदेश उपनिषद् सम्मत ही है । बुद्ध का
दुःखवाद सांख्य-योग दर्शन से आया है । दार्शनिक विचारों के विकासार्थ,
विशेषतः महायान सम्प्रदायों ने उपनिषदों से ही प्रेरणा ली है । वेदान्त और
बौद्ध सिद्धान्त दोनों ही अद्वैती हैं । अमरकोष के अनुसार अद्वयवादी बुद्ध का
पर्यायवाची शब्द है । माया, अविद्या, पुनर्जन्म, ब्रह्म, निर्वाण आदि की
धारणाएँ वेदान्त तथा बौद्ध धर्म में समान रूप से देखी जा सकती हैं ।
'कोशसञ्चय' शब्द के द्वारा कपाली का व्यंग्य भी प्रकट होता है
कि बुद्ध ने लोगों के देखते-देखते ही धनसञ्चय कर लिया ।
दृष्टानि वस्तूनि (श्लोक १३; पृ० ४४) —
बौद्धों के अनुसार जगत् की सत्ता सांवृतिक है, इस जगत् का अस्तित्व
नहीं है । इस संसार की सभी वस्तुएँ पृथ्वी, समुद्र, पर्वत इत्यादि जो दिखाई
देती हैं अविद्या के आवरण के कारण दिखाई देती हैं । वास्तव में उनका
कोई अस्तित्व नहीं है, सब शून्य है । योगाचार और माध्यमिक सम्प्रदाय
के लोग इस बाह्य जगत् की सत्ता को स्वीकार नहीं करते हैं ।
नहि प्रतिज्ञामात्रेण (पृ० ४४)—
अनुमान के पाँच अवयव होते हैं:- प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपगम
और निगमन । इनसे हेतुवादियों का अनुमान पूरा होता है । प्रतिज्ञा
(dogmatism) तो मात्र पहला ही अवयव है, अतः केवल अवयव से अनुमान
पूरा नहीं होता है ।
प्रत्यक्षे (पृ० ४८)—
'प्रत्यक्षे किं प्रमाणम्' ? अर्थात् जहाँ प्रत्यक्ष है वहाँ किसी दूसरे प्रमाण
की आवश्यकता नहीं है ।
टिप्पणियाँ ७८
आस्थाय प्रयतो (श्लोक १७; पृ० ५०) —
अत्यन्त प्राचीन काल में समस्त लोक और उनमें विद्यमान सभी कुछ
एक समुद्र में जलमग्न हो गए। सूर्य, चन्द्रमा, तारे, वायु, अग्नि और घास
तथा झाड़ियाँ भी जल में डूब गए। समस्त संसार में घोर अन्धकार व्याप्त
हो गया। भगवान् (Supreme Being) सहस्रों रात्रियों से घोर निद्रा में
लीन थे। रात्रि के अन्त में रजोगुणमय होकर सृष्टि की रचना के लिए उद्यत
हुए। समस्त वेदों और वेदांगों के ज्ञाता वे भगवान् पाँच अद्भुत मुखों सहित
प्रकट हुए। इसी प्रकार तीन नेत्रों वाला जटाधारी, त्रिशूल हाथ में लिए
रुद्राक्ष माला पहने तमोगुण सम्पन्न पुरुष (The Male Creative Energy)
उत्पन्न हुआ। तब महात्मा (Supreme Spirit) ने अहङ्कार (Egoism)
को उत्पन्न किया। इससे ब्रह्मा और शिव दोनों प्रभावित हुए। अहङ्कार से
अभिभूत हुए ब्रह्मा और शिव दोनों में कलह हुआ जिसके फलस्वरूप भगवान्
(The Lord) का जन्म हुआ। जन्म के तुरन्त पश्चात् भगवान् ने एक
अद्वितीय बांसुरी ली और उसे बजाते हुए आकाश में चले गए। जब ब्रह्मा
से परास्त हुए शिव क्रोधित हुए खड़े थे तब ब्रह्मा के पाँचवे मुख ने कहा कि
'तीन नेत्रों वाले, रजोगुणमय वायु का वेष धारण करने वाले, वृषभ पर
सवारी करने वाले तुम संसार के संहारक हो।' शिव ने क्रोधावेश में अपने
तृतीय नेत्र की अग्नि से ब्रह्मा को भस्म करना चाहा। ब्रह्मा के मुख सूर्य
की तरह चमक रहे थे। उन्होंने शिव से कहा—'जब तुम जल पर प्रहार करोगे
तब बुलबुले निकलेंगे, पर क्या उनमें शक्ति होगी ?' इस पर शिव ने अत्यन्त
क्रोधित होकर अपने नख से ब्रह्मा के सिर को काट दिया।
—वामनपुराण, अध्याय २
नाथोऽपि त्रिदिवौकसाम् (पृ० ५०)—
इन्द्र द्वारा त्रिशिरा के सिर काटने की कथा देवीभागवतपुराण में इस
प्रकार आती है—
प्राचीन काल में त्वष्टा नाम के विख्यात प्रजापति थे। यद्यपि पूत-
स्वभाव वाले वे ब्राह्मणों व देवों की उन्नति में रुचि रखते थे, फिर भी वे
देवराज इन्द्र के विरोधी थे। अतः उन्होंने इन्द्र के संहार का विचार किया।
तब अपनी रचना से विश्वरूप नाम का एक शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न किया।
उसके तीन सिर थे। इसलिए उसका नाम त्रिशिरस् पड़ा। इन तीन सिरों का
८० मत्तविलास-प्रहसन
प्रयोग वह एक ही बार में तीन कार्यों के लिए कर सकता था । एक का प्रयोग
वह वैदिक मन्त्रों के उच्चारण के लिए, दूसरे का मदिरा पीने के लिए और
तीसरे सिर का प्रयोग वह संसार देखने के लिए कर सकता था । बाल्यावस्था
से ही उसे सांसारिक सुखों से विरक्ति हो गई थी । वह भोजन का त्यागकर
तप करता था । ग्रीष्म ऋतु में अग्नि के मध्य बैठकर और शीत ऋतु में ठंड़े
पानी में बैठकर और कभी शीर्षासन लगाकर तप करता था । उसके इस प्रकार
के कठोर तप को देखकर इन्द्र को भय होने लगा । फलस्वरूप उसकी तपस्या
भङ्ग करने के लिए इन्द्र ने स्वर्ग की अप्सराएँ भी भेजीं परन्तु सब प्रयत्न
व्यर्थ गए । तब इन्द्र स्वयं अपने ऐरावत हाथी पर चढ़कर गए और अपने
वज्रायुध से त्रिशिरस् को मार दिया । परन्तु इस भय से कि कहीं अपने तप
के प्रभाव के कारण वह पुनर्जीवित न हो जाए, इन्द्र ने अपने समीपस्थ एक
बढ़ई से त्रिशिरस् के तीनों सिरों को उसके शरीर से अलग करके लाने के
लिए आदेश दिया । आदेशानुसार उस कर्मकार ने सिरों को काट दिया ।
परन्तु जैसे ही एक-एक सिर कटकर पृथ्वी पर गिरा, उनसे विभिन्न प्रकार
के पक्षी भागते हुए दिखाई दिए । जिस सिर से वह वैदिक मंत्रों का
उच्चारण करता था उससे कपिञ्जल नामक पक्षी, जिससे वह मदिरा पीता
था उससे कलपिङ्ग नामक पक्षी और संसार का निरीक्षण करने वाले सिर से
तित्तिरि नामक पक्षी उड़े । तब इन्द्र को यह पूर्ण विश्वास हो गया कि
त्रिशिरस् निश्चित रूप से मारा गया है ।
आगमानुगतमभिहितम् (पृ० ५०)—
निगम वेद हैं और वेदों को छोड़कर जिन ग्रन्थों को प्रमाण माना
जाता है वे आगम कहलाते हैं । ये तान्त्रिक ग्रन्थ हैं । शैवागम, शाक्तागम,
बौद्धागम, जैनागम इत्यादि ।
मायासन्तानसम्भवाः (पृ० ५२)—
'माया' शब्द श्लेषार्थक है । एक ओर बुद्ध की माता मायादेवी का
सङ्केत है—माया के पुत्र, अर्थात् बुद्ध के अनुयायी और दूसरी ओर बुद्ध
के मायावाद पर व्यंग्य है ।
दानपारमिता (पृ० ५२)—
पारमिता शब्द का अर्थ है 'पूर्णत्व' । पारमिताएँ छः होती हैं—दान,
शील, क्षान्ति, वीर्य, ध्यान तथा प्रज्ञा ।
टिप्पणियाँ ८१
महायान ग्रन्थों के अनुसार जो बुद्धत्व की प्राप्ति के लिए यत्नवान्
है अर्थात् जो बोधिसत्व है, उसे षट्पारमिता का ग्रहण करना चाहिए। इन
षट्पारमिताओं का अर्जन बुद्धत्व प्राप्ति का नैसर्गिक उपाय है। षट्-
पारमिता में प्रज्ञा का प्राधान्य है। प्रज्ञापारमिता यथार्थज्ञान को कहते हैं।
प्रज्ञा की प्राप्ति के लिए ही अन्य पारमिताओं की शिक्षा कही गई है। ये
पञ्चपारमिताएँ प्रज्ञा रहित होने पर लौकिक कहलाती हैं। जब पञ्च-
पारमिताएँ प्रज्ञापारमिता से समन्वगत होती हैं तभी वह सचक्षुक कहलाती
हैं और उसको लोकोत्तर संज्ञा प्राप्त होती है। प्रज्ञा की प्रधानता होते हुए भी
अन्य पारमिताओं का ग्रहण नितान्त आवश्यक है। सम्बोधि की प्राप्ति में
दान प्रथम कारण है, शील दूसरा। आत्मभाव का त्याग तथा निस्वार्थ बुद्धि
की प्रकृष्टता दानपारमिता है। दान, शील की अनुपालना क्षान्ति द्वारा
होती है। दानादि त्रितय पुण्यसंभार, वीर्य अर्थात् कुशलोत्साह के बिना नहीं
हो सकता; और बिना ध्यान अर्थात् चित्तैकाग्रता के प्रज्ञा का प्रादुर्भाव नहीं
होता क्योंकि समाहित चित्त होने से ही यथाभूत परिज्ञान होता है जिससे
सब आवरणों की अत्यन्त हानि होती है।³
भरतवाक्यम् (पृ० ६२)—
इससे नाट्याभिनय की समाप्ति पर सामाजिकों के लिए नट के द्वारा
आशीर्वाद दिया जाता है।
१. प्रस्तावना के अनन्तर वे नट ही नाट्य के विभिन्न पात्रों के
रूप में रङ्गशाला में प्रकट होते हैं। अभिनय की समाप्ति पर उसी
पहले रूप में प्रकट होना सम्भव नहीं होता है; अतः नटवाक्य न कहकर भरत-
वाक्य कहा जाता है।
२. नाट्यशास्त्र के रचयिता भरत मुनि की स्मृति में पुनः यह नट-
वाक्य भरतवाक्य कहा जाता है।
राजन्वान् (श्लोक; पृ० ६२)—
राजन् शब्द से राजवत् और राजन्वत् दोनों शब्द बनते हैं। राजवत्
शब्द का अर्थ है 'केवल राजा से युक्त' अर्थात् उस देश का राजा उत्तम नहीं
है; और जो देश न्यायपरायण तथा उत्तम राजा द्वारा शासित है वह
राजन्वत् है—
सुराज्ञि देशे राजन्वान् स्यात् ततोऽन्यत्र राजवान् । —अमरकोषः ।
३. आचार्य नरेन्द्रदेव, बौद्ध-धर्म-दर्शन', पृ० १८४ ।
श्लोक-सूची
श्लोक संख्या पृष्ठ
अजिह्मैः सारगुरुभिः १८ ५२
अनतिशयमनन्तं ९ ३०
आकरे सूक्तिरत्नानाम् ४ २६
आवृतं बहि- १६ ५०
आस्थाय प्रयतो १७ ५०
उद्भिन्नरोमाञ्चकपोलरेखम् ५ २४
उद्भिन्नश्रमवारिबिन्दु- ६ २६
कार्यस्य निःसंशयम् ८ ३०
गृहीतशूला १९ ५६
चिरं मया २१ ६०
तां क्षौरिकस्य १४ ४६
दृष्टानि वस्तूनि १३ ४४
निर्विष्टोज्झित- २० ५६
पेया सुरा ७ २८
प्रज्ञादानदया- ३ २४
भाषावेषवपुः १ २२.
मिथ्यात्रिलोचन- १० ३२
यदेतदासीत् १५ ५०
येन मम पानभोजन- ११ ३४
विरोधः पूर्वं- २२ ६२
वेदान्तेभ्यो १२ ४०
शश्वद् भूत्यै २३ ६२
सम्प्रति सङ्गीतघनः ५ २६
सन्दर्भ-ग्रन्थ-सूची
मत्तविलासप्रहसन (आवृत्तियाँ)
- Giri, Sri Kapildev : Mattavilāsa Prahasana; Varanasi, 1966.
- Unni, N.P., (ed. and tr.) : Mattavilāsa Prahasana of Mahen-
dravikrama Varman, Trivandrum, 1974.
संस्कृत-ग्रन्थ
अभिनवगुप्त : 'अभिनवभारती' सं० डा० नगेन्द्र, दिल्ली
विश्वविद्यालय, दिल्ली, १६६० ।
दण्डी : 'काव्यादर्श', दिल्ली, १६७३ ।
भरत : 'नाट्यशास्त्रम्' (काव्यमाला ४२), भारतीय
विद्या प्रकाशन, दिल्ली, १६८३ ।
मम्मट : 'काव्यप्रकाश', दिल्ली, १६६६ ।
विश्वनाथ : 'साहित्यदर्पण', वरेली, १६७६ ।
शुभङ्कर : 'सङ्गीतदामोदर', कलकत्ता, १६६६ ।
हिन्दी-ग्रन्थ
गैरोला, वाचस्पति : 'भारतीय नाट्य-परम्परा और अभिनयदर्पण',
संवर्तिका प्रकाशन, इलाहाबाद, १६७१ ।
गैरोला, वाचस्पति : 'संस्कृत साहित्य का इतिहास', इलाहाबाद, १६६० ।
नरेन्द्रदेव, आचार्य : 'बौद्ध-धर्म-दर्शन', पटना, १६५६ ।
त्रिपाठी, रमाकान्त : 'संस्कृत-नाट्य-सिद्धान्त', वाराणसी, १६६६।
अंग्रेजी-ग्रन्थ
Diskalkar, D.B. : Selections from Sanskrit Inscriptions (2nd
century to 8th century A.D.), Delhi, 1977.
Gopalan, R. : History of the Pallavas of Kāñchī, Madras,
Mani, Veṭṭam : Puranic Encyclopaedia, Delhi, 1975.
Śāstrī, N. K. : A History of the South India, Madras, 1955.
कोष
अमरसिंह : 'अमरकोष', १६७२ ।
आप्टे, वी०एस० : 'संस्कृत हिन्दी कोष', दिल्ली, १६६६ ।
शुद्धि-पत्र
पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध शुद्ध
३ ७ प्रसार प्रकार
३ २० उपदेशपेरक उपदेशपरक
७ ६ वेषभाषाषिः वेषभाषाभिः
८ ७ परस्य परस्थ
८ १७ अड्डों अङ्गों
११ १३ बल्लम वल्लम्
१३ १ सम्बन्ध सन्दर्भ
१३ २२ काल्पनिक कापालिक
१४ ११ सांपृतिक सांवृतिक
१५ ३ काम काय
१५ २०, २३ जैनों जैनियों
१६ १५ शाक्तभिक्षू शाक्यभिक्षु
१७ ३, ७ वभ्रु कल्प बभ्रु कल्प
१७ २१ है हैं
२१ १० भममिति भयमिति
२७ १ बाली वाले
२७ १६ करता ) करता है )
५० २५ पुरायताम् पुण्यताम्
५२ ३ निमितम् निर्मितम्
५४ २६ खादितुकाओ खादितुकामो
५६ १६ चीवघररो चीवरधरो
६३ २१ विधिपूवॅक विधिपूर्वक
८० ८ अयने अपने
८० २६ अनुयामी अनुयायी
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