मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
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यह वस्तुतः कपाली की कल्पना मात्र है, वास्तविकता नहीं।
स्नेहात्मिका (पृ० ३२)—
द्रवीभूत । स्नेह—तेल, द्रव ।
प्रस्तुत श्लोक की अन्तिम पङ्क्ति वर्ण-साम्य के कारण कालिदास का
अनुकरण करती है —
'सेयं प्रिये ! मदयति प्रसभं मनांसि' । —मत्तविलास
'मायूरी मदयति मार्जना मनांसि' । —मालविकाग्निमित्रम्, १.२१
अभितापवशात् (पृ० ३२)---
गर्मी के कारण ।
आपद्धर्मम् (पृ० ३४)—
विपत्ति के समय का धर्म ।
विपत्ति के अवसर पर जब शास्त्रों में निर्दिष्ट कर्त्तव्य का पालन
करना कठिन हो उस समय आपद्धर्म को प्रमाण मानकर वह निषिद्ध कार्य
किया जा सकता है। जैसे एक बार दुर्भिक्ष पड़ने पर महर्षि विश्वामित्र को
जब कहीं भोजन प्राप्त नहीं हुआ तब अपने प्राणों की रक्षा के लिए उन्होंने
श्वान का मांस भक्षण, इसी आपद्धर्म को प्रमाण मानकर किया (महाभारत,
शान्तिपर्व, १४१) ।
उसी प्रकार देवसोमा का कहना है कि जब भिक्षा-पात्र कपाल नहीं
मिल रहा है तो आदरपूर्वक लाई गयी भिक्षा का तिरस्कार न करके
आपद्धर्म को प्रमाण मानकर गोसींग में भिक्षा स्वीकार करनी चाहिए।
गोशृङ्गेण (पृ० ३४)—
कापालिकों के पास गाय के सींग से बना भी एक पात्र रहता था
जिसका वे समय पड़ने पर उपयोग कर सकते थे, भिक्षा आदि ग्रहण कर
सकते थे ।
उपासकस्य (पृ० ३६)—
बौद्ध धर्म में उपासक और भिक्षु—इन दो प्रकार के अनुयायियों का
उल्लेख मिलता है । जो लोग गृहस्थ होते हैं, और सन्यासी नहीं हैं, उनको
उपासक कहा जाता है और जो सन्यास धर्म में रहने वाले बौद्ध हैं वे भिक्षु
कहलाते हैं। जैनों में उपासक को श्रावक और भिक्षु को मुनि कहा जाता है।