सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)

Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I

पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 100 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 83

मत्तविलास-प्रहसन ७१
ये ब्रह्मचर्य-केशनिर्लोटन••••(पृ० ३०)—
यहाँ जैन धर्म के नियमों की ओर संकेत है। ब्रह्मचर्य का पालन
करना, बालों का लुंचन करना अर्थात् एक-एक करके बालों को उखाड़ना,
मल धारण करना अर्थात् शरीर को मलिन रखना, भोजन के समय का
नियम अर्थात् सूर्यास्त से पहले ही भोजन करना, मैले वस्त्र पहनना आदि
जैन धर्म के नियम हैं। वे लोग कायक्लेश (शारीरिक कष्ट) पर बल देते
हैं। जहाँ एक ओर बुद्ध ने आत्यन्तिक भोग और त्याग को छोड़कर मध्यम
मार्ग को स्वीकार किया तो दूसरी ओर जैनों ने आत्यन्तिक त्याग के मार्ग
को अपनाया।
अनतिशयमनन्तं••••(श्लोक ६; पृ० ३०) —
जिन ऋषि मुनियों ने परमतत्त्व परमानन्द का साक्षात्कार कर लिया
है, उनके अनुसार तपस्या से प्राप्त मोक्ष रूपी सुख अनतिशय अर्थात् अतिशय
से रहित है। उसके बराबर अन्य कोई सुख नहीं है। वह सुख अन्तरहित
है। कपाली का कहना है कि वैसा ही, मुनियों द्वारा वर्णित सुख यहाँ
काञ्चीपुरी में भी पूर्णरूपेण विद्यमान है। परन्तु फिर भी दोनों सुखों में
अन्तर है। काञ्ची का सुख इन्द्रिय-भोग्य और काम-भोग्य है जबकि मोक्ष
रूपी सुख इन्द्रियगम्य नहीं है। कपाली के अनुसार काञ्ची का सुख तपस्या
से प्राप्त सुख से भी बढ़कर है।
एष सुरापणो••••••(पृ० ३२)—
यहाँ मदिराशाला की तुलना यज्ञ स्थल से की गई है। यज्ञ स्थल
पर पताका युक्त एक खम्भा होता है जिससे बलि के पशु को बाँधा जाता है;
यहाँ मद्यशाला में भी पताका लगा हुआ स्तम्भ स्थित है।
सोमः —
सोमरस, मधु इत्यादि पेय पदार्थ होते हैं जो देवताओं को अर्पित किए
जाते हैं। यहाँ मद्यशाला की मदिरा की तुलना सोमरस से की गई है।
ऋत्विजः —
ऋत्विक् पुरोहित होते हैं जो यज्ञ करते हैं। मदिराशाला के
दुकानदार (शोण्डाः) ऋत्विक् तुल्य हैं। चमसाः—सोमपान करने का लकड़ी
के चमचे के आकार का यज्ञ का पात्र होता है। चषकाः—चमड़े का पात्र
जिसमें मदिरा आदि पीते हैं—सुरापात्र, प्याला।