मत्तविलास प्रहसनम् (पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रमवर्मा - कांचीपुरम सामाजिक व्यंग्य संस्कृत-हिन्दी सटीक)
Mattavilasa Prahasana of Mahendravarman I
पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रमवर्मा (व्याख्या: रानी मजूमदार) द्वारा
पृष्ठ 84, कुल 100 में से
संदर्भ में पढ़ें७२ टिप्पणियाँ
हविः —
पुरोडाश आदि विशेष प्रकार का आहार है जो देवताओं को यज्ञ के
अवसर पर अर्पित किया जाता है । मदिराशाला में शूली पर पका हुआ मांस
आदि भोज्य पदार्थ ही मानों हवि स्वरूप है ।
यजूंषि—
यजुर्वेद के मन्त्रः मदिरा पीने पश्चात् नशे में चूर लोगों के प्रलाप
(मत्तवचनानि) ही मानों यजुर्वेद के मन्त्र हैं ।
सामानि—
सामवेद । यज्ञ के अवसर पर सामवेद के मन्त्रों का सस्वर गान
(पाठ) होता है; मद्य पान के पश्चात् मतवालों के गाने सामवेद के गानों के
सदृश हैं ।
उदङ्कः —
तेल आदि रखने के लिए चमड़े का बना हुआ बर्तन, कुप्पा ।
स्रुवाः —
यज्ञ का चमचा ।
तर्षोऽग्निः —
मदिरा की तृष्णा अग्नि तुल्य है । जैसे यज्ञाग्नि में घृत, हवि आदि
डालने से वह और अधिक प्रज्ज्वलित होती है उसी प्रकार मदिरा की तृष्णा
भी स्वतः तीव्र होती जाती है ।
सुरापणाधिपतिः —
मद्यशाला का स्वामी यजमान स्वरूप है ।
मिथ्यात्रिलोचनपावकेन (श्लोक १०; पृ० ३२)—
यह पौराणिक कथा प्रसिद्ध है कि शिव की तपस्या भङ्ग करने के लिए
कामदेव ने नृत्य किया जिसके फलस्वरूपं शिव ने क्रुद्ध होकर अपने तृतीय
नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया और तभी से वह अनङ्ग
कहलाए । यहाँ कपाली यह कल्पना करता है कि कामदेव के विषय में प्रचलित
यह कथा झूठी है । उसके अनुसार कामदेव का शरीर भस्म नहीं बना अपितु
शिव के तीसरे नेत्र की गर्मी से वह शरीर, द्रव रूप में परिणत हो गया । उस
द्रवीभूत पदार्थ ने मदिरा का रूप धारण कर लिया । वही मदिरा मन को
अत्यधिक मतवाला बना देती है ।